नई दिल्ली: भारत में भ्रष्टाचार-रोधी संस्था लोकपाल ने अपने सदस्यों के लिए सात BMW कारों की खरीद से जुड़ा टेंडर विवाद बढ़ने के बीच वापस ले लिया है। टेंडर को लेकर पिछले करीब दो महीने से काफी विवाद मचा हुआ था। खासकर विपक्षी दल और सिविल सोसायटी की ओर से इस फैसले को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे। आखिरकार बढ़ते दबाव के बीच विवादित टेंडर वापस ले लिया गया है।
CNN-News18 की रिपोर्ट के अनुसार टेंडर को 17 दिसंबर 2025 को रद्द किया गया, जिसकी प्रति चैनल को मिली है। ऑर्डर में कहा गया है कि टेंडर ‘प्रशासनिक कारणों/समस्याओं’ की वजह से रद्द किया गया है और यह फैसला लोकपाल की फुल बेंच के 27 नवंबर, 2025 के प्रस्ताव के जरिए लिया गया था।
भारत के लोकपाल को अपने सात सदस्यों के लिए सात BMW कारें खरीदनी थीं, और पिछले अक्टूबर में इसके लिए टेंडर जारी किया गया था। इसके बाद से इस फैसले को लेकर विवाद शुरू हो गया था। यह बात सामने आई थी कि भारत का लोकपाल लगभग 70-70 लाख रुपये की सात हाई-एंड BMW कारें खरीदना चाहता था और इसके लिए 16 अक्टूबर को एक आधिकारिक टेंडर जारी किया था।
कुल बजट का 10 प्रतिशत से ज्यादा कारों पर खर्च होता
कारों की खरीद पर कुल खर्च लगभग 5 करोड़ रुपये का था, जिसकी आलोचना शुरू हो गई थी। अगर लोकपाल यह खरीद करता, तो वह सात BMW कारों की खरीद पर लगभग 5 करोड़ रुपये खर्च करता, जो उसके सालाना बजट का 10 प्रतिशत से ज्यादा होता। दस्तावेजों के अनुसार, 2025-26 के लिए लोकपाल का कुल बजट 44.32 करोड़ रुपये है।
दिलचस्प बात यह है कि 2023-24 के लिए लोकपाल के बजट और खर्च के अनुसार मोटर वाहनों के लिए 12 लाख रुपये का बजट रखा गया था। हालांकि, लोकपाल ने 2023-24 में मोटर वाहनों पर कोई पैसा खर्च नहीं किया। इस पर दिखाया गया असल खर्च ‘शून्य’ है।
पूर्व IPS अधिकारी और कभी जन लोकपाल की समर्थक रहीं किरण बेदी ने भी BMW खरीदने के लोकपाल के फैसले की आलोचना की थी। वहीं, इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने लोकपाल को ‘शौक पाल’ तक कह दिया था। नीति आयोग के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत ने टेंडर रद्द कर भारत में बनने वाली इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की मांग की थी।
जारी टेंडर के अनुसार लोकपाल चाहता था कि ये कारें दिल्ली के वसंत कुंज इंस्टीट्यूशनल एरिया में उसके ऑफिस में दो हफ्ते के अंदर डिलीवर हो जाएं, लेकिन लोकपाल द्वारा सप्लाई ऑर्डर जारी करने की तारीख से 30 दिनों से ज्यादा देर न हो।
गौरतलब है कि लोकपाल अभी एक सात सदस्यीय संस्था है जिसमें एक अध्यक्ष और छह अन्य सदस्य हैं। भारत का लोकपाल अपनी तरह का पहला संस्थान है जिसे लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 के तहत स्थापित किया गया है, ताकि उन सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच और छानबीन की जा सके जो अधिनियम के दायरे में आते हैं।
वर्तमान में लोकपाल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ए.एम. खानविलकर हैं। मौजूदा नियमों के अनुसार लोकपाल में एक अध्यक्ष के साथ अधिकतम आठ सदस्य हो सकते हैं, जिनमें चार न्यायिक और चार गैर-न्यायिक हो सकते हैं।

