Friday, March 20, 2026
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थार की कहानियां: मगद, साकर बाटी से गोंद के लड्डू तक…रेगिस्तान के मीठे पकवान

मारवाड़ की मिठाइयों की लिस्ट बहुत लंबी है। घेवर, लापसी, मालपुआ, पोकरण की चमचम, लूणी के रसगुल्ले, आबूरोड की रबड़ी, पाली का गुलाब हलवा, मावे की कचौरी तो बस कुछ उदाहरण भर हैं।

बाड़मेर में तब मीटर गेज रेल लाइन थी। सीधी रेल सेवा बहुत कम थी। बड़ी मुश्किल से जोधपुर ही पहुंचा जा सकता था। सुबह छः बजे जोधपुर के लिए एक लोकल चलती थी। मूलजी भी अपना थैला उठाए जनरल डिब्बे में बैठ गए। अढ़ाई सौ किलोमीटर के सफर में ये रेल आधा दिन तो लगा ही देती थी।

वो मोबाइल और सोशल मीडिया का भी दौर नहीं था तो लोग आपस में बंतल (बातचीत) भी खूब करते थे। समय गुजारने का और कोई तरीका भी नहीं था। अनजान लोग भी सफर पूरा होने तक खास परिचित हो जाते थे।

मूल जी भी हथाई (बातों) के शौकीन। डिब्बे में ज्यादा भीड़ नहीं थी। थोड़ी दूर गाड़ी चलने पर मूल जी ने अपना थैला खोला और उसमें से कपड़े की पोटली निकाली। पोटली खोली तो उसमें बाजरी की रोटी, घी और गुड़ का चूरमा था। सबको मनवार करके फिर खाने लगे। साथ में बैठी सवारियों में एक सवारी पश्चिम बंगाल की थी। वो सीमा सुरक्षा बल में नौकरी करते थे, अभी छुट्टियों में घर जा रहे थे। बाड़मेर सीमावर्ती जिला है सो यहाँ सीमा सुरक्षा बल और भारतीय सेना की कई टुकड़ियों तैनात है।

बाजरी का चूरमा

तो वो चूरमा जब बीएसएफ के सिपाही को खिलाया तो उसे बड़ा स्वाद लगा। उसने कहा “ये एकदम नया स्वाद चखा मैंने। क्या चीज है ये, यह कैसे बनती है “

मूल जी ने बताया “ये हमारे यहाँ का देसी चूरमा कहलाता है। बाजरे की रोटी को चूर लेते है, फिर घी और गुड़ मिलाते है, बस बन गया चूरमा। और ये कई कई दिनों तक खराब नहीं होता। आपकी बंगाली मिठाई तो बड़ी जल्दी खट्टी पड़ जाती है।”

सिपाही बोला “ठीक कहते हैं आप, हमारे वहाँ की मिठाई 24 घंटे में खानी होती है या फिर फ्रिज में रखे तो फिर भी कुछ दिन चल जाती है।”

सिपाही ने ही जिज्ञासा वश आगे पूछा “मुझे कोई साल भर हुआ है यहाँ पोस्टिंग हुए, पर मैंने तो ये चूरमा किसी मिठाई की दुकान पर नहीं देखा। दुकानों पर तो हमारी बंगाली मिठाईयां ही नजर आती है।”

मूल जी ने कहा “ठीक कहते है आप। चूरमा ही नहीं यहाँ कि अनेक देसी मिठाईयां है जो हर शुभ अवसर पर पीढ़ियों से बन रही है, वो भी दुकानों पर नहीं मिलती। कारण तो मुझे भी पता नहीं। पर लगता है हम उनका अच्छे से व्यापारिकरण नहीं कर पाए। जैसे हम हैं वैसी हमारी मिठाईयां। सीधी सादी, तड़क भड़क से दूर , शायद इसीलिए दुकान वालों को मुनाफे का सौदा न लगता हो।”

बड़ी अच्छी चर्चा चल पड़ी थी। साथ वालो को भी रस आने लगा था। जोधपुर अब भी काफी दूर था। सिपाही ने ही बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि “कृपया यहाँ के प्रामाणिक मीठे पकवानों के बारे में विस्तार से बताइए न !”

अंधा क्या चाहे, दो आँखें। और मूल जी क्या चाहे खूब सारी बातें। तो मूल जी ने शुरू की व्यंजन व्याख्यान माला।

मगद

कहने लगे “हमारे यहाँ हर शुभ अवसर पर मगद जरूर बनता है। चूरमे का ही झीना रूप है, पर बनाने की विधि अलग है और स्वाद भी एकदम जुदा। नई दुल्हन जब अपने ससुराल आती है, तब बड़ी बड़ी कोठियां भरकर मगद साथ लाती है। पूरे गांव में वो मगद बांटा जाता है। सबको पता चल जाता बिनणी आ गई है। फिर सब देखने आते, मिलने आते। ये सिलसिला चलता रहता है। गेहूँ के आटे में गर्म पानी और थोड़ा सा घी मिलाकर सेकते है। फिर ठंडा होने पर घी और चीनी का बूरा मिला लेते। हो गया मगद तैयार। “

साकर बाटी

“फिर जो सबसे खास मिठाई है वो है “साकर बाटी” इसे मिश्री रोटी भी कहते है। अधिकतर राजपूत परिवारों में ही बनती है। जंवाई आदि मेहमान आते हैं तो उनके लिए बनती है। और बेटी जब सुसराल जाए तो उसके साथ भी बनाकर भेजते है। मैदे का आटा, घी और चीनी बराबर मात्रा में लेकर रोटी बनाते हैं। चूल्हे पर लोहे का तवा रखना और उसके ऊपर पीतल की थाली रखनी होती है। एक तरफ से ही सेकते हैं। एक बर्तन में ठंडा पानी रखते है, बाटी सिक जाए तब गरम थाली को उसमें रखते है। फिर थाली में से बाटी निकाल लेते है। ऊपर से काजू, बादाम, बिरयाली से सजाते है। रंग से जंवाई और समधी समधन आदि का नाम भी लिखते हैं।”

बूंदी (नुखती)

“मगद की तरह बूंदी भी खूब बनती है। बड़े बड़े ड्रम भरकर एक दूसरे के यहाँ भेजते है। बेसन, चीनी और घी में बनती है। अब इसी बूंदी के लड्डू भी बनने लगे हैं।”

गोंद के लड्डू

“सर्दियों में गोंद के लड्डू बनते है। बहुत ही पौष्टिक। यहाँ जो देसी कीकर का पेड़ होता है उसपर गोंद आता है। चौहटन की तरफ का गोंद बड़ा प्रसिद्ध है। स्थानीय लोग ही उतारते है और बेचते है । बहुत कम जगहों पर ही असली गोंद मिल पाता है। फिर गोंद,कोपरा,तिजारा और सूखे मेवे पीस लेते है। गुड़ घी की चाशनी बनाकर, इसमें डाल देते हैं। लड्डू तैयार। पूरी सर्दी सुबह उठकर लोग इसे खाते है। इसे संधाना भी कहते है।”

खीच

“अक्षय तृतीया जिसे यहाँ आखातीज कहते है। इस दिन खीच बनता है। पानी उबालकर उसमें साबुत बाजरी पकाकर फिर गुड़ और घी मिलाकर खाते है। है न आसान! सब बहुत कम संसाधन में बनने वाली मिठाईयां हैं। अभावों का मुल्क है तो उसके अनुसार ही सब ने अपने आप को ढाल लिया है।”

मातर

“स्थानीय लोक देवता के दिन मातर बनती है। गुड और घी की चाशनी में गेंहू का आटा डालकर बनती है। इसके बाद थाली में बिछाकर चाकू से चौकोर काट लेते हैं।”

गुड़ राब

“घी और गेहूँ का आटा सेंकना। बाद में गरम पानी डालना और चीनी डालना। सर्दियों में खूब खाते है। रोटी और पापड़ के साथ खाते हैं।”

गडरा के लड्डू

“गेहूँ का आटा, गोंद, बादाम, चीनी, तिजारा आदि से बनते हैं। चूंकि पाकिस्तान से लगते गडरा रोड़ कस्बे में बनते है इसलिए गडरा के लड्डू नाम से प्रसिद्ध है। आगे गडरा सिटी पाकिस्तान में है। इनकी बहुत मांग रहती है यहाँ तक कि मारवाड़ के लोग जो विदेशों में रहते है वो भी मंगवाते है। देश भर में तो जाते ही हैं।”

जैसलमेर के घोटुआ लड्डू

“गेहूँ के आटे,घी और चीनी से बनता है। पहले जिस बूंदी का जिक्र किया, उसे ही कूटकर फिर बनाते हैं। ये भी बड़े प्रसिद्ध है। जैसलमेर की मिठाइयों की दुकान पर नज़र आ जाएंगे।”

मावे की कचौरी

“कचौरी को अब तक आप नमकीन हो मानते होंगे। पर जोधपुर की मावे की कचौरी को लोग बड़े शौक से खाते हैं। ये बाहर से कुरकुरी, अंदर से रसीली होती है। सामान्यतः तीखी कचौरी में जैसे आलू प्याज आदि मसाला भर दिया जाता है इसमें उसकी जगह भुना हुआ मावा भर देते हैं। फिर ऊपर से चाशनी डालते है और गरमा गर्म खाते है। जोधपुर को हर मिठाई की दुकान में यह मिल जाएगी। मूल जी ने ठहाका लगाते हुए कहा कि आज जब जोधपुर उतरो न तो रेलवे स्टेशन के पास ही दुकान है, वहां खा लेना।”

कई देर तक अपनी पकवान पुराण सुनाने के बाद मूल जी बोले “फौजी साब हमारे मारवाड़ की मिठाइयों की लिस्ट तो अभी बहुत लंबी है। घेवर, लापसी, मालपुआ, पोकरण की चमचम, लूणी के रसगुल्ले, आबूरोड की रबड़ी, पाली का गुलाब हलवा आदि की सारी कहानी कहने बैठूंगा तो आपकी आगे की गाड़ी छूट जाएगी। अब जोधपुर आने ही वाला है। फिर कभी मुलाकात हुई तो और हथाई करेंगे।”

सिपाही ने भी सहमती में सिर हिलाते हुए कहा ” आपका मैं किन शब्दों में शुक्रिया करूं। आपने इतने अच्छे से अपने खान पान और उससे जुड़ी परंपराओं के बारे में बताया। आप मुझे अपना नाम और पता दीजिए, मैं डायरी में लिख लेता हूं। अगली बार जब छुट्टी से वापस आऊंगा तो आपसे जरूर मिलूंगा।”

मूल जी ने नाम पता लिखवाए और इतने में जोधपुर जंक्शन से कुलियों और ठेले वालों की आवाजें आने लगी। भोंपू से भी आवाज आ रही थी कि “यात्रीगण कृपया ध्यान दें बाड़मेर से चलकर वाया बालोतरा जोधपुर आने वाली गाड़ी प्लेटफार्म संख्या एक पर पहुंच चुकी है।”

महेंद्र सिंह तारातरा
महेंद्र सिंह तारातरा
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक। भाषा, इतिहास और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर सक्रिय।
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