आज हम एक ऐसे समय के साक्षी और सहभागी हैं, जब आलोचना और समीक्षा को या तो गैरज़रूरी मान लिया गया है, या फिर उन्हें प्रशंसा के सुरक्षित और सुविधाजनक दायरे में सीमित कर दिया गया है। आलोचना का अर्थ अब बहुधा अनुशंसा या प्रशंसा तक सिमट गया है। असहमति, प्रश्नाकुलता और मूल्यांकन की जगह शिष्ट मौन या उत्सवी भाषा ने ले ली है। यह स्थिति केवल साहित्यिक संसार की समस्या नहीं है। यह एक व्यापक सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक संकट का भी संकेत है, जहाँ सवाल पूछना असुविधाजनक और आलोचनात्मक दृष्टि रखना लगभग अपराध-सा मान लिया गया है।
जब सार्वजनिक विमर्श में निजी पसंद–नापसंद ही अंतिम कसौटी बन जाए और विचार, मूल्य तथा संरचनात्मक प्रश्न हाशिये पर चले जाएँ, तब आलोचना की आवश्यकता अपरिहार्य हो जाती है। आलोचना केवल कृतियों का मूल्यांकन भर नहीं है; वह साहित्यिक चेतना को सजग रखने का माध्यम भी है। वह लेखक, पाठक और समाज, तीनों के बीच एक जीवंत संवाद स्थापित करती है। किसी भी स्वतःस्फूर्त लोकतंत्र और स्वस्थ साहित्यिक पर्यावरण के निर्माण के लिए आलोचना अनिवार्य शर्त है, क्योंकि वही साहित्य को आत्मालोचनात्मक बनाती है और उसे अपने समय के प्रति जवाबदेह भी ठहराती है।
ऐसे कठिन और प्रायः आलोचना-विरोधी माहौल में, गंभीर आलोचनात्मक पुस्तकों का प्रकाशन एक सुखद और आश्वस्त करने वाली परिघटना के रूप में सामने आता है। यहाँ जिन पुस्तकों पर टिप्पणी की जा रही है, वे किसी पूर्वनिर्धारित चयन-दृष्टि का परिणाम नहीं हैं और न ही यह लेख 2025 की ‘श्रेष्ठ’ आलोचना-पुस्तकों का दावा करने वाला कोई सर्वेक्षण है। यह केवल उन कुछ आलोचना पुस्तकों पर एक टिप्पणी है, जिन्हें मैं इस वर्ष पढ़ सका। इसलिए इस टिप्पणी को प्रतिनिधित्व या निष्कर्ष की आकांक्षा से नहीं, बल्कि मेरे सीमित अनुभव और व्यक्तिगत पाठकीय संयोगों के संदर्भ में देखा जाना ही उचित होगा।
आलोचना के नये क्षितिज : रोहिणी अग्रवाल (कौटिल्य बुक्स, नई दिल्ली)
रोहिणी अग्रवाल की पुस्तक ‘आलोचना के नये क्षितिज’ कुछ चुनिंदा कृतियों के मूल्यांकन के बहाने आलोचना की बुनियादी भूमिका, नैतिक ज़िम्मेदारी और वैचारिक उपकरणों पर पुनर्विचार का प्रस्ताव रखती है। साहित्य, समाज, इतिहास, सत्ता-संरचनाओं और मनुष्य की अस्मिता के जटिल अंतर्संबंधों को केंद्र में रखकर आलोचना की नई संभावनाओं को रेखांकित करती यह पुस्तक आलोचना के पारंपरिक अनुशासन को चुनौती भी देती है। रोहिणी अग्रवाल आलोचना को एक सक्रिय, हस्तक्षेपकारी और नैतिक दायित्व-बोध से युक्त कर्म के रूप में देखती रही हैं। यह पुस्तक उनके उसी आलोचना कर्म का एक सार्थक विस्तार है। इस पुस्तक का दायरा स्त्री-विमर्श, जातीय अस्मिता, पितृसत्ता, राष्ट्रवाद, संस्कृति और आधुनिकता जैसे प्रश्नों तक फैला हुआ है। इस पुस्तक के साथ बौद्धिक और वैचारिक यात्रा करते हुए यह स्पष्ट होता है कि साहित्य अपने समय से कटा हुआ कोई स्वायत्त सौंदर्यलोक नहीं है। इसका मूल और अंतिम उद्देश्य समय की वैचारिक, राजनीतिक और सामाजिक शक्तियों से निरंतर संवाद स्थापित करना है। पुनर्पाठ रोहिणी अग्रवाल के लिए एक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक प्रविधि है। चाहे कामायनी हो, प्रेमचंद हों या स्त्री और आदिवासी लेखन, रोहिणी अग्रवाल किसी भी स्वीकृत निष्कर्ष को अंतिम सत्य नहीं मानतीं। वे बार-बार यह दिखाती हैं कि साहित्यिक कैनन कैसे बना है और किन आवाज़ों को उसने बाहर रखा है। यह प्रविधि उन्हें पारंपरिक हिंदी आलोचना से अलग करती है, जो प्रायः स्थापित निर्णयों की पुष्टि में लगी रही है।

यह पुस्तक स्त्री-दृष्टि को स्त्री-लेखन की सीमा से बाहर निकालकर एक वैचारिक उपकरण के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जिसके माध्यम से पुरुष लेखकों द्वारा रचित साहित्य, साहित्येतिहास और आलोचना की पितृसत्तात्मक पूर्वधारणाओं का पुनर्पाठ संभव हो पाता है। हिंदी साहित्य का इतिहास स्त्री-रचनाकारों की उपस्थिति को या तो हाशिये पर डाल देता है या उन्हें सीमित और सुरक्षित छवियों में बाँध देता है। मीराबाई, सुभद्राकुमारी चौहान और शिवरानी देवी जैसी रचनाकारों के संदर्भ में रोहिणी अग्रवाल का विश्लेषण इस तथ्य को उजागर करता है कि आलोचना की पुरुषवादी दृष्टि ने स्त्री-चेतना के विद्रोही और परिवर्तनकारी आयामों को जानबूझकर ओझल किया है।
रोहिणी अग्रवाल की समीक्षा-दृष्टि सहानुभूति और आलोचना के बीच संतुलन बनाए रखती है। वे न तो किसी लेखक या कृति को श्रद्धा-भाव से अभेद्य बना देती हैं और न ही वैचारिक असहमति के कारण उसे एकांगी रूप से खारिज करती हैं। उदाहरण के लिए, जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर उनका विस्तृत विवेचन इस संतुलित दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण है। वे कामायनी को एक महान काव्य मानते हुए भी उसमें निहित जातीय अस्मिता, पितृसत्तात्मक संरचना और मनुष्य की अवधारणा पर गंभीर प्रश्न उठाती हैं। इस प्रक्रिया में वे यह स्पष्ट करती हैं कि किसी कृति की महत्ता उसे आलोचनात्मक प्रश्नों से मुक्त नहीं कर देती। बल्कि महान कृतियाँ ही सबसे अधिक गहन आलोचना की माँग करती हैं। इस विस्तृत आलेख में रोहिणी अग्रवाल कामायनी को श्रद्धापूर्ण महाकाव्य-दृष्टि से देखने के बजाय उसे आधुनिक संदर्भों में रखकर कठोर आलोचनात्मक कसौटी पर परखती हैं। वे मनु के चरित्र के माध्यम से ‘मनुष्य’ की अवधारणा, जातीय अस्मिता और पितृसत्तात्मक सत्ता के अंतर्संबंधों को विश्लेषित करती हैं। पारंपरिक आलोचना जहाँ कामायनी को भारतीय संस्कृति और दर्शन की गौरवगाथा के रूप में देखती रही है, वहीं रोहिणी अग्रवाल उसमें निहित अधिनायकवादी प्रवृत्तियों, स्त्री-विरोधी संरचनाओं और संघर्ष-विमुख चेतना को उजागर करती हैं। उसी तरह प्रेमचंद संबंधी लेख में रोहिणी अग्रवाल पारंपरिक ‘महान यथार्थवादी’ छवि से आगे जाकर उनकी स्त्री-दृष्टि, नैतिक संरचना और सामाजिक दृष्टिकोण की सीमाओं को चिन्हित करती हैं। वे यह तो स्वीकार करती हैं कि प्रेमचंद ने सामाजिक अन्याय को साहित्य का केंद्रीय विषय बनाया, किंतु साथ ही यह भी दिखाती हैं कि उनकी रचनाओं में स्त्री प्रायः करुणा और त्याग की मूर्ति बनकर रह जाती है। पारंपरिक आलोचना जहाँ प्रेमचंद की सहानुभूति को उनकी प्रगतिशीलता का प्रमाण मानती है, वहीं रोहिणी अग्रवाल सहानुभूति और समानता के अंतर को रेखांकित करती हैं। इस प्रकार उनकी आलोचना प्रेमचंद को न नकारती है, न पूज्य बनाती है, बल्कि उन्हें एक ऐतिहासिक और वैचारिक संदर्भ में पुनः पढ़ने का आग्रह करती है।
रोहिणी अग्रवाल की भाषा वैचारिक रूप से सघन, तर्कपूर्ण और भावनात्मक रूप से संवेदी है। वे अकादमिक आलोचना की रूखी और शुष्क भाषा से बचते हुए एक ऐसी शैली विकसित करती हैं जिसमें वैचारिक स्पष्टता के साथ-साथ एक प्रकार की बौद्धिक उत्कंठा और नैतिक बेचैनी भी उपस्थित रहती है। उनके वाक्य सामान्यतः लंबे लेकिन विश्लेषणात्मक होते हैं। दार्शनिक संदर्भ और ऐतिहासिक दृष्टांतों से बनी उनकी भाषा पाठक से एकाग्रता और वैचारिक सहभागिता की माँग करती है। यह पुस्तक पाठक और आलोचक दोनों को, अपने पूर्वग्रहों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करती है। इसीलिए यह एक सामान्य आलोचनात्मक पुस्तक से ज्यादा हिंदी आलोचना की दिशा और भूमिका पर पुनर्विचार का गंभीर आमंत्रण भी है।
रोहिणी अग्रवाल आलोचना की एक वैकल्पिक और हस्तक्षेपकारी पद्धति के रूप में प्रतिष्ठित तो करती ही हैं, इस क्रम में पारंपरिक हिंदी आलोचना की उस प्रवृत्ति को चुनौती भी देती हैं जो साहित्य को ‘तटस्थ’ मानते हुए पितृसत्तात्मक पूर्वग्रहों को अदृश्य बना देती है। इस तरह रोहिणी अग्रवाल की आलोचना पुनर्पाठ और पुनर्मूल्यांकन की सजग वैचारिक प्रक्रिया की तरह सामने आती है, जो पारंपरिक आलोचना से आगे जाकर सत्ता-संरचनाओं को उजागर करती है।
समग्र रूप से देखा जाए तो ‘आलोचना के नये क्षितिज’ के ये लेख हिंदी आलोचना को सुरक्षित परंपरा से बाहर निकालकर एक सजग, प्रश्नवाचक और नैतिक रूप से उत्तरदायी अनुशासन के रूप में स्थापित करते हैं। रोहिणी अग्रवाल की आलोचनात्मक दृष्टि की विशेषता यही है कि वह साहित्य को समाज से काटकर नहीं, बल्कि समाज की जटिल असमानताओं के भीतर रखकर पढ़ने का साहस दिखाती है। साहित्य को मूल्य-निर्णय की स्थिर कसौटियों से मुक्त कर एक जीवंत, संघर्षशील और प्रश्नाकुल प्रक्रिया बनाती है। पारंपरिक हिंदी आलोचना जहाँ संतुलन, सौंदर्य और महानता की स्थापना में रुचि लेती रही है, वहीं आलोचना के नये क्षितिज आलोचना को असुविधाजनक प्रश्न उठाने वाला बौद्धिक हस्तक्षेप बना देती है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
कहानी से संवाद: रश्मि रावत (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली)
रश्मि रावत की पुस्तक ‘कहानी से संवाद’ हाल के वर्षों में प्रकाशित महत्वपूर्ण कहानियों पर केन्द्रित उनके आलोचनात्मक आलेखों का संकलन है, जो हंस में प्रकाशित हुई थीं। इसका महत्व केवल इस बात में नहीं है कि इसमें किन कहानियों की चर्चा की गई है, बल्कि इस बात में अधिक है कि उन्हें किस तरह पढ़ा गया है। यहाँ आलोचना रचना के ऊपर खड़ी होकर निर्णय सुनाने वाली सत्ता नहीं, बल्कि रचना के भीतर प्रवेश कर उसके अनुभव, तनाव और प्रश्नों से जूझती हुई एक सहभागी चेतना के रूप में उपस्थित है।
रश्मि रावत की आलोचना-पद्धति को समझने के लिए उसे पारंपरिक हिंदी आलोचना की पृष्ठभूमि में रखना आवश्यक है। परंपरागत आलोचना सामान्यतः रचना को उसके अवयवों—कथानक, पात्र, शिल्प, भाषा, प्रतीक, दृष्टिकोण आदि में विभाजित कर, एक अपेक्षाकृत तटस्थ और संरचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करती रही है। वहाँ आलोचक का लक्ष्य रचना के कलात्मक संतुलन या सफलता–असफलता को निर्धारित करना होता है। इसके विपरीत कहानी से संवाद में रश्मि रावत आलोचना को किसी पूर्वनिर्धारित पद्धति या स्थिर कसौटी का अनुप्रयोग नहीं बनातीं, बल्कि उसे रचना और समय के बीच एक जीवंत, बेचैन और नैतिक संवाद के रूप में विकसित करती हैं। यही बिंदु उन्हें पारंपरिक आलोचना से मूलतः भिन्न करता है।

रश्मि रावत आलोचना को प्रश्नमूलक बनाती हैं, न कि निर्णयात्मक। पारंपरिक आलोचना जहाँ यह बताने की चेष्टा करती है कि ‘कहानी क्या है’ और ‘कितनी सफल है’, वहीं रश्मि रावत यह पूछती हैं कि कहानी हमारे समय के बारे में क्या खोलती है और किन सवालों को हमारे सामने छोड़ देती है। उदाहरण के लिए, प्रीति प्रकाश की कहानी ‘राम को जन्मभूमि मिलनी चाहिए’ पर लिखते हुए वे केवल कथानक या कहानी की यथार्थवादी प्रस्तुति की चर्चा नहीं करतीं, बल्कि यह भी कहती हैं कि जीते-जागते राम नाले में डूबकर मर रहे हैं और व्यवस्था मिथकीय राम की चिंता में व्यस्त है। यहाँ आलोचना रचना की शिल्पगत विशेषताओं से आगे बढ़कर समकालीन सत्ता-राजनीति और उसकी सांस्कृतिक प्राथमिकताओं से सीधा संवाद करती है। रश्मि रावत कहानी के भीतर प्रवेश करती हैं, बाहर खड़े होकर उसका परीक्षण नहीं करतीं। उनकी आलोचना में पात्र अक्सर विश्लेषण की वस्तु न रहकर संवेदनात्मक उपस्थिति बन जाते हैं। ‘राष्ट्रपति का दत्तक’ की चर्चा में बुटूराम कोई समाजशास्त्रीय “केस” नहीं है, बल्कि राज्य और विकास की नीतियों के बीच पिसता हुआ जीवित मनुष्य है, जिसकी चेतना तक सत्ता की भाषा धीरे-धीरे रिसने लगती है। पारंपरिक आलोचना इस बिंदु पर जनजातीय समस्या, यथार्थवाद या विडम्बना-बोध जैसे पदों में बात समाप्त कर देती, जबकि रश्मि रावत यह दिखाती हैं कि कैसे राज्य की तथाकथित सहानुभूति स्वयं दमन का सूक्ष्म औजार बन जाती है। यह आलोचना का अनुभव-केंद्रित रूप है, न कि केवल सिद्धांत-केंद्रित। पारंपरिक आलोचना अकसर वस्तुनिष्ठता के नाम पर भावात्मक दूरी बनाए रखती है। इसके विपरीत रश्मि रावत की आलोचना में भाषा स्वयं संवेदनशील, कभी-कभी व्याकुल और आत्ममंथनशील हो जाती है।
रश्मि रावत की आलोचना-पद्धति की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका संवादधर्मी स्वरूप है। वे कहानी को किसी तयशुदा सैद्धांतिक ढाँचे में फिट करने की कोशिश नहीं करतीं, बल्कि उसे अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ, सांस्कृतिक अंतर्विरोधों और नैतिक प्रश्नों के संदर्भ में खोलती हैं। उनकी आलोचना में ‘कथा-संरचना’, ‘शिल्प’ या ‘तकनीक’ जैसे पारंपरिक आलोचनात्मक पदावलियों का उपयोग गौण है; इसके स्थान पर प्रश्न, शंका, असहजता और बेचैनी के जरिए पाठ का अन्वेषण किया जाता है। इस दृष्टि से उनकी आलोचना विश्लेषण से अधिक जिरह का रूप ले लेती है, ऐसी जिरह जो रचना से टकराती भी है और उससे सीखती भी है।
इस पुस्तक में शामिल आलेखों को पढ़ते हुए स्पष्ट होता है कि रश्मि रावत का आलोचक-मन समकालीन यथार्थ के प्रति गहरी नैतिक सजगता से संचालित है। विषमता, जाति, पितृसत्ता, राज्य-सत्ता, पूँजी, सांप्रदायिकता और उत्तर-सत्य जैसे प्रश्न उनकी आलोचना की केन्द्रीय धुरी हैं। वे कहानियों में इन प्रश्नों की उपस्थिति रेखांकित करते हुए पूछती हैं कि रचना इन प्रश्नों के साथ क्या करती है? क्या वह उन्हें चुनौती देती है, उनसे बचती है या अनजाने में उन्हें पुनरुत्पादित करती है? इस तरह उनकी आलोचना एक प्रकार से विवेकशील नैतिक आलोचना बन जाती है, जो साहित्य को सामाजिक उत्तरदायित्व से अलगाकर नहीं देखती। नैतिक विवेक रश्मि रावत की आलोचना का एक स्थायी आधार है। उनके लिए कहानी केवल सौंदर्य की वस्तु नहीं, बल्कि मानवीय उत्तरदायित्व का दस्तावेज़ है। इसलिए वे देखती हैं कि कहानी हिंसा को कैसे देखती है, सत्ता के साथ कैसे भिड़ती है, स्त्री, हाशिए और ‘अंतिम आदमी’ के प्रति उसका रुख क्या है। यहीं से उनकी आलोचना कभी-कभी नैतिक आकुलता में बदल जाती है।
हालाँकि, उनकी आलोचना-पद्धति की यही विशिष्टता उसकी कुछ सीमाओं को भी जन्म देती है। संवादधर्मी और प्रश्नात्मक आलोचना का यह तरीका कई बार रचना पर आलोचक की वैचारिक बेचैनी का भार अधिक डाल देता है। कुछ आलेखों में यह महसूस होता है कि कहानी के कलात्मक या संवेदनात्मक पक्षों की अपेक्षा उसके वैचारिक निहितार्थों पर अधिक जोर है। इससे कभी-कभी रचना का सौन्दर्य-सत्य छे छूटता हुआ प्रतीत होता है। आलोचना का स्वर इतना सजग और हस्तक्षेपकारी हो जाता है कि कहानी अपने भीतर से बोलने के बजाय आलोचक के प्रश्नों के उत्तर देने को बाध्य लगने लगती है। इसके अतिरिक्त रश्मि रावत की आलोचना में एक प्रकार की नैतिक तीव्रता है, जो कई बार निर्णायक स्वर ग्रहण कर लेती है। यद्यपि वे किसी कठोर सिद्धांत के आधार पर रचनाओं को खारिज नहीं करतीं, फिर भी कुछ प्रसंगों में यह आभास होता है कि आलोचना की अपेक्षाएँ रचना की संभावनाओं से आगे निकल जाती हैं। यह जोखिम संवादधर्मी आलोचना के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है, जहाँ आलोचक की वैचारिक प्रतिबद्धता उसकी दृष्टि को तेज भी बनाती है और सीमित भी।
इन सीमाओं के बावजूद कहानी से संवाद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह हिंदी आलोचना को एक हस्तक्षेपकारी अभ्यास के रूप में पुनर्स्थापित करती है। यह पुस्तक यह याद दिलाती है कि आलोचना केवल साहित्यिक अनुशासन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और नैतिक कर्म भी है। रश्मि रावत की आलोचना पाठक को निष्क्रिय उपभोक्ता बनने नहीं देती; वह उसे प्रश्नों के असहज इलाके में ले जाती है, जहाँ साहित्य और जीवन के बीच की दूरी कम हो जाती है।
कुल मिलाकर ‘कहानी से संवाद’ हिंदी कथालोचना में एक संभावनाशील दिशा का संकेत देती है। यह आलोचना की किसी अंतिम या पूर्ण पद्धति का दावा नहीं करती, बल्कि आलोचना को निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया के रूप में देखती है। अपनी विशेषताओं और सीमाओं के साथ यह पुस्तक समकालीन हिंदी साहित्य में आलोचना की प्रासंगिकता और आवश्यकता को नए सिरे से रेखांकित करती है, यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
चुप्पियाँ और दरारें : गरिमा श्रीवास्तव (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली)
गरिमा श्रीवास्तव की पुस्तक ‘चुप्पियाँ और दरारें’ स्त्री-आत्मकथाओं पर केन्द्रित एक गंभीर, वैचारिक और दस्तावेज़ी कृति है। यह पुस्तक स्त्री-अनुभव, स्मृति, मौन, सेंसरशिप और प्रतिरोध के जटिल रिश्तों की आलोचनात्मक पड़ताल करती है। पुस्तक का मूल प्रतिपाद्य स्त्री-आत्मकथाओं में उपस्थित ‘चुप्पियों’ और उनके भीतर छिपी ‘दरारों’ की पहचान है। यहाँ चुप्पी केवल मौन नहीं है, बल्कि वह सामाजिक, पारिवारिक, धार्मिक और आत्मगत सेंसरशिप का परिणाम है, जिसके भीतर से स्त्री अपनी कथा कहने की कोशिश करती है। गरिमा श्रीवास्तव यह स्पष्ट करती हैं कि स्त्री का आत्मकथ्य सिर्फ उनके बोलने में नहीं होता। उसमें अधूरे वाक्य, छूटे हुए प्रसंग, संकेत, संकोच और आत्मसंशय भी शामिल होते हैं। यही अधूरापन और असंपूर्णता स्त्री-अनुभव की सच्चाई को अधिक विश्वसनीय बनाती है। इस प्रकार लेखिका आत्मकथा की पारंपरिक ‘पूर्णता’ और ‘निरपेक्ष सत्य’ की धारणा को प्रश्नांकित करती हैं।
पुस्तक की एक बड़ी विशेषता इसका व्यापक ऐतिहासिक और भाषायी परिप्रेक्ष्य है। लेखिका हिन्दी तक सीमित न रहकर मराठी, बांग्ला, मलयालम, कन्नड़, अंग्रेज़ी और उर्दू/मुस्लिम स्त्री आत्मकथाओं को अपने विश्लेषण में शामिल करती हैं। राससुन्दरी देवी, पंडिता रमाबाई, विनोदिनी दासी से लेकर बेबी हालदार, नलिनी जमीला, मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान, चन्द्रकिरण सौनरेक्सा और मुस्लिम स्त्री आत्मकथाकारों तक की विस्तृत चर्चा यह दिखाती है कि स्त्री आत्मकथा किसी एक वर्ग, जाति या समुदाय की कथा नहीं है, बल्कि बहुस्तरीय शोषण और संघर्ष का साझा दस्तावेज़ है। यह बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक दृष्टि पुस्तक को अकादमिक दृष्टि से भी समृद्ध बनाती है।
गरिमा श्रीवास्तव समकालीन हिन्दी आलोचना में उन विरल स्त्री-आलोचकों में हैं, जिन्होंने स्त्री लेखन को केवल विषय या अनुभव के स्तर पर नहीं, बल्कि एक सुसंगत आलोचकीय समस्या के रूप में देखा है। उनकी आलोचना का मूल सरोकार स्त्री आत्मकथा, स्मृति, अनुभव-सत्य, चुप्पी, सेंसरशिप और सत्ता-संरचनाओं के अंतर्संबंधों से है, जहाँ आलोचना पारंपरिक मूल्यांकन से आगे बढ़कर सामाजिक-सांस्कृतिक हस्तक्षेप का रूप ले लेती है। उनकी प्रविधि को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि वे पाठ, संदर्भ और सिद्धांत को किस प्रकार एक साथ साधती हैं। उनकी आलोचना की पहली और केंद्रीय विशेषता अनुभव-केंद्रित पाठालोचना है। वे किसी भी रचना को केवल उसके शिल्प या भाषा के आधार पर नहीं परखतीं, बल्कि उस अनुभव-संसार को केंद्र में रखती हैं, जिससे वह रचना जन्म लेती है। स्त्री आत्मकथाओं के संदर्भ में यह दृष्टि विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहाँ अनुभव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक, जातीय, वर्गीय और लैंगिक संरचनाओं से निर्मित होता है। इस कारण उनकी आलोचना में ‘पाठ’ और ‘जीवन’ के बीच की दूरी न्यूनतम हो जाती है। वे यह मानकर चलती हैं कि स्त्री आत्मकथा को जीवन-सत्य से काटकर नहीं पढ़ा जा सकता, क्योंकि वही उसका मूल नैतिक और राजनीतिक आधार है। गरिमा श्रीवास्तव स्त्री आत्मकथाओं को केवल ‘व्यक्तिगत दुख-कथा’ के रूप में नहीं पढ़तीं। वे दिखाती हैं कि कैसे निजी अनुभव सामूहिक इतिहास और सामाजिक संरचनाओं से गहरे जुड़े होते हैं। दलित, श्रमिक, पिछड़ी जातियों और मुस्लिम स्त्रियों की आत्मकथाओं में व्यक्त यातनाएँ व्यक्तिगत कम और संरचनात्मक अधिक हैं। वर्ण-व्यवस्था, पितृसत्ता, धार्मिक अनुशासन और आर्थिक परनिर्भरता—ये सभी तत्व स्त्री जीवन को नियंत्रित करते हैं और आत्मकथा में अलग-अलग रूपों में प्रकट होते हैं। इस दृष्टि से पुस्तक स्त्री आत्मकथा को सामाजिक इतिहास के वैकल्पिक स्रोत के रूप में स्थापित करती है।
पुस्तक का स्त्रीवादी वैचारिक आधार सुदृढ़ है, किंतु वह किसी एक सैद्धांतिक ढाँचे में बंधा हुआ नहीं है। सीमोन द बोउवार, जॉन स्टुअर्ट मिल, फूको, वाल्टर बेंजामिन, नैन्सी के. मिलर जैसे विचारकों के संदर्भ आते हैं, पर लेखिका उन्हें उद्धरण-सज्जा के लिए नहीं, बल्कि विश्लेषण को गहराने के लिए प्रयुक्त करती हैं। विशेषतः स्मृति और विस्मृति के द्वंद्व, देह पर नियंत्रण, यौनिकता की सेंसरशिप और आत्मकथा को राजनीतिक कर्म के रूप में देखने की दृष्टि पुस्तक की वैचारिक रीढ़ बनती है। आत्मकथा यहाँ आत्मसंतोष या आत्मगौरव का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसंघर्ष और आत्मपुनर्रचना की प्रक्रिया है।

मुस्लिम और दलित स्त्रियों की आत्मकथाओं पर केन्द्रित खंड पुस्तक के अत्यंत महत्त्वपूर्ण और अपेक्षाकृत दुर्लभ पक्ष है। यहाँ लेखिका पर्दा-प्रथा, धार्मिक अनुशासन, साम्प्रदायिक राजनीति और यौनिकता पर नियंत्रण जैसे मुद्दों को ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में रखकर देखती हैं। वे यह भी रेखांकित करती हैं कि मुस्लिम स्त्रियों की चुप्पियाँ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि साम्प्रदायिक भय और सामाजिक निगरानी से भी उपजी हैं। इस खंड में लेखिका का दृष्टिकोण संतुलित है। वह न तो इस्लाम को एकरेखीय रूप से दोषी ठहराती हैं, न ही स्त्री अनुभव को किसी सांस्कृतिक रूमानियत में बदलती हैं। यह संतुलन पुस्तक की वैचारिक परिपक्वता का प्रमाण है। भारतीय दलित साहित्य में आत्मकथा एक महत्वपूर्ण विधा के रूप में उभरी है। यह न केवल व्यक्तिगत जीवन-आख्यान है, बल्कि दलित जीवन की सामूहिक पीड़ा, प्रतिरोध, सामाजिक असमानता और चेतना की अभिव्यक्ति भी है। यह आत्मकथाएँ जाति-स्थितियों की कठोर वास्तविकताओं को सामने लाकर सामाजिक विमर्श को चुनौती देती हैं, और इसे ‘उपलब्धि’ या ‘जीवन-कथा’ से कहीं आगे ले जाती हैं।
शिल्प और भाषा की दृष्टि से ‘चुप्पियाँ और दरारें’ अकादमिक होते हुए भी बोझिल नहीं है। उद्धरणों और उदाहरणों की बहुलता के बावजूद लेखन प्रवाह बनाए रखता है। हालांकि, कहीं-कहीं उदाहरणों की अधिकता पाठक को सूचनात्मक विस्तार में उलझा सकती है और केंद्रीय तर्क थोड़ी देर के लिए पृष्ठभूमि में चला जाता है। फिर भी यह कमी नहीं, बल्कि पुस्तक की दस्तावेज़ी महत्त्वाकांक्षा का परिणाम है। लेखिका का उद्देश्य केवल निष्कर्ष देना नहीं, बल्कि सामग्री उपलब्ध कराना भी है, जिससे आगे के शोध और विमर्श के रास्ते खुलते हैं।
आलोचनात्मक दृष्टि से यदि कोई सीमा रेखांकित की जाए तो यह कहा जा सकता है कि पुस्तक में कुछ आत्मकथाओं का विश्लेषण अपेक्षाकृत अधिक विस्तार पाता है, जबकि कुछ महत्वपूर्ण पाठों पर संक्षिप्त चर्चा रह जाती है। इसके अतिरिक्त, पुरुष आत्मकथाओं के साथ तुलनात्मक विश्लेषण को और व्यवस्थित रूप में विकसित किया जा सकता था। फिर भी, यह सीमाएँ पुस्तक के प्रभाव को कम नहीं करतीं।
समग्रतः ‘चुप्पियाँ और दरारें’ हिन्दी में स्त्री आत्मकथा-विमर्श की एक आधारभूत और अनिवार्य कृति है। यह पुस्तक स्त्री लेखन को पढ़ने की नई दृष्टि देती है और आलोचना की जिम्मेदारी को पुनर्परिभाषित करती है।
उन्मुक्त रास्तों पर हिन्दी कहानी: नीरज खरे (रुद्रादित्य प्रकाशन, प्रयागराज)
हिन्दी कहानी की विकास यात्रा, उसके वैचारिक उतार–चढ़ाव, रचनात्मक जोखिम और आलोचनात्मक संकट को समझने के लिए नीरज खरे की पुस्तक ‘उन्मुक्त रास्तों पर हिन्दी कहानी’ एक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक पहल है। पुस्तक की मूल अवधारणा ‘उन्मुक्त कहानी’ है, जिसे लेखक किसी एक आंदोलन, विचारधारा या पूर्वनिर्धारित सौन्दर्यशास्त्र में बाँधकर देखने के बजाय एक खुली, बहुविध और गतिशील रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करते हैं। नीरज खरे के अनुसार 90 के बाद की कहानी न तो केवल बाजारवाद की उपज है और न ही परंपरागत यथार्थवाद की पुनरावृत्ति। वह इन दोनों के तनाव से उपजे नए अनुभव-संसार की अभिव्यक्ति है। यही उन्मुक्तता इस दौर की कहानी की पहचान बनती है। नीरज खरे द्वारा प्रस्तावित यह अवधारणा मूलतः 1990 के बाद की हिन्दी कहानी को समझने की एक वैकल्पिक दृष्टि है, जो उसे किसी आंदोलन, पीढ़ी या विचारधारा के कठोर खाँचों में बाँधने से इंकार करती है।
यहाँ ‘उन्मुक्त कहानी’ का आशय यह नहीं है कि समकालीन कहानी सामाजिक यथार्थ, विचार या प्रतिबद्धता से मुक्त हो गई है। यहाँ ‘उन्मुक्तता’ का तात्पर्य जड़ वैचारिक अनुशासन, घोषित आंदोलनों और पूर्वनिर्धारित सौंदर्यशास्त्र से मुक्ति है। नीरज खरे के अनुसार ‘उन्मुक्त कहानी’ अपने अनुभव-क्षेत्र, भाषा, संरचना और दृष्टि में बहुविध, अस्थिर और अनिश्चित है, और यही उसकी पहचान है। 1990 के बाद भारतीय समाज में आए संरचनात्मक परिवर्तनों- उदारीकरण, वैश्वीकरण, बाजारवाद, सूचना-संस्कृति, शहरीकरण, अस्मिता-विमर्श ने जीवन को बहुस्तरीय और खंडित बना दिया है। इस जटिल यथार्थ को किसी एक वैचारिक फ्रेम में बाँधना संभव नहीं रहा। ‘उन्मुक्त कहानी’ इसी खंडित यथार्थ की कथा है, जिसमें निजी और सामाजिक, स्थानीय और वैश्विक, अनुभव और स्मृति, यथार्थ और कल्पना लगातार एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं।
हिन्दी कहानी की आलोचना में लंबे समय से नामकरण की समस्या रही है- ‘नई कहानी’, ‘अकहानी’, ‘जनवादी कहानी’, ‘उत्तर-आधुनिक कहानी’, ‘समकालीन कहानी’ आदि। ये नाम प्रायः काल-सीमा में बँधे, वैचारिक रूप से संकुचित और अकसर मूल्यांकन को पूर्वग्रहग्रस्त बना देने वाले रहे हैं। ‘उन्मुक्त कहानी’ का प्रस्ताव इन नामों से भिन्न है क्योंकि यह काल-खंड की कठोरता से मुक्त है, किसी एक विचारधारा को केन्द्रीय नहीं बनाता और रचना की आंतरिक विविधता को स्वीकार करता है।
फिर भी इस अवधारणा पर कुछ आलोचनात्मक प्रश्न भी उठते हैं। मसलन, उन्मुक्त’ शब्द इतना व्यापक है कि उसमें लगभग हर तरह की कहानी समा सकती है। इससे अवधारणा के धुँधले हो जाने का खतरा बना रहता है। यह भी गौरतलब है कि यह अवधारणा यह बताती है कि कहानी किससे मुक्त है, लेकिन यह नहीं स्पष्ट करती है कि वह किसके लिए और किस दिशा में सक्रिय है। यहाँ यह उल्लेख भी जरूरी है कि नीरज खरे ‘उन्मुक्त कहानी’ की अवधारणा प्रस्तावित करते हुए 1990 के बाद हिन्दी कहानी के नामकरण के हुए एक अन्य प्रयास (भूमंडलोत्तर कहानी) की प्रत्यक्षतः अनदेखी कर जाते हैँ। अच्छा होता यदि इस संदर्भ में उन्होंने अपनी तार्किक असहमतियाँ दर्ज की होतीं। बावजूद इसके अपने वर्तमान स्वरूप में यह अवधारणा किसी सिद्धांत की तरह नहीं, बल्कि एक संवेदनशील आलोचनात्मक दृष्टि के रूप में ग्रहण किया जाए, तो यह आज की हिन्दी कहानी को समझने का एक सार्थक उपकरण बन सकती है। यह नामकरण कहानी को परिभाषित करने से अधिक उसे समझने की प्रक्रिया को समृद्ध करता है।
नीरज खरे कहानी को केवल पाठ-आधारित विश्लेषण तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे उदारीकरण, वैश्वीकरण, जातीय विमर्श, आदिवासी चेतना, शहरीकरण और मध्यवर्गीय मानसिकता जैसी व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं से जोड़ते हैं। आलोचक के रूप में नीरज खरे किसी विचारधारा के प्रवक्ता नहीं बनते, बल्कि रचना की आंतरिक संरचना, भाषा, शिल्प और संवेदना को प्राथमिकता देते हैं।
यह पुस्तक तीन खंडों और दो परिशिष्टों में विभाजित है। पहले खंड में 90 के बाद की हिन्दी कहानी के परिप्रेक्ष्य, प्रवृत्तियों और नामकरण की समस्या पर केंद्रित लेख हैं। दूसरे खंड में कुछ समकालीन कहानीकारों, तो तीसरे खंड में कुछ विशिष्ट कथा-संग्रहों और रचनाकारों की समीक्षाएँ हैं, जो आलोचना को ठोस पाठ-आधारित आधार देती हैं। परिशिष्टों में रेणु और नामवर सिंह पर केंद्रित आलेख हैं।

हिन्दी साहित्य में आलोचना की परंपरा प्रायः दो अतियों के बीच डोलती रही है—एक ओर सैद्धांतिक जड़ता और दूसरी ओर सार-संक्षेपणवादी सरलीकरण। ऐसे परिदृश्य में नीरज खरे की आलोचना-दृष्टि एक संतुलित, संवादधर्मी और रचनामुखी हस्तक्षेप के रूप में उभरती है। उन्मुक्त रास्तों पर हिन्दी कहानी के माध्यम से वे न केवल 1990 के बाद की हिन्दी कहानी का पुनर्पाठ करते हैं, बल्कि आलोचना की भूमिका, भाषा और पद्धति पर भी विचार करते हैं। नीरज खरे की आलोचना का एक बड़ा गुण यह है कि वह रचना से विमुख नहीं होती। वे सिद्धांतों को रचना पर आरोपित नहीं करते, बल्कि रचना से ही आलोचनात्मक निष्कर्ष तक पहुँचते हैं। समकालीन कहानीकारों पर लिखे गए लेखों में भाषा, शिल्प, कथ्य और संवेदना का संतुलित विश्लेषण दिखाई देता है। यह आलोचना रचनाकार को न तो महिमामंडित करती है और न खारिज, बल्कि उसे समझने का प्रयास करती है। लेकिन उनकी आलोचना संतुलन और सावधानी के कारण कई बार वैचारिक निर्णायकता से बचती हुई दिखती है। वे किसी एक वैचारिक पक्ष का तीव्र समर्थन या विरोध कम ही करते हैं। यह गुण आलोचना को उदार बनाता है, पर कुछ प्रसंगों में आलोचक से अपेक्षित तीखे हस्तक्षेप की कमी भी महसूस होती है।
इस पुस्तक में नीरज खरे आलोचना को तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक चेतना-संपन्न प्रक्रिया के रूप में बरतते हैं। वे किसी कथा-प्रवृत्ति को अलग-थलग नहीं देखते, बल्कि उसके बनने की परिस्थितियों, उसके पीछे काम कर रही स्मृतियों और साहित्यिक विरासत को भी साथ रखते हैं।
पुस्तक का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि आलोचक के रूप में नीरज खरे कहीं भी नैतिक सर्वज्ञता का दावा नहीं करते। वे असहमति प्रकट करते हैं, सीमाएँ बताते हैं, किंतु रचनाकार या प्रवृत्ति को खारिज करने की भाषा से बचते हैं। आज के तेज़ और ध्रुवीकृत आलोचनात्मक माहौल में यह आत्म-संयम स्वयं में एक आलोचनात्मक वक्तव्य है, जिस पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए।
नीरज खरे की आलोचना-दृष्टि हिन्दी कहानी-आलोचना को जड़ता से निकालकर संवाद, बहुलता और रचनात्मकता की ओर ले जाती है। उनकी सामर्थ्य उनकी संतुलित दृष्टि, रचनामुखी पद्धति और समकालीन यथार्थ की गहरी समझ में निहित है। वहीं, उनकी सीमाएँ उसी संतुलन और व्यापकता से उत्पन्न होती हैं, जो कभी-कभी आलोचना की धार को मद्धिम कर देती हैं। फिर भी, उन्मुक्त रास्तों पर हिन्दी कहानी यह प्रमाणित करती है कि नीरज खरे आलोचना को निर्णय सुनाने का नहीं, बल्कि समझ विकसित करने का माध्यम मानते हैं। समकालीन हिन्दी आलोचना में यह दृष्टि न केवल प्रासंगिक है, बल्कि भविष्य की आलोचनात्मक संभावनाओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण आधार भी प्रदान करती है।
हिन्दी का नया काव्यशास्त्र: डॉ. महेंद्र मधुकर (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली)
वरिष्ठ कथाकार–आलोचक डॉ. महेंद्र मधुकर की पुस्तक हिन्दी का नया काव्यशास्त्र हिन्दी आलोचना की दीर्घ और जटिल परम्परा को समकालीन विवेक के साथ देखने–समझने का गंभीर प्रयास है। यह कृति किसी एक सिद्धान्त या आलोचनात्मक चलन पर केंद्रित पुस्तक नहीं है, बल्कि हिन्दी आलोचना की ऐतिहासिक निरन्तरता, उसके अन्तर्विरोधों, संघर्षों और नवीनीकरण की प्रक्रियाओं का विस्तृत अध्ययन है। महेंद्र मधुकर प्राचीन संस्कृत काव्यशास्त्र से लेकर आधुनिक हिन्दी आलोचना तक की यात्रा को इस पुस्तक में सामाजिक–ऐतिहासिक चेतना के विकासक्रम के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
पुस्तक का वैचारिक आधार यह है कि हिन्दी का नया काव्यशास्त्र किसी एक क्षण में उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि वह संस्कृत काव्यशास्त्र, रीतिकालीन काव्यबोध, नवजागरण, भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग की आलोचनात्मक चेतना से गुजरता हुआ विकसित हुआ है। महेंद्र मधुकर ने इस पुस्तक में यह महत्त्वपूर्ण संकेत किया है कि रीतिकालीन काव्यशास्त्र को केवल संस्कृत का अनुकरण कहकर खारिज करना उचित नहीं, क्योंकि व्रजभाषा में काव्यशास्त्रीय अवधारणाओं का पुनर्पाठ अपने आप में सांस्कृतिक अस्वीकृति और सृजनात्मक साहस का प्रमाण है। यही प्रवृत्ति आगे चलकर उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में हिन्दी आलोचना को एक स्वतंत्र वैचारिक पहचान देती है।

इस पुस्तक की संरचना उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। इसमें हिन्दी आलोचना के शिल्पकारों को कालक्रम और वैचारिक क्रम दोनों दृष्टियों से देखा गया है। यहाँ महावीर प्रसाद द्विवेदी और श्यामसुन्दर दास से लेकर रामचन्द्र शुक्ल, मुकुटधर पांडेय, नन्ददुलारे वाजपेयी और हजारी प्रसाद द्विवेदी तक हिन्दी आलोचना की बुनियादी जमीन को विस्तार से समझाया गया है, तो रामविलास शर्मा, नलिन विलोचन शर्मा और गजानन माधव मुक्तिबोध के माध्यम से आलोचना के समाजशास्त्रीय और द्वन्द्वात्मक रूपों को रेखांकित किया गया है। देवेन्द्रनाथ शर्मा, बच्चन सिंह और विजयदेव नारायण साही पर केंद्रित अध्याय हिन्दी आलोचना में विधागत काव्यशास्त्र और वैचारिक साहस के विकास को स्पष्ट करते हैं। इसके बाद भगीरथ मिश्र, नगेन्द्र और नामवर सिंह जैसे आलोचकों के माध्यम से आधुनिक आलोचना के सैद्धांतिक और विमर्शात्मक स्वरूप का विवेचन किया गया है। राममूर्ति त्रिपाठी, देवीशंकर अवस्थी और रामस्वरूप चतुर्वेदी केंद्रित अध्याय हिन्दी आलोचना के अकादमिक विस्तार और पाठ–केंद्रित दृष्टि को सामने लाते हैं। निर्मला जैन और विश्वनाथ त्रिपाठी के आलोचना–सूत्रों पर किया गया चिन्तन पुस्तक को स्त्रीवादी और सांस्कृतिक आलोचना के आयामों से जोड़ता है। मलयज के माध्यम से आलोचना के आत्मालोचनात्मक और रचनात्मक पक्ष को रेखांकित किया गया है।
पुस्तक का उत्तरार्द्ध समकालीन आलोचना और नये काव्यशास्त्र की पुनर्नवता के संकेतों पर केन्द्रित है। पुरुषोत्तम अग्रवाल, रोहिणी अग्रवाल, अनामिका और संजीव कुमार जैसे आलोचकों पर केंद्रित अध्याय यह प्रमाणित करते हैं कि हिन्दी आलोचना आज भी ठहराव की स्थिति में नहीं है। साथ ही यहाँ कुछ अन्य युवा आलोचकों के संदर्भों के माध्यम से कहानी, कविता और उपन्यास को पढ़ने की नई कसौटियाँ प्रस्तुत की गई हैं, जो भूमंडलीकरण, डिजिटल युग और बदले हुए पाठक–बोध से जुड़ी हैं।
समग्र रूप से यह पुस्तक हिन्दी आलोचना को एक जीवित, संघर्षशील और निरन्तर रूपांतरित होती हुई परम्परा के रूप में प्रस्तुत करती है। महेंद्र मधुकर की आलोचनात्मक दृष्टि संतुलित है। वे परम्परा को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करते, न ही आधुनिकता के नाम पर उसका निषेध करते हैं। यही संतुलन इस कृति को केवल आलोचकों का परिचयात्मक ग्रन्थ न बनाकर हिन्दी के नये काव्यशास्त्र पर एक विश्वसनीय और विचारोत्तेजक दस्तावेज बनाता है। हिन्दी आलोचना के अध्येताओं, शोधार्थियों और गंभीर पाठकों के लिए यह पुस्तक निश्चय ही एक आवश्यक और समृद्ध संदर्भ ग्रंथ है।

