Friday, March 20, 2026
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कालजयीः न्याय, अनुताप और आत्म-परीक्षण

आज कालजयी में प्रसिद्ध लेखक योगेंद्र आहूजा बात कर रहे हैं टॉलस्टॉय के जगत-प्रसिद्ध उपन्यास ‘पुनरुत्थान’ पर। तमाम असहमतियों के बावजूद लेनिन ने लियो टॉल्स्टॉय को ‘रूसी क्रांति का दर्पण’ कहा था, क्योंकि उनकी कृतियाँ सत्ता से अधिक मनुष्य की अंतरात्मा को बेनकाब करती हैं। वॉर एंड पीस और अन्ना करेनिना की परंपरा में लिखा गया यह उपन्यास सामाजिक अन्याय का निर्मम चित्रण करता है, पर उसका सबसे तीखा आयाम नेख्लुदोव की ग्लानि और आत्मपीड़ा है। ऐसे समय में जब साहित्य से आत्मपरीक्षण का स्वर क्षीण होता जा रहा है, यह कृति याद दिलाती है कि मनुष्यता का पुनर्जागरण उत्तरों से नहीं, प्रश्नों और पश्चाताप की आग से शुरू होता है।

मैं नहीं जानता कि मैं तोल्स्तोय के इस उपन्यास पर ऐसा क्या कह सकूँगा जो आपकी निगाह में नया या खास हो। मेरे पास कुछ सादा, मामूली-सी बातें हैं, जिन्हें आपसे बाँटना चाहता हूँ। सबसे पहले, आयोजकों का शुक्रिया कि उन्होंने चर्चा के लिए यह क्लासिक, यह कालजयी किताब 125 साल पहले लिखी गयी थी। हम सब अमूमन ‘समकालीनता’ से आक्रांत रहते हैं, वर्तमान घटनाओं के सैलाब में डूबे हुए, और एक मायने में अपने समय या ‘समकाल’ के बंदी होते हैं – लेकिन कभी-कभी उससे त्रस्त होकर कुछ दूर भी जाना चाहते हैं। मैंने अभी ‘क्लासिक’ या ‘कालजयी’ शब्द का इस्तेमाल किया। इस शब्द के क्या मायने हैं, क्या है जो किसी रचना को ‘कालजयी’ बनाता है और उन्हें क्यों पढ़ा जाना चाहिए? इस बारे में इतालवी लेखक काल्विनो का कथन है – क्लासिक किताबें वे होती हैं जिनके बारे में यह नहीं कहा जाता कि ‘मैं इसे पढ़ रहा हूँ’। हमेशा यही कहा जाता है- मैं इसे ‘दुबारा’ पढ़ रहा हूँ’। यानी वे किताबें जिनके बारे में… यहाँ युवा पाठकों की नहीं, परिपक्व लोगों की बात हो रही है जो खुद को ‘अच्छा पाठक’ मानते हैं –ऐसे पाठकों को यह स्वीकार करने में शर्म महसूस हो कि उन्होंने इतनी प्रसिद्ध किताब नहीं पढ़ी है। हाँलाकि- वे कहते हैं- यह शर्म अपने में अतार्किक है। दुनिया में इतनी बड़ी संख्या में इतनी महान किताबें मौजूद हैं कि कोई कितना ही पढ़े, ऐसी बहुत सारी महत्वपूर्ण रचनाएँ रहेंगी ही, जो उन्होंने नहीं पढ़ी होंगी। अक्सर महान किताबें जितनी चर्चित होती हैं, उतनी पढ़ी नहीं जातीं, यहाँ तक कि अनेक मामलों में अत्यधिक चर्चा या प्रसिद्धि ही उन्हें पढ़ने के नहीं तो ठीक से ग्रहण करने, आत्मसात करने के रास्ते में एक रुकावट या अवरोध बन जाती है। किताब के इर्द-गिर्द टिप्पणियों, समालोचना या व्याख्याओं का विशाल जंजाल हो तो किताब उस जंजाल में गुम हो जा सकती है। चर्चा अत्यधिक हो तो एक हद के बाद लेखक की अपनी आवाज़ उन चर्चाओं के शोरगुल में खो जा सकती है। वे कहते हैं कि वास्तव में अच्छी तरह पढ़ी जाने या पढ़ी जा सकने वाली किताबें वही होती हैं जो पाठयक्रमों, अकादमियों और आलोचना के बोझ से कुछ हद तक आज़ाद हों, पूरी तरह इन ढांचों के कब्जे में न आयी हों। हमें भरसक इस बोझ या जंजाल को परे हटाकर, उसे अनसुना कर महान किताबों के पास जाना चाहिए- इसलिए कि अनेक मामलों में व्याख्याएँ और आलोचनाएँ उस बात को छिपाने के लिए होती हैं जो किताब अपने अद्वितीय स्वर में कह रही होती है और सिर्फ वही कह सकती है। और ऐसा न भी हो तो भी कोई भी टिप्पणी या व्याख्या खुद उस किताब से अधिक क्या कह सकती है?

आज हमारे सामने जो किताब है वह कुछ इसी श्रेणी की है– एक प्रसिद्ध किताब, लेकिन लेखक की अन्य रचनाओं की तुलना में कुछ कम। मैंने भी इस किताब को ‘दूसरी बार’ पढ़ा है –और महसूस किया कि किसी महान किताब को दूसरी, तीसरी, चौथी बार पढ़ना ही वास्तव में पढ़ना होता है। बेशक युवावस्था में पहली बार पढ़ी गई किताबें हमारे नज़रिये और अनुभवों को एक शक्ल देती हैं, तय करती हैं कि हमारे ‘अंतर’ का ‘बाहर’ से क्या रिश्ता होगा, और हमारे भीतर उत्कृष्टता, सौंदर्यबोध और मूल्य-निर्धारण के पैमानों की तामीर करती हैं। लेकिन दूसरी बार पढ़ना सिर्फ उस किताब को नहीं, कहीं अपने-आप को भी पढ़ना होता है, अपने भीतर उन चीजों को खोजना होता है जो हमारे आंतरिक तंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन जिनके स्रोत या उत्पत्ति को हम भूल चुके थे। ऐसी किताबों का हर पाठ पिछले पाठ का दुहराव नहीं, एक नया पाठ होता है, हर बार हमें कुछ नया, ताज़ा, अप्रत्याशित बताता है, नए ख्यालों और कल्पनाओं तक ले जाता है। इस तरह हम अपनी ओर से भी क्लासिक किताबों की एक नयी परिभाषा दे सकते हैं- वे हमेशा नई होती हैं या नई होती रहती हैं, अथवा अन्य शब्दों में – नए वक़्तों में नए पाठकों के साथ उनका बार-बार पुनर्जन्म होता है।

तोल्स्तोय का यह उपन्यास 1899 में छपा था, ‘अन्ना करेनिना’ और ‘वार एंड पीस’ के काफी बाद। उनकी तुलना में यह कुछ कम प्रसिद्ध है, हाँलाकि यह उनके धार्मिक और दार्शनिक सोच का सबसे स्पष्ट प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन लग सकता है कि इसमें पात्रों की गहराई, पेचीदगी, विश्लेषण और इसमें जो बहसें और चिंतन हैं, वे ‘अन्ना करेनिना’ और ‘वॉर एंड पीस’ की ऊंचाई को नहीं छू पाते। विवरणों, नैतिक बहसों और आत्म-मंथन का आधिक्य है जो कहानी की गति धीमी करते हैं। पात्र कुछ हद तक स्टीरियोटाइप हैं। कथानायक नेख्लुदोव बेहद आदर्शवादी, युवावस्था के एक गुनाह के बावजूद अत्यधिक नैतिक, सच्चरित्र दिखाया गया है, जो उसे- कृत्रिम तो नहीं लेकिन- कुछ अवास्तविक होने का एहसास कराता है। तोल्स्तोय के धार्मिक और दार्शनिक विचार, आत्म-सुधार, मुक्ति, करुणा और मनुष्यता की भावना… इनकी अतिरिक्त मौजूदगी कथा को कमजोर करती है। इनमें निहित ‘आध्यात्मिकता’, बाइबल के वचन और इसका अंत, जो पूरी तरह धार्मिकता में डूबा हुआ है… इक्कीसवीं सदी के विवेकशील, आधुनिक, विचार-सम्पन्न पाठक को संतुष्ट नहीं कर सकते। खास तौर पर इसका अंत हमें संतोष नहीं देता जहां नेख्लुदोव ‘इंजील’ को पलटते हुए अपने सवालों के उत्तर ढूँढता नज़र आता है और वहाँ से उसका नया जीवन शुरू होता है। उपन्यास का शीर्षक भी बाइबल में आए जीसस के resurrection की ही प्रतिध्वनि है। हम साहित्य के पास कोई पराभौतिक सत्य पाने या धर्म-भावना की तृप्ति के लिए नहीं आते। तो फिर एक आधुनिक, विचार-सजग, तर्कनिष्ठ और इहलोक-परक यानी सेकुलर पाठक के लिए इसका क्या महत्व है?

उपन्यास में ये कमियाँ बिना गहरे विश्लेषण के भी हर सजग पाठक को दिख सकती हैं। फिर भी यह एक महत्वपूर्ण कृति है- क्योंकि यह हमें जिन सवालों के सामने ला खड़ा करती है, वे सवाल महत्वपूर्ण हैं। यह एक समकालीन रचना नहीं इसलिए हमें इसे ‘समकाल’ के नहीं, इसके ही रचना-काल के पस-मंजर में रखकर देखना होगा। जिस जमाने में रूस के ये महान लेखक पुश्किन, गोगोल, तोल्स्तोय, दोस्तोयेव्स्की, चेखव आदि लिख रहे थे वह समय, यानी रूसी क्रांति से पहले की एक सदी, रूस के इतिहास में सबसे अधिक मानसिक-वैचारिक उद्वेलन और घनघोर बेचैनी का समय था। वहाँ हमारे देश या यूरोप की तरह बहुत पुरानी संस्कृति या परम्परा का मानस पर वैसा दबाव नहीं था। उस दौर की अराजकता, अन्याय और ज़ुल्म इन लेखकों को बेतरह बेचैन करते थे। ख़ास तौर पर स्त्रियों पर इन सबका सबसे ज़्यादा बोझ था—उनके लिए तो जैसे साँस लेना भी दुश्वार था। उत्पीड़न भीषण था और वहाँ ईसाइयत का जो रूप प्रचलित था, वह भी suffering पर ज़ोर देने वाला, उसे अनिवार्य मानने, उसमें एक आध्यात्मिक मूल्य देखने वाला था। दोस्तोएव्स्की के मुताबिक इंसान की पीड़ा आकस्मिक या सिर्फ सामाजिक अन्याय का नतीजा नहीं, यह उसके वजूद में अन्तर्भूत, उपचेतन के तलघर में छिपा उसका ‘उद्गम’ अथवा ‘मूल’ है – उसके ‘होने’ का ही एक ज़रूरी हिस्सा। ‘We can only love with suffering and through suffering’. मगर तोल्स्तोय की राह कुछ और थी। उनके लिए नैतिक शुद्धता और आत्म-परिष्कार अधिक केंद्रीय थे और उनका धर्म अंधी सहमति या समर्पण का नहीं, बल्कि विवेक, तर्क और नैतिक साहस का धर्म था, जो अन्य बातों के साथ संस्थागत चर्च की और सत्ता के साथ उसके गठजोड़ की भी कड़ी आलोचना करता था। उनके लिए पीड़ा कोई दैवी दंड या इंसानी वजूद का अलिखित ‘विधान’ नहीं, स्पष्टत: सामाजिक अन्याय की उपज थी। उससे मुक्ति पाने के लिए उसे चुपचाप ढोते रहना नहीं, बल्कि कठोर सामाजिक-नैतिक आत्मपरीक्षण, अनुताप और निरंतर आत्म-परिष्कार आवश्यक थे। वे आग्रह करते हैं कि बाहरी संसार को बदलने से पहले मनुष्य को अपने ‘भीतर’ उतरना चाहिए। दूसरी ओर बड़ी संख्या में आमूल परिवर्तन चाहने वाले थे– सिर्फ मार्क्सवादी नहीं, नरोदनिक, बाकुनिनपंथी और अराजकतावादी इत्यादि भी- जो बताते थे कि यह धर्म राज्य का सहयोगी है और उत्पीड़कों के पक्ष में खड़ा है। उनके लिए प्रश्न केवल व्यक्ति-परिवर्तन का नहीं, समूचे सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे को उलट देने का था। वे मानते थे कि जब तक सत्ता और संपत्ति की बुनियादी संरचनाएँ नहीं बदलेंगी, दुख और शोषण बने रहेंगे।

यही वजह है कि उस समय के साहित्य में एक अजीब सी बेचैनी, वैचारिक उथल-पुथल, और गहरे नैतिक सवाल बिखरे हुए मिलते हैं।

यह उपन्यास भी उसी उथल-पुथल का नतीजा या उसका हिस्सा है। ये सभी महान रूसी लेखक सिर्फ लेखक नहीं थे और न वे सिर्फ रूसी थे। वे activist और thinkers थे और केवल रूस के नहीं, पूरी मनुष्यता के ज़रूरी सामाजिक और नैतिक सवालों के जवाब खोज रहे थे। इन्हीं में चेर्निशेवस्की थे जिनका उपन्यास ‘क्या करें?’ 1863 में छपा था। वे आमूल परिवर्तन के समर्थक थे और कला और साहित्य के सामाजिक उद्देश्य पर जोर देते थे। इसी दौरान वहाँ बाकुनिन हुए जो एक क्रांतिकारी, दार्शनिक और अराजकतावाद (Anarchism) के प्रवर्तक थे। वे मार्क्सवाद के विरोधी थे और राज्य या सत्ता मात्र को व्यक्ति की आज़ादी का शत्रु मानते थे। दोस्तोएव्स्की और तोल्स्तोय इन बहसों को, उनकी उलझनों और अंतर्द्वंद्व को, इंसान के अन्तःकरण के पूरे फ़लक में सामने रखते हैं। इस कोशिश में उनका अस्तित्व के धार्मिक आयाम से भी उलझना अवश्यंभावी था, ऐसे समाज में जहां धर्म-निरपेक्षता मजबूत नहीं थी। वे उन सवालों से भी टकराते थे, असुविधाजनक सवाल- जो सिर्फ साहित्य या राजनीति नहीं, दर्शन, मनोविज्ञान और ‘एथिक्स’ के दायरे के हैं और जिनके अंतिम उत्तर शायद अभी तक नहीं खोजे जा सके हैं। जैसे… आमूल परिवर्तन के विचार कितने ही आकर्षक, मानवीय, खरे हों, कितने ही ऊंचे उद्देश्यों से प्रेरित हों– इंसान के मन में उनकी जड़ें कहाँ हैं या वे किन basic मनोवेगों से उपजते हैं? पीड़ितों के प्रति एक वास्तविक करुणा से या सिर्फ चीजों को बदल सकने के अहंकार से? अगर बुनियादी मनोवेग करुणा है तो वह ईसा या बुद्ध की करुणा से किस प्रकार भिन्न है? अगर अहंकार या दर्प है तो यह वर्चस्व या सत्ता की कामना से किस प्रकार भिन्न है -और ऐसा है तो क्या यह उथल-पुथल केवल सामाजिक क्रांति तक रुकेगी, या उसके आगे जाकर व्यक्ति को, उसकी ईमानदारी के बावजूद – विकृत और भ्रष्ट करेगी? अगर ऐसा हुआ तो क्या एक अमानवीयता की जगह दूसरी अमानवीयता नहीं आ जाएगी? क्रांति के समर्थक इन सवालों को महज बुद्धि-विलास, अकर्मण्यता का तर्क या प्रतिक्रियावाद मानकर खारिज करते थे, लेकिन उनके पास भी अपने तर्क थे। इंसान के मनोवेग और प्रेरणायेँ… कहीं शून्य से नहीं आतीं। उनकी जड़ें समाज-व्यवस्था में होती हैं। ‘बाह्य’ और ‘अंतर’ में एक आवयविक संबंध होता है। एक वर्ग-विभाजित समाज में इंसानी चेतना भी विभाजित होती है। अहंकार या दर्प या वर्चस्व की कामना एक असमान, वर्ग-विभाजित समाज की, एक बीमार समाज-व्यवस्था की व्याधि है। हमारे सोच और अनुभवों का एक पक्ष आभ्यन्तर और दूसरा बाह्यगत होता है और वे आपस में जुड़े होते हैं, अलग-अलग नहीं। आत्म-परिष्कार और सामाजिक परिवर्तन दोनों साथ-साथ चलते, बल्कि एक दूसरे को ताकत देते, एक ही प्रक्रिया के दो पहलू होते हैं और हम किसी एक के लिए दूसरे को स्थगित नहीं कर सकते। विचारों और नैतिकता के इस द्वंद्व में तोल्स्तोय के मामले में ग्लानि का भाव और जुड़ा होगा- जो इस उपन्यास में सीधे चला आया है- क्योंकि वे खुद उच्च-वर्ग के थे। इस पृष्ठभूमि में, इस उपन्यास में जो ‘धार्मिकता’ है, वह सतही अर्थों में ‘धार्मिकता’ नहीं, इसी moral conflict को resolve करने की कोशिश का हिस्सा है। उपन्यास पढ़ते हुए यह अनदेखा नहीं रहता कि इस उपन्यास में ही, धर्म का जो ऊपरी सांस्थानिक या ritualistic रूप है, उसकी कैसी तीखी और गुस्सैल आलोचना है। एक जगह एक पादरी जूरी के सदस्यों को शपथ दिलाने आया है, एक गिरजे में धार्मिक रस्मों का विस्तार से जिक्र है और एक जगह एक वक्ता रुँधे गले से, आँसू बहाता हुआ कहता है कि हमने यीशु को दुखी किया है, हमारी मुक्ति उस पवित्र लहू में है जो उन्होंने हमारे लिए बहाया। इन प्रसंगों में तोल्स्तोय की भाषा में जितना दर्द, क्रोध और उपहास है, पादरियों के ढोंग का जैसा मखौल उड़ाया गया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। लेकिन अंततः वे अपने moral conflict को दोस्तोएव्स्की की तरह स्वैच्छिक पीड़ा और व्यक्तिगत त्याग के स्तर पर ही resolve कर पाते हैं। कहा जा सकता है कि उन्होंने सर्वजन की पीड़ा का भार असहनीय पाकर या उसे निर्विकल्प मानकर या उससे उदासीन होकर व्यक्तिगत मुक्ति या मोक्ष के विचार में पनाह ली, सामाजिक सवालों को आध्यात्मिक संघर्ष की जमीन से एकाकार कर दिया। अपने लिए मुश्किल सामाजिक सवालों के आसान आध्यात्मिक उत्तर खोज लिए। लेकिन इसके बावजूद इस उपन्यास में, उनकी अन्य कृतियों की ही तरह, human situation का, साथ ही अपनी अंतरात्मा का जैसा साक्षात्कार है, वह इस किताब को मूल्यवान बनाता है।

कहानी में प्रिंस नेख्लुदोव एक धनी, कुलीन, प्रभावशाली व्यक्ति है। युवावस्था में उसका एक गरीब लड़की, कत्यूशा के साथ संबंध हुआ, फिर वह उसे भूलकर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गया। बरसों बाद कत्यूशा, जो अब जिस्मफरोशी करती है, हत्या के एक मुकदमे में एक मुजरिम के रूप में उसके सामने है। नेख्लुदोव जूरी का सदस्य है। कत्यूशा का जीवन उसी ने बर्बाद किया है, वह उसका मुजरिम है और अब उसके सामने न्यायाधीश की भूमिका में है। लेकिन वह अंतरात्मा से बेदखल नहीं हो गया है। वह महसूस करता है जैसे उसकी आँखों के सामने से एक पर्दा हटा हो, पहली बार उसे उसके पीछे छिपी भयानक चीजों की झलक मिली हो – उसकी अपनी क्रूरता, कायरता और अध:पतन की भी। वह अपनी भूमिका और जिम्मेदारियों का पुनरावलोकन करता है और उसकी एक नई नैतिक यात्रा शुरू होती है। लेकिन उपन्यास में उसकी ही नहीं, उसके समांतर कत्यूशा की भी एक यात्रा है, एक निस्सार, पतित जीवन से जिंदगी का एक उद्देश्य पा लेने तक ।

तमाम कमियों, आपत्तियों के बावजूद यह उपन्यास महत्वपूर्ण है, क्योंकि जिन सवालों को छूता है, वे सभी महत्वपूर्ण सवाल हैं । ‘तुममें जो निष्पाप हो, वही पहला पत्थर मारे’ यह वचन बाइबल से भले ही आया हो, यह ‘न्याय’ और ‘नैतिकता’ का सवाल है। नेख्लुदोव को यह सवाल मथता है कि उसे कत्यूशा का जज होने का क्या हक़ है। उपन्यास जारकालीन रूस की तीखी आलोचना के साथ ‘न्याय’- जो रोटी जितना ही ज़रूरी है- और ‘न्याय-प्रणाली’ या ‘न्यायिक-प्रक्रिया’ के बाबत ज़रूरी सवाल उठाता है। किसी को भी किसी पर भी जज होने का क्या हक़ है और जज होने का मतलब क्या है? ‘मैं दूसरों का न्याय करना न केवल निरर्थक समझता हूं बल्कि पाप भी‘ वह कहता है। न्यायाधीश न्याय-प्रक्रिया का ज़रूरी अंग होता है लेकिन क्या वह न्याय का ‘कस्टोडियन’ भी होता है? इस सवाल की अनुगूँज हम बाद की कितनी ही कृतियों में देख सकते हैं। यही प्रश्न ‘त्यागपत्र’ के प्रमोद के सामने है और यही कामू के उपन्यास ‘प्लेग’ में सामने आता है। जॉर्ज बरनार्ड शॉ का कथन था कि अगर हमने ‘न्याय’ को पूरी तरह न्यायाधीशों के हवाले कर दिया तो समाज में न्याय नहीं बचेगा। वे अपने समय के जज ही थे जिन्होंने सुकरात को जहर का प्याला पीने पर मजबूर किया, जिनका कसूर सिर्फ यह था कि वे अपने पड़ोसियों से ज्यादा बुद्धिमान थे।

नेख्लुदोव को कत्यूषा का जीवन बर्बाद करने का गहरा गिल्ट या अनुताप है। लेकिन ऐसा भी होता है कि हमारी अपनी भावनाएं हमें धोखा देती हैं। वे हमेशा इतनी साफ नहीं होतीं। करुणा के भीतर दर्प और ‘अनुताप’ के भीतर ‘आत्मगौरव’ की छिपी हुई पर्त हो सकती है। ‘अनुताप’ के पलों में, हम ठीक-ठीक नहीं जानते कि कहीं हम उसके बहाने सिर्फ यह आत्मतोष तो नहीं हासिल कर रहे कि हम कितने न्यायप्रिय या संवेदनशील हैं। तब ‘अनुताप’ भी सिर्फ एक खेल होता है या आत्म-प्रवंचना। एक प्रसंग में कत्यूषा उसके सौ रूबल उसके मुंह पर दे मारती है और उसे आत्मश्लाघा से पृथक विशुद्ध अनुताप के सामने खड़ा कर देती है। यह केवल एक प्रसंग है जहां हम पात्रों के अन्तःसंघर्ष में ऐसे डूब जाते हैं जैसे वे हमारे ही हों– और ऐसे प्रसंगों की एक भरमार इस उपन्यास में है। दरअसल इसमें असंख्य विषय और मार्मिक पल हैं, उनकी एक लंबी सूची बनाई जा सकती है और प्रत्येक पर बहुत कुछ कहा जा सकता है।

लेनिन तोल्स्तोय के दार्शनिक-राजनीतिक विचारों से असहमत होते हुए भी उनके प्रशंसक थे और उन्हें ‘रूसी क्रांति का दर्पण’ और रूसी समाज की परिस्थितियों का प्रतिबिंब मानते थे। ‘वॉर एंड पीस’ और ‘अन्ना करेनिना’ के साथ वे इस उपन्यास के भी प्रशंसक थे- इसमें सामाजिक अन्यायों का जो कठोर चित्रण है, उसके कारण– हाँलाकि वे उनके धार्मिक विचारों और ‘आध्यात्मिक अराजकतावाद’ से सहमत नहीं हो सकते थे जिसे वे क्रांतिकारी मार्क्सवाद के विरुद्ध मानते थे। वे उनके प्रशंसक थे लेकिन उनकी सीमाओं और अंतर्विरोधों को भी बखूबी जानते थे- एक ओर तत्कालीन व्यवस्था की कड़ी आलोचना, वर्ग-संघर्ष का यथार्थ चित्रण, ज़ुल्मों और अन्याय के प्रति नफरत- दूसरी ओर धर्मनिष्ठा, व्यक्तिगत मोक्ष और ‘अहिंसक प्रतिरोध’ के सिद्धांत।

यह उपन्यास हमें सवालों के जंगल में छोड़ देता है, कोई जवाब या समाधान नहीं देता, या जवाब देता भी है तो ऐसे जो हमारे लिए निरर्थक हैं। लेकिन हम ‘साहित्य’ के पास सवालों के लिए ही जाते हैं, उत्तर पाने नहीं। जवाबों के लिए हम शायद ‘दर्शन’ के पास जा सकते हैं लेकिन वहाँ भी, कोई ‘अंतिम या absolute जवाब’ का दावा करे तो हमें सावधान रहना होता है। तमाम आपत्तियों के बावजूद यह किताब क्यों महत्वपूर्ण है? मेरी राय में जो इस उपन्यास का केंद्रीय तत्व है, नेख्लुदोव का guilt, पश्चाताप से विदीर्ण उसकी अंतरात्मा, उसकी extreme vulnerability- उसी के कारण। यह तत्व हमारे समकालीन साहित्य से नदारद है। जैनेन्द्र जी के ‘त्यागपत्र’ को छोड़ दें तो याद नहीं आता कि हमारे समय के साहित्य में ऐसी गहरी ग्लानि का स्वर कहीं मिलता हो। तो क्या हम सब किसी ऊंचे धरातल पर पहुँचकर अति- नैतिक, त्यागमय, मूल्यनिष्ठ जीवन जीने लगे हैं? हमसे कभी कोई गुनाह नहीं होता, कोई विचलन नहीं आता? नहीं, हमने सिर्फ ग्लानि, आत्मपरीक्षण और अपने को कठोर कसौटियों पर कसना, इन सब से मुक्ति पा ली है । इन्हें झटककर, दामन बचाकर निकल जाने के रास्ते ईज़ाद कर लिए हैं। हमारे समय और समाज में, जहां तकलीफ़ें और अन्याय बढ़ते ही जाते हैं, क्या यह मुमकिन है कि हमारी कहीं कोई जिम्मेदारी या साझेदारी न हो? अगर कोई किताब और कुछ न कर, सिर्फ हमें हमारी खोई मनुष्यता की याद दिलाये, हमें आईने के सामने खड़ा कर दे, आत्म-निरीक्षण के लिए बाध्य करे- तो भी वह मेरे लिये एक बड़ी रचना है। मैं अपनी बात एंतोनियो ग्राम्शी के इस कथन के साथ समाप्त करना चाहूँगा कि ‘ग्लानि अपने में एक क्रांतिकारी विचार है।’

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