Friday, March 20, 2026
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कथा-अकथा: श्रम और साहित्य- हाशिये की दुनिया और दुनिया का हाशिया 

श्रम और साहित्य पर लिखा गया यह आलेख श्रमिकों के प्रति एक स्पष्ट पक्षधरता की माँग करता है। श्रम को केंद्र में लाने वाला साहित्य दरअसल लोकतंत्र को केंद्र में लाने का साहित्य है। यही वह बिंदु है जहाँ साहित्य सौंदर्य से आगे बढ़कर नैतिक और राजनीतिक दायित्व बनता है। इसका उद्देश्य यही है कि वह ‘कथा’ के भीतर छिपी ‘राजनीति’ और ‘अकथा’ में दबा ‘सच’ उजागर करे। यह वही ज़मीन है जहाँ कथा केवल कहानी नहीं रहती और अकथा केवल तथ्य नहीं। दोनों मिलकर हाशिये की दुनिया को दृश्य,श्रव्य और विचारणीय बनाते हैं।

वह साल के चंद आख़िरी दिन थे जब दो दिनों तक चले एक परिसंवाद ने हम लेखकों को उस यथार्थ से रूबरू कराया, जिससे हम या तो नज़रें चुराते हैं या फिर जिसे हम अक्सर अपनी कल्पना के भरोसे लिखते रहे हैं, वो उस सत्य या जीवन का अंशमात्र भी नहीं, जिससे हम रोज़ाना रू-ब-रु होते हैं। 27–28 दिसम्बर को ‘श्रम और साहित्य’ नाम से आयोजित इस संगोष्ठी में वक्ता और श्रोता की पुरानी भूमिकाएँ बदल गई थीं। यहाँ मंच पर वे लोग थे, जिनके श्रम पर समाज की बुनियाद खड़ी है। कारख़ानों के मज़दूर, घरेलू कामगार, आंदोलनकारी श्रमिक, संयोजित और असंयोजित कामगार और उन्हें सुनने वालों में हम लेखक, शिक्षक, पत्रकार, चिकित्सक, मतलब हम मध्यवर्गीय संभ्रांत जन।

यह अनुभव अविस्मरणीय ही नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण का भी था। श्रमिकों के अनुभवों के सामने कई बार मेरी निजी अनुभूतियाँ और लेखकीय अहं छोटे जान पड़े। यहाँ गुड़गांव मारुति आंदोलन से जुड़े कर्मचारी, घरेलू कामगार, उबर ड्राइवर और ईंट-भट्ठों पर काम करने वाली स्त्रियों ने अपने जीवन, संघर्ष, अर्जित की हुई सामाजिक चेतना और अपनी स्मृतियों को शब्द दिया। इनके शब्द साहित्यिक अलंकरण से भले ही युक्त नहीं थे, लेकिन इनमें अनुभव का ताप था। ये इतने सघन थे कि श्रोताओं की संवेदनात्मकता को हिला कर रख दें। यह श्रम की वह भाषा थी, जो किताबों से कम और जीवन से अधिक आती है।

इनसे मिलकर लगा मैं थोड़ी नयी हो गयी हूँ। वहाँ मुझसे बार-बार कुछ कहने की गुज़ारिश होती रही, पर मुझसे ज़्यादा कुछ आदतन कहना संभव नहीं हो सका। एक तो मेरा संकोची स्वभाव, दूजे उनकी आपबीतियों के आगे कुछ भी कहने को जैसे शब्द गुम थे। पर इस कुछ खास न कह सकने की मेरी बेबसी ने लगातार मेरे भीतर एक बेचैनी बनाए रखी। उनका जीवन, उनके प्रश्न, उनकी जिज्ञासाएँ, लगातार मेरा पीछा करती रहीं। जिनके आलोक में मैं यह लेख लिख सकी। सबसे बड़ा प्रश्न उनका यह था कि ऐसा साहित्य क्यों नहीं लिखा गया या फिर कम लिखा गया, जिनमें उनका जीवन, उनका अक्स हो। जहाँ वे अपना प्रतिबिंब तलाश सकें।

यह बात पूर्णतः सच भले न हो, पर बहुत हद तक सच है…

कला के आग्रह, शिल्प का अनुसंधान, कुछ नये तरीके का या फिर नये तरीके से लिखने की चाह, जिसका परम उद्देश्य सिर्फ पाठकों को चौंकाना और प्रभावित करना था, ने साहित्य से विषयवस्तु और यथार्थ को बाहर निकाल फेंकने की तमाम कोशिश तो की ही है। और इसका सबसे बड़ा घाटा समाज के वंचित वर्ग और उनसे सम्बंधित जेनुईन मुद्दों को हुआ।

साहित्य केवल कल्पना या सौंदर्य का अनुशासन नहीं, बल्कि समाज की अंतर्धाराओं को समझने और व्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। वह श्रम, जो मनुष्य के अस्तित्व, संस्कृति और इतिहास की बुनियाद है और सदा से रहा है। विडंबना यह है कि साहित्य में अक्सर वही हाशिये पर रहा। यह हाशिया आकस्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक- सत्ता संरचनाओं द्वारा निर्मित है।

लेकिन उसके समानांतर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि साहित्य की एक धारा तब भी अनुसंधान, विषयवस्तु और वंचितों के हक़ के साथ खड़ी रही। उसके लिए जगह बनाती और लड़ती रही। बाहर से देखने वालों को वह क्षीण होती भले दिखे, पर वह उस तरह क्षीण कभी नहीं हुई या हो सकी।

यहाँ मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगी कि श्रम कोई पृथक विषय नहीं, बल्कि साहित्य का अविभाज्य अंग है। हमारे वस्त्र, हमारा भोजन, हमारा दैनिक जीवन, सब इसी श्रम की देन हैं। फिर यह श्रम साहित्य में इतना कम या लगभग अनुपस्थित-सा क्यों हो? यह सच है कि उद्योगों और कॉरपोरेट जगत ने श्रम का अवमूल्यन किया। पर साहित्य ने भी कई बार अनजाने में इस चुप्पी को वैधता दी है। यदि हम एक बेहतर संसार की कल्पना करना चाहते हैं, तो श्रम की गरिमा का केवल स्वीकार ही नहीं, उसे उसकी जटिलता और पूर्णता में अनुभव, आत्मसात और अभिव्यक्त भी करना होगा। कब तक हम इसे ‘एक्टिविज़्म’ कहकर ख़ारिज करते रहेंगे?

श्रम का बदलता प्रारूप

सच कहें तो आज के वक्त में श्रम का प्रारूप भी बदल चुका है। ठेका प्रथा, गिग इकॉनॉमी, प्रवासी मज़दूर, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म। आज जब श्रम को ‘कौशल’, ‘ह्यूमन रिसोर्स’ और ‘डेटा’ की भाषा में परिभाषित किया जा रहा है, साहित्य के सामने सबसे बड़ा संकट यही है कि वह इस अमानवीयकरण का प्रतिवाद कैसे करे।

गिग इकॉनॉमी, ठेका प्रथा, निजीकरण, कॉरपोरेट खेती और श्रम क़ानूनों का क्षरण, ये केवल आर्थिक नीतियाँ नहीं, बल्कि श्रमिक जीवन की नई त्रासदियाँ हैं। एक ऐसे वक्त में श्रम की दुनिया को केवल ‘पीड़ित’ नहीं, बल्कि प्रतिरोध, संगठन और वैकल्पिक स्वप्नों की दुनिया के रूप में देखना, आज के लेखन की सबसे बड़ी ज़रूरत और चुनौती है।

‘श्रम और साहित्य’ पर विचार करना दरअसल साहित्य की उसी दृष्टि, वर्गीय-चेतना और उसकी नैतिक प्रतिबद्धता की जाँच करना है। श्रम और साहित्य का संबंध किसी एक विधा या आंदोलन तक सीमित नहीं। यह साहित्य की आत्मा का प्रश्न है। जब तक साहित्य समाज के सबसे श्रमसाध्य, सबसे उपेक्षित जीवन की दृष्टि से स्वयं को नहीं देखता, तब तक वह अधूरा रहेगा। श्रम और साहित्य का संबंध केवल प्रतिनिधित्व का नहीं, नैतिक उत्तरदायित्व का है। जिस समाज में श्रम जीवन का आधार है, वहाँ साहित्य का उससे विमुख रहना संभव नहीं।

साहित्य आत्मा का विस्तार है और जो साहित्य समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की दृष्टि से दुनिया को नहीं देख सकता, वह अधूरा है। श्रम की गरिमा को पहचानने वाला साहित्य ही भविष्य का साहित्य होगा। एक ऐसा साहित्य जो मनुष्य को उसके पूरे श्रम, संघर्ष और स्वप्नों के साथ स्वीकार करता है।

श्रम का साहित्यिक इतिहास

साहित्य में श्रम केवल रोज़गार या जीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवनानुभव की केंद्रीय धुरी है। खेत में हल चलाता किसान, ईंट ढोती स्त्री, कारख़ाने में खड़ा मज़दूर; ये सभी अपने श्रम के साथ एक पूरी दुनिया ढोते हैं। थकान, स्वप्न, अपमान, प्रेम और प्रतिरोध, साहित्य जब इन अनुभवों को भाषा देता है, तब वह केवल कथा नहीं रचता, बल्कि इतिहास के मौन स्वरों को स्वर देता है। साहित्य के मुख्य प्रवाह में श्रमिक, किसान, घरेलू कामगार, निर्माण मजदूर, सफ़ाईकर्मी, आदिवासी और दलित समुदाय प्रायः हाशिये पर ही रहे।

‘श्रम और साहित्य’ का प्रश्न दरअसल उसी हाशिये की दुनिया को केंद्र में लाने का प्रश्न है। उस दुनिया का, जो समाज को चलाती है पर स्वयं दृश्य नहीं होती। साहित्य केवल सौंदर्य या कल्पना का क्षेत्र नहीं है, वह समाज की संरचना, उसके अंतर्विरोधों और अदृश्य श्रम का जीवित दस्तावेज भी है।

भारतीय साहित्य की परंपरा में श्रम का उल्लेख प्रारंभ से मिलता है। लोकगीतों, श्रमगीतों, बिरहा, आल्हा, भक्ति साहित्य और सूफ़ी काव्य में मेहनतकश जीवन की धड़कन सुनाई देती है। कबीर, रैदास, नामदेव जैसे संत कवियों ने श्रम और जीवन को आध्यात्मिक गरिमा दी। लेकिन उस वक्त भी शास्त्रीय और दरबारी साहित्य ने श्रम को प्रायः निम्नतर जीवन-स्थितियों से जोड़कर देखा।

लोकगीत, श्रमगीत, जातीय कथाएँ और मिथक, ये सब श्रम की सहज अभिव्यक्तियाँ हैं। इनमें सौंदर्य श्रम से अलग नहीं, बल्कि उसी से उपजा हुआ है। बिरहा, सोहर, आल्हा, आदिवासी गीत, ये श्रम करते शरीर की लय में रचे गए हैं। यह वह साहित्य है जो लिखित परंपरा से पहले से मौजूद रहा, पर जिसे ‘मुख्यधारा’ ने लंबे समय तक साहित्य मानने से इनकार किया।

परिणामस्वरूप उनका जीवन-अनुभव साहित्य में या तो अनुपस्थित रहा या फिर मध्यवर्गीय दृष्टि से देखा-समझा गया। साहित्य में हाशिये की उपस्थिति प्रायः सहानुभूति से ही संचालित रही। साहित्य के कैनन, भाषा की शुद्धता, विषयों की ‘गरिमा’ इन सबने मिलकर श्रमिक वर्ग को लंबे समय तक साहित्यिक केंद्र से बाहर रखा। जो लिखा भी गया, वह प्रायः मध्यवर्गीय सहानुभूति से संचालित था, न कि श्रमिक की स्वायत्त दृष्टि से।

चुनौतियां

इस हाशिये की दुनिया को लिखने के लिए इन्हें बस बतौर विषय चुनना पर्याप्त नहीं। दृष्टि और भाषा भी बदलनी पड़ेगी। श्रमिक जीवन को अभिजात भाषा में ढालने से कई बार उसका यथार्थ कुंद हो जाता है। इस यथार्थ को व्यक्त करने के लिए श्रम की शब्दावली, बोलियों और लोक-भाषा को उसमें समायोजित करने की ज़रूरत बहुत ज़्यादा होगी। यहाँ हाशिये का अर्थ केवल आर्थिक अभाव से नहीं जुड़ता। यह सत्ता, संसाधन और प्रतिनिधित्व से वंचित किए जाने की एक जटिल प्रक्रिया से भी है।

यह प्रश्न भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि श्रमिक जीवन को किस भाषा में लिखा जाए। मानक भाषा अक्सर श्रम की खुरदुरी सच्चाई को मुलायम कर देती है। इसलिए बोलियों, लोक-शब्दों और श्रम-विशेष की शब्दावली का साहित्य में प्रवेश को एक सौंदर्यगत या असौंदर्यगत हस्तक्षेप की तरह नहीं, बल्कि व्यवहारिक जरूरत के तौर पर देखा जाये।

इसमें सबसे बड़ी चुनौती हम लेखकों के साथ जो है या जिसे साधना है, वह यह है- कैसे बिना कलात्मकता खोये या भाषा को अभद्र या वीभत्स किए हम इन सच्चाइयों को पाठकों तक पहुंचायें कि वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके।

हमारे लिखे के साथ उसके प्रकाशन के पूर्व जो उठता है वो पहला सवाल यह है कि ‘ इसमें नया क्या है? विषय की पुनरावृति तो नहीं हुई? किसी ने इस विषय पर पहले तो नहीं लिखा? कैसे इस सवालों के हल निकलेंगे, हमें यह भी रूककर सोचना है।

और सबसे बड़ी बात यह कि इसे एक आउटसाइडर की तरह बयां करने से भी काम नहीं चलनेवाला। इसमें डूबकर इसे अंकित करना होगा, क्योंकि जो बौरा डूबन डरा….हमें इनमें से एक या फिर इनका अल्टर इगो होकर सोचना, देखना या लिखना होगा। नहीं तो बाहर-बाहर से देखने पर इनके गमों की वह भीड़ कहां दिखाई देनेवाली?

हिंदी साहित्य में श्रम की छाया यानी श्रमिक चेतना का उद्भव और विकास

मार्क्सवादी साहित्य-चिंतन श्रम को उत्पादन संबंधों के केंद्र में रखता है। ग्राम्शी की ‘हेजेमनी’ की अवधारणा बताती है कि कैसे सांस्कृतिक वर्चस्व साहित्यिक स्वाद और विषय तय करता है। उत्तर-औपनिवेशिक और सबाल्टर्न अध्ययन इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इतिहास और साहित्य में ‘नीचे से’ बोलने की जगह बनाई जाए।

गोदान’ का होरी, ‘कफन’ के घीसू-माधव, ‘सद्गति’ का दुखी। ये चरित्र केवल व्यक्ति नहीं, एक पूरी श्रम-संरचना के प्रतीक हैं। प्रेमचंद के बाद प्रगतिशील आंदोलन ने साहित्य को श्रमिक वर्ग की ओर स्पष्ट रूप से मोड़ा। यशपाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं और कथाओं में खेत, कारख़ाना और मज़दूर जीवन का यथार्थ उभरता है। प्रेमचंद के यहाँ श्रमिक चरित्र पहली बार पूर्ण मनुष्य के रूप में उभरते हैं। ‘गोदान’ का होरी या ‘सद्गति’ का दुखी केवल दया के पात्र नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था पर मौन अभियोग हैं। आगे चलकर रेणु, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और मुक्तिबोध ने श्रम को केवल यथार्थ नहीं, बल्कि कविता और वैचारिक बेचैनी का स्रोत बनाया।

निराला सिर्फ ‘वह तोड़ती पत्थर’ के कवि नहीं थे, वे ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ जैसे चरित्रों के उद्गाता थे। वे ‘भिक्षुक’ जैसी यथार्थवादी कविताओं के कवि थे। गजल और कविताएं तो जैसे आज भी श्रम की उपत्यका हैं, फिर हम दुष्यंत और अदम गोंडवी जैसे लेखकों को इस विषय पर बात करते हुए कैसे विस्मृत कर सकते हैं?

अबदुल बिस्मिल्लाह की ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ संजीव की ‘सावधान नीचे आग है’ प्रियंवद की ‘परछाईं नाच’ नयी किताबों में शिवमूर्ति का उपन्यास ‘अगम बहे दरियाव’ मैत्रेयी पुष्पा लिखित ‘अल्मा कबूतरी’ संजीव का ही ‘फांस’ ये कुछ ऐसे उपन्यास हैं, जिन्हें किसानों, मजदूरों और सताये गये लोगों के आख्यान और उपाख्यान के रूप में पढा जा सकता है। मैं स्वयं अपने उपन्यास ‘ ये दिए रात की जरूरत थे’ को भी इसी की एक कड़ी के रूप में देखती हूं। रणेंद्र के उपन्यास भी इसी की एक कड़ी हैं। नाम और भी हैं और अनंत है।

कहानियों में भी परिदृश्य कुछ इससे भिन्न नहीं। हमारी पीढ़ी के अग्रज कथाकार ‘पंकज मित्र’ कस्बों में रहनेवाले उपेक्षित पात्रों को केंद्र में रखकर अविस्मरणीय पात्रों को सिरजनेवाले अप्रतिम कथाकार हैं।

साहित्य में श्रम की चर्चा तब तक अधूरी है जब तक स्त्री श्रम को समझा न जाए। घरेलू काम, देखभाल का श्रम, खेतों और असंगठित क्षेत्रों में स्त्रियों की भूमिका लंबे समय तक अदृश्य रही। स्त्री लेखन ने श्रम को सत्ता, शरीर और भाषा,तीनों स्तरों पर प्रश्नांकित किया। साहित्य में श्रम की चर्चा तब तक अधूरी है जब तक स्त्री श्रम को समझा न जाए। घरेलू काम, देखभाल का श्रम, खेतों और असंगठित क्षेत्रों में स्त्रियों की भूमिका लंबे समय तक अदृश्य रही।

स्त्रियाँ न केवल श्रमिक हैं, बल्कि उनका श्रम अक्सर ‘प्राकृतिक कर्तव्य’ मानकर अदृश्य कर दिया जाता है। घरेलू श्रम, देखभाल का काम, खेत और कारख़ानों में सस्ता श्रम, इन सबकी साहित्यिक उपस्थिति बहुत देर से शुरू हुई। स्त्री लेखन ने श्रम को सत्ता, शरीर और भाषा, तीनों स्तरों पर प्रश्नांकित किया। इसका उदाहरण वंदना राग की कहानी’ चंद रोज और मेरी जान’ है। एक हेल्पिंग हैंड यानी गृह-सहायिका के जीवन, सपनें , खुशियां और दुख और सुख को यह कहानी बखूबी अंकित करती है। हाल के हमय में आई आदित्य की कहानी ‘रानी मुखर्जी का अकेलापन’ भी इसी विषयवस्तु पर लिखी गयी सशक्त कहानी है।

अपनी पीढी की स्त्रियों की ओर भी देखूं तो नीलाक्षी सिंह की कई कहानियां, सोनी पांडे, सिनीवाली शर्मा की कहानियां दबी कुचली तबके की स्त्रियों की आवाज बनकर उभरती है। वरिष्ठ पीढ़ी में मैत्रेयी पुष्पा की एक सफाईकर्मी स्त्री के जीवन पर आधारित कहानी, जिसका नाम अभी ध्यान में नहीं आ रहा अविस्मरणीय है। महादेवी वर्मा, मृदुला गर्ग, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी से लेकर समकालीन स्त्री लेखन तक स्त्री श्रम की कई परतें खुलती हैं, जहाँ श्रम केवल आजीविका नहीं, अस्तित्व की पहली, आखिरी और सबसे जरूरी शर्त है।

तमाम नाम गिनाने लगूं तो लेख शायद असमाप्त हो जाये। फिर भी श्रम और साहित्य के सम्बंध को जानने के लिए जो कुछ लेखक या किताबें जरूर पढ़ी जानी चाहिए नीचे उनका नाम अंकित हैं ं-

  1. प्रेमचंद गोदान, सद्गति, कफन
  1. नागार्जुन – अकाल और उसके बाद, चयनित कविताएँ
  2. केदारनाथ अग्रवाल श्रम-केंद्रित कविताएँ
  3. फणीश्वरनाथ रेणु- मैला आँचल, परती परिकथा और चयनित कहानियाँ
  4. ओमप्रकाश वाल्मीकि – जूठन
  5. शरणकुमार लिंबाले – अक्करमाशी
  6. तुलसीराम – मुर्दहिया
  7. महादेवी वर्मा – श्रृंखला की कड़ियाँ (स्त्री श्रम संदर्भ)
  8. गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक Can the Subaltern Speak?
  9. रणजीत गुहा – सबाल्टर्न स्टडीज़ (चयन)

एक विशद सूची को न बनाने से खुद को बरजते और रोकते हुये बनाई गयी यह सूची बेहद अनौपचारिक है। यह भी अनायास नहीं कि इसमें एकसाथ दलित विमर्श की कई किताबें शामिल हैं।

यहां यह तो एकदम स्पष्ट है कि दलित साहित्य ने उस कृपागत दृष्टि और साहित्य में श्रम को दूर से देखे जाने की परंपरा और स्थिति को निर्णायक रूप से तोड़ा। यहाँ श्रम बाहर से देखा गया दृश्य नहीं, बल्कि भोगा हुआ यथार्थ है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, शरणकुमार लिंबाले, तुलसीराम जैसे लेखकों के यहाँ श्रम पीड़ा मात्र नहीं, संघर्ष और अस्मिता का स्रोत है। यह साहित्य सहानुभूति नहीं, साक्ष्य प्रस्तुत करता है। ऐसा साक्ष्य जो मुख्यधारा के साहित्य को असहज कर सकता है, करता भी है।

मैंने उस दिन कई वक्ताओं से मंच से परे एकांत में भी यह कहा था-‘ हम आपके साथ हैं, हम सब लिखते रहे हैं और आगे भी लिखेंगे आपकी कथाएं। पर क्या ही बेहतर हो कि ये अनुभव आपके लेखन के माध्यम से हम तक आयें? आप क्यों नहीं कर सकते अपने इन अनुभवों को लिपिबद्ध? भाषा, शैली, शिल्प आदि-आदि के बारे में सोचे बगैर? ठीक उसी तरह, जिस तरह आप हमसे कह रहे हैं। सिर्फ बेबी हालदार ही क्यूं लिखे ‘ आलो-आंधारि?’ ये इतनी भिन्न- भिन्न रोंगटे खड़ी कर देने वाली कहानियां भी बाहर आनी चाहिए, और अपनी तमाम प्रामाणिकता के साथ आनी चाहिए।’ मैं अनुभूति की प्रामाणिकता को बीते दिनों की बात नहीं मानती, उसके असर और प्रभाव पर भरोसा रखती हूं, बल्कि कहूं तो हद से ज्यादा रखती हूं।

हममें से अधिकतर लेखक यह जानता और मानता है कि उसका लेखन समाज से लिया गया ऋण है; उसे चुकाने का एकमात्र रास्ता यही है कि समाज को उसकी पूरी जटिलता, पीड़ा और संघर्ष के साथ देखा, जीया और लिखा जाए। महामारी के दौरान पैदल लौटते मज़दूरों की छवियाँ अगर साहित्य में हस्तक्षेप नहीं बनतीं, तो साहित्य अपने समय से चूक जाता है…

लेकिन हम याद कर सकते हैं प्रगतिवादी कविताएओं का हश्र। ये श्रम को वैचारिक केंद्र में भले हीं लेकर आईं। पर अगर आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यहाँ भी श्रमिक ‘विषय’ तो बने, पर ‘वक्ता’ नहीं। उनकी निजी और सामुदायिक आवाज़ लेखक की वैचारिक प्रतिबद्धता में कहीं समाहित होकर खो गयी।

मुझे उनसे और दुनिया के तमाम श्रमिकों से केदारनाथ अग्रवाल की कविता पंक्तियों के आलोक में सिर्फ इतना कहना है-

‘ज़िंदगी को वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं,

जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं…

यज्ञ की इस शक्ति-श्रम को श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!…

मैं नया इंसान हूं, इस यज्ञ में सहयोग दूंगा।

कविता
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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