साल 1956 में एक फ़िल्म आई— बसंत बहार, जिसका यह गीत है। शैलेन्द्र का लिखा, शंकर–जयकिशन का बनाया, पर जिसमें बड़ा योगदान रहा सारंगी वादक पंडित रामनारायण जी का। शंकर–जयकिशन ने यह गीत उन्हें और गायकों को सौंप दिया था। मन्ना डे के साथ भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी ने इसे गाया। यह वह अद्भुत पल था जब पंडित भीमसेन जोशी और मन्ना डे के बहाने हम सभी ने शास्त्रीय संगीत और फ़िल्मी संगीत की जुगलबंदी और उनकी अपनी–अपनी विशिष्टताएँ सुनीं–जानीं। भीमसेन जी सुरों और तानों के उन्मुक्त साधक थे, तो मन्ना डे फ़िल्मी गीतों के सबसे अनुशासित और प्रशिक्षित स्वरों में से एक। पंडित जी की गायकी में लंबे आलाप और तानें स्वाभाविक रूप से थीं। वे सीमाओं से डरते नहीं थे, बल्कि उनसे पार जाने का हौसला रखते थे, तो वहीं मन्ना डे इस गीत में प्रतियोगी कम, सूत्रधार ज़्यादा लगते हैं। उनकी मीठी और संयत आवाज़ मेरे जैसे साधारण श्रोताओं को बार–बार रास्ता देती है, ताकि वे पंडित जी के शास्त्रीय विस्तार में खो न जाएँ—गीत पर टिके रहें, जो उस आनंद से ज़्यादा ज़रूरी था। भीमसेन जी आकाश की तरह फैलते हैं और मन्ना डे धरती की तरह स्थिर रहते हैं। एक उन्मुक्त है, दूसरा संयत। एक विस्तार है, दूसरा संतुलन। दोनों की ख़ूबसूरती इस एक गीत में है।
यह एक संगीत प्रतियोगिता में इस्तेमाल हुआ गीत था, जिसमें हीरो के लिए मन्ना डे गा रहे थे, तो जाहिर तौर पर उन्हें ही जीतना था। पर देखिए, वे हरा किसको रहे हैं—पंडित भीमसेन जोशी को। जोशी जी कहते थे कि उन्हें लाइट म्यूज़िक नहीं जमता, फिर भी इस बार न जाने कितना मज़बूत आग्रह था कि वे मना न कर पाए। शंकर–जयकिशन अपने शिखर पर बहुत व्यस्त थे—फ़िल्मों की कतार, धुनों की चहल–पहल। रामनारायण जी और पंडित जी को “सौंपे” इस गीत की राग बसंत पर शैलेन्द्र जी ने बोल लिख दिए। ‘केतकी, गुलाब, जूही, चम्पक’ जैसे फूलों के बहाने भारतीय सुरों के खिलने की उपमाएँ बनीं। शब्द शास्त्रीय संगीत की गरिमा के अनुरूप रखे गए, जिसमें शब्द के साथ–साथ उसका साउंड भी एक लय की तरह मौजूद रहा।
मन्ना डे को जब पता लगा कि उन्हें इस गीत में पंडित जी को हराना है, तो वे चिंता में पड़ गए। पंडित जी की गायकी के लिए उनके मन में असीम सम्मान था, इसलिए वे नहीं चाहते थे कि पंडित जी उनसे हारें। पर शंकर–जयकिशन अड़े हुए थे—उन्हें मिली फ़िल्म की स्क्रिप्ट यही थी। मन्ना डे ने सोचा, पाँच–सात दिन बंबई से बाहर चले जाएँ, ताकि इस गीत से पीछा छूटे। पर पत्नी का फ़िल्म और फ़िल्मी संगीत के गौरव वाला स्वर बोल उठा—हीरो के लिए अगर तुम गा रहे हो, तो जीतोगे तुम ही, कोई और थोड़े ही। मन्ना डे कुछ पल सोचे और मान गए। पंडित जी के साथ ऐसी जुगलबंदी की कि यह गीत शंकर–जयकिशन और शैलेन्द्र की फ़ैक्ट्री से निकला एक अनूठा गीत बन गया—उनके पूरे फ़िल्मी करियर से एकदम अलग। रामनारायण जी और भीमसेन जी ने धुन और गीत के ऊपर अधिकार से काम किया, पर मन्ना डे का महत्व और माधुर्य कम न होने दिया। यह उस असीम आकाश का नेह रहा—उड़ने वाले अपने हर पंछी के नाम।

मनुष्य की अनुभूतियाँ जितनी विविध हैं, उतने ही विविध हमारे राग हैं। यह मनोरंजन से अधिक एक अनुभूति–विज्ञान है, जो समय, ऋतु, मनोदशा और अवसर के साथ बदलता है। हमारे हर सुख–दुःख, सुबह–शाम, उत्सव–शोक में वे साथ हैं। हमारे संस्कारों में ही रागों की उपस्थिति है—माँ की लोरी में, विवाह के मांगलिक गीतों में, उत्सवों में, उल्लास में, शोक के करुण भजनों में रागों की छाया है। सुबह की पावन लालिमा के लिए भैरव है, जिसमें भीतर की स्थिरता है, शांति है, जन्म का सुख है। दोपहर की प्रखरता में सारंग और धनाश्री हैं, जिनमें ऊर्जा है, कर्म है। संध्या ढले यमन, पूरिया या मारवा मन में ठहराव, प्रतीक्षा और विरह का भाव भर देते हैं। रात के गहरे सन्नाटे में मालकोंस और दरबारी हमारे भीतर के अकेलेपन, गहराई और आत्मसंवाद को स्वर देते हैं। रागों के समय का विभाजन जीवन की भावनात्मक यात्रा का भी चित्र है। भारतीय राग केवल स्वरों की संरचना नहीं हैं, वे समय, मौसम और मनःस्थिति के साथ बँधी हुई जीवित संवेदनाएँ हैं।
इन सभी रागों में बसंत राग सभी का प्रिय है। यह ऋतु का उत्सव है—बसंत का घोष, पतझड़ के बाद श्रृंगार और उल्लास का रस। जब प्रकृति जागती है, फूल खिलते हैं, कोयल बोलती है और मनुष्य फिर से प्रेम में पड़ने का साहस करता है। बसंत दरबारों में भी गाया गया और लोक में भी। बसंत आशा का राग है, जो बताता है—पत्ते झड़ेंगे, जड़ता आएगी ज़रूर, पर उसके बाद फिर से नए फूल खिलेंगे। यही जीवन है।
‘केतकी, गुलाब, जूही’ गीत की राग शुद्ध बसंत नहीं है। इसमें ‘बसंत’ के साथ ‘बहार’ का भी मिश्रण होकर राग ‘बसंत बहार’ बना है, जो फ़िल्म का नाम भी है। गीत में भी पंडित जी बसंत हैं, तो मन्ना डे बहार। दोनों साथ आते हैं, तो राग ही नहीं—हमारा मन भी ‘बसंत–बहार’ हो जाता है।
इस गीत की सबसे बड़ी सफलता यह है कि यह शास्त्रीय संगीत की गंभीरता, उसकी ऊंचाई को सरल नहीं बनाता, बल्कि सुनने वालो की समझ को जाँचता -परखता है। यह शास्त्रीयता से समझौता नहीं करता, बल्कि फ़िल्मी संदर्भ में उसे सम्मानजनक स्थान देता है। इसी कारण यह शास्त्रीय और सुगम दोनो तरह के संगीत के मुरीदो को संतुष्ट करता है। यही कारण है कि दशकों बाद भी यह गीत “पुराना” नहीं लगता—यह किसी दौर का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि परंपरा और प्रयोग के संतुलन का अनुपम उदाहरण बन चुका है। ‘केतकी, गुलाब, जूही’ केवल पंडित भीमसेन जोशी और मन्ना डे से भी ज्यादा शंकर-जयकिशन के लिए उल्लेखनीय काम है। उनके सैकड़ो लोकप्रिय गीतों के बीच यह गाना अतिरिक्त चमक रखता है। बहुत बार संगीत मनोरंजन से आगे जाकर सांस्कृतिक स्मृति बन जाता है—ऐसी स्मृति, जो हर बसंत के साथ फिर से खिल उठती है।
हमारी पीढ़ी ने भीमसेन जोशी जी को पहली बार ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ में सुना-देखा और जाना। बाद में उनके गाये दूसरे ‘चमत्कार’ तक पहुंचे। इस पीढ़ी तक पंडित जी के साथ -साथ शास्त्रीय संगीत पहुंचाना जरा मुश्किल काम होगा। आज जब संगीत को अक्सर त्वरित लोकप्रियता, एल्गोरिदम और ताली की तात्कालिकता में तौला जाता है, तब बेहतर होगा कि इस पीढ़ी में सुरों के संस्कार देने के लिए ‘केतकी, गुलाब, जूही’ जैसे गीत सुनाये जाए। अच्छा संगीत, साहित्य और सिनेमा संवेदनाओं से भरपूर है। अच्छी किताब पढ़ना, अच्छा संगीत सुनना आपमें नई संवेदनाओं को जन्म देता है। इतनी विविधताओ वाले देश में विविध लोग है, विविध पसंद है। सभी की अपनी जगह है पर संवेदना और गहराई कई बार उनसे मिलती है, जिनको हमने जाना नहीं। मोबाइल के लदे-पड़े ज़माने में कोई लड़का धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ पढ़ता दिखे, कोई लड़का बिस्मिल्लाह खान की शहनाई सुनते दिख जाए तो उस पर अतिरिक्त लाड, अतिरिक्त प्यार बरसाइये। ये सब अब विरले अनुभव होने वाले है।

