वासु ऑफिस में घुसा ही था कि उसके फ़ोन में फेसबुक पर किसी फ्रेंड रिक्वेस्ट के नोटिफिकेशन की घंटी बजी। वासु ने उचटती नज़र से स्क्रीन को देखा और फ्रेंड रिक्वेस्ट में उमा रघुवंशी का नाम पढ़ते ही उसे हल्का सा झटका लगा। इससे पहले कि वो सम्हलता उसने देखा सामने से बॉस आ रहे हैं। “अरे वासु अच्छा हुआ तुम मिल गए जल्दी चलो एक मीटिंग है।” इतना कह कर वो कांफ्रेंस रूम की ओर बढ़ गए। वासु भी उनके पीछे हो लिया। लेकिन सारी मीटिंग के दौरान उसका ध्यान उस फ्रेंड रिक्वेस्ट पर ही लगा रहा। वासु सोचता रहा कि इतने बरसों बाद उमा को उसकी याद कैसे आ गई। तीस साल बीत चुके थे। मीटिंग में ही बैठे बैठे उसकी यादें तीन दशकों का फासला तय करके उस पहली मुलाकात तक जा पहुंचीं।
“हेलो मैं उमा,” उसने बेफिक्री से हाथ बढ़ाया था।
“उमा थरमन हॉलीवुड हीरोइन?” वासु ने हाथ बढ़ाते हुए मुस्कुरा कर पूछा था।
“हाहाहा नहीं उमा रघुवंशी से ही काम चलना पड़ेगा,” उसने जवाब दिया था।
“मुझे उसमें कोई शिकायत नहीं है और मैं वासु हूँ,” वासु ने वापस कहा था।
वो रविवार का दिन था और अपने सहकर्मियों के साथ वासु ने पुस्तक मेले जाने का प्लान बनाया था। नियत समय पर वासु प्रगति मैदान के गेट पर पहुंचा तो उसने पाया वहां कोई नहीं आया था। रमेश, रमन, दृष्टि और आभा को आना था लेकिन सब नदारद थे। वो सबका इंतज़ार कर रहा था कि उसने देखा आभा बस से उतरी लेकिन वो अकेली नहीं थी। लगा जैसे एक और लड़की उसके साथ है। वही लड़की उमा थी और आभा उससे मिलवाती इससे पहले ही उसने बेतकल्लुफी से खुद का परिचय दे दिया था। वासु ने भी उसी मस्ती में उससे बात शुरू की ही थी कि आभा की आवाज़ उसके कानों में पड़ी।
“ज़्यादा फ़्लर्ट करने की ज़रूरत नहीं है, अभी कॉलेज में पढ़ रही है एमए फर्स्ट ईयर में” आभा ने वासु को झिड़का था।
“एमए फर्स्ट ईयर के छात्र बच्चे होते हैं तो किंडरगार्टन वाले क्या होते हैं?” वासु ने पलट कर पूछा।
“शिशु,” उमा ने कहा और खुद ही हंस पड़ी।
वासु के चेहरे पर अनायास ही मुस्कुराहट उभर आई। “मियां मीटिंग में बोले कुछ नहीं और अब बुध की तरह मुस्कुरा और रहे हो। सब ठीक है न?’ यह आवाज़ उसके बॉस की थी। वासु झेंप गया पर कुछ बोला नहीं। “चलो बहुत काम है अभी,” इतना कह कर बॉस अपने केबिन की ओर बढ़ गया और वासु अपने क्यूबिकल में आ कर चुपचाप बैठ गया। उसने कंप्यूटर खोला और सीधे फेसबुक का रुख किया। अब फ्रेंड रिक्वेस्ट भी दिखाई दे रही थी और उमा का मैसेज भी। उसने उमा की प्रोफाइल देखनी शुरू कर दी और पाया कि उसकी ज़्यादातर फोटो में वो किसी न किसी किताब के साथ चाय का प्याला लिए हुए बैठी है। वासु का ध्यान एक बार फिर उसी पहली मुलाकात पर पहुँच गया जहाँ उमा, आभा और वासु पुस्तक मेले में एक लेखक की गोष्ठी में शामिल होने जा रहे थे।
वासु आभा और उमा तीनों ने सबसे पीछे की कतार में कोने की तीन सीटें घेर कर बैठना तय किया। आभा सबसे पहले अंदर की सीट पर जाकर बैठ गई । वासु उमा के बीच वाली कुर्सी पर बैठने का इंतज़ार करने लगा तभी उमा ने कहा, “आप बीच में बैठ जाइये। मैं किनारे की सीट पसंद करती हूँ। अगर मुझे लेखक की बातचीत उबाऊ लगी तो मैं धीरे से खिसक लूंगी।”
“हाहाहा वो तो ठीक है पर भाग के जाओगी कहाँ? हम दोनों तो यहीं हैं।” वासु ने पूछा।
“मैं किसी किताब के स्टाल पर मिल जाउंगी या रेस्टोरेंट में,” उमा ने कहा।
“तुमको लेखकों में कोई रुचि नहीं है?” वासु ने पूछा।
“नहीं उनके लेखन में है,” उमा ने उसी बेफिक्री से कहा।
“क्या बात है। बहुत अच्छे,” वासु और आभा हँसते हुए बोल पड़े।
फेसबुक पर उमा की प्रोफाइल को देखते हुए वासु वाकये को याद करके मुस्कुरा दिया। उस किस्से को याद करते हुए उसे यह भी याद आया कि वो उसी पल उमा की हाज़िरजवाबी का कायल हो गया था। उमा की सहजता और सुंदरता दोनों ही उसको बहुत आकर्षक बना रहे थे। वासु को याद आया कि वार्ता शुरू होने से पहले धमकी देने के बावजूद उमा अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई थी। पूरी बातचीत उसने बड़े ध्यान से सुनी थी। वार्ता खत्म हुई और तीनों फुलवारी रेस्टोरेंट की तरफ बढ़ गए। चाय और समोसे की तलब लगी हुई थी। रेस्टोरेंट में एक कोने में तीनों चाय और समोसे लेकर बैठे और बातों का दौर शुरू हो गया। बातों बातों में उमा बड़ी सहजता से आप से तुम पर आ गई। वासु और आभा दोनों को ही अटपटा नहीं लगा। तीनों के बीच सबसे कम उम्र होने के बावजूद उसके पास गज़ब की जानकारी थी और उसने हिंदी और विदेशी दोनों साहित्य खूब पढ़ा था। वासु को याद आया कि उस दिन उमा की विद्वता के कारण ही उससे बात करना और उसकी बातें सुनना दोनों ही सुखद अनुभव लग रहे थे।
वासु का ध्यान वापस फेसबुक पर लौटा और वो उमा की तस्वीरों को देखने लगा तभी उसकी नज़र एक तस्वीर पर ठहर गई जिसमें वो अपने घर की खिड़की पर खड़ी है और डूबते सूरज की लाल रौशनी उस पर पड़ रही है। वासु उसे देखते ही वापस उस पहली मुलाकात की यादों में डूब गया।
उस पहली मुलाकात के अंत तक अँधेरा हो चुका था। तीनों प्रगति मैदान से बाहर निकले। आभा और उमा एक बस से रवाना हुईं और वासु दूसरी में।रास्ते भर वासु के दिमाग में बीती शाम घूम रही थी। उसका सारा ध्यान घूम फिर कर रेस्टोरेंट में उस ढलते सूरज की लाल रौशनी पर जाकर टिक जाता था जो उस समय उमा के तीन चौथाई चेहरे पर पड़ रही थीं। वासु के मन में एक हूक सी उठी। काश उसके पास कैमरा होता और उसे फोटोग्राफी करनी आती होती तो यह उसका सबसे अच्छा पोर्ट्रेट होता। उमा की वो छवि उसके दिमाग पर छप गई थी। “उसके पति ने अच्छी फोटो खींची है,” वासु ने मन ही मन सोचा और फिर उमा की तस्वीरें देखने लगा। उन तस्वीरों को देखते हुए उसका ध्यान एक बार फिर अतीत में डूब गया।
वासु को याद आया उमा से हुई पहली मुलाकात के बाद ऑफिस की आपाधापी और घर में होने वाली कुछ शादियों के बीच वो ऐसा उलझा कि ढलती सर्दियों की वो शाम धूमिल हो गई। जब एक बार फिर वो वापस ऑफिस लौटा तो पता चला कि आभा को दूसरी नौकरी मिल गई थी और वो ऑफिस से जा चुकी थी। उसे आभा के जाने का दुख था। इस ऑफिस में आभा उसकी अच्छी दोस्त थी। वासु जानता था कि ऑफिस में हुई दोस्तियों के जीवित रहने के लिए रोज़ रोज़ मिलना ज़रूरी होता है। ऐसा न होने पर फिर बहुत से साझा अनुभव कम होने लगते हैं और धीरे धीरे व्यक्ति अपने नए परिवेश में नए सम्बन्ध ढूंढ लेता है। यह एहसास मात्र वासु को दुखी कर रहा था कि उसे अचानक यह भी लगा अगर आभा से मिलना कम हो जाएगा तो फिर उमा से मिलने की संभावना तो नाममात्र की रह जाएगी। और इससे उसका दुःख और गहरा गया था।
“क्या बात है सर फेसबुक पर स्टॉक कर रहे हो अपनी एक्स को?” ये प्रिया थी।ऑफिस में सबसे ज़्यादा मुहफट्ट और सबकी मुँहलगी। वासु ने हड़बड़ा का उसकी और देखा और बोला, “कुछ भी?” “कुछ भी कैसे नहीं ? तब से देख रही हूँ कि आप स्क्रीन पर हर फोटो को घूरे जा रहे हैं। इतना तो मैंने आपको कभी फेसबुक में समय बिताते नहीं देखा।” प्रिया सच कह रही थी। वासु का किसी काम में मन नहीं लग रहा था ठीक वैसे ही जैसे उस दिन जब उसे आभा के जाने और उसके साथ ही उमा से मिलने की क्षीण होती संभावना का एहसास होने पर महसूस हो रहा था।
वासु एक बार फिर पुरानी यादों में खो गया। उस दिन भी वासु खुद पर हैरान था और सोच रहा था, ऐसा क्या हुआ कि एक बार उमा से मिलने के बाद ही उसका यह हाल है कि दोबारा न मिलने की स्थिति उसे इतना विचलित कर रही है। पर उसे कोई जवाब नहीं सूझा। धीरे धीरे समय बीतने लगा। सभी की तरह वासु भी ऑफिस की व्यस्तता में डूब गया। आभा की कमी खलनी दूर हो गई। कुछ नए लोग आ गए वासु ने उनसे दोस्ती गांठ ली।
एक दिन वासु ऑफिस के बाद किसी काम से कनॉट प्लेस गया तो रीगल सिनेमा के पास सबवे से पालिका बाजार जा रहा था तो देखा सामने से एक दो पैकेट लिए उमा चली आ रही थी। दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कुराए और उमा बोल पड़ी, “तुमको पता है मेरी बाईं आँख फड़फड़ा रही थी। मुझे लगा कोई एक्सीडेंट होने वाला है। लेकिन यह तो गज़ब का इत्तेफ़ाक़ हो गया। अब ज्योतिषियों को बाईं आँख फड़कने के बारे में अपना नजरिया बदलना होगा।” वासु हंसा और उसने कहा, “सुनो अब अगर इतना बड़ा इत्तेफ़ाक़ हुआ है तो उसका जश्न भी मनाते हैं। क्यों न एक कॉफ़ी हो जाए?” “क्यों नहीं,” उमा ने उतनी ही तत्परता से कहा। दोनों कॉफ़ी होम की ओर बढ़ गए।
कॉफ़ी होम में बहुत देर तक दोनों किताबों पर लेखकों पर, फिल्म और दुनिया की तमाम चीज़ों पर बात करते रहे। उमा की आवाज़ भी उसके जैसे ही बहुत सुन्दर थी और किसी चीज़ को देखने का नजरिया किसी विचारधारा से प्रेरित नहीं था।बहुत देर बातों का सिलसिला चलता रहा कॉफ़ी ख़त्म हो गई थी और पकौड़ियों की प्लेट में एक ही पकोड़ा बचा था । उमा ने वासु से कहा, “आखिरी पकोड़ा तुम ले लो सुन्दर बीवी मिलेगी।”
” पक्का मिलेगी ना?” वासु ने पूछा।
“अब कहते तो ऐसा ही हैं। ऐसा न हो तो मेरे पीछे न पड़ जाना,” उमा बोली।
“जिसने कहा है उसके पीछे नहीं पडूंगा तो किसके पीछे पडूंगा,” वासु ने झूठा आश्चर्य जताते हुए कहा और उमा हंस दी।
दोनों चलने को हुए तो उमा अचानक बोली, “अरे वासु तुम्हारी उमा थरमन की नई फिल्म आई है ‘किल बिल’।”
वासु ने ठंडी साँस भरने का नाटक करते हुए कहा, “अरे काश कि उमा थर्मन हमारी होती। तुम्हारे मुँह में घी शक्कर!”
हँसते हुए उमा बोली, “छी घी शक्कर और कोई मिठाई नहीं मिली थी”। वासु भी मुस्कुरा दिया।
“अच्छा बताओ तुमने देखी कि नहीं। सुना है क्विंटिन तारंटीनो ने बनाई है।” उमा ने पूछा।
“नहीं देखी तो नहीं लेकिन मन है। असल में कोई फिल्म देखने में मुझे एक साथी की ज़रूरत पड़ती है,” वासु ने जवाब दिया।
“ओह यह तो नई बात पता चली तुम्हारे बारे में। वरना आभा कहती है कि तुम तो मिस्टर खोए खोए हो और अकेले रहना पसंद करते हो,” उमा ने आश्चर्य से कहा।
“हाँ हूँ तो लेकिन फिल्म मुझे किसी के साथ देखना ही अच्छा लगता है। तुम चलोगी देखने,” वासु ने कहा।
“चल तो सकती हूँ अगर तुम्हारा इतना मन है वरना मैंने सुना है उसमें बहुत हिंसा है,” उमा ने कहा।
“हाँ है तो लेकिन चलो न,” वासु ने इसरार किया।
“ठीक है कल चलते हैं,” उमा ने हामी भर दी। वासु को बहुत ख़ुशी हुई अपने पसंदीदा डायरेक्टर की फिल्म देखने के लिए उसको अपनी मनचाही साथी मिल गई थी।
“सर कॉफ़ी लेंगे,” आशीष ने वासु के विचारों में खलल डाला। वासु ने उसकी ओर देखा और बोला, “क्या बात है आज सभी मेरे क्यूबिकल के आसपास ही मंडरा रहे हैं। अरे फेसबुक देख रहा हूँ कोई स्कैंडल नहीं हो गया है।” “हाहाहा नहीं सर मैं तो बस कॉफ़ी के बार में ही पूछ रहा हूँ। लेंगे न?” आशीष ने पूछा। “हाँ ले आओ अब इसके बाद लंच डिनर सबके बार में पूछने मत आ जाना।” वासु ने कहा और आशीष मुस्कुराते हुए चला गया। वासु फिर मन ही मन उस फिल्म हॉल पर था जहाँ वो और उमा फिल्म देखने गए थे।
हॉल पर पहुँचने में थोड़ी देर हो गई थी। दोनों हॉल के अंदर घुसे तो अँधेरा था और उमा बोली, “वासु मेरा हाथ पकड़ लो मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा। वैसे भी मैं चश्मा लगाती हूँ। आधी अंधी तो हूँ ही और इस अँधेरे में तो पूरी तरह से अंधी हो गई हूँ।” वासु ने उसकी ओर अँधेरे में ही देखा और हंसा और धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। फिल्म में वाकई हिंसा बहुत थी। और जब जब हिंसा के दृश्य आते तो उमा अपना सर नीचे कर लेती और पूछती, “सीन ख़त्म हो गया”। और वासु के हाँ कहने पर फिर सर उठा लेती। यह सिलसिला फिल्म के अंत तक चलता रहा।
फिल्म ख़त्म हुई और दोनों हॉल के बाहर निकले तब तक झुटपुटा हो चुका था। दोनों फिल्म की बात करते हुए बस स्टैंड की ओर बढ़ने लगे। उमा बोली, “तुम्हें पता है जब तुम्हारी उम्र चढ़ जाएगी तो तुम भी इस फिल्म के विलेन जैसे लगने लगोगे”।
वासु ने हड़बड़ा कर जवाब दिया, “बकवास। कुछ भी बोल देती हो। क्या मैं इतना क्रूर दिखता हूँ जो उमा थरमन पर हाथ उठाएगा?”
“उमा थर्मन नहीं तो रघुवंशी को तो मार ही सकते हो,” उमा खिलखिला कर हंसी। वासु ने झूठी नाराज़गी जताई और उमा बोली, “अरे वासु जी आप तो नाहक जज़्बाती से हो चले”। वासु मुस्कुराया और देर तक उमा को देखता रहा। उमा भी उसे देखती रही और फिर दोनों के बीच में चुप्पी पसर गई। बस में दोनों के बीच हवा के झोंके एक दूसरे की खुशबू में दोनों को लपेट देते। थोड़ी देर बाद उमा का स्टैंड आ गया वो “बाय” कह कर उतर गई और वासु आगे की यात्रा अकेले ही करने लगा। कुछ देर बाद उसने खिड़की के शीशे में अपनी परछाईं को मुस्कुराते देखा और सकपका कर इधर उधर देखने लगा कि किसी ने उसे बेवजह मुस्कुराते हुए तो नहीं देखा। फिर उसने पाया कि बस करीब करीब खाली थी। वहां बैठे बैठे वो उमा के बारे में सोचता रहा। तीन मुलाकातें लेकिन कितनी सहजता, कितनी बेबाकी, कितना खुलापन। कोई नाटक नहीं, कोई खेल नहीं लेकिन बहुत गहरे एहसास। वासु के मन में ख्याल उठा, “उमा से प्रेम न हो यह बहुत मुश्किल है”।
“ये लीजिये कॉफ़ी,” आशीष ने एक शैतानी मुस्कराहट के साथ कॉफ़ी का प्याला वासु के सामने रखा और इसके पहले कि वो पूछता कि आप क्या कर रहे हैं वासु ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, “अब तुम भी प्रिया की तरह पंचनामा भरने न खड़े हो जाना।” आशीष की हंसी छूट गई और वो, “नहीं नहीं सर, ऐसा नहीं है,” कहते हुए वहां से चला गया।
वासु ने उमा की फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली और फिर उसके मैसेज को खोला। कॉफ़ी पीते हुए उसे उमा से अपने आखिरी संपर्क की याद आ गई।
फिल्म देखने के बाद उमा एक बार फिर गायब हो गई थी। वासु को कई दिन तक यह ख्याल आता रहा कि उमा कैसी होगी? क्या कर रही होगी? क्या उसे भी यह एहसास हो गया है कि मैं उसकी ओर आकर्षित हूँ? क्या वो भी मेरी ओर आकर्षण महसूस करती है? इन्हीं सब सवालों से जूझते जूझते उसे कई बार लगा वो आभा से बात करे और उमा के बारे में पूछे। लेकिन न जाने क्यों वो रुक गया। मन में शायद चोर था कि कहीं आभा उसकी ललक को पकड़ न ले। फिर हंसी होगी सो अलग लेकिन उससे भी बड़ा खतरा था कि उमा को पता चल जाता। और उसके और उमा के बीच जो भी थोड़ा कुछ था उसे वो बचाए रखना चाहता था। इसी उधेड़बुन में कुछ महीने निकल गए। उमा से मिलने का कोई सहज मौका बन ही नहीं पाया। न तो उमा आभा के घर के आसपास रहती थी, न वो खुद। उसकी यूनिवर्सिटी वासु के ऑफिस से बिल्कुल एक सौ अस्सी कोण की दिशा में करीब बीस किलोमीटर दूर थी। नब्बे के दशक में न तो मेट्रो थी और न ही मोबाइल और बस सेवा का हाल बेहाल था। ऐसा नहीं था कि उस ज़माने में इश्क़ के मारे मीलों का सफर तय नहीं करते थे और प्रेमी या प्रेमिका से दूरियां पाटने के लिए दुर्दांत किस्म की हरकतें नहीं करते थे। लेकिन वासु को हमेशा यह लगता था कि अभी इतनी नज़दीकियाँ नहीं हुई हैं कि वो इस तरह के काम करे। उसे यह भी लगता था कि पता नहीं वो ऐसी कोई हरकत करे तो उमा उसको पसंद करेगी या नहीं। तो वासु ने थक हार कर अपना मन मार लिया।
अगला साल शुरू हो चुका था। एक बार फिर पुस्तक मेला दस्तक दे रहा था। वासु सोच ही रहा था कि आभा से कहे कि वो और उमा आ जाएं तो तीनों एक बार फिर पुस्तक मेले में पिछले साल की यादों को ताज़ा कर सकें। तभी उसे ऑफिस के रिसेप्शन से फ़ोन आया कि उसके नाम एक चिट्ठी आई है। वासु को थोड़ी हैरानी हुई। चिट्ठी किसकी है? 90 के दशक में भी चिट्ठी लिखने का चलन काफी कम हो गया था। और वैसे भी वासु किसी को चिट्ठी नहीं लिखता था। वो रिसेप्शन पर पहुंचा और चिट्ठी लेकर वापस अपनी डेस्क पर आ गया। बड़ी उत्सुकता से उसने चिट्ठी खोली और अवाक् रह गया। चिट्ठी उमा ने लिखी थी।
उसने पढ़ना शुरू किया था।
वासु,
तुम्हारे नाम के पहले मैंने कोई सम्बोधन नहीं लगाया है। कारण यह है कि कुछ भावनाओं को शब्द देने से उनका महत्व ख़त्म हो जाता है। उस दिन तुमने जिस तरह से मुझे देखा तो मुझे एहसास हो गया कि तुम्हारे लिए मैं दोस्त से कुछ ज़्यादा हो गई हूँ। बड़ी अजीब बात है तुमसे पहली बार मिलकर मुझे भी लगा कि तुम अब तक कहाँ थे? सिर्फ तीन मुलाकातों में तुम इतने आत्मीय हो गए कि तुमसे मिल कर मुझे समय से बहुत नाराज़गी हुई। क्योंकि तुम वो आदर्श थे जो मेरे जीवन में गलत समय पर आए। वो इसलिए कि मेरे पास चुनाव की स्वतंत्रता नहीं थी। हमारी देर से हुई मुलाकातों के बीच भी बड़े बड़े अंतराल रहे और इनमें बहुत कुछ हुआ जिसमें मेरी शादी का तय होना सबसे बड़ी घटना थी। जिससे शादी तय हुई है वो कनाडा में रहता है। उसका वहां अपना व्यापार है। हम मध्यम वर्गीय परिवारों के मानकों पर खरा उतरता है और उसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसकी वजह से मैं उसे अपने ख़ुशी से इतराते परिवार के सामने ठुकराया सकूं। पढ़ाई लिखाई में उसकी कोई रूचि नहीं है लेकिन आदमी “प्रथम दृष्टया” भला लगता है।
पुलिसिया प्रयोग में लाए जाने वाले शब्द “प्रथम दृष्टया” का इस्तेमाल अपने होने वाले पति के लिए इस्तेमाल करने की उमा की अदा पर वासु की हंसी छूट गई थी। उसने आगे पढ़ना शुरू किया।
अगले महीने मेरी शादी है। अगर समय निकाल पाओ तो आना। अगर नहीं आए तो मुझे बुरा ज़रूर लगेगा लेकिन मैं तुम्हारे निर्णय का सम्मान करुँगी। उमा।
वासु का ध्यान वापस अपने सामने खुले लैपटॉप की स्क्रीन पर लौटा। मैसेंजर में उमा का सन्देश छोटा सा ही था – मैं 15 नवंबर को दिल्ली आ रही हूँ क्या हम मिल सकते हैं? मेरा फ़ोन नंबर ये है। इसके बाद फ़ोन नंबर लिखा हुआ था। वासु ने भी छोटा सा जवाब लिखा, “क्यों नहीं। मेरा नंबर यह है। जब आ जाना तो बताना फिर मिलेंगे”।
नवम्बर 16 को दोनों का मिलना तय हुआ। वासु किसी भी उस पुरानी जगह पर नहीं मिलना चाहता था जहाँ वो और उमा मिले थे। वो सब बातें उसे बचकानी लगती थीं। बीतते समय के साथ उसकी नाहक भावुकता संयत परिपक्वता में बदल गई थी। तो उसने उमा को साकेत के एक मॉल में मिलने के लिए कहा। नियत समय पर वासु मॉल के एक कॉफ़ी शॉप में पहुँचा तो देखा उमा वहीँ खड़ी थी। 30 साल बीत जाने और बालों में उतरी चाँदी के बावजूद वो आज भी उतनी ही खूबसूरत थी। वासु को देखते ही हंस कर बोली, “अरे अगर पता होता कि तुम उम्रदराज़ हो कर इतने आकर्षक लगोगे तो मैं मंडप से भाग कर तुमसे शादी कर लेती”।
वासु हंसा और बोला, “बकवास की आदत नहीं गई अभी तक”।
“और जाएगी भी नहीं। कुछ चीज़ें नहीं बदलनी चाहिए। वैसे मैंने तो उसी समय कहा था न कि तुम्हारे बाल सफ़ेद होंगे तो तुम बिल्कुल किल बिल फिल्म के विलेन लगने लगोगे”।
“मतलब अब मैं विलेन लग रहा हूँ,” वासु ने मुस्कुराते हुए पूछा।
“अरे मेरा वो मतलब नहीं था। अच्छे लग रहे हो। और एक बात देख कर सुकून है कि तुमने बाल रंगने का झंझट नहीं पाला। उम्र को सहज स्वीकार करने की अपनी एक खूबसूरती है,” उमा ने कहा।
“हाँ ऐसी खूबसूरती जो विलेन बनाती है,” वासु ने कहा।
“बकवास तो आप भी कम नहीं करते वासु जी,” उमा खिलखिलाते हुए बोली।
“तुम्हें पता है जब फेसबुक शुरू हुआ तो मैंने तुम्हें उस पर ढूँढा लेकिन तुम तो वहां थे ही नहीं। फिर कुछ साल बाद भी ढूँढा तो तुम मिले लेकिन एक नज़र में ही लग गया तुम वहां बहुत कम समय बिताते हो। तो मैंने तुम्हें तंग नहीं किया। लेकिन इस बार मैं पंद्रह साल बाद भारत आ रही थी तो सोचा एक चांस लेते हैं। अगर तुम्हारी ज़र्रानवाज़ी हुई तो मुलाकात हो जाएगी,” उमा ने मुस्कुराते हुए कहा।
“हाँ माँ बदौलत को लगा कि ज़र्रानवाज़ी कर ही दी जाए,” वासु ने कहा।
“ओफ्फो कहाँ गई वो विनम्रता जिसकी इतनी दुहाई दी जाती थी?” उमा ने उलाहना देते हुए पूछा।
दोनों मुस्कुराते हुए कॉफ़ी लेकर कोने की एक टेबल पर बैठे और उमा ने पूछा, “आजकल क्या कर रहे और क्या पढ़ रहे हो?”
दोनों लम्बी बातचीत करते रहे। शाम कहाँ रफूचक्कर हो गई पता ही नहीं चला। वासु को लगा ही नहीं वो उमा से 30 साल बाद मिल रहा था।
अब चलने का समय था। उमा ने कहा, “वासु इतने बरस हमारे बीच कोई संवाद नहीं रहा फिर भी आज मिलकर ऐसा लगा जैसे समय बेमानी हो गया हो। जीवन में तीन दशक पहले हम ऐसे दोराहों पर खड़े थे जहाँ बहुत सी संभावनाएं थीं। पर मेरा मानना है कि अतीत के कुछ पन्ने हमें अपने मन की गहराईयों में ही छोड़ देने चाहिए। अब मैं वापस कनाडा लौटूंगी तो न जाने कब आना हो। पर क्या हम फिर से दोस्त बन सकते हैं?”
वासु ने बड़ी सहजता से कहा, “क्यों नहीं। हमारे बीच प्रेम अपूर्ण था। दोस्ती तो हमेशा ही पूर्ण थी।”

