तिरुवनंतपुरमः केरल हाई कोर्ट ने कन्नाया कैथोलिकों को सिर्फ अपने ही समुदाय के भीतर शादी करने के रिवाज पर जोर को लेकर केरल हाई कोर्ट ने फटकार लगाई है। अदालतने समुदाय से बाहर किसी गैर कन्नाया से शादी करने पर समाज से बहिष्कृत करना असंवैधानिक है।
जस्टिस ईश्वरन एस ने पाया कि इस तरह की जबरन अंतर्विवाह प्रथा कन्नाया समुदाय के भीतर एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं थी। अदालत ने कहा इसलिए इसे न्यायिक जांच या संवैधानिक मानदंडों से छूट नहीं दी जा सकती।
केरल हाई कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?
पीठ ने टिप्पणी की कि प्रतिवादी यह स्थापित करने में असफल रहे हैं कि अंतर्विवाह एक प्रथा के रूप में प्रचलित है। परिणामस्वरूप, अंतर्विवाह को एक आवश्यक धार्मिक प्रथा मानने का तर्क भी विफल होना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि कन्नाया कैथोलिक समुदाय के सदस्य सिर्फ इस आधार पर चर्च की सदस्यता या संबंधित अधिकार खत्म नहीं कर सकते कि उन्होंने किसी अन्य धर्मप्रांत से संबंधित कैथोलिक से शादी की है।
यह भी पढ़ें – सोनिया गांधी अस्पताल में, राहुल बोले- सोफे पर रात गुजरी, केरल की नर्स ने मां की रातभर देखभाल की; राज्य में दो हफ्ते बाद वोटिंग
सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि ” इस संबंध में व्यक्ति की स्वायत्तता पूर्ण है और इसमें किसी भी प्रकार का धार्मिक हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। न्यायालय यह कहने के लिए बाध्य है कि धार्मिक स्वायत्तता का हवाला देकर संवैधानिक रूप से प्रदत्त स्वतंत्रता का उल्लंघन करने और किसी व्यक्ति को धर्म से बहिष्कृत करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। “
अदालत ने यह भी कहा कि कन्नाया समुदाय के पुरुषों से शादी करने वाली गैर कन्नाया समुदाय की महिलाएं और उनके बच्चे भी सदस्यता मांग सकते हैं। सुनवाई के दौरान जस्टिस ने बाइबिल की एक आयत का भी जिक्र किया कि धर्म अंतर्विवाह का समर्थन नहीं करता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
इस दौरान जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया जिसमें अदालत ने कहा था कि ईसाई धर्म जातिगत वर्गीकरण को मान्यता नहीं देता है। एस राजगोपाल बनाम सीएम अरमुगम मामले में अदालत ने कहा था कि सभी ईसाइयों को एक समान माना जाना चाहिए और एक ईसाई दूसरे ईसाई में कोई भेद नहीं है।
हाई कोर्ट ने उन अपीलों के एक समूह को खारिज कर दिया जिसमें दीवानी अदालतों के फैसलों को चुनौती दी गई थी। दीवानी अदालतों के इन फैसलों में कन्नाया कैथोलिकों के बीच अंतर्विवाह को गैरकानूनी घोषित किया गया था। इसके साथ ही कोट्टायम के आर्कपार्ची को समुदाय के बाहर विवाह करने वाला कन्नाया सदस्यों को निष्कासित करने से रोका गया था।
यह भी पढ़ें – पश्चिम बंगालः भाजपा ने जारी की उम्मीदवारों की तीसरी लिस्ट, आरजी कर पीड़िता की मां को बनाया उम्मीदवार
केरल में रहने वाला कन्नाया समुदाय ईसाई धर्म का एक समूह है। यह मानता है कि वे उन 72 परिवारों के वंशज हैं जिनकी जड़ें दक्षिणी मेसोपोटामिया से आए यहूदी-ईसाई प्रवासियों से जुड़ी हैं। वे अपने समुदाय के भीतर ही विवाह करने के कट्टर समर्थक हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने समुदाय से बाहर विवाह न करें।
अदालत ने पाया कि अंतर्विवाह को एक बाध्यकारी नियम के रूप में स्थापित करने वाला कोई सबूत नहीं था। क्योंकि न तो कोट्टायम धर्मप्रांत के बाहर कन्नाया समुदाय ने ऐसी प्रथा का पालन किया और न ही कोट्टायम धर्मप्रांत के भीतर इसे लगातार लागू किया गया।
इस मामले में कन्नाया कैथोलिक नवीकरणा समिथि और अन्य का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता रेंजिथ थैंपन ने रखा। उनके साथ अन्य अधिवक्ता भी मौजूद थे। वहीं अपीलकर्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील पीबी कृष्णन और अन्य अधिवक्ता मौजूद रहे।

