पहली पढ़त की एकरैखिक प्राप्तियों को ही निष्कर्ष के रूप में स्थापित करना आलोचना का कार्य नहीं होता है। बल्कि एक व्यवस्थित और परिपक्व आलोचना रचना की वैचारिकी, सौंदर्यबोध और संरचनागत बारीकियों को समझते हुए कृति में निहित रचनात्मक अर्थ-योजना से आत्मीय संवाद स्थापित करती है। मेरी दृष्टि में यही आलोचना का उद्देश्य होना चाहिए और यही आलोचना से अपेक्षा भी। परंतु इसके विपरीत हिन्दी कथालोचना की दुनिया में कई बार ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं, जब आलोचक कहानी की संरचनात्मक और कथ्यगत विशेषताओं की गहराइयों में बिना उतरे अपनी पूर्वधारणाओं और अपेक्षाओं को ही कहानी पर आरोपित कर देते हैं। किसी रचना को उसके कथ्य, भाषा, संरचना और अर्थ-योजना के अनुरूप उपकरणों से आलोचित करने के बजाय पूर्वनिर्धारित मानकों और अपेक्षाओं के डार्क रूम में विश्लेषित करने का नतीजा यह होता है कि पाठक अर्थ-ग्रहण से अर्थ-सृजन की विकासोन्मुख प्रक्रिया में दिग्भ्रमित हो जाते हैं। कथादेश (नवंबर – 2022) में प्रकाशित मिथिलेश प्रियदर्शी की कहानी ‘रकीब’ कुछ हद तक ऐसी ही आलोचना का शिकार है। ऐसा कहते हुए, ई पत्रिका ‘समालोचन’ पर प्रकाशित कथाकार-उपन्यासकार और सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता अंजली देशपांडे का लेख ‘21वीं सदी की समलैंगिक कहानियाँ : पहचान और परख’ मेरे जेहन में है। इसके पहले कि मैं अंजली देशपांडे के उन आलोचनात्मक निष्कर्षों पर बात करूँ, जिनसे मेरी असहमति है, ‘रकीब’ पर बात करना जरूरी है।
‘रकीब’ ‘प्रेम, आत्महीनता, समलैंगिक अनुभव, सत्तापोषित हिंसा और लोकतान्त्रिक राजनैतिक आंदोलनों की संयुक्त जमीन पर रची गई एक ऐसी कहानी है, जो इन्हीं के बीच इन्हीं की टकराहटों से उत्पन्न विडंबनाओं की शक्ल में प्रक्षेपित होती है। ‘मैं’ शैली में लिखी गई यह कहानी आरम्भ में ही दो महत्वपूर्ण अवधारणाएं प्रस्तावित करती हैं। पहली – प्रेम नश्वर नहीं है और और दूसरी- यह मरने के बाद पुनः जन्म लेता है-
“कहते हैं मृत्यु के बाद आत्मा किसी नए शरीर को धारण करती है। मृत्यु और प्रेम में यही समानता है। प्रेम भी मरने के बाद किसी नए शरीर में पनाह पाता है। फिर यहाँ से जन्म होता है एक रकीब का। कोई चाहे ना चाहे, देर-सवेर उसके हिस्से यह आना ही है।”
कहानी का वाचक अंसल, जो इंटेलिजेंस ब्यूरो के फोरेंसिक विभाग में अस्थायी नौकरी करता है, एफ़िल के गहरे प्रेम में रहा है। एक दिन एफ़िल अचानक एक छोटा-सा संदेश भेजकर उससे रिश्ता खत्म कर लेता है। यह घटना अंसल को भीतर से तोड़ देती है। इसी मन:स्थिति में, अपनी मित्र दिवि की शादी में उसकी मुलाक़ात सुशांत से होती है। सुशांत वही व्यक्ति है, जिसके लिए एफ़िल ने उसे छोड़ा था। सुशांत को देखकर अंसल की प्रतिक्रिया सामान्य से अलग किस्म की है। वह उससे ईर्ष्या तो करता है, लेकिन उसके प्रति एक अजीब आकर्षण से भी भर उठता है। सुशांत के प्रति उसकी जिज्ञासा जुनून में बदल जाती है। इसी क्रम में वह उनके दोस्तों के साथ शाहीन बाग़ जैसे राजनीतिक आंदोलन से जुड़ जाता है जिसके बाद राजनीतिक आरोपों के तहत उसे जेल हो जाती है। बाद में सुशांत भी जेल आता है और वहीं दोनों के बीच एक रागात्मक आत्मीयता जन्म लेती है।
अंसल का रकीब सुशांत प्रत्यक्षतः भले एक व्यक्ति हो, पर गहरे प्रतीकार्थों में एक ऐसा दर्पण है, जिसमें वाचक अपनी सारी कमियाँ, अपूर्णताएँ और भय देखने लगता है। सुशांत की ऊर्जस्विता, राजनैतिक जागरूकता, करिश्माई उपस्थिति और सामाजिक सक्रियता, अंसल के भीतर बैठे आत्म-संदेह को और तीव्र बनाती है। इस तरह अंसल का यह रकीब किसी अन्य प्राणी से ज्यादा उसके आंतरिक अस्तित्व की तरह प्रतीत होता है, जो मूलतः और वस्तुतः उसी की प्रतिकृति है और उसके दमित स्वप्नों और आत्महीनता बोध से उत्पन्न हुआ है।
आइए अब अंजली देशपांडे की आपत्तियों को देखते हैं-
“इतने जानदार कथानक के होते हुए भी मिथिलेश की कहानी में कई झोल हैं. कहीं भी एफिल से बेइंतहा प्यार कर रहे अंसल को सुशांत को एफिल से छीन कर प्रतिशोध का ख्याल भी नहीं आता…”
“बौद्धिक रूप से संपन्न लेखक भी थीसिस एंटीथीसिस के इस स्वरूप को कितने सतही तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं इसकी मिसाल है ‘रकीब’ जिसमें प्रेमी अपने रकीब का एंटीथीसिस बन कर अंत में सिंथेसिस के प्रतीक रूप में उसके करीब आ जाता है.”
“सुशांत का इस हद तक अच्छा और संवेदनशील होना, यह जानते हुए कि अंसल एफिल का पुराना प्रेमी है उसका कभी सामना नहीं करना, उससे द्वेष या ईर्ष्या नहीं करना, कभी नहीं अचकचाना, कभी कन्नी नहीं काटना, कभी अहंकार महसूस नहीं करना कि एफिल का पूर्व प्रेमी उस पर नज़र रखे हुए है, इतना इगो-रहित होना उसे एक महामानव बना देता है. काश मिथिलेश उसे वेनगार्ड बनाने के बजाय इंसान बनाते.”
वाचक अंसल के भीतर प्रतिशोध का ख्याल क्यों नहीं आता या सुशांत को लेखक ने महामानव बना दिया है जैसी आपत्तियाँ दर्ज करते हुए अंजली देशपांडे सुशांत को एक सम्पूर्ण वास्तविक चरित्र की तरह परखती हैं। लेकिन ऐसा करते हुए उनका ध्यान इस बात की तरफ नहीं जाता कि ‘मैं’ शैली की यह कहानी पूरी तरह वाचक अंसल की दृष्टि से देखी और लिखी गई है। यहाँ सुशांत वैसा नहीं दिखता जैसा वह है, बल्कि पाठकों को उसकी वैसी और उतनी ही छवि दिखाई पड़ती है, जैसा और जितना उसे वाचक अंसल देखता या देखना चाहता है। कहानी और सुशांत के चरित्र की इस संरचना की अनदेखी का नतीजा है कि सुशांत को एक स्वतंत्र, वास्तविक और सम्पूर्ण किरदार की तरह नहीं प्रस्तुत किया जाना अंजली देशपांडे की नजर में कहानी की कमजोरी है, जबकि सुशांत के चरित्र की यह गढ़ंत कहानी की वह संरचनात्मक विशेषता है, जो सुशांत को वास्तविक किरदार से ज्यादा अंसल के प्रक्षेपित आदर्श और ‘Ideal Ego’ की तरह प्रस्तुत करता है। कहानी में प्रमुखता से वर्णित अंसल की आत्महीनता का भाव भी उसी की पुष्टि करता है।
सामान्य यथार्थवादी नजरिए से किसी रचना से ‘तथ्यगत विश्वसनीयता’ की मांग जायज हो सकती है, पर कई बार ‘मनोवैज्ञानिक विश्वसनीयता’ उससे आगे की चीज होती है। पाठक-आलोचक के ‘अपेक्षित-सत्य’ और पात्रों के ‘अनुभव-सत्य’ से इतर एक ‘रचना-सत्य’ भी होता है। किसी रचना की आलोचना करते हुए इस बात पर जरूर नजर होनी चाहिए कि ‘तथ्यगत विश्वसनीयता’ की माँग और ‘मनोवैज्ञानिक विश्वसनीयता’ की अनदेखी कहीं ‘रचना-सत्य’ को पकड़ने में तो नहीं चूक रही? संदर्भ भिन्नता के बावजूद इसे समझने के लिए मानस की एक चौपाई को देखा जा सकता है- ‘हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम देखी सीता मृगनैनी।।’ मनुष्य और पशु-पक्षी के बीच बातचीत का यह दृश्य ‘तथ्यगत विश्वसनीयता’ की कसौटी पर तो नहीं खरा उतरता पर सीता-हरण के बाद राम की विक्षिप्त मनोदशा को चित्रित करने के क्रम में ‘मनोवैज्ञानिक विश्वसनीयता’ की रक्षा करते हुए एक बड़े ‘रचना-सत्य’ की स्थापना करता है।

अंजली देशपांडे ‘रकीब’ पर हीगेल के द्वन्द्वात्मक सिद्धांत के ‘थीसिस-एंटी थीसिस-सिन्थेसीस’ मॉडल को आरोपित करते हुए इस निर्णय पर पहुँचती हैं कि कहानी इसका बहुत सतही इस्तेमाल करती है। यह उनकी पढ़त की दूसरी चूक है, जो कहानी पर हीगेलियन दर्शन के आरोपण की हड़बड़ी से पैदा हुई है। यह कहानी सामान्यतया द्वंद्व की संरचना में विस्तार नहीं पाती और मूलतः स्मृति और इच्छा के चक्र में ही अपनी उपस्थिति को मूर्त करती है। वाचक अंसल के आंतरिक परिप्रेक्ष्य से संचालित आत्मकेंद्रित पाठ की शक्ल में खुलना इस कहानी की मुख्य संरचनागत विशेषता है, जिसके आलोक में सुशांत प्रकटतः अंसल के प्रतिद्वंद्वी की तरह दिखते हुए भी मूलतः उसके प्रक्षेपित आदर्शों के मॉडल की तरह ही उपस्थित होता है। इसलिए ‘रकीब’ को हीगेलियन सिद्धांत की कसौटी पर परखना प्रथमतः युक्तिसंगत नहीं लगता। बावजूद इसके, थोड़ी देर को यदि रकीब पर हीगेल के इस सिद्धांत को आरोपित करें भी तो यहाँ ‘थीसिस’ ‘एंटी थीसिस’ और ‘सिन्थेसीस’ की स्पष्ट पहचान एक जरूरी प्रश्न की तरह उपस्थित होता है। अंजली देशपांडे का यह कहना कि इस कहानी में ‘प्रेमी अपने रकीब का एंटीथीसिस बन कर अंत में सिंथेसिस के प्रतीक रूप में उसके करीब आ जाता है’ इतना उलझाऊ और अस्पष्ट है कि इससे ‘थीसिस’ ‘एंटी थीसिस’ और ‘सिन्थेसीस’ की पहचान ठीक-ठीक मूर्त नहीं होती। अंजली देशपांडे की आलोचना में यह फांक भी कहानी को सामान्य यथार्थवादी नजरिये से देखने के कारण ही पैदा हुई है, जो सुशांत को अंसल का वास्तविक प्रतिद्वंद्वी चरित्र ही मानती और समझती है। अंसल भावुक, निराश, अपने दर्द की चहारदीवारी में बंद और प्रेम को एक निजी घटना की तरह देखने वाला इंसान है, जबकि सुशांत बौद्धिक, संतुलित, सामाजिक-राजनैतिक रूप से सक्रिय और प्रेम को व्यापक मानवीय अनुभव के हिस्से के रूप में देखनेवाला व्यक्ति है। उल्लेखनीय है कि सुशांत की यह छवि किसी तटस्थ पर्यवेक्षक ने नहीं, वाचक अंसल ने बनाई है, जिसका रंग उसने अपनी ईर्ष्या के दमन और अवचेतन में सुरक्षित आदर्श चरित्र के प्रक्षेपण से अर्जित किया है। कहानी के अंतिम दृश्य में जब दोनों जेल में हैं, अंसल सुशांत से कहता है- “मुझे माफ कर दो यार, मैं तुम्हारा पीछा कर रहा था। एक्चुअली मैं तुम्हारी तरह बनना चाहता था।” अंसल का यह दयनीय आत्मस्वीकार इस बात का सत्यापन भी है कि सुशांत और वह परस्पर विपरीत शक्तियां नहीं हैं। इसलिए ‘थीसिस’ ‘एंटी थीसिस’ के प्रारूप को उँ पर आरोपित कर जेल में दोनों के निकट आने को ‘सिन्थेसीस’ की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि अंसल का सुशांत को देखने का तरीका, उसकी बेचैनी, आत्महीनता और अंततः आत्मस्वीकार के बाद सुशांत का यह कहना कि ‘तुम अच्छे लड़के हो। आई रियली लाइक यू। ऐसे ही रहना। किसी के लिए ख़ुद को बदलने की जरूरत नहीं है’ कहानी में मौजूद क्वीयर इच्छा के मजबूत संकेतों को एक नई संभावना से भर देने जैसा है।
रकीब ‘मैं’ शैली की पुनरावृत्तीय कथन वाली एक जटिल भावनात्मक प्रक्षेपण की कहानी है, जिसमें प्रेम, ईर्ष्या, स्मृति, राजनैतिक हिंसा और क्वीयर संवेदना परस्पर अंतरंग संवाद में शामिल हैं। सतह पर एक गैरपारंपरिक त्रिकोणीय प्रेम (पुरुष-पुरुष-पुरुष) की तरह विकसित होती दिखती यह कहानी, दरअसल ईर्ष्या तथा आकर्षण की परस्पर आबद्धता, आत्म-विघटन, स्वीकार और मुक्ति की शृंखलाबद्ध प्रक्रिया की कथात्मक निर्मिति है। रकीब के जन्म की दार्शनिक प्रस्तावना से शुरू हुई यह कहानी अपने अंत-तक आते-आते रकीब के अंत की जिस मार्मिक कथा में बदल जाती है, उसमें क्वीयर कामना और प्रेम की नई संभावनाओं के दस्तक मौजूद हैं। इस क्रम में आत्म बनाम आदर्श, भय बनाम आकर्षण, निजी बनाम सार्वजनिक, विघटन बनाम पुनर्निमाण और असुरक्षा बनाम आत्म-स्वीकृति की परस्पर विरोधी स्थितियों के संतुलन में यह कहानी जिन अर्थ-छवियों का संधान करती है, उसी में इसका मर्म निहित है। आलोचना कहानी के उस मर्म तक पहुँच इसके इसके लिए सुसंगत उपकरणों का इस्तेमाल जरूरी है। अन्यथा इस मामले में की गई एक छोटी सी चूक, बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। समीक्षा-उपकरणों की उपयोगिता उनके रचनानुकूल चयन से तय होती है। बड़े-छोटे के भाव को छोड़ दें तो रहीम के एक प्रसिद्ध दोहे की दूसरी पंक्ति ‘जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि’ में भी यही अभिप्राय निहित है।
किसी कहानी की संरचना कैसी है और उसके विश्लेषण के लिये किस तरह के सिद्धांत उपयोगी हो सकते हैं, यह बता देना भर ही आलोचना का कार्य नहीं होता। उसे यह भी बताना चाहिए कि किसी विशिष्ट संरचनात्मक निर्मिति के रूप में साकार हुई कोई रचना अपने समय, समाज और उसके पारंपरिक नैतिक ढांचे में किस तरह के हस्तक्षेप करती है। ‘रकीब’ क्वीयर प्रेम, नागरिक आंदोलन, राजनैतिक हिंसा और आत्म-चेतना से निर्मित एक बहुपरतीय रचना है। क्वीयर प्रेम के मनोविश्लेषणात्मक दास्तान के समानांतर यह कहानी दिल्ली में हुए आंदोलनों, खासकर शाहीन बाग़, सीएए एनआरसी, जामिया और जे एन यू के छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि में नागरिक प्रतिरोध के स्वतःस्फूर्त संघर्षोत्सव के विरुद्ध सत्ता संपोषित दमन, दंगों और साजिशों की रहस्यकथाओं को भी सार्वजनिक करती है। यद्यपि राजनीति इस कहानी में बाहरी समय नहीं, बल्कि वाचक अंसल के निजी समय का हिस्सा बन कर आती है, तथापि इसे राजनैतिक कहानी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसका एक बड़ा कारण यह है कि कहानी में अंसल के चेतन और अवचेतन तथा स्मृति और इच्छाओं की आवाजाही जहाँ ठहराव की वर्णनात्मकता में प्रकट होते हैं, वहीं राजनैतिक आंदोलनों के दृश्य लगभग सारांश की तरह तेज गति से गुजर जाते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि कहानी की ‘मैं’ शैली, जो अंसल की आत्मोन्मुखता से ही संचालित है, ही इसके मूल में है। अंसल राजनैतिक व्यक्ति नहीं है। उसकी राजनीति व्यक्तिगत प्रेम की राजनीति है। लेकिन सुशांत और एफिल की उपस्थिति उसे उस क्षेत्र में धकेलती है, जहाँ वह कभी जाना ही नहीं चाहता था। वह राजनीतिक जलसों में इसलिए जाता है कि सुशांत को देख सके। उसकी राजनैतिक चेतना प्रेम-प्रेरित है, स्वतःस्फूर्त नहीं। राजनीति में उसका प्रवेश विचारों से नहीं, उसकी दमित इच्छाओं और आत्महीन असुरक्षाबोध के कारण हुआ है। ‘रकीब’ भले एक राजनैतिक कहानी नहीं हो, पर इस कहानी में आए सामाजिक-राजनैतिक संदर्भ क्वीयर-राजनीति की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। क्वीयरनेस सिर्फ लैंगिक ही नहीं, एक राजनैतिक अवधारणा भी है। इसलिए प्रतिरोध और दमन दोनों के ही यहाँ राजनैतिक निहितार्थ भी हैं। सुशांत का आंदोलन में सक्रिय होना, पुलिस की मार और सत्ता के हिंसक स्वरूप को, सामाजिक नॉर्म के विरुद्ध जाने की कोशिश और उसके दमन के प्रतीक के रूप में भी देखा जाना चाहिए। समलैंगिक संवेदना के प्रति समकालीन अमेरिकी राजनीति को इस संदर्भ में देखा जा सकता है। लेकिन कहानी अंसल के परिप्रेक्ष्य के अनुरूप इस सघनता से संकेंद्रित है कि इन जरूरी मुद्दों की गहराई में नहीं जा पाती और यहीं आकर, इसकी संरचनात्मक विशेषता इसकी एक बड़ी सीमा भी साबित होती है।
‘रकीब’ के स्थापत्य पर कई जगह सिनेमा और अन्य डिजिटल विज़ुअल माध्ययम का गहरा प्रभाव दिखाई पड़ता है। कहानी के कई महत्त्वपूर्ण हिस्से सिनेमेटिक संरचना के कारण पाठक-मन पर दृश्य की तरह असर करते हैं, गोया वे कहानी पढ़ नहीं देख रहे हों। अंसल का सुशांत को पहली बार देखने का प्रसंग हो कि शाहीन बाग़ और जेल के दृश्य इनमें इसे बखूबी महसूस किया जा सकता है। ‘सिनेमेटिक संभावनाओं’ की पहचान कहानी की गति और भावनात्मकता को एक खास तरह की तीव्रता प्रदान करते हैं। लेकिन कई बार नाटकीय प्रभाव से पैदा हुई अति गत्यातमकता प्रसंगों को तार्किक गहराई तक जाने से रोक देती है। क्वीयर राजनीति के विश्लेषण की गहराई के अभाव का जो संकेत ऊपर किया गया है, इसे उसके साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।
कहानी में इस बात को समझने के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं कि समलैंगिक और क्वीयर इच्छाएं सामान्यतया कितनी दबी हुई, संकोचपूर्ण और आत्महीनता से ग्रस्त होती हैं। ‘रकीब’ समलैंगिकता और क्वीयरनेस को किसी सनसनी या अप्राकृतिक व्यवहार की तरह नहीं रचकर, एक संकटग्रस्त मानवीय अनुभव की तरह प्रस्तुत करती है। कहानी एफिल, सुशांत और अंसल के संबंधों को किसी समस्या की तरह नहीं देखती, ना ही किसी तरह के नैतिक निर्णय या पक्षधरता की हड़बड़ी या वाचालता हीं दिखाती है, बल्कि क्वीयर संबंधों को प्राकृतिक और भावनात्मक मानवीय अनुभव की तरह पेश करती है। समलैंगिक प्रेम कोई ‘अलग’ तरह का प्रेम नहीं है। यह वही प्रेम है, उसी तीव्रता वाला, जो मनुष्य सदियों से अनुभव करता आया है, का यह भावबोध हिन्दी कहानी में समलैंगिकता और क्वीयर संबंधों की दिशा में एक नया प्रस्थान है। राजनैतिक आंदोलनों में सुशांत की सक्रियता और अंसल की सहज स्वीकार्यता को इस संदर्भ से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए।
भारतीय सामाजिक मानसिकता में एक गहरी धारणा रही है कि स्त्री–पुरुष के बीच शुद्ध मैत्री संभव नहीं, या तो ऐसी मित्रताएं अंततः प्रेम में परिणत हो जाती हैं या निभती नहीं। यह कहानी इस सांस्कृतिक-मानसिक स्टीरियोटाइप को सिरे से ध्वस्त करती है। दिवी अंसल की भावनात्मक आधारशिला है, लेकिन उसकी प्रेमिका नहीं। दिवी के विवाह के बाद और उसके पति रेहान की उपस्थिति में कहानी अंसल और दिवी की इस मित्रता को जिस सहजता और परिपक्वता से संभालती है, वह उल्लेखनीय है।
अंसल एक ऐसा चरित्र है, जो प्रेम(मी) के जाने के बाद शून्य में विलीन नहीं हो जाता। बल्कि पहले एफिल से, फिर उसकी अनुपस्थिति से, फिर एक गहरे और अनाम आकर्षण में बंधकर सुशांत से, और अंततः जेल में भावनात्मक पुनर्प्राप्ति से जुड़कर प्रेम के नैरंतर्य की दार्शनिकता को पुष्ट करता है। इस तरह, ‘सच्चा प्रेम एक ही बार होता है’ की सामान्य अवधारणा के उलट यह कहानी इस बात की स्थापना करती है कि प्रेम एक तिथि या व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है। स्मृति, ईर्ष्या, मोह, आत्महीनता और पुनर्प्राप्ति की सतत मनोवैज्ञानिक संरचना के रूप में प्रेम को देखने-परखने और स्थापित करने की यह दार्शनिकता उसकी बहुवचनीय संभावना की स्वीकृति भी देती है। प्रेम को ‘एक बार के अनुभव’ की सांस्कृतिक सीमा से बाहर निकालकर उसे मनुष्य की पुनरावृत्त भावनात्मक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करना ‘रकीब’ को विशिष्ट बनाता है। प्रेम के नैरंतर्य की इस अवधारणा को समझने के लिए जेल में घटित कहानी के आखिरी दृश्य को देखा जाना चाहिए-
“सॉरी की कोई बात नहीं है। जीवन ऐसा ही है। लोग मिलते हैं और एक रोज़ चले जाते हैं। तुम अच्छे लड़के हो। आई रियली लाइक यू। ऐसे ही रहना। किसी के लिए ख़ुद को बदलने की जरूरत नहीं है।“ उसने मेरा हाथ उष्णता के साथ सहलाते हुए कहा। वह मुझे मुस्कुराता हुआ प्यार से देख रहा था। अपने भीतर की सारी कमज़ोरियाँ उसके सामने उढ़ेल देने से मेरा मन हल्का हो गया था। मैं हर पल उस पर फ़िदा होता जा रहा था। मन कर रहा था, उठकर उसे चूम लूं। वह जितनी मोहब्बत से मुझे देख रहा था, लग रहा था ये ऐसे ही मेरी तरफ़ देखता रहा तो मुझे अपने रकीब से प्रेम हो जाएगा।”
वाचक अंसल और सुशांत के बीच क्वीयर प्रेम की जो स्पष्ट संभावना यहाँ संकेतित हुई है, वह एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा है। न प्रेम का स्वीकार, न प्रेम से इंकार के बीच संकोचमिश्रित कामनाओं की तनी रस्सी में ही क्वीयर संवेदना का मुख्य तनाव निहित होता है, जिसकी कई-कई विश्वसनीय छवियाँ कहानी में आद्योपांत मौजूद हैं। सुशांत के प्रति वाचक का आकर्षण, उसकी ओर चोरी से देखना, उसकी आवाज़ और व्यक्तित्व पर मोहित होना तथा उसके पास होने पर थरथराहट, बेचैनी और चुप्पी का महसूस करना…ये सब क्वीयर प्रेम के उस उच्चतम और सघनतम तनाव को व्यक्त करनेवाली स्थितियाँ हैं, जो अंत तक आते-आते सुशांत के ‘सहज सरल स्वीकार’ और ‘उष्ण स्पर्श’ के साथ पिघलकर वाचक अंसल की भावनात्मक पुनर्प्राप्ति में बदल जाता है। नए प्रेम की यह संभावना रकीब के होने से रकीब के खत्म होने तक की इस पूरी प्रक्रिया का हासिल है।
आत्म-प्रतिबिंबित प्रतिस्पर्धी के प्रिय और आत्मीय हो जाने की इस कथा के अंतिम पड़ाव पर पहुंचकर मुझे दिव्या विजय की कहानी ‘अलगोजे की धुन पर’ का आखिरी दृश्य याद हो उठता है, जिसमें दो रकीब स्त्रियाँ स्वप्ना और अन्वेषा एक दूसरे को चूमती हैं। क्वीयर कामनाओं के मनोविश्लेषण में इस काव्यात्मक मोड़ का अन्वेषण हिन्दी कहानी में एक नए भावनात्मक संसार की सृष्टि है। इन कहानियों के पात्रों के बीच भले लैंगिक अंतर (पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री) है, लेकिन रकीबों के बीच प्रेम का भावसाम्य इन्हें साथ रखकर पढ़े जाने की माँग करता है। ‘रकीब’ पर पर्याप्त बात हो चुकी। ‘अलगोजे की धुन पर’ भी कभी विस्तार से बात होगी।
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