Tuesday, March 24, 2026
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कथा प्रांतर-9: पितृसत्ता की संरचना में दरार

साहित्य की तमाम विधाओं के बीच कहानी की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि प्रति वर्ष अनुमानतः पाँच सौ से ज्यादा नई हिंदी कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं। नई कहानी के दौर में पहली बार कहानियों के विधिवत मूल्यांकन का जो सिलसिला शुरू हुआ था, आज वह एक सुदीर्घ परंपरा के रूप में विकसित हो चुका है। ‘कथा प्रांतर’ चुनिंदा कहानियों के मूल्यांकन की एक शृंखला है, जिसकी हर कड़ी में कहानीकार आलोचक राकेश बिहारी किसी समकालीन कहानी की विवेचना करते हैं। इस शृंखला की नौवीं कड़ी में प्रस्तुत है, ‘कथादेश’ (नवंबर, 2024) में प्रकाशित योगेंद्र आहूजा की कहानी ‘अभिनिष्क्रमण’ का विश्लेषण।

“कहानी में एक यथार्थ जो जैसा देखा, वैसे ही रचा गया है। उस पर किसी इच्छित या वांछित यथार्थ का रंग चढ़ाने की कोशिश नहीं की गई।” – (योगेन्द्र आहूजा, ‘अभिनिष्क्रमण’ कहानी के संदर्भ में)

साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्य के संबंध में इस बहुश्रुत और बारंबार उद्धृत वाक्य पर सोचते हुये हमेशा मेरे मन में एक प्रश्न उठता है- साहित्य आखिर करता क्या है? क्या वह केवल यथार्थ का दर्पण है- एक ऐसा माध्यम जो जीवन को ‘जैसा है’, ‘वैसा ही’ हमारे सामने रख देता है? या वह उससे आगे बढ़कर ‘जैसा हो सकता है’ की कल्पना भी करता है? जिसे हम एक वैकल्पिक दुनिया, स्वप्न या संभावना का सृजन भी कह सकते हैं।

यह प्रश्न विशेषतः कथा-साहित्य के संदर्भ में और भी जटिल हो जाता है। शायद ही कोई इस बात से असहमत हो कि कहानियाँ सिर्फ घटनाओं का पुनरुत्पादन नहीं करतीं, बल्कि अनुभवों और स्वप्नों की ताना-भरनी से जीवन का पुनर्संयोजन भी करती हैं। वह जीवन को जस का तस नहीं उठातीं, बल्कि संभावनाओं की एक नई अर्थ-संरचना से जोड़कर कई बार उसे एक ऐसी दिशा में भी मोड़ देती है जो वास्तविक जीवन में भले विरल या लगभग असंभव हो, लेकिन मानवीय आकांक्षा के स्तर पर अत्यंत आवश्यक होती है। यही वह अभिसंधि है, जहां यथार्थ और स्वप्न के बीच का द्वंद्व जन्म लेता है। इस द्वन्द्व के एक छोर पर वह लेखकीय आग्रह होता है, जो कहता है कि रचना की प्राथमिक जिम्मेवारी यथार्थ के प्रति है अतः उसे उन पर किसी वांछित या आदर्श स्थिति का आरोपण नहीं करना चाहिए, तो दूसरी ओर वह दृष्टि होती है, जो यह मानती है कि यदि साहित्य केवल यथास्थिति का पुनरावर्तन करता रहे, तो वह अपने सृजनात्मक दायित्व से चूक जाता है। बीहड़, असुंदर और अति तिक्त यथार्थ के बीच भी सुंदर की संभावना का संधान हर रचनाकार का स्वप्न होता है। एक ऐसा स्वप्न, जो यथार्थ से पलायन नहीं, बल्कि उसी के भीतर से एक नई दिशा संधान है- एक वैचारिक और संवेदनात्मक हस्तक्षेप, जो इस बात में विश्वास करता है कि ‘जो है’ के भीतर ही ‘जो हो सकता है’ के बीज छिपे होते हैं।

किसी रचना का विश्लेषण या मूल्यांकन करते हुये यह प्रश्न उठना बहुत स्वाभाविक है कि यदि कोई रचना केवल यथार्थ के उद्घाटन तक सीमित रह जाती है और किसी वैकल्पिक संभावना, किसी संबंधात्मक पुनर्गठन, किसी मानवीय विस्तार की कल्पना नहीं करती, तो इसे उस रचना की शक्ति कहा जाय या सीमा? अस्मिता विमर्शों के संदर्भ में यह प्रश्न तब और तीक्ष्ण हो उठता है, जब कोई रचना हाशिये पर धकेल दिये गए समूहों के दमन, उनके अधूरे प्रतिरोधों, विफलताओं, उस समूह की आंतरिक एकता की कमी आदि को तो बहुत गहराई से दिखाती है, लेकिन उसके बीच किसी संभावित साझेपन या किसी वैकल्पिक संबंध-रचना की कल्पना नहीं करती? लेकिन यह भी सच है कि बावजूद इसके, कोई रचना पाठकों के भीतर उस वैकल्पिक दुनिया के अभाव या उसकी संभावनाओं के प्रति एक मारक बेचैनी पैदा कर सकती है, करती है। इसलिए ककुहह कहानियों को यथार्थ के प्रतिबिंब और स्वप्न के प्रारूप की बायनरी में पढ़ा जाना पर्याप्त नहीं होता है। गहरे प्रभाव वाली कहानियाँ इन दोनों के बीच एक जटिल और द्वंद्वात्मक क्षेत्र में अपनी जगह बनाती हैं। यथार्थ, स्वप्न और रचना के अंतर्संबंधों को टटोलती इस प्रस्तावना और इसकी शुरुआत में उद्धृत योगेन्द्र आहूजा के वक्तव्य की साझा रोशनी में यह आलेख ‘अभिनिष्क्रमण’ कहानी के पाठ की ‘एक और’ कोशिश है। ‘एक और’ इसलिए कि लगभग एक वर्ष पूर्व इस कहानी पर ‘विदूज बैटन’ द्वारा आयोजित परिचर्चा और उसमें दिया गया लेखकीय वक्तव्य दृश्य-श्रव्य डिजिटल दस्तावेज़ की शक्ल में आज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।

प्रवाहपूर्ण कहानीपन के बावजूद सुनियोजित वैचारिक सघनता और अति सूक्ष्म वर्णनात्मकता वाली कहानियों का सार संक्षेप, उनकी प्रभावशीलता को नष्ट किए बिना, नहीं बताया जा सकता। यह बात योगेंद्र आहूजा की अन्य कहानियों की तरह ‘अभिनिष्क्रमण’ पर भी लागू होती है। बावजूद इसके, जिन लोगो ने यह कहानी नहीं पढ़ी है, उनेक लिए कम से कम इतना तो बताया ही जाना चाहिए कि इस कहानी के केंद्र में एक स्त्री है, जिसे लगातार छोटी नाम से संबोधित किया गया है। यह कहानी छोटी के जीवन की त्रासदी, एक आत्मचेता व्यक्क्ति और नागरिक हो सकने की उसकी आकांक्षा और पितृसत्ता की संरचना के भीतर ही रहकर किये गए उसके सीमित मुक्ति-संघर्ष को बहुत बारीकी से दिखाती है। छोटी के इसी मुक्ति-संघर्ष को कहानी ‘अभिनिष्क्रमण’ कहती है और बाद में उसकी असफलता या नाकामी को संकेतित भी करती है। कहानी के दूसरे सिरे पर खड़ी है- छोटी की सास, यानी वाचक की दादी। आखिरी एक पृष्ठ को छोड़ दें, तो इस अति-दीर्घ कहानी में वह अपनी क्रूरता के कारण पितृसत्ता की मजबूत वाहिका के रूप में सदैव उपस्थित रहती है। कहानी का वाचक चालीस वर्षीय संदीप, एक वैज्ञानिक है और जर्मनी में रहता है। कहानी उसकी उन स्मृतियों के आधार पर खुलती है, जब वह चार वर्ष का था। चार वर्षीय बालक की दृष्टि से कहानी कहने के पीछे शायद यह लेखकीय इरादा हो कि उस वय के बालक की दृष्टि तटस्थ, गैरपक्षपाती और लिंग निरपेक्ष होती है। लेकिन खुद वाचक (इसे लेखक भी समझा जा सकता है) को यह भी संशय है कि चालीस वर्ष पुरानी स्मृति के भरोसे कही गई यह कहानी अपनी भाषिक परिपक्वता और चैतन्य हस्तक्षेप के कारण उस लेखकीय मंशा के साथ कितना न्याय कर सकती है-

“शब्द तो हमेशा बाद में आते हैं, घटनाओं के पीछे-पीछे, लड़खड़ाते हुए। वे मुझे बहुत बाद में, टुकड़ों-टुकड़ों में न जाने कहाँ-कहाँ मिले, सुनसान जगहों, नीची छतों, टूटे-फूटे फ़र्शों और बदरंग दीवारों वाली कोठरियों, पुलों के ऊपर-नीचे, कब्रिस्तानों, कबाड़खानों में, कई शहर और देश बदलने के बाद अब जर्मनी में जहां काम करता हूँ, वहाँ … और मुझे डर है कि बहुत बाद में मिले शब्दों से बहुत पहले की कहानी कहना उसे झूठा बनाना न हो। बहुत से मुझे छोटी की किताबों, पत्रिकाओं और डायरियों में भी मिले। वह रोटी बनाने के दौरान चुपके से कभी-कभी कुछ लिख कर छिपा लेती थी, यह मैंने बहुत बाद में जाना। छोटी से मुझे मिले ‘लुच्ची’, ‘मक्कार’, ‘फाफे-कुटनी’ और ‘चुड़ैल’ जैसे लफ्ज, मगर ‘पाथरदिल’, ‘कठकरेज’, ‘जुलमी’ और ‘प्रोफेसरानी’ दादी से। ‘राज्य’ शब्द भी मैंने पहली बार छोटी की एक किताब में देखा। मैं उस समय तक ‘राजा’ और ‘रानी’ जानता था लेकिन ‘राज्य’ नहीं।”

कहानी का यह अंश कहानी की संरचना के दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्षों– वाचकीय दृष्टि और छोटी तथा दादी के सम्बन्धों के व्याकरण की तरफ पर्याप्त संकेत करने में सक्षम है। गौरतलब है कि कहानी का आरंभ जिस तरह ‘साम्राज्य’, ‘मातहत राज्य’, ‘उपनिवेश’, ‘जासूस’, ‘सेनापति’ जैसे शब्दों से होता है, उसमें एक व्यापक सत्ता-संरचना के संकेत निहित हैं। यह भाषा स्पष्ट रूप से बताती है कि कहानी स्त्री-जीवन की त्रासदी के मूल में एक संगठित और बहुस्तरीय सत्ता-व्यवस्था को देखती है। यह रूपक पितृसत्ता को एक ऐसे ‘सिस्टम’ के रूप में स्थापित करता है- जहाँ नियंत्रण, निगरानी, अनुशासन और अधीनता के जटिल तंत्र काम करते हैं। स्त्री के अनुभव को राजनीतिक और संरचनात्मक संदर्भ देने के कारण कहानी का यह आरंभ पाठक के मन में एक एक बड़ी उम्मीद जगाता है। लेकिन जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, यह व्यापक रूपक धीरे-धीरे घरेलू संबंधों- विशेषतः सास, बहू और ननद के त्रिकोण में सिकुड़ने-सिमटने लगता है। प्रश्न यह है कि सत्ता संरचना के रूपक के इस संकुचन को क्या कहा जाय, कथा का नियोजित रचाव या फिर उसकी संरचनात्मक सीमा? यदि इसे कथा का नियोजित रचाव मानें, तो यह मानना होगा कि कि कहानी यह दिखाना चाहती है कि बड़ी सत्ता-संरचनाएँ रोजमर्रा के घरेलू संबंधों में किस तरह पुनरुत्पादित होती हैं। इसीलिए सास केवल एक व्यक्ति नहीं रहती, बल्कि पितृसत्ता की सबसे मजबूत एजेंट बन जाती है। घर एक छोटे साम्राज्य की तरह काम करता है और स्त्रियाँ स्वयं उस व्यवस्था को आगे बढ़ाने लगती हैं। इस अर्थ में सास-बहू संबंध उस ‘साम्राज्य’ का सूक्ष्म संस्करण हो सकता है, जिसकी ओर कहानी आरंभ में संकेत करती है। लेकिन समस्या यह है कि कहानी इस रूपांतरण को पर्याप्त आलोचनात्मक स्पष्टता के साथ नहीं साधती। परिणामतः जो संरचना प्रारंभ में ‘पितृसत्ता का तंत्र’ थी, शनैः शनैः स्त्रियों के आपसी संबंधों में परिसीमित होने का आभास कराने लगती है। पितृसत्ता अपने वास्तविक सत्ता-संबंधों को छिपाने के लिए स्त्रियों के बीच के संघर्षों को उभारता है। इससे दो काम होते हैं- एक, असली उत्पीड़क संरचना पर से ध्यान हट जाता है और दूसरा, स्त्रियाँ एक-दूसरे को ही अपनी पीड़ा का कारण मानने लगती हैं। सास-बहू की बहुप्रचारित संबंध-छवि इसी रणनीति का हिस्सा रही है, जिसमें स्त्री की त्रासदी को ‘स्त्री की ही समस्या’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कहानी में दादी और छोटी के बीच टकराव जिस तरह से उभरता है, कुछ हद तक वह इसी पैटर्न की आवृत्ति का एहसास दिलाता है।

कहानी के अंत में वाचक की चहेरी बहन राशि के माध्यम से चर्चा में आया दादी का अतीत उसे एक पीड़ित के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता है, लेकिन आरोप के शिल्प में उच्चरित संवाद उसे एक नैतिक निर्णायक की तरह ही पेश करते हैं, जो छोटी के ‘अभिनिष्क्रमण’ को प्रश्नांकित करती है। यहाँ यह टकराव पितृसत्ता के खिलाफ साझा प्रतिरोध में बदलने के बजाय एक आंतरिक विभाजन में बदल जाता है। इस बिंदु पर कहानी का प्रारंभिक ‘साम्राज्य’ रूपक पृष्ठभूमि में चला जाता है और उसकी जगह तनातनी वाले हिंसक घरेलू संबंधों की आवृत्तिमूलक संरचना केंद्र में आ जाती है। यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि कहानी इस आवृत्तिमूलकता को उजागर करते हुये यह दिखाना चाहती है कि पितृसत्ता केवल ऊपर से थोपी हुई शक्ति नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी स्त्रियों के भीतर भी अंतर्निहित हो जाती है। लेकिन समस्या यह है कि कहानी इस ‘अंतर्निहित पितृसत्ता’ और ‘स्त्री-स्त्री द्वंद्व’ के बीच पर्याप्त भेद नहीं कर पाती। यही कारण है कि कहानी का आरंभिक प्रतीकात्मक ढाँचा पितृसत्ता की संरचना को गहराई से समझने की जो भूमिका तैयार करता है, उसका कथात्मक विकास उस संभावना को पूरी तरह साध नहीं पाता। परिणामस्वरूप स्त्री जीवन की त्रासदी एक व्यापक सत्ता-संबंध के रूप में सामने आने के बजाय, सास-बहू-ननद के परिचित और आवृत्तिमूलक द्वंद्व में सिमटने लगती है।

प्रतीकात्मक ढांचा के समानांतर कहानी की वाचकीय दृष्टि इसकी संरचना का विशिष्ट और जटिल पक्ष है। चार वर्ष के बच्चे की दृष्टि से घर को साम्राज्य, राज्य और उपनिवेश जैसे रूपकों में देखा जाना वाचक की सत्ता-संबंधों की एक गहरी और अवचेतन समझ का संकेत है। बच्चा इन जटिल संबंधों को वैचारिक भाषा में नहीं, बल्कि अपने अनुभव और भय के मिश्रण से व्यक्त करता है। इसी कारण पाठक सीधे छोटी की पीड़ा का सामना नहीं करता, बल्कि उसे बच्चे की संवेदनशील अनुभूति के माध्यम से महसूस करता है। यहाँ बाल-दृष्टि में निहित मासूमियत और घटनाओं में छिपी हुई हिंसा के बीच जो द्वंद्व उपस्थित होता है, वह कहानी को एक विशेष मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान करता है। वाचक के भाव और भाषा में एक भोली जिज्ञासा तो बनी ही रहती है, उसके समानान्तर भय, असुरक्षा और दमन की तीव्रता भी लगातार उपस्थित रहती है।

कहानी बाल-अनुभव को एक वयस्क स्मृति के रूप में जिस तरह पुनर्संयोजित करती है, उससे वाचक को दो स्तरों पर बोलने की सुविधा मिलती है- एक, तात्कालिक अनुभव के स्तर पर और दूसरा, चालीस वर्षों के अंतराल में अर्जित समझदारी के स्तर पर। वाचकीय दृष्टि की यह द्विस्तरीयता कथा को गहराई तो देती है, किंतु यहीं से कहानी में अनुभव की विश्वसनीयता की समस्या प्रकट होती है। वाचक के कथन और अभिव्यक्तियों से गुजरते हुए कई बार यह अनुभव होता है कि चार वर्ष का बच्चा जिस तरह जटिल सत्ता-संरचनाओं, उसके प्रतीकार्थों और मनोवैज्ञानिक तनावों को ग्रहण करता दिखाया गया है, वह पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है। कई स्थानों पर भाषा और विचार स्पष्ट रूप से वयस्क चेतना के प्रतीत होते हैं, जिससे यह बाल-दृष्टि एक स्वाभाविक अनुभव के बजाय एक निर्मित कलात्मक युक्ति लगने लगती है। परिणामस्वरूप कथा का भावात्मक प्रभाव और तनाव तो बना रहता है, पर भाव और अनुभव की आंतरिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।

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कहानी एक पुरुष बाल-वाचक के दृष्टिकोण से कही गई है। इस कारण छोटी का जीवन, उसकी पीड़ा, उसकी आकांक्षाएँ- ये सब पाठक तक प्रत्यक्ष रूप से नहीं, बल्कि एक देखने वाले, आंशिक रूप से समझने वाले बच्चे की दृष्टि से पहुँचते हैं। परिणामतः उसका अनुभव जिया हुआ कम और देखा हुआ अधिक प्रतीत होता है। इसी से जुड़ी दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कहानी में छोटी की आवाज़ अपेक्षाकृत अनुपस्थित है। वह अधिकतर चुप, सहनशील, टूटती हुई या रोती हुई दिखाई देती है, जबकि उसके भीतर चल रही वैचारिक प्रक्रिया, उसकी तर्कशीलता और उसकी आत्म-चेतना सीमित रूप में ही सामने आती है। इस दृष्टि से वह एक स्वतंत्र ‘सब्जेक्ट’ की बजाय एक ‘ऑब्जेक्ट’ के रूप में अधिक दिखाई देने लगती है- एक ऐसा पात्र जिसे देखा और महसूस किया जाता है, पर जो स्वयं अपने अनुभव का पूर्ण भाष्य नहीं रचती। यही कारण है कि कहानी छोटी के माध्यम से एक स्त्री की पीड़ा को तो बहुत गहराई और तीव्रता से प्रस्तुत करती है, लेकिन उसकी स्वायत्तता, उसकी वैकल्पिक सोच और उसकी जटिल मानवीय परतों को उतनी नहीं खोल पाती, जितनी अपेक्षा की जा सकती है।

किन्तु इस स्थिति का एक महत्वपूर्ण पक्ष भी है। क्योंकि छोटी स्वयं बोलती नहीं, वाचक और पाठक दोनों को उसका दर्द और भी अधिक गहरा, रहस्यमय और बेचैन करने वाला प्रतीत होता है। बाल-वाचक केवल घटनाओं को देखता है, उनका पूर्ण अर्थ नहीं समझ पाता और यही अधूरापन पाठक को सक्रिय बनाता है। पाठक अपनी चेतना और अर्थ ग्रहण की क्षमता से उस मौन को भरने की कोशिश करता है, उन संकेतों को जोड़ता है और इस प्रक्रिया में कहानी का अनुभव अधिक तीव्र और व्यक्तिगत हो जाता है। इस प्रकार, जो बात एक सीमा के रूप में दिखाई देती है, वही एक सशक्त कलात्मक युक्ति में रूपांतरित हो जाती है। छोटी के आंतरिक स्वर की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति के अभाव को कहानीकार जिस भाषाई कौशल से अपनी कलात्मक रणनीति का हिस्सा बना लेता है, वह पाठकों के भीतर एक गहरी संवेदनात्मक बेचैनी पैदा करता है।

छोटी का अधिकांश जीवन नियंत्रण, दमन और चुप्पी के बीच बीतता है। अभिनिष्क्रमण, यानी घर छोड़ेने का निर्णय उसके जीवन और कहानी का एक महत्वपूर्ण क्षण है। छोटी ने यह निर्णय स्वयं लिया है, यह बात महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसे वाचकीय दृष्टि के चयन की सीमा कहें कि यह निर्णय पाठकों को उसके भीतर से उभरती हुई चेतना के रूप में नहीं, बल्कि बाहर से घटित एक प्रतिक्रियात्मक घटना के रूप में दिखाई देता है। छोटी की सोच, भावनाएँ और आत्मसंवाद कहानी में बहुत कम खुलते हैं। बाल-वाचक की दृष्टि से पाठक उसके डर, पीड़ा और आक्रोश को तो देखता है, पर उसे उसकी स्वयं की चेतना के भीतर से नहीं समझ पाता। ‘अभिनिष्क्रमण’ में छोटी का मौन एक ओर तो उसके दमन, असहायता और नियंत्रण की स्थिति को प्रकट करता है, तो दूसरी ओर यही मौन कहानी में एक गहरा, अनकहा तनाव भी निर्मित करता है। फिर भी, कई बार यह महसूस होता है कि यदि छोटी को कुछ अधिक बोलने, सोचने या अपनी रचनात्मकता व्यक्त करने का अवसर मिलता, तो उसकी ‘सब्जेक्टिविटी’ और अधिक सशक्त रूप में उभर सकती थी। यदि कहानी उसके भीतर उतरती, तो संभवतः उसके गुस्से, उसकी इच्छाओं और उसकी वैचारिक दुनिया के अधिक जटिल और बहुआयामी रूप सामने आते। तब शायद पाठकों पर अर्थ-निरूपण की जिम्मेदारी भी कुछ कम होती।

यह कहानी मनुष्य के भीतर सक्रिय अवचेतन प्रक्रियाओं, दमन, आघात और व्यवहारिक संरचनाओं की एक जटिल कथा है। कहानी के पात्र अपने वर्तमान व्यवहार में जितने दिखाई देते हैं, उससे कहीं अधिक वे अपने अतीत, दबे हुए अनुभवों और अनकही मनोवैज्ञानिक जटिलताओं से संचालित होते हैं। इस दृष्टि से यह कथा मनुष्य के भीतर और पीढ़ियों के बीच चलने वाले गहरे मानसिक तनावों को उजागर करती है। यूं तो कहानी के लगभग सम्पूर्ण पाठ में इस तनाव को महसूस किया जा सकता है। लेकिन अभिनिष्क्रमण के बाद के दस दिन जब छोटी अपने चार वर्षीय बेटे सहित पति के साथ है, अनकहे मनोवैज्ञानिक तनाव के इस (सं)ताप को ज्यादा बारीकी से समझा जा सकता है।

ऐसा छोटी और दादी पर फोकस के आधिक्य के कारण हुआ या इसके कोई अन्य कारण भी हैं, प्रायः पाठकों-आलोचकों का ध्यान इस ओर कम गया है। यद्यपि इस कहानी में पुरुषों की उपस्थिति बहुत कम या लगभग अनिर्णायक है, पर कहानी का यह प्रसंग इस बात को शिद्दत से रेखांकित करता है कि पितृसत्तात्मक संरचना में पति बहुत शक्तिशाली इकाई है। उल्लेखनीय है कि अभिनिष्क्रमण के बाद छोटी पति के पास जाती है। यहाँ सहज ही एक प्रश्न उठता है कि ऐसा करते हुए क्या छोटी उसी पितृसत्ता से अपने लिए वैधता की उम्मीद नहीं कर रही, जिससे मुक्त होना चाहती है? पितृसत्तात्मक संरचना में पति वैधता, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति का मुख्य स्रोत होता है। इस दृष्टि से देखें तो अभिनिष्क्रमण के बाद पति के पास जाने की यह घटना भावनात्मक वापसी से ज्यादा एक संरचनात्मक वापसी है। ध्यान दिया जाना चाहिए कि छोटी का संघर्ष दादी, यानी परिवार की आंतरिक सत्ता से है। लेकिन उस सत्ता के विरुद्ध खड़े होने के बाद वह जिस जगह जाती है, वह कोई स्वतंत्र, स्वनिर्मित स्पेस नहीं है, वह पति का घर है। छोटी के ‘अभिनिष्क्रमण’ को कहानी ‘कहने-सुनने के परे एक सीधी, शब्दहीन कार्रवाई’ बताती है, जिसके किए ‘हर आवाज़, नज़ारे और शोर से ध्यान हटाकर, आँखें मीचकर और कानों को बंद कर, सख्ती से दांतों को भींचे और विचारों को विराम देकर देश-काल की दरार से तीर की तरह निकल जाना होता है’। क्या छोटी ऐसा इसलिए कर सकी कि उसे अपने पति के पास ही जाना था?

कहने की जरूरत नहीं कि एक स्त्री, जो घर से निकाली गई हो या विद्रोह करके खुद बाहर आई है, उसके लिए समाज में वैध स्थान वही होता है, जहाँ उसका संबंध किसी पुरुष से स्थापित हो। तो क्या छोटी का पति के पास जाना इस बात का संकेत है कि वह अपने अस्तित्व को सामाजिक रूप से मान्य बनाने के लिए उसी संरचना की ओर लौटती है? उसे पति से एक प्रकार की मान्यता और संरक्षण की क्षीण सी उम्मीद भी है। वह ‘प्यार’ की दुहाई भी देता है, लेकिन विडंबना यह कि वही पति न सिर्फ उसकी स्वतंत्रता का सीमांकन कर देता है बल्कि उसे बड़ी चतुराई से लगभग बेआवाज उसी संरचना में वापस भी ले जाता है।

यह भी गौरतलब है कि छोटी का पति बार-बार प्यार की दुहाई देता हुआ उसके साथ शारीरिक निकटता स्थापित करने की कोशिश करता है, जबकि छोटी बार-बार उसे छूने से मना करती है। सतह पर पति का प्रेम-प्रदर्शन लगता यह दृश्य अपने भीतर सत्ता, इच्छा और नियंत्रण की कई गांठें समेटे हुए है। यहाँ प्यार एक भाषिक आवरण बन जाता है, जिसके भीतर एक प्रकार का अधिकारबोध छिपा है। प्यार की दुहाई यहाँ एक युक्ति की तरह काम कर रही है- एक ऐसी युक्ति, जो भावनात्मक दबाव के माध्यम से शारीरिक निकटता हासिल कर उसे उसी संरचना में वापस जाने के लिए अनुकूलित कर सकती है। छोटी का बार-बार मना करना इस बात का संकेत है कि वह इस युक्ति को पहचान रही है और उसका प्रतिरोध भी कर रही है। लेकिन समस्या यह है कि यह प्रतिरोध टिकता नहीं दिखता। अपनी आँखें मीचे, सोने का बहाना करता बाल संदीप छोटी और पिता के संवाद सुन रहा है। उस संवाद की रोशनी में वह छोटी के व्यक्तित्व और तकलीफों के मायने पर लगे बंद तालों को खुलता हुआ देख लेना चाहता है। लेकिन उसकी यह चाहत मुकम्मल नहीं होती-

“लालटेन कब की बुझ चुकी थी…छम छम छम, मेरी पलकों पर नींद नाच रही थी। उसके हवाले होने तक दूर से आती शेरों की दहाड़ की पृष्ठभूमि में एक भुतैली खुसर-फुसर सुनाई देती रही, फिर खामोशी।”

सोने का अभिनय करते संदीप के सचमुच सो जाने के कई निहितार्थ हो सकते हैं। प्रथमतः तो यह चार वर्षीय बालक की अपरिपक्वता का संकेत हो सकता है, जो जटिल भावनात्मक और शारीरिक सत्ता-संबंध को पूरी तरह समझ नहीं पाता, इसलिए नींद उसे घेर लेती है। इसका दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि यह एक प्रकार की अचेतन स्वीकृति है, जहाँ वह इस पूरी प्रक्रिया को रोकता नहीं, हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि खुद को नींद के हवाले कर देता है। ‘नींद के हवाले होना’ प्रतीकात्मक रूप से उस प्रक्रिया की ओर इशारा करता है, जिसमें अगली पीढ़ी पितृसत्तात्मक व्यवहारों को देखते हुए भी सामान्य मान लेती है।

इसका तीसरा और मेरी दृष्टि में सबसे गहरा अर्थ मुझ पर आगे के प्रसंग में खुला, जब तीनों लौट रहे हैं। छोटी को एहसास हो गया है कि उसके साथ धोखा हो चुका है, ट्रेन सोबती मैडम के शहर नहीं, बल्कि दारागंज की तरफ जा रही है। वही दारागंज, जहाँ दादी का साम्राज्य है। वाचक के शब्दों में कहानी का दृश्य देखिए-

“मैंने दूर से देखा, छोटी की आँखें धीरे-धीरे बोझिल होने लगीं। पिता सामने की बर्थ पर लेटे पहले ही नींद में जा चुके थे। मैं छोटी के पास जाकर, उससे चिपक कर, उसके गालों से गाल रगड़ना, देर तक – और कानों में चुपके से फुसफुसा कर कहना चाहता था कि अभी वक्त नहीं आया लेकिन कभी न कभी हम उनके घर ज़रूर चलेंगे, सिर्फ हम दोनों…मगर यह सब ठीक से कह सकूँ, इसके लिए मेरे पास शब्द नहीं थे।”

जो बच्चा छोटी के साथ एक वैकल्पिक दुनिया की कल्पना करता है, अपनी माँ के पक्ष में मन ही मन हमेशा अपनी दांतों के हथियार के संग तैयार रहता है, आखिर क्या कारण है कि वही बच्चा, उस रात के निर्णायक क्षण में नींद के हवाले हो जाता है?

कहानी में आगे कई ऐसे संकेत हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि छोटी का ‘अभिनिष्क्रमण’ नाकाम हो गया और वह उसी संरचना में पुनः समाहित हो गई। लेखकों की संगति में लेखक बनने का सपना लिए इलाहाबाद के लड़के से शादी करने का निर्णय लेनेवाली छोटी, पति के रिटायरमेंट के बाद मुक्तेश्वर के पहाड़ों में रह रही है। कहानी में आया ईलाहाबाद के दस दिनों की आजादी का प्रसंग भी इसी बात का प्रतीक है कि छोटी की आजादी भी उन्हीं दस दिनों की ही थी। फिर मासूम बाल संदीप के उस वायदे का क्या हुआ– ‘कभी न कभी हम उनके घर ज़रूर चलेंगे, सिर्फ हम दोनों’ चालीस साल बाद अपने उस वादे के प्रति वयस्क संदीप निष्क्रिय क्यों हो गया? मैडम सोबती के घर माँ को ले जाने की कल्पना अतीत के पन्नों तक क्यों सीमित रह गई? इन प्रश्नों पर विचार करते हुए अंदेशा होता है कि उस निर्णायक क्षण में, जब छोटी पुनः उसी संरचना के जाल में फंस रही थी, वयस्क हो चुके संदीप की स्मृति की अर्गलाओं से देखे गए बाल-वाचक का नींद के हवाले हो जाना, उसकी वयस्क निष्क्रियता का पूर्वाभास तो नहीं है? हो सकता है, मेरी यह बात दूर की कौड़ी हो, पर इससे भला कैसे इंकार किया जा सकता है कि अपनी तमाम असहमतियों के बावजूद, छोटी, प्यार की दुहाई वाले उसी क्षण में पति की उस युक्ति में फंस गई थी, जो बिना किसी शोर-शराबे के उसकी स्वायत्तता के स्थाई सीमांकन की पटकथा लिख रही थी। भाषा, स्पर्श और अधिकार एक दूसरे के साथ मिलकर पितृसत्ता की संरचना को पुनः स्थापित करते हुए कैसे इसे अगली पीढ़ी को सौंप देते हैं, पति-पत्नी के निजी संबंध के इस सहज लगते दृश्य के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है।

कहानी पात्रों को उनके नाम से नहीं, बल्कि संबंध-सूचक पदों या पारिवारिक संरचना में उनके क्रम से पुकारती है। ‘दादी’ का साम्राज्य है, लेकिन उनका कोई नाम नहीं। छोटी का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह केवल एक स्थान है- परिवार की संरचना में एक स्थिति, एक क्रम। छोटी होना ही उसकी पहचान है। इसी तरह ‘बड़ी’ या ‘मँझली’ भी व्यक्ति नहीं, बल्कि भूमिकाएँ हैं। यह पूरी नाम-व्यवस्था पितृसत्तात्मक परिवार की उस प्रवृत्ति को रेखांकित करती है, जहाँ स्त्री को व्यक्ति नहीं, बल्कि रिश्तों की इकाई के रूप में देखा जाता है। इस रूढ़ पारिवारिक संरचना के भीतर छोटी को उसके नाम ‘ज्योति’ से पहली और आखिरी बार कहानी में उसका पति ही पुकारता है।

पहली नजर में पति के द्वारा छोटी को उसके नाम से पुकारना कुछ हद तक छोटी को व्यक्ति के रूप में पहचानने का संकेत मालूम पड़ता है। बहुत संभव है छोटी को भी लगता होगा कि पति के यहाँ ही उसे अधिक मानवीय और अधिक आत्मीय स्थान मिलेगा। लेकिन बहुत जल्द यह स्पष्ट हो जाता है कि नाम से पुकारना भी एक प्रकार का अधिग्रहण या प्रलोभन ही है। परिवार ने उसे छोटी बनाकर सीमित किया, और पति उसे ‘ज्योति’ पुकारकर परंपरागत ढाँचे में पुनःस्थापित करने की रणनीति को अंजाम दे रहा है। दोनों ही स्थितियों में उसकी पहचान स्वनिर्मित नहीं है, बल्कि दूसरों द्वारा निर्धारित है। इस दृष्टि से देखें, तो छोटी को उसके नाम से पुकारा जाना वास्तव में मुक्ति का क्षण नहीं, बल्कि एक तरह का illusion है, जो प्रत्ययक्ष दमन से ज्यादा सांघातिक है। पहले स्त्री को यह विश्वास दिलाना कि उसके भीतर भी एक व्यक्ति है और फिर उसे अपनी सत्ता संरचना में नियंत्रित कर लेना दरअसल व्यक्ति बनने के स्त्री-स्वप्न का नियंत्रण है, इसलिए ज्यादा मारक और घातक है। दादी और छोटी के कटु संबंधों की ध्वनियाँ कहानी में इतनी तीव्र और तीक्ष्ण हैं कि कहानी के इस प्रसंग में छिपी ठंडी हिंसा बहुत मुखरित रूप में सामने नहीं आती।

सवाल यह है कि ज्योति का यह अभिनिष्क्रमण महज दस दिनों की चमक के बाद ब्लैकहॉल में क्यों तब्दील हो गया? इस प्रश्न का उत्तर भी कहानी की संरचना में ही निहित है। जैसा कि मैंने ऊपर कहा है, कहानी की वाचकीय योजना छोटी की बाह्य प्रतिक्रियाओं को तो दिखाती है, पर उसकी आंतरिक यात्रा को नहीं पकड़ पाती। यही कारण है कि छोटी का अभिनिष्क्रमण उसके तात्कालिक गुस्से का परिणाम होकर रह जाता है, उसकी चेतनागत अंतर्यात्रा का हिस्सा नहीं बन पाता। गुस्से को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन चेतना का विकास तो एक तरह की आंतरिक जाग है, उसे कोई कैसे नियंत्रित कर सकता है!

छोटी के घर से जाने के बाद दादी की प्रतिक्रिया और उनकी सन्दूकची से उभरता अतीत पूरी कहानी को अधिक जटिल और गहरे अर्थ-क्षेत्र में ले जाते हैं। आरंभ से अंत तक जिस दादी को हम एक कठोर, नियंत्रक और लगभग निर्मम सत्ता-केन्द्र के रूप में देखते आए थे, उसी दादी के भीतर इस प्रसंग में एक विचलन, एक अस्थिरता और एक अनकही बेचैनी उभरती दिखाई देती है। यह प्रतिक्रिया क्रोध और अपमान से कहीं आगे एक ऐसा आंतरिक विस्फोट है, जो संकेत देता है कि उसकी सत्ता की सतह के नीचे कुछ दबा हुआ, असुरक्षित और अस्थिर भी है। इस तरह कहानी पहली बार दादी को केवल एक दमनकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल मानवीय सत्ता के रूप में देखने का अवसर देती है।

यहाँ सन्दूकची अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक बनकर सामने आता है। वह दबी हुई स्मृतियों, अधूरी इच्छाओं और एक ऐसे अतीत का भंडार है, जिसे अब तक कथा ने छिपाकर रखा था। इसका खुलना दादी के उस इतिहास का खुलना है, जो उसके वर्तमान व्यवहार को समझने की कुंजी हो सकता है। यह खुलना केवल भौतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी एक अनावरण है। इस अतीत की झलक से यह संकेत मिलता है कि दादी स्वयं भी कभी उसी व्यवस्था की शिकार रही होगी, जिसका वह अब प्रतिनिधित्व कर रही है। उसका कठोर, दमनकारी रूप किसी जन्मजात क्रूरता का परिणाम नहीं, बल्कि एक लंबे ऐतिहासिक और सामाजिक दमन की उपज है। आंतरिकीकृत पितृसत्ता का वह रूप, जिसमें पीड़ित स्वयं उस दमनकारी संरचना को आत्मसात कर लेता है और आगे उसे ही पुनरुत्पादित करता चलता है। यहाँ कहानी दादी के चरित्र को रैखिक नैतिकता से बाहर निकालकर एक चक्रीय संरचना की तरह देखने का आग्रह करती है।

यहीं छोटी और दादी के बीच का संबंध भी एक नए अर्थ में खुलता है। छोटी वर्तमान की पीड़ित स्त्री है, जबकि दादी अतीत की वही स्त्री है, जो अब सत्ता की स्थिति में आ गई है। इस तरह कहानी यह संकेत देती है कि यह केवल दो व्यक्तियों का संघर्ष नहीं, बल्कि एक ऐसी संरचना का पुनरावर्तन है, जिसमें पीड़ा और दमन पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहते हैं। यह चक्र कहानी को एक व्यापक सामाजिक आलोचना की दिशा में ले जाता है, जहाँ समस्या किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में निहित है जो ऐसे चरित्रों को गढ़ती है। यदि यह अंश कहानी में न होता, तो यह कहानी संभवतः केवल ‘क्रूर सास बनाम पीड़ित बहू’ की एक अपेक्षाकृत सरल कथा बनकर रह जाती। यहाँ तक आते-आते दादी के पूरी तरह खलनायिका होने का प्रभाव दरकता है। अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या दादी के अतीत के इस औचक अनावरण के कारण कहानी एक बहुस्तरीय सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पाठ में परावर्तित हो पाती है? पितृसत्ता एक ऐसी संरचना है, जो अपने शिकारों को ही अपने वाहक में बदल देती है का विचार कहानी को जटिल और विचारोत्तेजक बनाता है। लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या यह विचार कहानी की स्वाभाविक गति, लय और चरित्रों के आंतरिक विकास के साथ सिंक्रोनाइज होकर आता है? मैं इन प्रश्नों का कोई उत्तर प्रस्तावित करूँ इसके पहले सीधे कहानी के उस हिस्से को देखा जाना बेहद जरूरी है-

“उस पूरी शाम दादी टुकड़ों में रुक-रुक कर जो कहती रही, उनमें से कुछ बातें याद हैं। उहे एक पढ़नहारी रही? उहे लिखईया रही? हम तो मूरख रहीं ना, खुसट बुढ़िया। उहे एक बुधियार रही।

अरे, हमहूँ कउनो बुढ़िया नाहीं जनमी रहीं। कभू हमहूँ लरिकी रहीं, हमहूँ लिखत रहीं, कच्ची-पक्की कबिता। ई देखऽ, अबहिन तलक बचाय के धरे अहि। ई देखऽ हमरे इस्कूल क फोटो बा, कबिता लिखे पर हमका इनाम मिला रहा। उहे बेरा क फोटो बा, एक ठे बड़की कबयित्री आई रहीं इनाम बाँटे। चीन्हि लेयो।

फेर बियाह होय गवा अउर घर-बार हमका पीसि के रखि दिहिस। तुही लोगन, तोहार चुल्हा-चक्की, हगी-मूती पीसि के रखि दिहा।

अच्छा, हम मूरख रहीं त ऊ त बुधियार रही। ओकरे मने में कबहुँ बिचार नाहीं आवा कि …का नाऊँ बतावत रही, हाँ मईडम सोबती…ओनकर कउनो किताब अम्मा भी पढ़ि सकत हईं? ओकरी ननदिया के भी इन किताबन के जरूरत होय सकत है? ऊ त कोठरी बंद करि के अकेले-अकेले पढ़त रही, सुआरथी। हम बाट जोहत रहीं कि कबहुँ आइके लगे बइठी, कछु किताब से पढ़िके सुनइहै, कछु बतइहै। लेकिन ऊ त मेमसाब के जइसन बिना कछु कहै मुँह फेरि के चलि गइन।”

यहाँ इस बात को भी समझे जाने की जरूरत है कि इस हिस्से तक आते-आते कहानी की वाचकीय व्यवस्था बदल गई है। कहानी का यह हिस्सा पाठकों तक संदीप की कजिन राशि लेकर आती है। राशि के माध्यम से प्रस्तुत दादी के इस कथन में पहली बार उनका दुख और आंतरिक संसार लगभग आत्मचीत्कार के रूप में सामने आता है। लेकिन अब भी वह छोटी को फ्रेम करना नहीं भूलती। उस पर स्वार्थी होने का आरोप मढ़ती है। छोटी के अभिनिष्क्रमण के बहाने आधुनिक स्त्री विमर्श का वह स्वरूप, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्म-विकास की बात करता है, यहाँ वह भी प्रश्नांकित हो उठता है।

चूंकि बाल संदीप अपनी माँ के साथ घर से जा चुका था, इस हिस्से को प्रस्तुत करने के लिए वाचक का बदला जाना जरूरी थी। प्रकटतः यह वाचक एक परिपक्व और वयस्क स्त्री है। कहानी में निहित संकेतों के आधार पर अपनी उम्र के छठे दशक में प्रवेश कर चुकी स्त्री। चूंकि कहानी का यह उत्कर्ष अबतक प्रस्तुत किए गए अपने ही पाठ को लगभग उलटकर रख देता है, मैं यह मान लेने की छूट चाहता हूँ कि कहानी की नई वाचकीय व्यवस्था दादी के दुख और आरोप दोनों को एक स्त्री के माध्यम से वैधता प्रदान करना चाहती है। लेकिन क्या यह सचमुच एक स्वायत्त स्त्री की आवाज है? क्या उसकी अभिव्यक्ति चयनित, संयोजित और पुनर्निर्मित नहीं है? राशि के माध्यम से कहानी दादी के आरोपों और छोटी से की जाने वाली उनकी उम्मीदों को वैधता तो प्रदान करती है, पर उन स्थितियों की तरफ एक पल को भी मुड़कर नहीं देखती, जिसने उसे दमित, विद्रोही और दादी के अनुसार आत्मकेंद्रित बनाया। वह छोटी के उस दमन, अकेलेपन और मानसिक संघर्ष को नहीं देख पाती, जिसके भीतर छोटी का कोठरी में पढ़ना, स्वार्थ नहीं, आत्मरक्षा और अस्तित्व बचाने की रणनीति और उपकरण दोनों है। यही कारण है कि स्त्री जीवन के दो अनुभव- एक, वंचना से उपजी सामूहिकता की आकांक्षा और दूसरा, दमन से उपजी निजी स्पेस की जरूरत के बीच पूरी कहानी में संवाद की कोई गुंजाइश नहीं बन पाती और दोनों अंततः शत्रुओं की तरह आमने-सामने खड़े दिखाई पड़ते हैं।

पूरी कहानी में पितृसत्ता की संरचना की जो परतें अनकही रह गई थीं, उनके खुलने के संकेत दादी की आवाज़ में सुनाई पड़ते हैं, लेकिन ये संकेत इतने सूक्ष्म, अपर्याप्त और बिना अपेक्षित तैयारी के साथ उपस्थित होते हैं कि राशि के माध्यम से मुखरित दादी की आवाज में पितृसत्ता के नियंत्रण का आभास बना रह जाता है। सार्वभौम बहनापा या ग्लोबल सिस्टरहुड जो मूलतः स्त्रीवाद की ही प्रस्तावना है, के अभाव को पितृसत्ता से अनुकूलित और उसकी वाहक दादी के द्वारा रेखांकित किए जाने की विडंबना भी उसी की तरफ संकेत करती है। दादी के भीतर आत्म-संघर्ष, अंतर्द्वंद्व, वैचारिक जटिलता, आत्मावलोकन और आत्मस्वीकार की पर्याप्त संभावनाएं थीं, लेकिन कहानी उन्हें एक्सप्लोर करने के बजाय क्षीण संकेतों, जटिल प्रतीकों और औचक नाटकीय दृश्यों के सहारे अर्थ निर्माण की गुरुतर पाठकीय जिम्मेवारी के भरोसे छोड़ देती है। काश ऐसा नहीं हुआ होता! तब शायद देखे हुए सच को जस का तस रख देने की नौबत भी नहीं आती। इस स्थिति के बचाव में एक तर्क यह हो सकता है कि कहानी में वर्णित यथार्थ आज का नहीं है। कहानी में वर्णित संकेत बताते हैं कि कहानी का घटना-काल लगभग चालीस साल पुराना, यानी पिछली सदी के नवें दशक के मध्य का है। तब एक नया और असुविधाजनक प्रश्न आ खड़ा होता है कि क्या कहानी अपनी प्रस्तुति में वर्तमान और कहानी के घटना-काल के बीच स्थित समय के चालीससाला अंतराल से उपजे तनावों को संबोधित करती है? ऊपर वाचक की जिस द्विस्तरीयता की बात मैंने की थी, इस प्रश्न का आंशिक जवाब वहाँ मौजूद है, लेकिन संपूर्णता में कहानी इस प्रश्न को संबोधित नहीं करती। यह कहानी का उद्देश्य भी नहीं है, अतः इस प्रश्न को यहीं छोड़ना उचित होगा।

मैं ‘काश ऐसा नहीं हुआ होता!’ की अपनी कसक और ‘अभिनिष्क्रमण’ में संकेतित पितृसत्तात्मक संरचना की जटिलता को ‘स्त्री दृष्टि बनाम पुरुष दृष्टि’ की प्रचलित और सुविधाजनक बायनरी से नहीं परखना चाहता। लेकिन दादी के दुख और आरोपों की जटिलता के विस्फोट की प्रतिध्वनियों के बीच मुझे राजी सेठ की कहानी ‘खाली लिफाफा’, जो इसी शीर्षक से 2007 में प्रकाशित उनके कहानी-संग्रह में संकलित है और जो संभवतः उसके बहुत पहले लिखी गई थी, का एक दृश्य लगातार याद आ रहा है। प्रसंग किंचित लंबा है, पर यथार्थ, स्वप्न और कहानी के अंतर्संबंधों से शुरू कर ‘अभिनिष्क्रमण’ का जो पाठ मैंने यहाँ रखने की कोशिश की है, को समझने के लिए मुझे उसे उद्धृत करना जरूरी लग रहा है –

“मेरे मुंह पर अबूझा जैसा कुछ छपा होगा कि तुमने प्रसंग का सिरा काट दिया, ‘अच्छा इस वक़्त तू इस बात को छोड़… जाकर शामो को इधर भेज ।’

भेजना क्या था… मेरी भाभी श्यामा पता नहीं कहां से अपने-आप वहां आन टपकी थीं और तुम्हारे घुटने से लगकर बैठ गई थीं। वे मेरी ओर देखकर मंद-मंद मुस्करा रही थीं। कोई ऐसे भेद भरे ढंग से लगातार मुस्कराता कैसे रह सकता होगा? शायद वे मेरे जाने का इंतज़ार कर रही थीं ।

तुमने धीरे से अपनी पालथी के नीचे से स्लेट निकाली थी और पास रखे गीले चीथड़े से उसे पोंछने लग गई थीं। मुझे उसी जगह, उसी तरह जमे देखकर तुमने मुझे डपटा था, ‘ऐसे आंखें फाड़-फाड़कर देख क्या रही हो? कहा नहीं, जाओ… अपनी पढ़ाई-लिखाई में लगो ।’

जाना मैंने नहीं चाहा था पर स्लेट पर रखे तुम्हारे हाथ ने वहीं रुके रहने का हठ जैसा ठान लिया था। मुझे जाना पड़ा था, पर मैं गई नहीं थी। खिड़की की ओट में खड़ी रही थी। वहां पर खड़े तुम्हारे और भाभी के सिर जुड़े हुए दिख रहे थे। अस्फुट स्वर उठ रहे थे, पर मुझे सुनाई नहीं दे रहे थे। उन फुसफुसाहटों के बीच और नीचे सदा से ओझल सरस्वती की धार बह रही थी। पता नहीं कब से? यह सब पता नहीं कब से चल रहा था। कौन जाने?

घंटा-डेढ़ घंटा ज़रूर बीता होगा। पता नहीं कितने ही ऐसे घंटे-डेढ़ घंटे इस सीक्रेट मिशन में जुड़े होंगे। गर्मी के ताप से भरी निचाट दोपहरियां। अंधेरे किए गए कमरे। भिड़े दरवाज़े की दरार से आती कतरन भर रोशनी। ऐसे सन-सन सन्नाटे में कोई एक बहू अपनी सास के सिर पर ज्ञान की चुनरी ओढ़ाने का उपक्रम कर रही है। सदियों से कलह-क्लेश के लिए गाए जाते बदनाम रिश्ते में नए रंग भर रही है।”

स्पष्ट है कि ‘खाली लिफाफा’ के इस प्रसंग में, सास-बहू मिलकर पितृसत्ता के विरुद्ध एक वैकल्पिक स्पेस निर्मित करती हैं, एक ऐसा स्पेस, जो गुप्त है, लेकिन सृजनशील है। सदियों से बदनाम सास-बहू के रिश्ते में ‘नए रंग भरने’ की जो बात यहाँ आई है, वह दरअसल स्त्री की एजेंसी और उनके बहनापे की पुनर्स्थापना है। स्वप्न को संभव बनाने की रचनात्मक पहल को ‘किसी इच्छित या वांछित यथार्थ का रंग चढ़ाने की कोशिश’ नहीं कहा जा सकता। ‘नए रंग भरना’ और ‘वांछित यथार्थ का रंग चढ़ाने की कोशिश’ ये दोनों मुहावरे एक जैसी स्थिति का संकेत करते हुए भी अपनी संवेदना में एक जैसे नहीं हैं। पहला मुहावरा जहाँ स्वप्न को संभव बनाने की कल्पनाशीलता का नाम है तो दूसरे मुहावरे में एक प्रच्छन्न आरोप का भाव शामिल है। इसे स्त्री और पुरुष भाषा के बारीक अंतर के रूप में भी देखा जा सकता है। संवेदना को अभिव्यक्त करने में भाषा की बड़ी भूमिका तो होती ही है।

योगेंद्र आहूजा में स्त्री अस्मिता और इससे जुड़े प्रश्नों को अपनी कहानियों में उठाते रहे हैं। इस सिलसिले में ‘अभिनिष्क्रमण’ (‘कथादेश’, नवंबर 2024) उनकी तीसरी महत्त्वपूर्ण कहानी है। पूर्व में प्रकाशित उनकी कहानियों ‘स्त्री विमर्श’ (‘कथादेश’ फरवरी 2004) और ‘इतने सारे शब्द’ (‘अकार’, अंक 25) के साथ जोड़कर मैं इस कहानी का पाठ करना चाहता था। लेकिन इस आलेख की लंबाई उधर जाने से रोक रही है। इन तीन कहानियों को एक साथ रखकर योगेंद्र आहूजा के स्त्री चिंतन पर अलग से कभी बात की जा सकती है। पर मोटे तौर पर इन तीनों कहानियों में एक समानता जरूर मिलती है कि वे इनके माध्यम से आधुनिक स्त्री विमर्श के अंतर्विरोधों को रेखांकित करते हुए इससे अपनी किंचित असहमतियाँ हर बार दर्ज करते हैं। लेकिन ‘अभिनिष्क्रमण’ में आधुनिक स्त्री विमर्श के लिए एक मानक की तरफ भी संकेत है-

“फोटो की दूसरी महिला भी एक कौंध में अनायास पहचान में आयीं…महादेवी जी, खादी की साड़ी में हमेशा जैसी भव्य और शानदार।”

निस्संदेह महादेवी वर्मा का स्त्री चिंतन भारत के आधुनिक स्त्री विमर्श की नींव का एक महत्त्वपूर्ण पत्थर है। पर क्या आधुनिक स्त्री विमर्श में उसके विकास के सूत्र नहीं शामिल हैं? आधुनिक स्त्री विमर्श से किंचित असहमतियों के बीच ‘खादी की साड़ी में हमेशा जैसी भव्य और शानदार’ पर जोर के क्या निहितार्थ हैं? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनपर चलते-चलते कुछ नहीं कहा जा सकता। ये प्रश्न स्वतंत्र रूप से विस्तृत चर्चा की माँग करते हैं।

कुछ समय के लिए ही सही, पर ‘अभिनिष्क्रमण’ में पितृसत्ता का साम्राज्य दरकता है, यह उसकी बड़ी सफलता है, लेकिन उस दरार से उसी संरचना के पुनरुत्पादन की छवियों का पुनः झांकना कई जरूरी प्रश्न भी खड़े करता है। संभव की कल्पना का अभाव और आत्मकेंद्रीयता के आरोप के द्वन्द्व की जटिल अभिसंधि पर नियोजित ‘अभिनिष्क्रमण’ वैकल्पिक दुनिया का प्रारूप भले नहीं प्रस्तावित करती, पर उस दिशा में सोचने की बेचैनी पाठक के भीतर जरूर पैदा करती है, यही इस कहानी की सबसे बड़ी ताकत है।

राकेश बिहारी
राकेश बिहारी
जन्म : 11 अक्टूबर 1973, शिवहर (बिहार)। कहानी तथा कथालोचना दोनों विधाओं में समान रूप से सक्रिय। प्रकाशन- वह सपने बेचता था, गौरतलब कहानियाँ (कहानी-संग्रह) केंद्र में कहानी, भूमंडलोत्तर कहानी (कथालोचना)। सम्पादन- स्वप्न में वसंत (स्त्री यौनिकता की कहानियों का संचयन),‘खिला है ज्यों बिजली का फूल’ (एनटीपीसी के जीवन-मूल्यों से अनुप्राणित कहानियों का संचयन), ‘पहली कहानी : पीढ़ियां साथ-साथ’ (‘निकट’ पत्रिका का विशेषांक) ‘समय, समाज और भूमंडलोत्तर कहानी’ (‘संवेद’ पत्रिका का विशेषांक)’, बिहार और झारखंड मूल की स्त्री कथाकारों पर केन्द्रित 'अर्य संदेश' का विशेषांक, ‘अकार- 41’ (2014 की महत्वपूर्ण पुस्तकों पर केन्द्रित), दो खंडों में प्रकाशित ‘रचना समय’ के कहानी विशेषांक, ' चेतना का देश-राग' और 'आहटें आसपास' ('पुस्तकनामा' की साहित्य वार्षिकी)। सम्मान- ‘स्पंदन’ आलोचना सम्मान, वनमाली कथा आलोचना सम्मान तथा सूरज प्रकाश मारवाह साहित्य सम्मान से सम्मानित। ईमेल – brakesh1110@gmail.com
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