पिछले पच्चीस–तीस वर्षों के हिन्दी कथा-साहित्य पर गौर करें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि कहानियाँ अपेक्षाकृत लंबी होती गई हैं और उपन्यास छोटे। यह परिवर्तन हिन्दी साहित्य की विधागत चेतना, रचनात्मक दृष्टि और समय-बोध में आए गहरे बदलाव का संकेत है। इस परिघटना को कहानी की औपन्यासिक संरचना और उसमें निहित औपन्यासिक संभावना से जुड़े प्रश्नों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। परंपरागत रूप से कहानी और उपन्यास की पहचान उनकी लंबाई के आधार पर करने की एक सहज समीक्षात्मक प्रविधि प्रचलन में रही है। कहानी को संक्षिप्त, तीव्र और संघनित अनुभव की तरह देखा गया, जबकि उपन्यास को विस्तार, बहुस्तरीयता और दीर्घकालिक जीवन दर्शन की तरह। किंतु इक्कीसवीं सदी का एक चौथाई बीतते-बीतते यह विभाजन लगातार कमजोर पड़ा है। इसलिए अब जरूरी हो गया है कि लंबाई को विधागत पहचान की निर्णायक कसौटी मानने के बजाय कथा की संरचना और चेतना पर पुनर्विचार किया जाए।
कहानियों की औसत लंबाई बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण अनुभव की जटिलता में हुई वृद्धि है। समकालीन जीवन अब किसी एक निर्णायक क्षण या घटना में सिमटने वाला नहीं रहा। विस्थापन, पहचान-संकट, वर्गीय अस्थिरता, लैंगिक प्रश्न, स्मृति और सामाजिक-राजनीति जैसे विषय अपने स्वभाव से ही बहुस्तरीय हैं। इन्हें पकड़ने के लिए कहानी को समय-विस्तार, पृष्ठभूमि और चरित्र-विकास की अतिरिक्त जगह चाहिए। इसी दबाव में कहानी औपन्यासिक संरचना की ओर अग्रसर होती दिखाई देती है। यहाँ कहानी इसलिए लंबी नहीं होती कि लेखक उपन्यास लिखना चाहता है, बल्कि इसलिए कि अनुभव स्वयं छोटा नहीं रह गया है।
दूसरी ओर, उपन्यासों की औसत लंबाई का कम होना भी उतना ही अर्थपूर्ण है। समकालीन उपन्यास प्रायः महाकाव्यात्मक विस्तार का दावा नहीं करते। वे संपूर्ण समाज को समेटने के बजाय किसी सीमित जीवन-खंड, किसी विशेष सामाजिक स्थिति या किसी खास मनःस्थिति पर केंद्रित होते हैं। यह प्रवृत्ति उपन्यास को अधिक सघन और विषय केंद्रित बनाती है तथा कई बार उसे कहानी के निकट ले आती है। यहाँ उपन्यास ‘सब कुछ कह देने’ की अपनी परंपरागत आकांक्षा छोड़कर चयन और संयम को अपनाता है। इस अर्थ में उपन्यासों का छोटा होना किसी रचनात्मक कमजोरी का नहीं, बल्कि बदली हुई कथा-दृष्टि का प्रमाण है।
इस परिदृश्य में कहानी की औपन्यासिक संरचना और उसमें निहित औपन्यासिक संभावना के बीच का भेद और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अनेक लंबी कहानियाँ वास्तव में औपन्यासिक संरचना ग्रहण कर लेती हैं, वहीं कुछ कहानियाँ अपेक्षाकृत कम विस्तार के बावजूद ऐसी औपन्यासिक संभावना रचती हैं कि पाठक को उनके बाहर फैली दुनिया का आभास बना रहता है। इसी तरह कई छोटे उपन्यास भी संरचनात्मक रूप से औपन्यासिक होते हैं, भले ही उनकी लंबाई सीमित हो। इससे स्पष्ट होता है कि लंबाई केवल एक बाहरी लक्षण है, विधागत पहचान का मूल आधार नहीं।
यह स्थिति हिन्दी कथा-साहित्य में एक तरह की विधागत संक्रमणशीलता को जन्म देती है। कहानी और उपन्यास अब स्थिर कोटियाँ नहीं रह गई हैं, बल्कि एक-दूसरे की ओर खिसकती, संवाद करती हुई विधाएँ बनती जा रही हैं। यह संक्रमण न तो पूरी तरह संकट का संकेत है और न ही केवल प्रयोगधर्मिता का परिणाम। यह उस ऐतिहासिक क्षण की उपज है, जिसमें जीवन स्वयं खंडित, असमाप्त और बहुदिशात्मक हो गया है। ऐसी दुनिया में कथा भी स्वयं को किसी एक तय ढाँचे में बाँधने से इंकार करती है।
कहानी की लंबाई बढ़ना तभी सार्थक है जब वह अपने आंतरिक कसाव और वैचारिक सौंदर्यबोध को बनाए रख सके। उसी तरह उपन्यास का छोटा होना तभी रचनात्मक उपलब्धि है जब वह औपन्यासिक दृष्टि और संरचनात्मक गहराई से समझौता न करे। अन्यथा यह खतरा बना रहता है कि लंबी कहानी असफल-अधूरे उपन्यास में बदल जाए और छोटे कलेवर का उपन्यास लंबी कहानी का भ्रम पैदा करे। अतः आज मूल प्रश्न यह नहीं है कि कहानी कितनी लंबी है या उपन्यास कितना छोटा, बल्कि यह है कि क्या रचना अपने चुने हुए रूप में अनुभव, संरचना और शिल्प का संतुलन साध पा रही है? इसी संतुलन में समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य की सृजनात्मक संभावना निहित है।
अमूमन आकार में छोटी कहानियाँ लिखने वाली प्रीति प्रकाश की हंस (दिसंबर 2025) में प्रकाशित कहानी ‘आह लेकिन कौन जाने…’ का अपेक्षाकृत लंबा आकार कहानी की औपन्यासिक संरचना और उसमें निहित औपन्यासिक संभावनाओं के इन प्रश्नों पर नए सिरे से विचार करने का अवसर देता है। आज का दिन, अलग-अलग समयावधियों में विभक्त अतीत की स्मृतियाँ और आज की रात की त्री-स्तरीय संरचना में विभक्त इस कहानी के केंद्र में ममता नाम की एक स्त्री का जीवन है, जिसे कहानी एक पुरुष वाचक के माध्यम से सामने रखती है।
कहानी की संरचना में जिस त्री-स्तरीय विभाजन- आज का दिन’, अतीत की स्मृतियाँ, और आज की रात का प्रयोग किया गया है, वह केवल कथानक को क्रमबद्ध करने का साधन नहीं है, बल्कि यह पाठक को समय, अनुभव और स्मृति के बीच एक जटिल संवाद में प्रवेश कराता है। आज का दिन खंड सतत वर्तमान का अनुभव देता है। घटनाएँ और पात्र यहाँ तत्कालीन क्रियाओं में उलझे होते हैं, जो समय की रैखिक धारा का अनुकरण करती हैं। परंतु इस सततता के बावजूद, यह खंड स्थिर नहीं है, बल्कि कथा के अर्थ निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार के रूप में कार्य करता है।
तीसरा खंड- आज की रात, कहानी के इस त्री-स्तरीय ढांचे का संश्लेषण और समापन प्रस्तुत करता है। यह खंड न केवल दिन और स्मृति के खंडों के बीच संबंध स्थापित करता है, बल्कि स्वप्न के शिल्प में कथानक को प्रतीकात्मक और वैचारिक विस्तार का अवसर भी प्रदान करता है। यही कारण है कि रात का खंड पाठक को भावनात्मक और वैचारिक दोनों ही स्तरों पर कहानी से जोड़ता है और इसे केवल एक घटना आधारित कथा से ऊपर उठाकर संवेदनशील और बहुपरतीय पाठ–अनुभव में परिवर्तित करता है।
वाचक अटल का चरित्र अत्यंत जटिल है। वह न तो खलनायक है, न नायक। वह एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने समय और समाज से थोड़ा आगे तो है, लेकिन निर्णायक रूप से नहीं। एक ओर वह ग्रामीण अंधविश्वास, पुलिसिया क्रूरता और सामूहिक स्त्री-द्वेष से असहमत दिखता है; दूसरी ओर वह स्वयं सत्ता-संरचना का लाभार्थी है- पुरुष है, बिना डिग्री के ‘डॉक्टर साहब’ है, सरपंच का बेटा है। ममता के प्रति उसका आकर्षण सहानुभूति से शुरू होकर धीरे-धीरे एक नैतिक संकट में बदलता है। वह ममता को सुनता है, समझता है, उसके दुःख से विचलित होता है, लेकिन उसके पक्ष में खड़ा नहीं हो पाता। यही उसकी सबसे बड़ी विफलता है।

ममता का चरित्र इस कथा का केंद्र है, लेकिन विडंबना यह है कि उसकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है। वह अधिकतर दूसरों की स्मृतियों, आरोपों और व्याख्याओं के माध्यम से सामने आती है। ममता का अपराध यह नहीं कि उसने बच्चों को मार दिया, बल्कि यह है कि उसने पति की अनुपस्थिति में अपनी देह की चाह को स्वीकार किया, सास-ससुर की सेवा को मातृत्व से ऊपर रखने से इनकार किया, सबकुछ चुपचाप सहने से मना किया। उसकी विक्षिप्तता दरअसल एक टूटे हुए मन की अंतिम भाषा है। जब वह कहती है – “हाँ, मैं खा गयी उन्हें… वो भी तो मुझे रोज़ खा रहे थे” तो यह कथन किसी हत्यारिन का नहीं, बल्कि एक स्त्री का आत्मस्वीकार है जिसे समाज ने धीरे-धीरे निगल लिया।
‘आह लेकिन कौन जाने…’ की ममता को सोचते हुए बार-बार टॉल्स्टॉय की अन्ना कारेनिना याद आती है। दोनों के बीच समय, देश और भाषा का फासला है, लेकिन स्त्री-पीड़ा की बनावट में एक अजीब-सी समानता है। इन्हीं विचारों के बीच, जाने कैसे, मैं एक स्वप्न की दुनिया में प्रवेश करता हूँ- जहाँ न रूस है, न गाँव; न उन्नीसवीं सदी, न इक्कीसवीं। वहाँ केवल दो स्त्रियाँ हैं, जो अपने अपराध के बाद, समय और समाज से परे, एक-दूसरे से संवाद कर रही हैं-
अन्ना – तुम्हें भी क्या ऐसा लगा था, ममता, कि अपराध अचानक नहीं होता? कि वह बहुत पहले शुरू हो जाता है, जब लोग तुम्हें देखना बंद कर देते हैं?
ममता – हाँ। मेरे लिए तो अपराध तभी शुरू हो गया था, जब लोगों ने मान लिया कि मैं अकेली हूँ… किसी ने यह तक नहीं पूछा कि क्या मैं थकती भी हूँ।
अन्ना – मेरे साथ उलटा हुआ। सब मुझे देख रहे थे। इतनी निगाहें थीं कि साँस लेना मुश्किल हो गया। समाज ने मुझे छोड़ा नहीं, बस मुझे जीने नहीं दिया।
ममता – आपको घेर लिया गया था। मुझे छोड़ दिया गया था। शायद यही फर्क है हमारे अपराध में।
अन्ना – जब मैंने रेल के आगे कदम रखा, तो मुझे लगा, मैं किसी से बदला नहीं ले रही। मैं बस इस भीड़ से बाहर निकल रही हूँ। क्या तुम्हें भी ऐसा लगा?
ममता – नहीं। मुझे लगा मैं पहली बार कोई निर्णय ले रही हूँ। गलत था…भयानक था…लेकिन वह मेरा था। जब मैंने बच्चों को देखा, तो लगा, यह दुनिया उन्हें भी उसी तरह छोड़ देगी, जैसे मुझे छोड़ा…और मैंने पहले बच्चों को… ताकि उन्हें अकेला न छोड़ूँ…इसके बाद खुद को भी तो खत्म करना चाहती थी, लेकिन…
अन्ना – तुमने उन्हें…?
ममता – मैंने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा। यही मेरा अपराध है…शायद यही मेरी सफ़ाई भी।
अन्ना – मेरे बेटे को मुझसे छीन लिया गया था, लेकिन समाज यह दावा करता रहा कि वह उसके भले के लिए है। तुम्हारे बच्चों को समाज ने अपनाया ही नहीं। शायद इसीलिए तुम्हारा अपराध समाज के खिलाफ़ ज़्यादा गवाही देता है।
ममता – आपको प्रेम के लिए दंड मिला। मुझे मातृत्व के लिए।
अन्ना – और दोनों ही मामलों में पुरुषों से किसी ने कुछ नहीं पूछा।
ममता – उसने तो विवाह कर लिया…नई शुरुआत…नई स्त्री… मेरे पास क्या था? एक शब्द था- मायका। मैंने उसे ही घर समझ लिया। उसने वही…
अन्ना – मैंने भी प्रेम को घर समझ लिया था। हम दोनों ने शायद वही भूल की, भावना को संरचना समझ लिया।
ममता – या शायद समाज ने हमें कभी संरचना दी ही नहीं।
(कुछ देर चुप्पी)
अन्ना – क्या तुम्हें लगता है कि हम अपराधी थीं?
ममता – नहीं। मुझे लगता है हम अंतिम कड़ियाँ थीं। अपराध किसी और ने शुरू किया था- उपेक्षा से, चुप्पी से, सुविधा से।
अन्ना – अगर कोई हमें पढ़े, तो क्या वह यह समझ पाएगा?
ममता – अगर वह सिर्फ़ हमारे अंत को देखेगा, तो नहीं। अगर वह उस रास्ते को देखेगा, जो हमें यहाँ लाया, तो शायद…
अन्ना – काश कोई पूछता, “तुम ठीक हो?”
ममता – काश कोई रुकता…
इसके बाद दोनों खामोश हो जाते हैं…मेरे सपनों की दुनिया टूटती है, संवाद यहीं ठहर जाता है। लेकिन प्रश्न जागते रहते हैं…मैं चाहता हूँ कि अन्ना और ममता के बीच घटित इस संवाद को भावुक कल्पना से आगे एक संवाद-सेतु की तरह देखा जाए। टॉल्स्टॉय की ‘अन्ना कारेनिना’ और ‘आह लेकिन कौन जाने…’ की ममता, दोनों ही स्त्री-अपराध को उस बिंदु तक ले जाती हैं, जहाँ अपराध व्यक्तिगत नैतिकता का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक संरचना की विफलता का प्रमाण बन जाता है।
अन्ना का अपराध प्रेम, या कहिए विवाह-संस्था के बाहर प्रेम करने के साहस में है। टॉल्स्टॉय का समाज उसे दंड देता है, लेकिन पूरी तरह त्यागता नहीं। अन्ना को सामाजिक निगरानी, आलोचना और नैतिक दबाव झेलना पड़ता है। यह दमन सक्रिय है, दृश्य है। इसके विपरीत ममता का समाज निष्क्रिय है। उसकी यही निष्क्रियता स्थिति को और अधिक भयावह बना देती है।
अन्ना के पास एक सामाजिक संरचना है, भले ही वह दमघोंटू हो; ममता के पास कोई संरचना ही नहीं। उसका मातृत्व सामाजिक मान्यता से वंचित है, उसका प्रेम असुरक्षित है और उसका भविष्य पूरी तरह अनिर्धारित। इसीलिए ममता का अपराध किसी क्षणिक आवेग का परिणाम नहीं, बल्कि उपेक्षा की एक लंबी प्रक्रिया की परिणति है।
“जाने मेरी अब तक की सारी चतुराई कहाँ चली गयी जो उसको रोता देख मैं भी रोने लगा। ये एक पल था, शायद सबसे सुन्दर पल। मैं रो रहा था और खुश था कि रो रहा हूँ, कि रो पा रहा हूँ, ममता के लिए। जैसे मैं ममता बन गया हूँ उस पल में, और सच में फिर हम दोनों एक हो गए। उस शाम रसोई की बगल वाली कोठरी में फूल झरे, खुशबू फ़ैली और हम एक होते रहे। मेरा मन तो बिलकुल नहीं था उसे जाने देने का लेकिन वो माँ थी न सो बच्चो के लिए घर गयी। उसके जाने के बाद भी मैं देर रात तक उसकी खुशबू को महसूस करता रहा। अगले दिन वो फिर आयी। अबकी बच्चों को साथ लेकर। अकेले आने से लोग शक करते। बच्चों के लिए टीवी चला कर हम फिर उसी कमरे में आए। उस दिन मुझे लगा कि ममता आसमान हो गयी है और मैं कोई चिड़िया। मैं उसके आसमान में उड़ता रहा। वो समुन्द्र बन गयी और मैं नदी। उसमे मैं घुलता रहा| जाते वक्त वो मेरे सीने से लगी, मेरी धड़कन थोड़ी देर सुनती रही और फिर उसने एक बात कही- ‘तुम मेरा मायका हो’
ममता को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि वह जिस संसार में रहती है, वहाँ उसके लिए विकल्प सीमित हैं। परिवार, पड़ोस और समाज, तीनों जगह वह पहले से ही संदेह और निगरानी के घेरे में है। उसका जीवन किसी स्वतंत्र व्यक्ति का जीवन नहीं, बल्कि एक ऐसी स्त्री का जीवन है जिसकी पहचान लगातार दूसरों की दृष्टि से तय होती है। ऐसे वातावरण में अटल के साथ उसका संबंध केवल प्रेम या आकर्षण नहीं, बल्कि एक संभावित मुक्ति का क्षण है, ऐसा क्षण जहाँ वह पहली बार स्वयं को केवल ‘स्त्री’ नहीं, बल्कि ‘व्यक्ति’ के रूप में अनुभव करती है। इसीलिए, ममता द्वारा वाचक से यह कहना कि “तुम मेरा मायका हो”, कहानी के सर्वाधिक निर्णायक क्षणों में एक है। ‘मायका’ यहाँ प्रेम का पर्याय नहीं, बल्कि सुरक्षा और आत्मीयता का संकेत है। ममता पुरुष में घर खोजती है, इसलिए नहीं कि वह निर्भर है, बल्कि इसलिए कि समाज ने उसके लिए कोई और सुरक्षित संरचना छोड़ी ही नहीं है। ‘मायका’ शब्द यहाँ सुरक्षा, संरक्षण और बिना शर्त स्वीकार्यता का भाववाचक सम्बोधन है। ममता के लिए अटल एक ऐसा भावनात्मक स्थल बन चुका था, जहाँ वह स्वयं को सुरक्षित, संपूर्ण और स्वीकार्य महसूस करती थी। इन अर्थों में यह कथन ममता के संपूर्ण भावनात्मक निवेश का उद्घोष है।
जब वाचक का अनिर्णय, उसका पीछे हटना और प्रमिला से विवाह क्रमवार घटित होते हैं, तो ममता के भीतर जन्मा सुरक्षा-बोध पूरी तरह नष्ट हो जाता है। यही वह क्षण है जहाँ उसका मातृत्व असहनीय बोझ में बदल जाता है। बच्चे अब भविष्य नहीं, बल्कि उसी दुख और उपेक्षा की निरंतरता प्रतीत होने लगते हैं, जिसमें वह स्वयं जी रही है। ममता का मानसिक विघटन इसी बिंदु से शुरू होता है। उसके जीवन में पहले से ही परिवार, समाज और पड़ोस की उपेक्षा मौजूद है। उस पर ‘चरित्र’, ‘मर्यादा’ और ‘त्याग’ के सामाजिक दबाव हैं। वाचक के साथ संबंध में उसे पहली बार सुरक्षा और आत्मीयता का अनुभव हुआ था। जब वह भी छिन जाता है, तो ममता पूर्णतः असुरक्षित, परित्यक्त और अर्थहीन स्थिति में पहुँच जाती है। उसके बाद बच्चों को खत्म करने और स्वयं को खत्म करने का प्रयास किसी निजी पागलपन का परिणाम नहीं है, बल्कि एक ऐसी सामाजिक स्थिति की परिणति है जहाँ स्त्री के पास कोई वैध सहारा नहीं बचता। इस तरह यह कहानी अपराध की अवधारणा को पुनर्परिभाषित करती है। ममता का कृत्य नैतिक रूप से अस्वीकार्य है, लेकिन कहानी उसे ‘अपराधी’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘उपेक्षा की शिकार’ के रूप में प्रस्तुत करती है। उसका अपराध व्यक्तिगत विचलन नहीं, बल्कि सामाजिक असफलता का लक्षण है। समाज, परिवार और प्रेम- तीनों संस्थाएँ उसे विफल कर देती हैं। यह दृष्टिकोण कहानी को संवेदनशील तो बनाता ही है पाठक को सहज नैतिक निर्णयों से आगे सोचने के लिए भी बाध्य करता है। यही इस कहानी की सबसे असुविधाजनक उपलब्धि है।
इस संदर्भ में यह भी गौर किया जाना चाहिए कि अन्ना की आत्महत्या एक सार्वजनिक, प्रतीकात्मक कृत्य है। ममता का अपराध निजी है। अन्ना समाज से टकराती है; ममता समाज से बाहर हो चुकी है। फिर भी, दोनों स्त्रियों को जोड़ने वाला सूत्र एक ही है- पुरुषों की निर्णयात्मक सुविधा और स्त्री की नियति। अन्ना और ममता दोनों ही के जीवन में पुरुष आगे बढ़ जाते हैं, स्त्री पीछे छूट जाती है, अपराध के साथ।
इस पूरे पाठ, संवाद और आलोचना का केंद्रीय प्रश्न यही है- स्त्री-अपराध आखिर किसका अपराध है? क्या उस स्त्री का, जो टूट जाती है? या उस समाज का, जो पहले देखना, फिर सुनना और अंततः जिम्मेदारी लेना छोड़ देता है?
‘आह लेकिन कौन जाने…’ की ममता और ‘अन्ना कारेनिना’ की अन्ना हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचातीं। वे हमें केवल उस रास्ते पर खड़ा कर देती हैं, जहाँ से अपराध एक कृत्य नहीं, बल्कि बार-बार दुहराई जानेवाली प्रक्रिया की तरह दिखाई देने लगता है- उपेक्षा, चुप्पी और चयनित सुविधा की प्रक्रिया।
जिन लोगों ने कहानी नहीं पढ़ी है, उनके लिए यह बताना जरूरी है कि कहानी वर्तमान में वाचक अटल के ममता तक पहुँचने से शुरू होती है, जहाँ ममता घृणा और आक्रोश में उसके मुँह पर थूक देती है। इससे अटल के भीतर अतीत की स्मृतियाँ जागती हैं।
अतीत में पता चलता है कि अटल एक ग्रामीण ‘क्वैक’ है और ममता उसके बचपन के मित्र की पत्नी है, जिसका पति परदेस में नौकरी करता है और वह गाँव में उपेक्षित जीवन जी रही है। बच्चों के इलाज के दौरान दोनों के बीच भावनात्मक और शारीरिक संबंध बनता है। बाद में अटल सामाजिक दबावों के कारण उससे दूरी बना लेता है और प्रमिला से विवाह कर लेता है।
ममता अकेली पड़ जाती है और एक दिन बच्चों को मारकर आत्महत्या का प्रयास करती है, पर पकड़ ली जाती है। कहानी पुनः वर्तमान की रात में लौटती है, जहाँ सपने में ममता फिर अटल के सामने आती है और उसके मुँह पर थूक देती है।
इस कथासार में अटल का पारिवारिक जीवन, उसके माँ-पिता के संबंध आदि पूरी तरह छूट गए है। कहानी पढ़ने के बाद ही इसके असली पाठ-सुख तक पहुंचा जा सकता है। बहरहाल कथासार के माध्यम से यह तो स्पष्ट है कि कहानी में ममता द्वारा वाचक के मुंह पर थूकने का प्रसंग दो बार उभरता है- पहली बार आरंभ में ‘आज का दिन’ खंड में, और दूसरी बार अंत में ‘आज की रात’ खंड में। यदि इसे प्रतीकात्मक दृष्टि से देखें, तो स्वप्न खंड में थूकने का प्रसंग अत्यधिक प्रभावशाली और अर्थपूर्ण है। यहाँ थूकना केवल शारीरिक क्रिया नहीं रहता, बल्कि वाचक के अवचेतन में अंतर्निहित अपराधबोध, शर्म और आंतरिक संघर्ष का अभिव्यक्तिकरण बन जाता है। इसके विपरीत कहानी के प्रारंभिक हिस्से में थूकने का दृश्य, कहानी में घटनात्मक रूप से मौजूद है, जो अटल के प्रति ममता की घृणा को दिखाता है। इस रूप में यह इस प्रसंग के अर्थ-प्रभाव को संकुचित कर देता है। क्या ही अच्छा होता कि पहले खंड में यह प्रसंग आता ही नहीं, और यदि आता भी तो यथार्थ की तरह नहीं, अटल की आशंका या आभास की तरह। तब यह वाचक के आंतरिक अपराधबोध की प्रबलता को अधिक सूक्ष्म और प्रभावशाली ढंग से पाठक तक पहुँचाता। कहने की जरूरत नहीं कि घृणा के प्रकटीकरण की तुलना में अवचेतन में स्थित अपराधबोध और प्रत्याशित दंड की आशंका ज्यादा प्रभावशाली होती। इस दृष्टि से, कहानी की प्रतीकात्मक शक्ति और मनोवैज्ञानिक गहराई दोनों स्वप्न खंड में अधिक सुसंगत और सशक्त प्रतीत होती हैं। थूकना, पहले खंड में, केवल एक शारीरिक क्रिया के रूप में मौजूद है। इस कारण पाठक का ध्यान सीधे घटना की सतही वास्तविकता पर जाता है, जबकि स्वप्न में इसका अर्थ वाचक के भीतर के मनोवैज्ञानिक तनाव, आत्म-संदेह और अपराधबोध की ओर संकेत करता है। थूकने के प्रसंग की आवृत्ति को देखकर ऐसा लगता है कि लेखक ने फ्लैशबैक से निकलकर वर्तमान में वापस आने की युक्ति की तरह इसका प्रयोग किया है। पर इस क्रम में, उसे यह याद नहीं रहता कि प्रथम दृश्य जहाँ दिन का है, वहीं अंतिम दृश्य रात और स्वप्न का। अतः यहाँ फ्लैशबैक से वापस आने की यह युक्ति युक्तिसंगत नहीं दिखती।
अटल और ममता का असफल प्रेम संबंध केवल दो व्यक्तियों के बीच का भावनात्मक संकट नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सामाजिक और मानसिक संरचना का प्रतिफल है, जहाँ व्यक्तिगत निर्णय, सामाजिक अपेक्षाएँ और संस्थागत उपेक्षा मिलकर अपराध, अपराधबोध और आत्म-विनाश की स्थितियाँ रचते हैं। कहानी का महत्व इसी बिंदु पर स्थापित होता है कि वह अपराध को किसी एक पात्र के नैतिक पतन के रूप में नहीं, बल्कि एक पूरी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप देखने का आग्रह करती है।
‘आह लेकिन कौन जाने…’ का पुरुष वाचक अपने समय और सामाजिक संरचना से मुक्त नहीं है। उसकी दृष्टि में पितृसत्तात्मक सहजताएँ, आत्मकेन्द्रिकता और निर्णयहीनता मौजूद हैं। वह स्त्रियों को समझना चाहता है, पर अक्सर उन्हें अपने भावनात्मक संकट के संदर्भ में ही देखता है; इसी कारण वह ‘आदर्श पुरुष’ नहीं बन पाता। किंतु इसी असफलता के भीतर उसकी संवेदना का मूल्य निहित है। कहानी में वह स्त्री के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है, पर यह पक्षधरता अनिर्णायक है। वह माँ की चुप्पी, प्रमिला की व्यावहारिकता और ममता की आकांक्षा को हल्के में नहीं लेता। वह स्त्री के दुख, त्याग और असंतोष को पहचानता है, लेकिन विडंबना यह है कि इसे व्यवहार में नहीं बदल पाता। यही कारण है कि उसकी संवेदना अपराधबोध में रूपांतरित हो जाती है।
स्त्री-संवेदी पुरुष की निर्मिति केवल समझ से नहीं, बल्कि हस्तक्षेप और जोखिम से होती है। इस कसौटी पर यह वाचक विफल है, पर यही विफलता उसे विश्वसनीय भी बनाती है। वह न नायक है, न खलनायक, बल्कि एक संक्रमणकालीन पुरुष है- पुराने ढाँचे में खड़ा, पर नए नैतिक बोध की ओर झुका हुआ। यह पुरुष-वाचक स्त्री की ओर से बोलने का दावा नहीं करता; वह अपनी असफलता, अपराधबोध और नैतिक पलायन को सामने रखता है। वाचक का यह आत्मालोचकीय व्यवहार कहानी की एक वैचारिक उपलब्धि है। एक स्त्री लेखक द्वारा स्त्री-जीवन की त्रासदी दिखाने वाली कहानी का वाचक पुरुष को बनाने की रचनात्मक रणनीति के निहितार्थों को भी इससे समझा जा सकता है।
एक बार फिर इस कहानी की औपन्यासिक संरचना के प्रश्न पर लौटते हैं। गौरतलब है कि ‘आह लेकिन कौन जाने…’ का कथ्य जीवन के विस्तृत समय और स्मृति से निर्मित है, जबकि उसका कथन कहानी की सघनता में नियंत्रित रहता है। यही संतुलन इसे औपन्यासिक होते हुए भी कहानी बनाए रखता है। कालानुक्रम के आधार पर घटना शृंखला यहाँ सीमित है, पर उसके भीतर निहित विमर्श परतदार है। वर्तमान में अटल का ममता से सामना, अतीत की स्मृतियाँ और रात का स्वप्न, सब मिलकर कथा-समय को विस्तार देते हैं, लेकिन यह विस्तार घटनाओं का नहीं, चेतना का है। इसलिए पात्रों की बहुलता के बावजूद कथा उपन्यास की तरह फैलती नहीं, बल्कि कहानी की तरह भीतर की ओर गहराती है। कहानी का समय रैखिक नहीं, चक्रीय है। वर्तमान बार-बार अतीत में फिसलता है और अंततः उसी क्षण में लौट आता है जहाँ से कथा शुरू हुई थी। कथा-समय को विस्तारित न कर उसे घुमाकर अर्थ पैदा करने की यह पुनरावृत्त गति कहानी को विखंडित होने से बचाती है।
पात्रों की बहुलता को देखते हुए इस कहानी में उपन्यास होने की संभावना दिखाई पड़ती है, लेकिन लेखक एक सुनियोजित रचनात्मक निर्णय के साथ इसे कहानी के प्रभाव क्षेत्र में ही सीमित रखता है। अटल के माता पिता, पलटू, उसकी पत्नी और प्रमिला की महत्त्वपूर्ण उपस्थिति के बावजूद उन्हें स्वतंत्र समानांतर कथा-रेखाओं की तरह विकसित नहीं करना उसी का परिणाम है। वे कथावाचक की चेतना में नैतिक और भावनात्मक दबाव के रूप में उपस्थित हैं, पर वे कथा को आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि उसके अर्थ को तीव्र करते हैं। ममता संभावना और आकांक्षा का प्रतीक है, प्रमिला स्थिरता और सामाजिक यथार्थ का, माँ चुप्पी और परंपरा का, और पलटू की पत्नी वर्गीय उपेक्षा का। यह चरित्र-बहुलता औपन्यासिक है, पर लेखक ने नियोजित रूप से उसका उपयोग कहानी की नैरेटिव अर्थव्यवस्था के भीतर किया है।
ममता की त्रासदी कोई क्लाइमैक्स नहीं, बल्कि एक उद्घाटन है, जो वाचक को अपराधबोध और अनिर्णय में छोड़ देता है। अपने खुले अंत के बावजूद अर्थ की दृष्टि से कहानी पूर्ण है, क्योंकि कथा अपने केंद्रीय भाव को पाठकों तक संप्रेषित करने में सफल है। यही कारण है कि अपनी औपन्यासिक संरचना के बावजूद ‘आह लेकिन कौन जाने…’ एक मुकम्मल कहानी है। यह उपन्यास की तरह जीवन की जटिलता को देखती है, लेकिन कहानी की तरह उसे एक नियंत्रित, सघन और अर्थपूर्ण कथात्मक फ्रेम में बाँध देती है। इसका नैरेटिव फैलता नहीं, बल्कि लौट-लौटकर स्वयं को गहरा करता है, और यही इसकी संरचनात्मक उपलब्धि है। प्रीति प्रकाश यहाँ न तो कहानी की सीमाओं को नकारती हैं, न उपन्यास बनने की आकांक्षा पूरी करती हैं। बल्कि यह दिखाती हैं कि समकालीन जीवन को व्यक्त करने के लिए आज कहानी में औपन्यासिक संरचना और चेतना की आवश्यकता है, पर उसका उपन्यास बन जाना अनिवार्य नहीं। लेकिन, ‘आह लेकिन कौन जाने…’ के कहानी के रूप में मुकम्मल होने का आशय यह नहीं है कि इस कहानी में औपन्यासिक विस्तार की संभावनाएं नहीं हैं।


राकेश बिहारी का यह आलेख केवल एक कहानी की समीक्षा नहीं, बल्कि समकालीन हिंदी कथा-साहित्य की विधागत, वैचारिक और संवेदनात्मक जटिलताओं पर गंभीर विमर्श भी है, जिसमें वे प्रीति प्रकाश की कहानी ‘आह लेकिन कौन जाने…’ को केंद्र में रखकर कहानी और उपन्यास के बदलते पारस्परिक संबंध, कथा-समय की संरचना, स्मृति की भूमिका और औपन्यासिक संभावनाओं जैसे प्रश्नों को गहराई से खोलते हैं। ममता के चरित्र को ‘अपराधिनी’ नहीं, बल्कि सामाजिक उपेक्षा की अंतिम कड़ी के रूप में देखने का उनका आग्रह इस समीक्षा को विशुद्ध नैतिक निर्णयों से ऊपर उठाकर सामाजिक-संरचनात्मक आलोचना के स्तर पर ले जाता है। अटल के जटिल, अपराधबोध से भरे पुरुष-वाचक की विवेचना, स्त्री-अनुभव को पुरुष चेतना के भीतर से देखने की रचनात्मक रणनीति को रेखांकित करती है। अन्ना कारेनिना और ममता के बीच स्थापित स्वप्न-संवाद आलोचना को एक सृजनात्मक आयाम देता है, जहाँ तुलनात्मक साहित्य, मनोवैज्ञानिक यथार्थ और स्त्री-अपराध की सामाजिक व्याख्या एक साथ उपस्थित होते हैं। विशेष रूप से ‘थूकने’ के प्रसंग पर किया गया प्रतीकात्मक विश्लेषण कहानी की संरचनात्मक कमजोरियों की ओर संकेत करते हुए भी उसकी मनोवैज्ञानिक गहराई को उभारता है। कुल मिलाकर यह समीक्षा कहानी को पुनर्पाठ के लिए प्रेरित करती है और यह स्थापित करती है कि ‘आह लेकिन कौन जाने…’ केवल एक त्रासदी की कथा नहीं, बल्कि उपेक्षा, चुप्पी और पितृसत्तात्मक सुविधा से निर्मित अपराध की सामूहिक प्रक्रिया का दस्तावेज़ है।
आलेख काफी संजीदगी और बारीकी से कहानी को परत दर परत खोलता है।। मैंने कहानी नहीं पढ़ी है। इस ओर चंद्रकला त्रिपाठी जी और शिवमूर्ति जी के वक्तव्य सुने थे ऑनलाइन चर्चा में। जितना कहानी समझ पाई। उस परिप्रेक्ष्य में यह आलेख काफी अच्छा लगा। और देखना सुनना बंद करना अपराध की जिस भूमि को तैयार करता है, उस प्रक्रिया के प्रति आलेख बहुत अच्छे से संवेदित करता है।।
राकेश जी को पढ़ती रही हूं। उनकी समीक्षा पढ़कर कहानियां पढ़ने की ललक बढ़ जाती है। मैंने इनमें से किसी कहानी को नहीं पढ़ा है। पर आलेख के बहाने वे जीवन और उसके आस पास की गहरी पड़ताल करते हैं। कहानियों पर उनकी पकड़ बहुत गहरी है। वे कहानियों की नब्ज़ पर अपनी उंगलियां रख कर पूरे परिदृश्य का आंकलन कर लेते हैं। हिन्दी कहानियों में जो कुछ लिखा जा रहा है अगर समझना हो तो राकेश जी का आलेख अपने समय का जरूरी दस्तावेज है। शुक्रिया राकेश जी साझा करने के लिए
कहानी की बारीकियों को उकेरता सुव्यवस्थित, सुचिंतित आलेख।