यह बात मुझे बहुत बाद में पता चली कि हर शहर में एक बाज़ार ऐसा भी होता है। हमारे शहर में वह जगह दरगाह वाली सड़क से मुड़कर पीछे की तरफ़ पड़ती है, जहाँ शाम जल्दी उतर आती है।
पहली बार मैं वहाँ यूँ ही पहुँच गई थी, जैसे अक्सर हम अपनी बारहा ज़रूरी- ग़ैर ज़रूरी जगहों पर यूँ ही पहुँच जाते हैं।
भीतर के नज़ारे पर सरसरी नज़र डाली तो एकबारगी लगा पुरानी चीज़ों का बाज़ार है या फिर चोर बाज़ार। ज्यादा पास गई तो देखा, वहाँ दूसरे बाजारों की तरह बहुत सारी वस्तुएँ नहीं है, सारी दुकानें में बस एक ही चीज रखी है- अलग-अलग आकार के, अलग-अलग रंगों के मर्तबान।
मैंने जरा गौर से देखा, अरे! ये सारे मर्तबान तो खाली हैं और खाली मर्तबानों से भरीं उन दुकानों पर कोई दुकानदार नहीं है। हर दुकान पर एक बोर्ड टँगा है जिस पर एक ही वाक्य लिखा है- स्टॉक खत्म है, बेचने वालों का स्वागत है।’
‘ये पक्का चोर बाज़ार ही है।’ मेरा शक यकीन में बदलने लगा।
अचानक मेरी दुकान गली की सबसे आखिरी दुकान पर पड़ी जिस पर चढ़ी कालिख रतजगों की पोती हुई सी है। दुकान उतनी ही पुरानी लग रही है जितनी उस पर बैठी दुकानदार है।
मैं उधर ही चल पड़ी, दुकान भी अपनी मालकिन की तरह पतली और नाटी है। दुकान में रखे मर्तबान खाली नहीं हैं। हर मर्तबान में कागज़ की एक छोटी पर्ची रखी थी जिन पर बूढ़ी की झुर्रियों के से अक्षरों में कोई वाक्य लिखा हुआ है।
बूढ़ी औरत ने मुझे देख कर अपने स्कार्फ की कोर आँखों से हटाई, माथे पर पड़े बल सँवारे और मुस्कराई।
“सेकंड हैंड लेना है या ज्यादा पुराना माल?” बूढ़ी की आवाज में एक खम है और थोड़ी सी जवानी भी।
“लेकिन मुझे मालूम तो हो कि ये कौन सा बाजार है और यहाँ इन मर्तबानों में क्या-क्या मिलता है।
“जब आ ही गई हो तो जान भी लो। वैसे सयाने लोग यहाँ कम ही आते हैं, भला हुआ तुम आ गई।’ बूढ़ी की आवाज में कुछ पर्दे सरसरा रहे थे और आँखों में सरगोशियों की तितलियाँ उड़ रही थीं।
“हे भगवान, क्या ये चोर बाजार है?” और बूढ़ी अपने निर्दन्त मुँह से हँस दी “सपने चोरी से ही बिकते हैं लाडो।”
‘हैं! सपने बिकते हैं? या तो ये बूढ़ी बावली है या छँटी हुई ठगिनी।’ मैं थोड़ा सा डर गई।
“हाँ री भोली, ये सेकिंड हैंड सपनों का बाजार है, जहाँ सपने चोरी से बेचे-खरीदे जाते हैं। बाहर लटक रहा बोर्ड नहीं पढ़ा क्या?”
मैंने दुकान के ऊपर लटक रही बोसीदा पट्टी की ओर देखा जिस पर लिखा था- यहाँ सेकिंड हैंड सपने चोखे दामों पर मिलते हैं।
“आप सपने बेचती हैं वो भी सेकिंड हैंड?” मैंने जबरदस्ती हसीन बनी बूढ़ी से पूछा।
“हाँ, यहाँ बिकने वाला कोई सपना नया नहीं होता। कौन नहीं जानता कि नए सपने देखते सब हैं पर उनमें से बहुत से सपने छोड़ दिए जाते हैं। कुछ खो दिए जाते हैं और बारहा किसी को सौंप भी दिए जाते हैं।” बूढ़ी के गहरे काजल के बीच उसकी चुन्धी आँखों में गहरी बीनाई थी गोया उसे इलहाम हुआ हो।
‘अरे हाँ न!’ उस पल मुझे पहली बार लगा ‘सारे सपने टूटते नहीं हैं, कुछ सपने मालिक भी बदल लेते हैं।’
“वैसे भी ज्यादातर लोग यहाँ सपने खरीदने आते हैं। गली में घुसते ही डरते हैं, फिर दुकान में मर्तबान देखते हुए ललचाते हैं। हिम्मत करके अपने मर्तबान की पर्ची पढते हुए सामने आए सपने को देखकर दोबारा डरते हैं और उसे यहीं पटककर भाग खड़े होते हैं।” बूढ़ी जादूगरनी की आँखों में उदासी है।
मैंने दुकान की हर जिंस को ध्यान से देखा, पर दुकान में छोटे-बड़े मर्तबानों के सिवा वो छोटी सी बूढ़ी और एक कोने में रखी एक बहुत बड़ी सी छतरी के अलावा कोई नहीं था। हाँ, छतरी की बन्द तहों के बीच से बहुत कुछ झाँक रहा था, मैं उनमें केवल तीन चीजें ही चीन्ह पाई। वो एक झिंगली सी कपड़े की गुड़िया, डेढ़ जोड़ी घुंघरुओं की पट्टी और कोने से फटा हुआ एक लिफाफा, जिस पर बैंगनी स्याही से दिल बना हुआ है।
‘ये छतरी इस गुड़िया सी बुढ़िया से हिलती भी होगी।’ मुझे सोचकर ही हँसी आ गई।
“हँस मत लड़की, वो छतरी मैं ही बरतती हूँ।” बूढ़ी ने टोका और मैं मर्तबानों में रखी पर्चियों की तरह सिलवटों से भरे अपने चेहरे को मेरी ओर से फेर लिया।
शाम अब पूरी तरह उतर आई थी और अपने साथ लाई ठंडक के साथ मिलकर मर्तबानों के काँच पर धुंध जमाने लगी थी। अब बूढ़ी की आँखें उस धुंध के पार कुछ खोज रही थीं।
मैंने एक मर्तबान उठाया ही था कि बूढ़ी ने मेरा हाथ थाम लिया।
“रहने दे लाडो,” उसने धीमे से कहा,
“तू यहाँ खरीदने नहीं आई है।” मैं चौंकी।
“तो क्या बेचने आई हूँ?” मेरी आवाज में चोटिल तुर्शी थी।
बूढ़ी बोली नहीं, मुस्कराई। काले कोटरों में छुपी उसकी आँखों में जैसे कोई पुराना राज चमक उठा था। मेरा बहस करने का मन नहीं था। मैं भी बूढ़ी की तरह चुप होकर मर्तबानों को छुए बिना उनमें रखी पर्चियाँ पढ़ने लगी।
एक पर्ची पर लिखा है- किसी को बताने से पहले छोड़ दिया गया सपना।
दूसरी पर लिखा है- वो इच्छा जो माँ से कभी न कह सकी।
इसी तरह एक पर लिखा है- मुझे पापा की परी नहीं मम्मा जैसी डायन बनना है।
“क्या है ये सब?” पूछते हुए मेरी निगाह एक मोरपंखी मर्तबान पर अटक गई। मर्तबान मन मोहने जितना सुंदर लेकिन किनारों पर दो जगह से खिरा हुआ था गोया किसी जिद्दी अड़ियल सपने ने भीतर डाले जाते वक्त विरोध में खूब हंगामा मचाया हो। मर्तबान के मोरपंखी गले से चलकर तले तक पहुंचती बारीक लकीर भी इस बात की तस्दीक कर रही थी कि सपने ने उसे चटकने की सीमा तक सताया है।
“इन सब में सपने रखे हैं, अभी नहीं दिख रहे हैं न? दिखेंगे भी नहीं। पर घबरा मत जब तू अपनी पसंद का कोई चुन लेगी तब वो तुझे दिखेगा। ये ले, मुझे लगता है ये तेरे सपनों का मर्तबान है।”
मेरी ओर वही उंगल भर का मर्तबान सरकाती वो बूढ़ी मुझे अब पागल नहीं जादूगरनी सबरीना स्पेलमैन लग रही थी। वो भी तो इसी की तरह दुनिया और जादुई दुनिया के बीच के धुंधले मोड़ पर ग्रीनडेल शहर में रहती है जहाँ यहाँ की तरह धुंध छाई रहती है और पुरानी, रहस्यमयी दुकानें हैं।
पर यह सबरीना स्पैलमैन नहीं है इसलिए झाड़ू पर नहीं इस छतरी पर बैठ कर जाती होगी और कर्णपिशाची की तरह लोगों के कान में इस जगह आने का टोना फूँक आती होगी। मैं अब वहाँ से भाग जाना चाहती थी।
“पर मुझे तो इसमें कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा बूढ़ी सुंदरी।”
“डर मत छोकरी, क्योंकि तू अब अपने सपने देखे बगैर नहीं भाग सकेगी। मैं भगाऊँ तब भी नहीं। चल अब अपना मर्तबान चुन। बूढी अब जरा व्यस्त और उतावली है।
“तुम्हें मालूम तो है, फिर क्यों पूछ रही हो?” मुझे ताव आ गया।
“तो उठा ले इसे, पर ध्यान से उठाना। इसमें तेरे स्वप्न-शिशुओं की बेरंग पातियाँ हैं जिन पर तूने इतने टिकट नहीं चिपकाए थे कि मंजिल पर पहुंच सकें। तो मेरी जान! न ये अपनी मंजिल पर जा सके और न ही तेरे पास लौट आ सके।”
जिस क्षण बुढ़िया सन्निपात मारी सी ये सब बुदबुदा रही थी उसी क्षण मर्तबान की महीन लकीर से एक-एक कर तीन पर्चियाँ निकलीं और मेरी बरौनियों से आ चिपकीं।
‘मुझे डॉ बनना है, बहुत बड़ी डॉ।’ ये गुलाबी पर्ची के शब्द थे। मैं हँस पड़ी और मेरे साथ बूढ़ी जादूगरनी भी- “ये तेरा वो सपना है जो तूने किसी को जबरदस्ती सौंप दिया है।”
‘इश्क़ की दीवानगी रहती साँस तक बहती रहे।’ ये उस पर्ची पर लिखा था जो एक बहती हुई नदी के अचानक सूखे पर, वहाँ की धरती की शक्ल की थी- पीली और सूख के पपड़ाई हुई। मेरे मन में एक टीस सी उठी, जो उस जादूगरनी ने तुरन्त पढ़ ली “ये वो सपना है जो उड़ जाना चाहता है।” उस के शब्दों में दुख, करुणा या तंज जाने क्या था।
‘एक दिन मैं सब कुछ ठीक कर लूँगी।’ तीसरी पर्ची पर हल्दी की छाप जैसे रंग की लिखावट थी। “इसी पर्ची ने मर्तबान को घायल किया है।” बूढ़ी ने अपनी रहस्यमयी छतरी को सहलाते हुए कहा और छतरी से एक पर्ची निकल कर मेरे हाथों से लग गई।
“ये बेईमानी है, तुम ने कहा था मर्तबान की पर्चियों के सपने मेरे हैं, अब तन्तर मन्तर से इस छाते से पर्चियाँ निकालने लगी। झूठी, मक्कार चुड़ैल, मुझे नहीं चाहिए एक भी पर्ची। कोई सपना नहीं है मेरा, मुझे नहीं लेना कोई सपना। सपनों की तिजारत नहीं होती, समझी न। सपनों की तिजारत नहीं होती।
सपनों की तिजारत नहीं होती…..”
“सिप्पी, क्या हुआ? जागो सिप्पी, यहाँ कोई नहीं है।” बुरी तरह चीखती हुई सिप्पी कोअक्षय की आवाज और हाथ दोनों झिंझोड़ रहे थे।
“लगता है सपने में डर गई थी। लो पानी पी लो।”
कुछ ही देर में अक्षय सो गया लेकिन सिप्पी को नींद नहीं आई। कैसा तो उलजुलूल सपना था। क्या अर्थ है इसका। धत्त, ऐसे बेवकूफाना हैरी पॉटर सपनों का भी कोई अर्थ होता है क्या। लेकिन मां कहती हैं सपने बेवजह नहीं आते। पर सेकंड हैंड सपने और सपनों को….’ सोचते हुए सिप्पी की सुबह हो गई।
“गुड मॉर्निंग मम्मा” सुबह जब सिप्पी नाश्ते की ट्रे लिए लॉन में बैठे अक्षय की ओर जा रही थी, वृंदा के कमरे से आवाज़ आई।
‘ये लड़की फिर भाग आई!’ सिप्पी की त्यौरियों में एक साथ कई बल पड़ गए। डाइनिंग टेबल पर ट्रे पटक रख कर सिप्पी कमरे में घुसी, लेकिन वहाँ वृंदा की मोटी-मोटी मेडिकल की किताबों के सिवा कोई नहीं था।
शायद उसे ही भ्रम हुआ हो, सोचती सिप्पी पलटी ही थी कि उसकी नज़र दीवार पर लटक रहे घुंघरुओं की जोड़ी पर पड़ी। धूल भरे, उदास और उपेक्षित घुंघरुओं को देखते ही सिप्पी की आँखों में रात का सपना फिर जाग गया – “ये तेरा वो सपना है जो तूने किसी को जबरदस्ती सौंप दिया है।”
“क्या सोच रहे हो?”अक्षय हमेशा का चुप्पा है पर आज सिप्पी को उसकी चुप्पी खल रही है।
“हूँ? कुछ नहीं, बस वही बिजनैस की उठापटक।” अक्षय हमेशा की तरह मुस्कराया। लेकिन आज सिप्पी को उसकी मुस्कान भी खल रही थी।
“आज वृंदा कहाँ चली गई इतनी जल्दी?” सिप्पी की कत्थई आँखें रास्ते पर घूम रही थीं।
“अरे, भूल गईं? कल शाम तुमने ही तो उसे केमिस्ट्री की कोचिंग के लिए प्रोफेसर जैमन से बात करने जाने के लिए कहा था।” अक्षय बोल ही रहा था कि वृंदा आ गई।
साँवली सलोनी, घुंघराले बालों और ऊँचे कद वाली वृंदा की बड़ी बड़ी आँखों में अठारह साल की किशोरी की चपलता की जगह एक उदास गम्भीरता है।
“कल शाम से पाँच बजे जाना होगा, फीस भी कल ही देना है”।” चम्मच से पोहे खोदती वृंदा को देखती सिप्पी को लगा उसके हाथ में चम्मच नहीं एक गुस्साई पर्ची है जो किसी भी तरह पोहों से दोस्ती नहीं करना चाहती।
“मैं तुम्हारे लिए ब्रेड बना देती हूँ।” सिप्पी उठने को हुई।
“रहने दो मम्मा, मैं पोहे खा लूँगी”
और सिप्पी को सुनाई दिया- “रहने दो मम्मा, उपमा होगा तब भी चम्मच तो नहीं बदल जाएगा।”
दोपहर जब अक्षय ऑफिस और वृंदा कॉलेज चले गए, सिप्पी ने अपनी आलमारी से वो गुलाबी बक्सा निकाला जिसमे कुछ चिट्ठियाँ अपनी महक खो कर सूखी सी रखी थीं और उनके नीचे एक फोटो जिसके घुंघराले बाल और गुलाबी रंगत बन्द कमरे के धुंधकले सी हो गई थी। बाकी नक्श भी बमुश्किल पहचान में आ रहे थे। सिप्पी देखती रही, फोटो धीरे धीरे एक कसमसाती हुई पर्ची में बदल रहा है।
“बीस साल कम नहीं होते, अब तो खुद को और मुझे मुक्त कर दो शिप्रा।”
बाथरूम में खड़ी सिप्पी बालटी के पानी में गुलाबी बक्से के सामानों के साथ खुद को भी ढीला होता देखती रही। फिर कागज की लुगदी के साथ दो मर्तबान बह गए।
रात जब सब सो गए, सिप्पी के एक आँसू ने अक्षय के कंधे से पूछा था।”अक्षय, मुझसे दोस्ती करोगे, मैं अकेले सब नहीं कर पा रही?”
“मैं हूँ न, तुम हरक्यूलिस बनना बंद तो करो।” अक्षय के हाथों ने सिप्पी के हाथों को जवाब दिया था।
फिर जब अक्षय भी सो गया, सिप्पी बॉलकनी के झूले पर बैठी एक-एक कर वे सारे मर्तबान खोल रही थी।
जाओ, कि तुम मेरे नहीं दूसरों के हिस्से के सपने थे। मैंने बेकार ही पकड़ कर रखे थे, सच कहूँ तो मैं भूल ही गई थी कि तुम्हारे साथ मुझे भी उसी कैद में रहना पड़ रहा है। अब जाओ जल्दी, तुम मुक्त होगे तभी मैं मुक्त हो सकूँगी। फिर मर्तबान में रखी उदास पर्चियाँ स्टेथिस्कोप, बन्द गुलाबी बक्सा और मोटे बैलेंस वाली बैंक की पासबुक की जगह घुँघरू, लूविरे संग्रहालय में मुस्कराती मोनालिसा और आजाद पतंग बने हुए एक-एक कर उसके हाथ से उड़ रहे थे।
सिप्पी को लगा इस बार जागते हुए ही वो उसी बाज़ार में वापस पहुँच गई है।
बूढ़ी वहीं बैठी थी। उसने धीरे-धीरे सारे मर्तबान बूढ़ी जादूगरनी के सामने रख दिए।
“ले,” मैंने कहा…
“अब अपनी बरौनियों पर अटक रही पर्ची भी तो पढ़ ले मेरी सुरतप्यारी।” बूढ़ी हँसी और खुद से ही मेरी पर्ची निकाल ली।
वहाँ एक शांत उजास था बस।

