प्रयागराजः इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपने पद से इस्तीफा देने के संबंध में एक पत्र लिखा है। गौरतलब है कि जस्टिस वर्मा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। बीते साल दिल्ली स्थित उनके आवास से जले हुए नोट बरामद हुए थे।
राष्ट्रपति को लिखे पत्र में जस्टिस वर्मा ने लिखा ” यद्यपि मैं आपके सम्मानित कार्यालय को उन कारणों से अवगत नहीं कराना चाहता जिनके कारण मुझे यह पत्र लिखना पड़ रहा है फिर भी अत्यंत दुख के साथ मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से तत्काल प्रभाव से अपना इस्तीफा दे रहा हूं।
इस कार्यालय में काम करना सम्मान की बात है। “
जस्टिस वर्मा के घर लगी थी आग
ज्ञात हो कि जस्टिस वर्मा के घर पर 14 मार्च को आग लगने की घटना हुई थी। इस दौरान दमकल कर्मियों को कथित तौर पर उनके आवास से नकदी बरामद हुई थी।
इस समय जस्टिस वर्मा और उनकी पत्नी मध्य प्रदेश में सफर कर रहे थे। जब उनके घर में आग लगी तो सिर्फ उनकी बेटी और वृद्ध मां ही थीं। इसके बाद आग में जलते नोटों के बंडल का वीडियो देखा गया।
इस घटना ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। हालांकि, वर्मा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया था और अपने खिलाफ साजिश बताया था। जब यह घटना घटी थी तो जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे।
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इसके बाद जस्टिस खन्ना ने आरोपों की आंतरिक जांच शुरू की और इसके लिए 22 मार्च को तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। जस्टिस वर्मा की जांच करने वाली आंतरिक समिति में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और कर्नाटक उच्च न्यायालय की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थे। समिति ने 25 मार्च को जांच शुरू की और 4 मई को मुख्य न्यायाधीश खन्ना को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजा गया
आंतरिक समिति की रिपोर्ट मिलने पर दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने या महाभियोग की कार्यवाही का सामना करने के लिए कहा। हालांकि, जस्टिस वर्मा द्वारा इस्तीफा देने से इनकार करने पर चीफ जस्टिस खन्ना ने न्यायाधीश को हटाने के लिए रिपोर्ट और उस पर न्यायाधीश की प्रतिक्रिया भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दी थी। इन आरोपों के बाद जस्टिस वर्मा को दिल्ली उच्च न्यायालय से उनके मूल उच्च न्यायालय (इलाहाबाद हाई कोर्ट) में वापस भेज दिया गया। आगे की कार्रवाई लंबित रहने तक उनका न्यायिक कार्य रोक दिया गया।
इसके बाद अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जस्टिस वर्मा को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की और उनके खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया।
इस समिति में शुरू में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, मद्रास उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बी वासुदेव आचार्य शामिल थे। बॉम्बे उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर ने जस्टिस श्रीवास्तव के रिटायरमेंट के बाद उनका स्थान लिया।
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इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इंकार किया था। अदालत ने फैसला दिया कि लोकसभा अध्यक्ष न्यायाधीश जांच समिति गठित करने के लिए कानूनी रूप से अधिकृत हैं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने फैसला सुनाया कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं हुआ है और याचिकाकर्ता मौलिक अधिकारों के किसी भी वर्तमान उल्लंघन को साबित करने में विफल रही है।

