न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सोमवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के रूप में पद की शपथ ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। उन्होंने न्यायमूर्ति बीआर गवई का स्थान लिया, जो रविवार को 65 वर्ष की आयु पूरी होने पर मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हुए।
परंपरा का पालन करते हुए, जस्टिस गवई ने वरिष्ठतम न्यायाधीश के रूप में जस्टिस सूर्यकांत को अपना उत्तराधिकारी नामित किया था। उनकी नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 124(2) के तहत की गई।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत लगभग 14 महीने तक इस सर्वोच्च न्यायिक पद पर रहेंगे और 9 फरवरी, 2027 को सेवानिवृत्त होंगे। शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनके कैबिनेट सहयोगी और कई विदेशी गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शपथ ग्रहण की तस्वीरें साझा करते हुए लिखा, जस्टिस सूर्यकांत के भारत के चीफ जस्टिस के तौर पर शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुआ। उनके आगे के कार्यकाल के लिए उन्हें शुभकामनाएं।
हरियाणा के सबसे युवा एडवोकेट जनरल से सुप्रीम कोर्ट तक सफर
जस्टिस सूर्यकांत का जन्म 10 फरवरी 1962 को हरियाणा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उन्होंने 1984 में हिसार से वकालत की शुरुआत की और अगले साल पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में स्थानांतरित होकर संवैधानिक, सिविल और सेवा संबंधी मामलों पर काम करना शुरू किया। वर्ष 2000 में वे हरियाणा के इतिहास में सबसे युवा एडवोकेट जनरल बने। 2001 में उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा मिला और 9 जनवरी 2004 को उन्हें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का स्थायी जज नियुक्त किया गया।
इसके बाद उनका करियर लगातार आगे बढ़ता गया। अक्टूबर 2018 में वे हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने और मई 2019 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत हुए। नवंबर 2024 से वे सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमिटी के चेयरमैन के रूप में कार्यरत हैं। इससे पहले वे नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (नाल्सा) की संचालन समिति में दो बार सदस्य रह चुके हैं और विभिन्न न्यायिक संस्थाओं से जुड़कर कार्य कर चुके हैं।
अपने कार्यकाल के दौरान जस्टिस सूर्यकांत कई ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा रहे। अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को बरकरार रखने वाली पीठ में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अलावा उनकी पीठ ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास भेजे गए विधेयकों पर समयसीमा तय करने से इंकार किया।
उन्होंने उस पीठ में भी हिस्सा लिया जिसने औपनिवेशिक काल के राजद्रोह कानून को रोकते हुए नए एफआईआर दर्ज करने पर अस्थायी रोक लगाई। भ्रष्टाचार के मामलों में कड़ा रुख दिखाते हुए उनकी अगुवाई वाली एक पीठ ने एनसीआर में बिल्डर्स, बैंकों और वित्तीय संस्थानों के गठजोड़ की सीबीआई जांच के आदेश दिए। वहीं एक अन्य पीठ देशभर में मतदाता सूची के संशोधन की विशेष निगरानी कर रही है।

