नई दिल्लीः पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजराइल के साथ ईरान के टकराव को करीब 20 दिन हो चुके हैं। इस युद्ध से शेयर बाजार में उथल-पुथल मचा हुआ है, क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ गई हैं और भारत को एलपीजी के संकट से दो-चार होना पड़ रहा है। लेकिन इन सबके बीच एक और वैश्विक खतरा मंडराने लगा है और वह है इंटरनेट कनेक्टिविटी की। ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध किए जाने से जहां दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है, वहीं अब आशंका जताई जा रही है कि यह संकट इंटरनेट सेवाओं तक भी फैल सकता है।
किन दो अहम समुद्री रास्तों पर मंडरा रहा खतरा?
दुनिया का लगभग सारा डेटा- ईमेल, बैंकिंग ट्रांजेक्शन से लेकर एआई सेवाओं तक- समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबल्स के जरिए चलता है, लेकिन वर्तमान में दो सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग निशाने पर हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान ने समुद्री बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं, जिससे शिपिंग और बीमा कंपनियों ने यातायात रोक दिया है।
वहीं दूसरी ओर, बाब अल-मंडेब (लाल सागर) में ईरान समर्थित हूती विद्रोही लगातार जहाजों पर हमले कर रहे हैं। इन दोनों रास्तों से होकर लगभग 20 प्रमुख सब-सी केबलें गुजरती हैं। लाल सागर से 17 केबल्स यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ती हैं, जबकि होर्मुज से गुजरने वाली AAE-1, FALCON और Tata-TGN Gulf जैसी केबल्स सीधे तौर पर भारत के अंतरराष्ट्रीय डेटा कनेक्शन को सहारा देती हैं।
ऐसे हालात के बीच टेक दिग्गजों के अरबों डॉलर भी दांव पर लगे हैं। अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी बड़ी कंपनियों ने हाल के वर्षों में संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में विशाल डेटा सेंटर बनाने के लिए भारी निवेश किया है। उनका लक्ष्य इस क्षेत्र को एआई का हब बनाना था और ये अंडरवॉटर केबलें ही इन डेटा सेंटर्स को दुनिया से जोड़ती हैं। अगर ये केबलें प्रभावित होती हैं, तो वैश्विक एआई ऑपरेशंस और क्लाउड सर्विसेज पूरी तरह ठप पड़ सकती हैं।
विशेषज्ञों को मानना है कि मौजूदा वक्त में सबसे बड़ी चुनौती क्षतिग्रस्त केबलों को ठीक करने की है। युद्ध क्षेत्र होने के कारण विशेष मरम्मत जहाज इन इलाकों में प्रवेश नहीं कर सकते। टेलीजीयोग्राफी के एलन मौल्डिन का कहना है कि सक्रिय सैन्य अभियानों वाले क्षेत्रों में कोई भी जहाज जोखिम नहीं उठाएगा। ऐसे में एक छोटा सा बारूदी सुरंग विस्फोट या जानबूझकर किया गया कटाव हफ्तों या महीनों तक इंटरनेट को धीमा या बंद कर सकता है, जिससे एक गंभीर ‘बॉटलनेक’ की स्थिति पैदा हो जाएगी।
भारत पर होगा असर
इसका भारत और पूरी दुनिया पर गहरा असर होने की संभावना है। भारत का विदेशों से होने वाला डेटा संपर्क काफी हद तक इन खाड़ी केबल्स पर निर्भर है, इसलिए केबल कटने की स्थिति में इंटरनेट की गति में भारी गिरावट और बैंकिंग सेवाओं में बाधा आ सकती है।
इससे पहले 2024 में हूती हमलों के दौरान भी लाल सागर की केबलें क्षतिग्रस्त हुई थीं, जिससे कई महाद्वीपों में इंटरनेट सुस्त पड़ा था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज और लाल सागर दोनों रास्ते एक साथ बंद होते हैं, तो यह एक ‘वैश्विक संचार संकट’ होगा। भौगोलिक दृष्टि से होर्मुज के संकरे रास्तों पर समुद्र की गहराई मात्र 200 फीट है, जिससे इन केबलों को नुकसान पहुँचाना बेहद आसान है।

