अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमलों के बाद पश्चिम एशिया में तनाव तेज हो गया है। इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दिखा। सोमवार को ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतों में 7 से 10 प्रतिशत तक उछाल दर्ज किया गया।
ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर 82.37 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो जनवरी 2025 के बाद का उच्चतम स्तर है। वहीं वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट भी 71 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो ब्रेंट 90 डॉलर से ऊपर और संघर्ष बढ़ने की स्थिति में 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है।
सबसे बड़ी चिंता ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को लेकर है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी मार्ग से होता है, जबकि भारत के लगभग 40 प्रतिशत कच्चे तेल भी इसी रास्ते से आयात होते हैं।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने इस अहम समुद्री मार्ग से आवाजाही पर रोक लगाने की घोषणा की, जिसके बाद सैकड़ों तेल टैंकर खाड़ी क्षेत्र में लंगर डाले खड़े हैं। कई शिपिंग कंपनियों ने एहतियातन जहाजों की आवाजाही रोक दी है। ग्रीस के शिपिंग मंत्रालय ने भी अपने जहाजों को फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी से दूर रहने की सलाह दी है।
हालांकि ईरान के विदेश मंत्री ने कहा है कि फिलहाल जलडमरूमध्य को बंद करने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन इस अनिश्चितता ने बाजार में घबराहट बढ़ा दी है।
तनाव के बीच ओपेक और उसके सहयोगी देशों (ओपेक+) ने अगले महीने से उत्पादन बढ़ाने पर सहमति जताई है। सऊदी अरब और रूस के नेतृत्व में 2.06 लाख बैरल प्रतिदिन अतिरिक्त उत्पादन जोड़ा जाएगा।
फिर भी विश्लेषकों का कहना है कि अधिकांश सदस्य देशों के पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता सीमित है, इसलिए यह कदम कीमतों को स्थायी रूप से काबू में रखने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल कीमतों में हर 5 प्रतिशत सालाना वृद्धि से प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में औसत महंगाई लगभग 0.1 प्रतिशत अंक बढ़ सकती है। अगर ब्रेंट 100 डॉलर तक पहुंचता है, तो वैश्विक महंगाई में 0.6 से 0.7 प्रतिशत अंक तक का इजाफा संभव है। इससे केंद्रीय बैंकों की ब्याज दरों में कटौती की योजना धीमी पड़ सकती है।
सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोना और चांदी में भी मांग बढ़ी है। बाजार फिलहाल कमाई आधारित ट्रेडिंग से हटकर ऑयल ड्रिवन रुख की ओर बढ़ता दिख रहा है।
भारत के लिए क्यों चिंता की बात?
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। विश्लेषण के मुताबिक, तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है। इससे व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा दोनों पर दबाव पड़ता है।
तेल महंगा होने का असर सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत और फिर महंगाई पर पड़ता है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक के लिए महंगाई को नियंत्रित रखने की रणनीति जटिल हो सकती है।
शेयर बाजार में भी जोखिम से बचने की प्रवृत्ति दिख रही है। विदेशी निवेशकों की निकासी, ऑटो, वित्तीय और ऊर्जा-आधारित क्षेत्रों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अगर पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति प्रभावित होती है, तो लॉजिस्टिक्स और समुद्री बीमा लागत भी बढ़ सकती है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतें ही नहीं, वैश्विक व्यापार संतुलन भी दबाव में आ सकता है।
युद्ध के साये में सेंसेक्स और निफ्टी भी धड़ाम

अमेरिका, इजराइल व ईरान के बीच शुरू हुए सीधे संघर्ष का सीधा असर सोमवार को भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। वैश्विक बाजारों से मिले नकारात्मक संकेतों और निवेशकों के बीच बढ़ते डर (Risk-off Sentiment) के चलते सप्ताह के पहले कारोबारी दिन बाजार की शुरुआत भारी गिरावट के साथ हुई। शुरुआती कारोबार में ही सेंसेक्स 891 अंक (1.10%) टूटकर 80,395 के स्तर पर आ गया, जबकि निफ्टी 268 अंक (1.07%) फिसलकर 24,909 पर पहुँच गया। बाजार की यह चौतरफा गिरावट केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रही; निफ्टी मिडकैप 100 में 1.14% और स्मॉलकैप 100 में 1.35% की कमी दर्ज की गई, जिससे छोटे और मझोले निवेशकों को भी भारी चपत लगी।
क्षेत्रवार प्रदर्शन की बात करें तो बाजार के सभी इंडेक्स लाल निशान में कारोबार करते दिखे। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और युद्ध के कारण ‘सप्लाई चेन’ प्रभावित होने की आशंका से रियल्टी (2.19%), ऑयल एंड गैस (1.81%) और ऑटो सेक्टर (1.35%) में सबसे ज्यादा बिकवाली देखी गई।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ती अनिश्चितता के कारण पूरे सत्र के दौरान निवेशकों का उत्साह ठंडा रह सकता है। खासकर एविएशन (विमानन) शेयरों पर दबाव सबसे ज्यादा है, क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात के प्रमुख रूटों पर उड़ानें निलंबित होने से परिचालन पर सीधा असर पड़ा है। इसके अलावा, सोमवार को निफ्टी की साप्ताहिक एक्सपायरी और होली की छुट्टियों से पहले बाजार में उतार-चढ़ाव और बढ़ सकता है।
आईएएनएस के अनुसार, तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि निफ्टी का चार्ट लगातार कमजोर हो रहा है और यह अपने 200-दिवसीय ईएमए (200-day EMA) के नीचे बंद हुआ है, जो बाजार में मंदी के हावी होने का संकेत है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है; एशियाई बाजारों में जापान का निक्केई 1.5% और हांगकांग का हैंग सेंग 1.68% तक गोता लगा चुका है। वहीं, पिछले सत्र में अमेरिकी बाजार (नैस्डैक और डाउ जोन्स) भी गिरावट के साथ बंद हुए थे। कच्चे तेल में 7% से ज्यादा के उछाल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए व्यापार घाटा बढ़ने का डर पैदा कर दिया है, जिससे विदेशी संस्थागत निवेशकों की निकासी तेज होने की संभावना है।
समाचार एजेंसी आईएएनएस इनपुट के साथ

