Friday, March 20, 2026
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2 लाख से अधिक भारतीय हर साल छोड़ रहे हैं नागरिकता, क्या है इसकी वजह?

संसद में एक सवाल के लिखित जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय ने बताया कि 2020 से अब तक 5 वर्षों में करीब 10 लाख लोग नागरिकता छोड़ चुके हैं।

नई दिल्लीः भारत में बीते 5 सालों में करीब 10 लाख लोगों ने नागरिकता छोड़ दी है। वहीं, साल 2022 से प्रति वर्ष 2 लाख से अधिक भारतीयों ने नागरिकता छोड़ी है। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से यह जानकारी दी गई।

संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, साल 2011 से 2024 के बीच में 20 लाख से अधिक लोगों ने नागरिकता छोड़ी है। इनमें से लगभग आधे ने बीते 5 वर्षों में कोविड महामारी के बाद नागरिकता छोड़ी है।

2 लाख भारतीय प्रति वर्ष छोड़ रहे हैं नागरिकता

इन 14 वर्षों के दौरान लगभग एक दशक तक यह प्रति वर्ष 1.2 लाख से 1.45 लाख भारतीयों ने नागरिकता छोड़ी जबकि 2022 से यह प्रवृत्ति बढ़कर 2 लाख प्रति वर्ष हो गई।

लोकसभा में सवालों पर विदेश मंत्रालय ने लिखित जवाब दिया कि “इसके कारण व्यक्तिगत हैं और केवल संबंधित व्यक्ति को ही पता हैं” और “उनमें से कई लोगों ने व्यक्तिगत सुविधा के कारणों से विदेशी नागरिकता लेने का विकल्प चुना है।”

मंत्रालय ने यह भी स्वीकार किया कि भारत नॉलेज इकॉनमी के युग में वैश्विक कार्यस्थल की क्षमता को पहचानता है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत 1970 के दशक से ही प्रतिभा पलायन से जूझ रहा है और हर दशक के साथ इसमें वृद्धि ही हुई है जो 2020 के दशक में चरम पर पहुंच गई।

पूर्व मीडिया सलाहकार और प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रवक्ता संजय बारू ने अपनी किताब ‘सीसीजन ऑफ सक्सेसफुलः द फ्लाइट आउट ऑफ न्यू इंडिया’ में लिखा है कि अतीत के विपरीत जब भारतीय या तो ब्रिटिश शासन के तहत बंधुआ मजदूरों के रूप में या 1970 के दशक से डॉक्टरों और इंजीनियरों जैसे कुशल पेशेवरों के रूप में देश छोड़ते थे, अब धनी लोग देश छोड़कर जा रहे हैं।

बारू ने किताब में भारतीयों के पलायन के चार चरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह चौथा चरण है। उनका कहना है कि यह अभी शुरुआती दौर में है लेकिन पहले ही काफी चर्चा में आ चुका है। बारू ने लिखा है कि यह धनी लोगों के बच्चों के साथ-साथ उच्च आय वर्ग के व्यक्तियों (एचएनआई) और राजनीतिक और सामाजिक रूप से शक्तिशाली और प्रभावशाली अभिजात वर्ग का पलायन है। चौथी लहर कई मायनों में ‘सफल लोगों का पलायन’ है।

संजय बारू ने मोर्गन स्टेनली के आंकड़ों का हवाला देते हुए लिखा कि 2014 से अब तक लगभग 23,000 भारतीय करोड़पति देश छोड़कर चले गए हैं।

दोहरी नागरिकता का प्रावधान न होना सबसे बड़ी चुनौती

भारतीयों द्वारा अपने पासपोर्ट को छोड़कर अमेरिका, ब्रिटेन या कनाडा के अधिक आकर्षक पासपोर्ट अपनाने का एक कारण यह है कि भारत में दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं है। इस बारे में लिंक्डइन, रेडिट समेत अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारतीय प्रवासी समुदाय के सदस्यों की पोस्ट से भरे पड़े हैं, जिनमें लोगों ने बताया है कि उनके लिए अपनी पहचान, यानी भारतीय नागरिकता का दस्तावेज, भारतीय पासपोर्ट छोड़ना कितना मुश्किल था।

भारत के कानून के मुताबिक, जब कोई नागरिक दूसरे देश की नागरिकता हासिल करता है तो भारत की नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है। वहीं जो भारतीय नागरिक लंबे समय से विदेश में रह रहे हैं और काम कर रहे हैं, उनके लिए पूर्ण नागरिक और व्यावसायिक अधिकारों का लाभ उठाने के लिए अक्सर विदेशी नागरिकता हासिल करना जरूरी हो जाता है।

भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 9 के मुताबिक, “भारत का कोई भी नागरिक जो प्राकृतिककरण, पंजीकरण या किसी अन्य तरीके से स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है या जिसने 26 जनवरी, 1950 और इस अधिनियम के प्रारंभ होने के बीच किसी भी समय स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त कर ली है तो ऐसी नागरिकता प्राप्त करने पर वह भारत का नागरिक नहीं रहेगा।”

यहां यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे अधिकांश विकसित देशों में मतदान, सामाजिक सुरक्षा लाभ, असीमित निवास, सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार और दीर्घकालिक स्थिरता आमतौर पर नागरिकता से जुड़ी होती है।

वहीं, भारत का प्रवासी नागरिक (ओसीआई) दर्जा वीजा-मुक्त यात्रा और सीमित आर्थिक अधिकार प्रदान करता है लेकिन यह कोई राजनीतिक अधिकार नहीं प्रदान करता है।

ओसीआई धारक अन्य देशों में वोट नहीं कर सकते हैं, चुनाव नहीं लड़ सकते हैं या संवैधानिक पदों पर आसीन नहीं हो सकते हैं। विदेशों में स्थायी रूप से बस चुके प्रवासियों, विशेषकर परिवारों वाले लोगों के लिए, विदेशी नागरिकता एक आवश्यकता बन जाती है। इसलिए भारतीय नागरिकता का त्याग करना हमेशा स्वैच्छिक निर्णय नहीं होता। दोहरी नागरिकता का अभाव भारतीयों के लिए कोई विकल्प नहीं छोड़ता है।

भारतीय नागरिकता क्यों छोड़ रहे हैं भारतीय?

भारत में दशकों से प्रतिभा पलायन की समस्या बनी हुई है। 1970 के दशक से ही डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, वैज्ञानिक और कई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के कुशल पेशेवर देश छोड़कर जा रहे हैं। यह पलायन अक्सर उच्च शिक्षा के लिए होता है लेकिन बाद में कई लोग विदेश में ही बसना पसंद करते हैं क्योंकि भारत में उनकी शिक्षा और कौशल पर निवेश का प्रतिफल काफी कम माना जाता है।

विदेश में रहने वाले भारतीयों ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दावा किया है कि विदेशों में अवसर भी काफी बेहतर हैं। पेशेवरों ने लिंक्डइन और अन्य प्लेटफार्मों पर कहा है कि इसी तरह की भूमिकाओं में अक्सर कहीं अधिक अच्छा वेतन मिलता है और जीवन स्तर भी बेहतर होता है, जैसे कि स्वच्छ हवा, बेहतर सुरक्षा, विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन और काफी मजबूत नागरिक सुविधाएं।

हालांकि विदेशों में जीवन यापन की लागत अधिक है इन खर्चों को ध्यान में रखने के बाद भी कुल वेतन और जीवन स्तर भारत की तुलना में काफी बेहतर हैं। इसलिए एक दशक पहले विदेश गए कई भारतीय अब उस स्थिति में पहुंच रहे हैं जहां नागरिकता प्राप्त करना स्वाभाविक लगता है।

अमरेन्द्र यादव
अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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