जिस तरह माँ के लिए अपनी औलाद में कोई भेद नहीं होता ठीक उसी प्रकार देश में भी अपनी सरहदों को लेकर भेद नहीं होना चाहिए। पर पश्चिमी सरहद होने के नाते मुझे उत्तरी सरहद जितना मान नहीं मिला। वहाँ तो हिमालय की ऊँची चोटियां थी किंतु यहाँ न पहाड़ों की आड़ है, न जंगलों की ढाल। यहाँ रक्षा केवल हथियारों से नहीं होती अदम्य साहस और मनोबल से होती है।
1947 में जब से मेरा जन्म हुआ तब से मैंने पाकिस्तान के साथ तीन युद्ध देखें हैं। सेना के शौर्य के साथ ही यहाँ के बाशिंदों की मर्दानगी को भी मैने नजदीक से देखा है। ऐसे उदाहरण बिरले ही मिलते है जहां आमजन सेना के साथ कंधा से कंधा मिलाकर लड़ा हो। फिर भी न जाने क्यों जब युद्धों की बात आती है मुझे उपेक्षित कर दिया जाता है। खैर मांगने से मान कहाँ मिलता है, पर अपनी दास्तां तो आपको सुना ही सकता हूँ।
1965 और 1971 के युद्धों में, इसी सीमांत ने चार ऐसे योद्धा दिए जिनके नाम इतिहास की मोटी किताबों में नहीं, पर रेत के कण-कण में दर्ज हैं।
विस्थापन से विजय तक- देवी सिंह सोढ़ा
देवी सिंह का जीवन सीमा की क्रूर सच्चाई से शुरू हुआ यानी विस्थापन। 1944 में उनका जन्म पाकिस्तान के रताकोट रियासत के नमप्ला (छोर) गाँव में हुआ। पढ़े-लिखे, एथलीट, सिंधी और उर्दू के जानकार, पर 1965 के युद्ध ने सब बदल दिया।
खोखरापार रेलवे स्टेशन पर बम धमाके का झूठा आरोप। हिंदुओं की गिरफ्तारियाँ। निर्दोषों को आजीवन कारावास। देवी सिंह ने देखा- जब देश पराया हो जाए, तो शिक्षा भी बेघर हो जाती है। वे हजारों शरणार्थियों के साथ भारत आए। 1968 में राजस्थान पुलिस में भर्ती हुए और गडरा रोड-मुनाबाव जैसे संवेदनशील क्षेत्र में तैनात हुए। 1971 का युद्ध शुरु होता है।
देवी सिंह सैनिक नहीं थे, पर वे सीमा को पढ़ना जानते थे। हवा, रास्ते, बस्तियाँ, सिंध का समाज, उसकी राजनीति। उनकी दी सूचनाओं पर 10 पैरा स्पेशल फोर्स ने कार्रवाई की। कमांडर थे महाराजा सवाई भवानी सिंह, और एक शरणार्थी सिपाही रणनीति का स्तंभ बन गया। युद्ध के बाद उन्हें संग्राम मेडल मिला। लेकिन उनका असली सम्मान था भारत में जड़ें जमाना। 2003 में आप सेवानिवृत होकर बाड़मेर स्थित अपने गांव गडरा रोड आकर रहने लगे।
सीमा प्रहरी ठाकुर हेम सिंह चौहटन
ठाकुर हेम सिंह राठौड़ के पिता ठाकुर श्याम सिंह चौहटन स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए थे। देश प्रेम और त्याग इन्हें परम्परा में ही मिला था।

1965 में, जब पाकिस्तानी सेना ने केलनोर, देदूसर, सोभाला जैसे गाँवों में घुसपैठ की और चार ग्रामीणों की हत्या कर दी। तब प्रशासन दूर था, सेना रास्ते में थी। हेम सिंह ने इंतज़ार नहीं किया। 25–30 बंदूकधारी ग्रामीणों के साथ दो दिन तक पाक सेना को रोके रखा। तीसरे दिन भारतीय सेना पहुँची- 3 गार्ड। मेजर एम.एस. सोढ़ी, कैप्टन सुरंग, कैप्टन अर्जुन सिंह और दशम से भारी संघर्ष हुआ। 25 पाक सैनिक मारे गए। भारतीय सेना के 5 जवान शहीद हुए। गोला-बारूद और वाहन बरामद हुए। नवभारत टाइम्स ने लिखा-
“चौहटन के ठाकुर हेम सिंह सैनिकों के साथ स्वयं मोर्चे पर जाते थे।”पर युद्ध के बाहर भी वे मानवता के प्रहरी थे। आग में कूदकर बच्चों को बचाना, अपहृत नागरिक छुड़ाना, अत्याचारियों को सीमा पार खदेड़ना। 1971 में, अस्वस्थ होते हुए भी उन्होंने फिर सेना का मार्गदर्शन किया। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत जब चौहटन आए थे तो उन्होंने आमसभा में कहा था की “सीमा पर प्रत्येक नागरिक हेम सिंह राठौड़ बनकर रहे तभी भारतीय सीमा सुरक्षित रहेगी”
अशोक चक्र विजेता- प्रताप चंद भार्गव
भारत-पाक 1965 के युद्ध के समय खास बात यह रही इस युद्ध में भारतीय रेल भी शामिल हुई। भारत के इतिहास का एकमात्र युद्ध होगा जिसमें रेलवे सक्रिय रूप से युद्ध में शामिल हुआ। इस दौरान बाड़मेर से सरहद तक गोला बारूद की सप्लाई रेल से ही हुई। रेल पर भी बम बरसाए गए। बाड़मेर रेलवे स्टेशन पर भी पाकिस्तान द्वारा बंब गिराए गए, जिसके निशान आजतक मौजूद है।
इस युद्ध में रेलवे के 19 कार्मिक शहीद हुए। इनमें एक प्रताप चंद भार्गव भी थे जिनके अदम्य साहस और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत “अशोक चक्र” से सम्मानित किया गया। यह भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है (युद्धकाल में परमवीर चक्र के समकक्ष)। साथ ही यह किसी नागरिक (non-military person) को मिलने वाला पहला अशोक चक्र था।
सीमांत के सिंघ भीम सिंह सोढ़ा
सुंदरा गाँव- सीमा से सटा, हवा से रास्ते बदलने वाला इलाका। भीम सिंह सोढ़ा जरूर सैनिक नहीं थे, पर सीमा उनके लिए नक्शा नहीं जीवन का हिस्सा थी। 1965 के युद्ध में जब पाक सेना ने म्याजलार और नोहड़ियाला पर कब्ज़ा किया तब भारतीय सेना को स्थानीय सहयोग चाहिए था।
भारतीय सेना के मेजर जनरल रोले, कर्नल लेहरी, मेजर मूर्ति तथा जिला कलेक्टर के आग्रह पर भीम सिंह ने अपनी अलग सेना बनाकर भारतीय सेना का साथ देने का वादा किया था जिसे इन्होंने 1965 के युद्ध में पूरी तरह निभाया।

पाक सेना के साथ हुए सशस्त्र संघर्ष, आपातकालीन स्थिति में मुकाबला करने, वीरता और साहस के साथ भारतीय सेना का साथ देने का कारण 16 अप्रैल 1966 को “स्पेशल पुलिस ऑफिसर बाड़मेर ” के पद और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। साथ ही सरकार द्वारा उनको राजस्थान के सिरोही जिले के शिवगंज तहसील में ओडा बांध के कमांड क्षेत्र में 452 बीघा जमीन आवंटित की गई।
ऐसे वीर सपूतों का जीवन देश प्रेम,वीरता और कर्तव्यपालन का जीता जागता उदाहरण है।
डकैत से देवता- बलवंत सिंह बाखासर
बलवंत सिंह का जीवन एक प्रश्न है, कानून और न्याय में अंतर का। जागीरदारी उन्मूलन के बाद सीमा क्षेत्र कानूनविहीन हो गया। पाक सीमा से लुटेरे आते, मारते, लूटते।
बलवंत सिंह ने सोचा- “व्यवस्था बदली है, दायित्व नहीं।”
वे बागी कहलाए। कभी अकेले सौ से अधिक मवेशी छुड़ाए। जनता के लिए देवता, सरकार के लिए डाकू। 1971 का युद्ध आया। भवानी सिंह को सीमा के दुर्गम रास्तों का ज्ञान चाहिए था। सवाल था — किससे? उत्तर था — बलवंत सिंह।
“छाछरो रेड” हुई। चार जोंगा जीप, साइलेंसर खुले।
पाक सेना भ्रमित हुई — टैंक समझे। दो तरफ़ा हमला। रेंजर पोस्ट तबाह। 80 किमी भीतर तक भारतीय सेना। एक राजा और एक डाकू इतिहास रच गए।
अंत में …
देवी सिंह ने विस्थापन को शक्ति बनाया।
हेम सिंह ने गाँव को किला बनाया।
प्रताप चंद ने सर्वोच्च बलिदान दिया।
भीम सिंह ने ग्रामीणों को सेना बनाया।
बलवंत सिंह ने व्यवस्था से ऊपर कर्तव्य चुना।
मेरी आँखो के सामने हुए इन युद्धों और योद्धाओं को बाड़मेर जैसलमेर से बाहर कितने लोग जानते है? किसी स्कूल या कॉलेज की किताबों में इन्हें पढ़ाया जाता है? किसी राष्ट्रीय समाचार चैनल में इनके ऊपर बात होती है ?
कारण कि ये केवल कहानियाँ नहीं हैं। ये प्रश्न हैं- क्या हम अपने नायकों को पहचानते हैं? यदि नहीं, तो क्या इतिहास हमें कभी माफ़ करेगा ?

