नई दिल्ली: विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने शनिवार को कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरानी नौसेना के जहाज को कोच्चि में डॉक करने की अनुमति भारत ने मानवीय आधार पर दी थी। उन्होंने जयशंकर ने यह भी कहा कि अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरान के युद्धपोत आईआरआईएस डेना के डूबने की घटना दुर्भाग्यपूर्ण है।
शनिवार को रायसीना डायलॉग में बोलते हुए जयशंकर ने बताया कि जहाज घटनाओं के गलत पक्ष में फंस गए थे। ईरान का एक अन्य जहाज आईआरआईएस लावन तकनीकी समस्याओं के कारण भारतीय बंदरगाह पर आना चाहता था। ईरान ने भारत से इस संबंध में अनुरोध किया था, जिसके बाद भारत ने उसे कोच्चि में आने की अनुमति दे दी।
आईआरआईएस लावन अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू और मिलान-2026 नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने के लिए क्षेत्र में मौजूद था। यह कार्यक्रम 15 से 25 फरवरी के बीच आयोजित हुआ था।
जयशंकर के अनुसार, 28 फरवरी के आसपास ईरान की ओर से संदेश मिला कि जहाज को तकनीकी दिक्कत आ रही है और वह भारतीय बंदरगाह में प्रवेश करना चाहता है। इसके बाद भारत ने 1 मार्च को उसे अनुमति दे दी। कुछ दिनों की यात्रा के बाद जहाज कोच्चि पहुंचा, जहां उसके 183 सदस्यीय चालक दल को भारतीय नौसेना की सुविधाओं में ठहराया गया है।
‘मानवीय आधार पर लिया गया फैसला’
विदेश मंत्री ने कहा कि उस समय जहाज पर सवार कई लोग युवा कैडेट थे और वे सामान्य परिस्थितियों में भारत आए थे, लेकिन क्षेत्र में बदलते हालात के कारण वे अचानक संकट में फंस गए।
उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में भारत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए जहाज को सुरक्षित बंदरगाह में आने की अनुमति दी। उनके मुताबिक, “जब किसी जहाज ने मुश्किल में मदद मांगी, तो हमारे लिए मानवीय आधार पर मदद करना ही सही कदम था।”
जयशंकर ने बताया कि आईआरआईएस डेना के डूबने की घटना दक्षिण श्रीलंका के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई। जहाज से संकट संदेश मिलने के बाद कोलंबो स्थित समुद्री बचाव समन्वय केंद्र को सूचना मिली। इसके बाद भारतीय नौसेना ने भी तुरंत खोज और बचाव अभियान में सहयोग करते हुए लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमान को भेजा और श्रीलंका के नेतृत्व में चल रहे प्रयासों को समर्थन दिया।
हिंद महासागर की वास्तविकता समझने की जरूरत
विदेश मंत्री ने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की बहसें चल रही हैं, लेकिन क्षेत्र की वास्तविकता को समझना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि डिएगो गार्सिया जैसे विदेशी सैन्य ठिकाने पिछले कई दशकों से इस क्षेत्र में मौजूद हैं, जबकि जिबूती में विदेशी सैन्य बलों की तैनाती इस सदी की शुरुआत में हुई और हंबनटोटा बंदरगाह भी उसी दौर में विकसित हुआ।
जयशंकर ने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र एक तरह का “इकोसिस्टम” है और यह क्षेत्र अब व्यापार, कनेक्टिविटी और आर्थिक गतिविधियों के लिहाज से पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहा है।
उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में भारत की कूटनीति ने इस क्षेत्र में विकास और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए काफी निवेश किया है। उनका मानना है कि भारत की आर्थिक प्रगति से हिंद महासागर के अन्य देशों को भी लाभ मिलेगा।
समुद्री जहाजों की सुरक्षा पर भी चिंता
विदेश मंत्री ने व्यापारी जहाजों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में चलने वाले कई मालवाहक जहाजों पर बड़ी संख्या में भारतीय नाविक काम करते हैं।
ऐसे में किसी जहाज पर हमला होने का मतलब अक्सर यह भी होता है कि उसमें भारतीय नागरिक भी खतरे में होते हैं। उन्होंने बताया कि हाल के दिनों में कुछ घटनाओं में जानहानि भी हुई है, इसलिए इन भारतीय समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा को गंभीरता से लेना जरूरी है।
जयशंकर ने कहा कि भारत की नीतियां क्षेत्र में रहने वाले 90 लाख से अधिक भारतीयों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार में लगे भारतीय नाविकों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर तय की जाती हैं।

