सात फेरों के सातों वचन प्यारी दुल्हनियां भूल न जाना….
’घर द्वार’ फिल्म का यह गाना बड़ा उलझा देता था। कारण कि हमारे मारवाड़ में तो चार ही फेरे होते है। समझ नहीं आता था कि ये फिल्म वाले सात फेरे कहाँ से ले आए हैं।
धीरे धीरे बड़े हुए और इधर उधर पूछताछ कि तो मालूम चला बाकी जगहों पर तो सात फेरे होते है, अपने यहाँ ही चार फेरो का रिवाज़ है।
इसका क्या कारण है ? इसका कारण है पाबूजी राठौड़।
13 वी सदी के इस महानायक का नाम था पाबूजी राठौड़। आपका जन्म 13वीं सदी में जोधपुर के कोलू गाँव (फलौदी) में धांधलजी राठौड़ और कमलादे के घर हुआ था। गायों की रक्षार्थ ये वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसके बाद से ही इनकी पूजा राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों, गुजरात और सिंध (पाकिस्तान) तक होती है। ये राजस्थान के विख्यात पांच पीरो में आते है।
पाबू,हड़बु,रामदेव,मांगलिया मेहा,
पांचो पीर पधारजो गोगाजी जेहा।

चार फेरों वाली बात इस तरह है कि देवल चारणी नामक महिला थी। उसके पास केसर कालमी नाम की बहुत ही सुंदर घोड़ी थी।
पाबूजी का विवाह अमरकोट जो अब पाकिस्तान में है, वहाँ तय हुआ था। पाबूजी को केसर कालमी घोड़ी बड़ी पसंद थी, उन्होंने देवल चारणी से निवेदन किया कि मेरा विवाह है, और मैं केसर कालमी पर चढ़कर ही तोरण मारना चाहता हूँ।
देवल चारणी ने कहा कि मेरी घोड़ी देवी सरीखी है। मुझ पर या मेरी गायों पर कोई विघ्न पड़ा तो ये आपको अपनी ही भाषा में संदेशा दे देगी। मेरी बस एक ही शर्त है कि ऐसा कोई संदेश आपको मिले तो एक क्षण की भी देर न करना।
पाबूजी ने वचन दिया और चल पड़े अमरकोट की ओर। शाही ठाट बात से सजी धजी बारात। ऊपर से पाबूजी राठौड़ जैसा बांका वीर जवान। घोड़ी केसर कालमी। अमरकोट वाले पाबूजी को देखते ही रह गए। औरतें भी आपसे में कानाफूसी करने लगी कि इतना सुंदर बींद तो हमने आजतक नहीं देखा।
चंवरी सजी हुई थी। अग्नि प्रज्ज्वलित थी। पंडित मंत्रोच्चार कर रहे थे। फूलमदे सोढ़ी के साथ पाबूजी राठौड़ ने फेरे लेने प्रारंभ किए। तीन फेरे पूरे हुए थे और चौथे की तैयारी थी। इतने में केसर कालमी जोर से हिनहिनाती है। पाबूजी स्वयं भी देव पुरुष थे। उन्होंने जान लिया कि हो न हो देवल चारणी किसी संकट में है। मैंने उसे वचन दिया था कि कुछ अशुभ होने के समाचार मिलने पर एक पल की भी देर नहीं करूंगा।

पाबूजी ने अपना फैसला सुनाया तो बजती शहनाइयां थम गई। हाहाकार मच गया। सबने समझाया कि दो घड़ी रुक जाइए, फेरे पूरे हो जाए फिर भले पधार जाना। पर वचन में बंधे पाबूजी राठौड़ ने एक पल गंवाए बिना गठजोड़ खोल दिया।
“देवल हैलो देवतों, दिनी चँवरी छोड़,
प्रण निभांवण आपरो, रंग पाबु राठौड़”
केसर कालमी के एड लगाई और निकल पड़े अपना वचन निभाने।
पाबूजी वहां पहुंचते है और देखते है कि जिंदराव खींची देवल चारणी की गायों को ले जा रहा है। पाबूजी अपने साथियों के साथ उनसे युद्ध करते है। पाबूजी घनघोर युद्ध करते है और युद्ध मैदान में ही वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। पाबूजी के बड़े भाई बूढ़ोंजी भी इसी युद्ध में काम आते है। अमरकोट जब यह समाचार पहुंचता है तो फूलमदे सोढ़ी भी सती हो जाती है।
इसको लेकर ही पूज्य तनसिंह जी ने अपने गीत में लिखा है कि
” गठजोड़ों को काट चले थे बजती रही शहनाई….
सतियां स्वर्ग सिधाई…..”
कालांतर में बूढोजी के पुत्र रूपनाथजी ने जींदराव खींची का वध किया और अपने परिवार के अपमान और पाबूजी की मृत्यु का बदला लिया।
इस घटना के बाद से ही चार फेरो की परंपरा प्रारंभ हो गई। इन्हें धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष का प्रतीक माना जाता है। तीन फेरो में दुल्हन आगे रहती है और चौथे फेरे में दूल्हा आगे हो जाता है।

पाबूजी की कथा ‘पाबूजी री पड़’ (लोकगाथा) के रूप में गाई जाती है। पड़ एक कपड़े पर की हुई चित्रकारी को कहते है।
इसमें चित्रों के माध्यम से पाबूजी के पूरे जीवन को उकेरा गया होता है। यह पड़ करीब पंद्रह फीट लंबी और पांच फीट चौड़ाई में होती है। इसे दीवार के सहारे बांध देते है। फिर भोपा और भोपी इसे देखते हुए गाते और नाचते है। यह पड़ रात में ही बाँची जाती है।
पाबूजी को ऊँटों के देवता के रूप में भी पूजते है, इससे ऊँटों के रोग दूर होते हैं।
राजस्थान सरकार ने कोलू (फलौदी) में पाबूजी के पैनोरमा की स्थापना की है।


अति सुंदर वर्णन हुकुम आपके लेख से ये तो पता चला राजस्थान की वीरभूमि पर ऐसे वीरों ने जन्म लिया था
जय पाबूजी राठौड़