नई दिल्लीः ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी। इसका असर दुनियाभर के तमाम देशों पर तेल, गैस, ऊर्जा संकट के रूप में देखने को मिल रहा है। वहीं, भारत में भी इसको लेकर एलपीजी संकट देखने को मिला। बीते दिनों पेट्रोल-डीजल के लिए भी विभिन्न राज्यों के फिलिंग स्टेशनों पर लंबी कतारें देखने को मिलीं। हालांकि, सरकार ने किसी भी तरह के एलपीजी संकट से इंकार किया है और कहा है कि अभी देश में डीजल-पेट्रोल का पर्याप्त भंडारण है। लेकिन एलपीजी गैस संकट का असर छात्रों पर विशेष रूप से पड़ रहा है।
इसका असर घर से बाहर रहने वाले छात्रों पर अतिरिक्त खर्च के रूप में पड़ रहा है क्योंकि खाने के दाम बढ़ गए हैं। दिल्ली में भी छात्रों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ रहा है। ऐसे में बोले भारत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों से समस्याओं के बारे में बात की। छात्रों ने बताया कि कैंपस के अंदर की कैंटीन (जहां खाना मिलता था) या तो पूरी तरह से बंद है या फिर खुली भी हैं तो खाने के सीमित आइटम्स के साथ। पहले जहां विकल्प के रूप में थाली (वेज, नॉनवेज) उपलब्ध थी तो वहीं अब फास्ट फूड आइटम्स ज्यादा हैं। खाने के दाम भी बढ़ गए हैं।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों ने क्या बताया?
अतुल मौर्या जामिया में शोधार्थी छात्र हैं। उन्होंने बातचीत में बताया कि छात्रों के लिए यह समय चुनौती भरा है क्योंकि कैंपस में छात्रों को खाने की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। वह बताते हैं कि कैंपस में सीमित विकल्प और अधिकतर फास्ट फूड आइटम्स के चलते छात्र कैंपस से बाहर खाने को मजबूर हैं। जहां पर खाने की प्लेट में औसतन 15-20 रुपये बढ़ गए हैं। वहीं, जो छात्र रूम लेकर रह रहे हैं और खुद खाना बनाते हैं उन्हें गैस न मिलने की समस्या के बारे में भी बताते हैं।
उन्होंने बताया कि गैस जहां पहले 80-90 रुपये प्रति किलो मिल रही थी, अब उसका दाम 300-350 रुपये प्रति किलो हो गया है। उन्होंने बताया कि रिसर्च कर रहे छात्र तो फिर भी फेलोशिप की राशि से किसी तरह इन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं लेकिन यूजी-पीजी के छात्रों को ज्यादा समस्या का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि महंगाई और गैस की अनिश्चितता के बीच कई छात्रों को माता-पिता घर वापस आने के लिए कह रहे हैं जिससे उनकी अटेंडेंस शॉर्ट होने का डर है। अटेंडेंस शॉर्ट होने के चलते परीक्षा में बैठने से भी रोका जा सकता है।
तारिक सोशल एक्सक्लूजन के छात्र हैं। उन्होंने बताया कि कैंपस में खाना न मिलने से छात्र परेशान हैं। वह बताते हैं कि जामिया की दस्तरख्वान कैंटीन रमजान के महीने से बंद है। लंच के समय यहां अधिकतर भीड़ रहती थी। वहीं, दूसरी कैंटीनों में खाने की कम चीजें ही उपलब्ध हैं और अधिकतर फास्ट फूड हैं जो स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदायक हैं।

वह कहते हैं कि पहले कैंपस में दिनभर रहते थे लेकिन खाने की समस्या के चलते जल्दी ही कैंपस से जाना पड़ता है जिससे पढ़ाई सही से नहीं हो पा रही है।
जामिया हिंदी विभाग की शोधार्थी छात्रा मानसी मोघा ने भी छात्रों की परेशानी बताई। उन्होंने कहा गैस सिलेंडर के महंगे होते ही जामिया के कैंटीन बंद कर दिए गए। जिसके कारण हमें (छात्रों को) बहुत ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। पूरा-पूरा दिन भूखा रहना पड़ता है और जहां कुछ मिल भी रहा है, वहां हर सामान पर पैसा बढ़ा दिया गया है।
उन्होंने बताया कि जामिया के गेट नंबर-8 में कैस्ट्रो कैंटीन में जो दोसा ₹50 का मिलता था वह अब ₹60 का कर दिया गया है। अन्य बहुत सारे आइटम बंद कर दिए गए हैं। 1 महीने से ज्यादा कैंटीन बंद था, खुला तो दाम बढ़ा दिए गए। हाइजीन पर जो चाय पहले ₹10 की मिलती थी वह अब ₹15 की कर दी गई है। अन्य सामग्री जैसे- सैंडविच, कबाब पराठा मिलना ही बंद कर दिया गया है, या तो खाना मिलना ही बंद हो गया या जो मिल रहा है उसका पैसा बढ़ा दिया गया है। इसके चलते सबसे बड़ी समस्या छात्रों को हो रही है जो दिल्ली जैसे महंगे शहर में एक सीमित खर्च में अपना जीवन यापन करते हैं। उनके लिए बेहद मुश्किल और कठिन समय है।
टाइम मैनेजमेंट, पढ़ाई हो रही प्रभावित
गैस क्राइसिस से छात्रों के दैनिक जीवन में पढ़ाई और टाइम मैनेजमेंट पर भी असर पड़ रहा है। मानवाधिकार (Human Rights) में एमए कर रहे हरीश साहू बताते हैं कि चूंकि उन्हें वेज थाली नहीं मिलती तो ऐसे में या तो नॉन वेज (बिरयानी) खाने के लिए लंबी लाइन में लगना पड़ता है। इसके लिए उन्हें 20 से 30 रुपये भी एक्स्ट्रा खर्च करने पड़ते हैं। या फिर वेज खाने के लिए कैंपस से बाहर जाना पड़ता है। लंच ब्रेक में बाहर जाने पर समय ज्यादा लगता है जिससे उनकी क्लास छूट जाती है। या फिर वो सीधे 3 बजे के बाद खाते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।
हरीश कहते हैं कि इससे शरीर में थकान आ जाती है और वो या तो अपने रूम जल्दी चले जाते हैं और अगर अपने आपको कैसे भी करके लाइब्रेरी में रोकते हैं तो उससे पढ़ाई में ध्यान कम लगता है। हरीश बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव से आने के बाद तमाम संघर्षों के बीच, ये एक नए तरह का और बड़ा संघर्ष है।
कुछ ऐसी ही समस्या सत्यम भी बताते हैं। उनका कहना है कि इसका असर छात्रों पर मानसिक रूप से भी पड़ रहा है क्योंकि उनकी पूरी ऊर्जा खाना कहां खाना है, इसी में खर्च हो रही है। वहीं, आर्थिक स्थिति को लेकर भी उन्होंने बताया कि छात्रों के पास सीमित मात्रा में धन घर से आता है क्योंकि अधिकतर किसान पृष्ठभूमि या पिछड़े इलाकों से आते हैं। ऐसे में छात्र मानसिक के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी मार झेल रहे हैं।
मोहम्मद फरहान शिक्षाशास्त्र में एमए कर रहे हैं। उन्होंने अनहेल्दी खाने को लेकर कहा कि इसका स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। उन्होंने जामिया प्रशासन से मांग की कि बंद कैंटीन को खोलने का प्रयास किया जाए और जो कैंटीन खुल रही हैं वहां हेल्दी खाना उपलब्ध कराया जाए जिससे छात्रों को समस्या न हो और वे बाहर जाने को मजबूर न हों। फरहान ने फास्ट फूड की बढ़ी कीमतों का जिक्र करते हुए बताया कि 10 रुपये का समोसा 15 रुपये का हो गया है। वहीं, फ्राइड राइस और अन्य सामान के दाम तो बढ़ें ही हैं क्वांटिटी भी कम हुई है।
दिलीप एमटेक के छात्र हैं। उन्हें भी गैस की किल्लत का सामना करना पड़ा। बिहार के मोतिहारी जिले से आने वाले दिलीप के मुताबिक, उनके पास छोटा गैस चूल्हा है जिसमें गैस भराने के लिए 5 दिनों तक इधर-उधर भटकते रहे। मजबूरन 300 रुपये की एक किलो गैस किसी तरह भराई लेकिन यह कितने दिन तक चलेगी इसको लेकर भी वह चिंतित हैं कि फिर से उन्हें इधर-उधर भटकना न पडे़।
शादाब हिंदी विषय से शोध कर रहे हैं। वह बताते हैं कि पहले सुबह कैंपस आ जाया करते थे और दोपहर का खाना कैंपस में ही खाते थे। लेकिन इस बीच खाने की समस्या के बीच वह बाहर खाने को मजबूर हैं जिससे उन्हें अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि पढ़ाई भी बाधित हो रही है और स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है।
बोले भारत ने छात्रों की समस्याओं के विषय में जामिया प्रशासन से मेल के जरिए पक्ष जानने की कोशिश की है। खबर लिखे जाने तक प्रशासन की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है। जवाब आते ही इसे खबर में जोड़ा जाएगा।


जरूरी मुद्दा उठाया है आप ने। टीम बोले भारत को धन्यवाद।