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आखिर यह मालाणी है क्या, कैसे और कब यह नाम अस्तित्व में आया ?
मारवाड़ में राठौड़ राजवंश के संस्थापक राव सिहाजी 13वीं शताब्दी (लगभग 1226 ई. या 1243 ई.) में राजस्थान आए थे। वे कन्नौज के राजा जयचंद के वंशज माने जाते हैं। उन्होंने सबसे पहले पाली में अपना राज स्थापित किया। पालीवाल ब्राह्मणों के निवेदन पर उन्होंने इस क्षेत्र को लूटेरों से मुक्त कराया और अपना शासन स्थापित किया। बाद में उन्होंने खेड़ (बाड़मेर) को भी अपनी शक्ति का केंद्र बनाया।
रावल मल्लीनाथ जी, राव सिहाजी की 9वीं पीढ़ी के शासक हुए। वे राव सलखाजी के सबसे बड़े पुत्र थे। रावल मल्लीनाथ जी मात्र शासक ही नहीं थे, बल्कि वे मारवाड़ की उस गौरवशाली परंपरा के पुरोधा थे जहाँ शक्ति और भक्ति का अद्भुत संगम होता था। तिलवाड़ा की पावन धरा पर उनकी भक्ति की खुशबू आज भी पशु मेले और भजनों के रूप में जीवित है। इन्हीं रावल मल्लीनाथ जी नाम पर वर्तमान के बाड़मेर और बालोतरा जिले के समूचे क्षेत्र को मालाणी कहा गया।
प्रारंभिक जीवन
एकदम सटीक तिथि तो नहीं किन्तु रावल मल्लीनाथ जी का जन्म विक्रम संवत 1415 तदनुसार 1358 ईस्वी के आसपास हुआ मानते है। उनके पिता का नाम रावल सलखा जी और माता का नाम जाणीदे था।
एतिहासिक रूप से वीरमदेव,जैतमाल और शोभित यह तीन रावल मल्लीनाथ जी के भाई थे।
वीरमदेव जी के वंशज जोधपुर, बीकानेर, रतलाम और ईडर जैसे प्रसिद्ध राठौड़ घरानों के पूर्वज बने।
जैतमाल जी के वंशजों ने गुड़ामलानी और केलवा जैसे क्षेत्रों पर शासन किया। यह ‘जैतमालोत राठौड़‘ कहलाए।
रावल मल्लीनाथ जी के सबसे बड़े पुत्र जगमाल थे, जिन्होंने उनके बाद महेवा की गद्दी संभाली।
रावल जगमाल जी के वंशज कालांतर में ‘महेचा राठौड़’ कहलाए।
शौर्य और पराक्रम
रावल मल्लीनाथ जी ने अपने जीवन काल में अनेक युद्ध लड़े और सभी युद्धों में विजयी हुए।
महेवा विजय: प्रारंभिक जीवन में अपने पैतृक राज्य महेवा को 1374 ई. में पुनः प्राप्त किया। कान्हड़दे को रावल मल्लीनाथ जी का चाचा या ताऊ माना जाता है। मल्लीनाथ जी के पिता सलखा जी की मृत्यु के बाद शासन की बागडोर इन्हीं के पास थी, जिनसे बाद में मल्लीनाथ जी ने अपना अधिकार वापस लिया। त्रिभुवनसी से संघर्ष का भी कहीं कहीं ज़िक्र आता है।
” गढ़ महेवा ऊजलो, मालो गहर गम्भीर।
धिन-धिन सलखा रा कँवर, राठौड़ां रा वीर।।”
(अर्थ: महेवा का गढ़ उजला और भव्य है और मल्लीनाथ जी गहरे व गंभीर स्वभाव के स्वामी हैं। राजा सलखा के इन वीर पुत्र को धन्य है।)
सिवाणा विजय: अलाउद्दीन खिलजी ने 1308 ई. में सिवाना दुर्ग, जिसे उसने ‘खैराबाद’ नाम दिया था जीता लिया था। कालांतर में रावल मल्लिनाथ जी के शासनकाल के दौरान, उनके भाई जैतमाल राठौड़ ने सिवाना दुर्ग पर अधिकार (1374 ई से 1380 ई के मध्य) कर उसे राठौड़ सत्ता का एक प्रमुख केंद्र बनाया। आगे चलकर उन्होंने अपने भाई जैतमाल को सिवाना की जागीर दी।
मंडोर अभियान : अपने भतीजे राव चूंडा की सहायता के लिए नागौर और आसपास के क्षेत्रों पर आक्रमण किया।
मारवाड़ के प्रसिद्ध राठौड़ शासक राव चूंडा जिन्होंने मंडोर जीता, वो वीरमदेव के पुत्र और मल्लीनाथ जी के भतीजे थे। मल्लीनाथ जी ने ही राव चूंडा को संरक्षण दिया और उन्हें सत्ता स्थापित करने में मदद की। अतः आधुनिक मारवाड़ के इतिहास का केंद्र बिंदु मल्लीनाथ जी का परिवार ही रहा। इसलिए मारवाड़ में एक कहावत भी बड़ी प्रसिद्ध है:-
“मालम रा मढ़े, वीरम रा गढ़े”
तेरह तुंगी युद्ध : 1378 ई . में हुआ यह युद्ध मल्लीनाथ जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य अभियान था।
दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक और मालवा के सूबेदार निजामुद्दीन ने मिलकर मारवाड़ पर हमला किया। उन्होंने अपनी सेना को 13 टुकड़ियों (तुंगों) में विभाजित किया था। मल्लीनाथ जी ने अपनी छोटी लेकिन कुशल सेना के साथ छापामार युद्ध और अदम्य साहस का परिचय देते हुए इन सभी 13 टुकड़ियों को एक-एक करके परास्त कर दिया। इस विजय के बाद मारवाड़ में उनकी धाक जम गई और इसी घटना पर वह प्रसिद्ध कहावत बनी:-
“तेरह तुंगा भांजिया, माले सलखाणी।”
गुजरात (अहमदाबाद) के विरुद्ध युद्ध : 1399 ई. के इस युद्ध को रावल मल्लीनाथ जी के पुत्र राव जगमाल जी का सबसे प्रसिद्ध युद्ध माना जाता है। उन्होंने गुजरात के सुल्तान (संभवतः महमूद बेगड़ा के पूर्वज या तत्कालीन सूबेदार) के सेनापति हाथी खान को पराजित किया था। जिसके बाद सुल्तान की विशाल सेना ने उन पर आक्रमण किया था। इसी युद्ध की भीषणता को देखकर बेगम ने सुल्तान से पूछा था जो कि गीतों में भी गाया जाता है कि:
“पग पग नैजा पाड़ीया पग पग पाड़ी ढाल।
बीबी पूछै खान ने जग किता जगमाल।।”
आध्यात्मिक झुकाव
राणी रूपादे से विवाह के बाद रावल मल्लीनाथ जी के जीवन में आध्यात्म के प्रति झुकाव होने लगा। राणी रूपादे एक उच्च कोटि की महान भक्त और लोक संत थीं, जिनका जीवन भक्ति और साधना के प्रति समर्पित था।
वे मल्लीनाथ जी की पत्नी होने के साथ-साथ उनकी आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी थीं।
“राणी रूपादे री रीत, माले तजी रजपूती प्रीत।”
धारू मेघवाल और राणी रूपादे दोनों संत उगमसी (उगमसिंह) भाटी के शिष्य थे। एक ही गुरु से दीक्षित होने के कारण वे आध्यात्मिक रूप से गुरु-भाई और गुरु-बहन माने जाते हैं। उन्हीं के प्रभाव से मल्लीनाथ जी ने तलवार छोड़कर भक्ति का मार्ग चुना। उनके भजन आज भी मारवाड़ में श्रद्धा से गाए जाते हैं, जो गुरु महिमा और समरसता का संदेश देते हैं।
“काचो धागो प्रेम रो, खाँडो खैंचे न खाय।
राणी रूपादे री प्रीत, मालो सिध हुय जाय।।”
रावल मल्लीनाथ जी निर्गुण भक्ति परंपरा के अनुयायी थे।
उन्होंने भी उगमसी भाटी को ही अपना गुरु बनाया था।
“वायक आया गुरुदेव रा, म्हांने सतगुरु सा जगाया।”
समाधि लेने से पूर्व 1399ई . में उन्होंने मारवाड़ के सभी संतों और भक्तों का एक बहुत बड़ा ‘हरिकीर्तन‘ आयोजित किया था। इसमें राजा से लेकर रंक और सभी जातियों के लोगों ने एक साथ भाग लिया, जो उस समय सामाजिक एकता का सबसे बड़ा उदाहरण था।
कुंडा पंथ : उन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों को मिटाने के लिए ‘कुंडा पंथ’ की स्थापना भी की। इस पंथ के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि ईश्वर की भक्ति पर सबका समान अधिकार है। इसमें ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं था। मल्लीनाथ जी ने उस काल में छुआछूत के विरुद्ध कार्य किया जब यह चरम पर थी। उन्होंने ‘कुंडा पंथ’ के माध्यम से समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा से जोड़ा।
“ऊंच-नीच री ओळखी, सतगुरु बिना न होय।”
अजपा जाप: उन्होंने ‘अजपा जाप’ और योग साधना में निपुणता प्राप्त की थी। जिसमें नाम जपना नहीं होता सांसों में नाम घुल सा जाता है।
“जपे न जपावे, अपने से आवे।”
निर्गुण मार्ग: उन्होंने मूर्ति पूजा के स्थान पर निराकार ईश्वर और ‘नाम स्मरण’ पर जोर दिया।
सामाजिक समरसता: उन्होंने ऊंच-नीच और जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए कार्य किया। वे और रानी रूपादे दलित संतों (जैसे धारू मेघवाल) के सत्संग में जाते थे, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था। वर्तमान में भी मल्लीनाथ जी के मंदिर के समीप ही धारू मेघ का मंदिर स्थित है। यह मालाणी की सुंदरता है।
इस प्रकार कालांतर में उन्हें लोकदेवता के रूप में पूजा जाने लगा।
“मल्लीनाथजी सिध हुआ, गऊवां रा रखवार।”
“मल्लीनाथ सिद्ध भया, थली रा रखवाळ।”
राजस्थान का प्राचीन पशु मेला
वे भविष्यवक्ता थे और पशुओं के रोगों को दूर करने की शक्ति रखते थे। उनकी स्मृति में तिलवाड़ा में लगने वाला मल्लीनाथ पशु मेला राजस्थान का सबसे प्राचीन मेला है, जो उनकी अटूट लोक मान्यता का प्रमाण है। कहते है रावल माल के गद्दी संभालने पर तिलवाड़ा में एक बड़ा समारोह हुआ था,उसमें आस पास के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में लोग अपने अपने घोड़े, ऊंट और बैल लेकर आए थे। उत्सव का मौका था तो जैसा लोगों ने श्रृंगार कर रखा था वैसे ही अपनी अपनी सवारी को भी सजाकर लाए थे। यहीं आए हुए यात्रियों ने एक दूसरे के घोड़े, बैल, ऊंट आदि को देखा, प्रभावित हुए और आपस में अपने पशुओं का आदान प्रदान किया। यहीं से इस मेले की शुरुआत मानी जाती है। यह मेला हर वर्ष चैत्र बदी ग्यारस (एकादशी) से चैत्र सुदी ग्यारस तक लगता है। मेले की शुरुआत रावल मल्लिनाथ जी के ध्वजारोहण के साथ होती है। मल्लीनाथ जी के परचे से इस मेले में पानी की कोई कमी नहीं रहती। कोई हाथ भर भी खोद दे तो पानी निकल आता है। जबकि मेले के बाद यहाँ पानी नहीं निकलता। दूसरी खास बात ये कि जैसा खोदने वाले के गाँव का पानी है ऐसा ही पानी यहाँ तिलवाड़ा मेले में निकलेगा। जैसे अपने गांव में मीठा पानी है तो हम यहाँ खोदेंगे तो मीठा पानी आएगा। किसी के गांव का पानी खारा है और वो यहाँ गड्ढा खोदेगा तो खारा पानी निकलेगा।
अंततः
रावल मल्लीनाथ जी का चरित्र एक युगपुरुष का है जिन्होंने तलवार की धार पर धर्म की रक्षा की और भक्ति के मार्ग पर चलकर समाज का मार्गदर्शन किया।
वे सामाजिक समरसता के अग्रदूत और ‘त्राता’ (रक्षक) थे। उन्होंने जाति-पाति के बंधनों से ऊपर उठकर 36 कौमों को एकजुट किया और मालाणी में एक ऐसे लोकतांत्रिक और समतामूलक समाज की नींव रखी जहाँ मानवता ही सर्वोपरि थी।
नोट:-
1.अनेक स्थानों पर जैन तीर्थंकर मल्लिनाथ और रावल मल्लीनाथ को एक मान लिया जाता है जबकि जैन तीर्थंकर मल्लिनाथ जो कि जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर हैं, जिनका जन्म प्राचीन काल में मिथिला (बिहार) के इक्ष्वाकु वंश में राजा कुंभ और रानी प्रभावती के यहाँ हुआ था। इनका कालखंड पौराणिक माना जाता है जबकि रावल मल्लीनाथ जी 14 वी शताब्दी में राजस्थान में हुए। इस प्रकार इन दोनों के कालखंड, वंश और कार्यक्षेत्र पूरी तरह भिन्न हैं।
2. थार क्षेत्र, मालाणी क्षेत्र और मारवाड़ को लेकर भी लोग असमंजस में रहते है और इन्हें एक मानते है जबकि थार का रेगिस्तान है वह पाकिस्तान के सिंध, गुजरात के कच्छ, राजस्थान के बाड़मे, जैसलमेर,जोधपुर,फलोदी,बीकानेर और गंगानगर व पाकिस्तानी पंजाब के कुछ हिस्से तक फैला है। मारवाड़/मरूधर/मरूधरा पूरे जोधपुर क्षैत्र के लिए व बाड़मेर के लिए मालाणी और जैसलमेर के लिए माड़ प्रदेश ये शब्द सदियों से चलन में रहे है।

