मैं स्त्रियों द्वारा लिखी कविताओं को, कविता पढ़ने की अपनी स्वाभाविक ललक के अलावा इस आतुरता से भी पढ़ता हूँ कि मेरे अपने जीवन के वे कौन से अलक्षित कोने हैं जिनसे होकर मैं गुजरा तो हूँ लेकिन ठहरा नहीं या जिन तक मैं पहुँच नहीं पाया। और हर बार यही महसूस होता है कि एक स्त्री की सांसत के ओर-छोर को विचार की आँख से परिभाषित और व्याख्यायित तो किया जा सकता है, लेकिन उसे पूरा जानना असंभव नहीं तो दुष्कर अवश्य है। विशेषकर भारतीय समाज में, जहाँ स्त्री पर पहरेदारी के कई-कई स्वयंभू और तैनाती पहरुए हैं। समाज-शास्त्रीय अर्थ में जिन्हें ‘संस्थाएँ’ कहते हैं। आरती के पहले संग्रह ‘मायालोक से बाहर’ की कविताओं के भीतर भी मैं इसी आतुरता के साथ घुसा और जो लोक मेरे सामने खुला, वह कई तरह से आश्चर्य पैदा करने वाला था।
आरती की कविताएँ चीखने की इच्छा से पैदा हुई हैं और इस इच्छा के तल में जो संसार है वह प्रेम, असुरक्षा, मातृत्व, स्वप्न, परिवार, स्मृति और रोमान के लौकिक धागों से बुना हुआ है। उस संसार को आरती ने नहीं बुना है। वह उन धागों में उलझती-सुलझती हुई एक ऐसे प्रतिकार को अपने लिए निहायत ज़रूरी मानने के बोध तक पहुँचती है जो चीखने या चिल्लाने का पूरक भी बन जाए तो उन्हें कोई मलाल नहीं ! संग्रह की पहली ही कविता ‘आवाज़’ में वे लिखती हैं –
दो ढाई बजे रात
जब सब सो रहे हैं
कुत्ते भी
मेरा मन करता है
ज़ोर की आवाज़ लगाऊँ
दसों दिशाओं को कँपा देने वाली आवाज़
चुप्पियों के चीरकर रख देने वाली
चाँद के गूँगेपन के ख़िलाफ़ एक आवाज़
इस घोर सन्नाटे को को भंग करके मैं
परिणाम की प्रतीक्षा करना चाहती हूँ
इस तेवर की कई कविताएँ संग्रह के आरंभ में ही हैं। बावजूद चीखने की इस इच्छा के, और संग्रह की पहली ही कविता में इसे रखकर जैसे अपने मंतव्य को व्यक्त करती हुई भी, वे चीखती नहीं। बहुत मद्धिम और संयत स्वर में उस दुनिया को रेशा-रेशा करती है, जो बहुत ठोस और अंतिम निर्णीत सच की तरह हमारे सामने फैला हुआ है। ऐसे में यह देखना ज़रूरी हो जाता है कि एक युवा कवयित्री का पहला संग्रह यानी उसके स्त्री-अनुभव के काव्य-रूपांतरण का प्रथमोद्गार क्या कुछ ऐसा नया कहने की कोशिश कर रहा है जो उसके पहले कहा नहीं गया या कम से कम उस रूप में नहीं कहा गया?
‘मुर्दा मौन’ कविता में आरती जी ने बोलते जाने को रस्सी बटना कहा है –
तुम्हारा बोलते जाना अच्छा है
जैसे कि रस्सी बटना, लंबी सी
यह मुझे बिल्कुल नया ही प्रतीक लगा। बोलते जाने की तुलना रस्सी बटने से करने के पीछे यह प्रतीत होता है कि ज्ञात या अज्ञात रूप में उनके भीतर ज़रूर एक अतल गहराई वाला कुआँ है, शब्दों की रस्सी को थामकर जिससे वह बाहर आना चाहती है! इसी चाहत को जैसे साकार करती हुई वह ‘धरती से भारी’ कविता में लिखती हैं –
वह एक कदम जैसे धरती से भारी था
वही कदम, आगे बढ़ाते हुए
मैंने वादा किया था खुद से
पीछे मुड़कर नहीं देख देखूँगी
हालाँकि इसी कविता में आगे एक रूपक में वह चूक भी करती हैं –
यह आगे बढ़ना कई अर्थों में धरती के सापेक्ष था
जैसे वह आगे बढ़ती है
निरंतर घूमती रहती है
और घूमते हुए धुरी पर लौटती है फिर…फिर…
धरती अपनी धुरी पर ही घूमती है और अपनी कक्षा में सूर्य का चक्कर भी लगाती है। पहले घूमने में दिन और रात का रहस्य छिपा है और दूसरी तरह के घूमने में वर्ष का। पृथ्वी धुरी छोड़कर नहीं घूमती है इसलिए धुरी पर लौटने की बात बेमानी है। खैर, वे जो कहना चाहती हैं वह यह कि उन्हें घूमते हुए भी बार-बार अपनी स्मृतियों में लौटना है। उनका इस तरह से लौटना स्मृति-रागी की तरह का लौटना नहीं है। स्मृति-रागी के लिए हर तरह का लौटना अपने खुशनुमा पलों में लौटना होता है। आरती ऐसा नहीं करती। ‘लय की तरह’ कविता में कहती भी हैं –
स्मृतियाँ फर्श पर बिखरी पानी की बूँदें नहीं
जो मिटा दी जाएँ पोछा फेरकर
वे कंकड़ हों तो भी
समा जाती हैं मिट्टी में
चलो यही सही
मैं पी जाती हूँ पानी सा उन्हें
रक्त में मिला लेती हूँ
जीवन में उतार लेती हूँ एक लय की तरह
आखिर ये भी क्या फ़लसफ़ा हुआ
कि कड़वा कड़वा थू…
यहीं पर आरती मुझे अन्य कवयित्रियों से अलग लगती हैं। स्मृतियों से न दुराव न छिपाव, उन्हें स्वीकार करने का साहस भी और स्मृतियाँ जिस जीवन को गढ़ती हैं उससे बाहर आने का माद्दा भी।
हिंदी की अधिकांश स्त्री कविता की यह खूबी भी है और सीमा भी, कि वह अपने अस्तित्व को पाने की जद्दोजहद से गुजरती हुई स्त्री का विकल विलाप है। और इसी विलाप में समाज और परिवार का वह चेहरा दिखाई पड़ता है जिसे पुरुष-निर्देशों ने रचा है। इसलिए इसमें रोज़-ब-रोज़ के अनुभवों में धँसे हुए सवाल अधिक हैं। आरती की कविताएँ भी इसका अपवाद नहीं हैं। हालाँकि मैंने पहले भी कहा कि उनका स्वर बहुत ही संयत और सधा हुआ है। शायद इसकी मुख्य वजह यह एहसास हो कि उन्हें कविता के दायरे में ही सवाल उठाना है। वे सवाल उठाती हैं और आईना भी दिखाती हैं लेकिन कविता की चौहद्दी का अतिक्रमण नहीं करती। बोलना या चीखने की इच्छा उनके भीतर अनायास नहीं पैदा हुई। इसके पीछे कहने, न कहने, सहने और चुप रहने जैसी मार्मिक अनुभूतियाँ हैं जो अनतः अस्तित्वहीनता के बोध से जन्म लेती है। यह अंदरुनी तौर पर गहरी असुरक्षा का व्याकुल कर देने वाला एहसास है। यह निहायत निजी लगते हुए भी मध्यवर्गीय भारतीय परिवार की अधिकांश स्त्रियों का सच है। अपनी एक छोटी-सी कविता ‘कोई और तो नहीं’ में वे लिखती हैं –
तुम सौंप दोगी जिस दिन
उसे अपना सम्मान तक
वह तुम्हारे अंतःदेश की एक एक अंतड़ियाँ
हिला हिलाकर देखेगा
‘वहाँ कोई और तो नहीं !’
कितना विचित्र और मर्मांतक एहसास है यह ! पूर्ण समर्पण के बावजूद भी संदेह का आक्रमण।
इस संग्रह की प्रेम कविताओं में स्त्री के स्वप्न, रोमान और अनुभूतिमयता के दर्शन होते हैं। स्त्रियों द्वारा लिखी हुई प्रेम कविताएँ मुझे निराला, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, नेरुदा और नाजिम हिकमत के बावजूद ज्यादा सच्ची और जेनुइन लगती हैं. क्योंकि उनमें जिए गए और न जी पाए पलों की उपस्थिति बहुत ही आत्मीय होती है। प्रेम में जिस तरलता-सरलता-सघनता और निजता का होना ज़रूरी है वह मुझे स्त्री कविता में ज्यादा स्वाभाविक तरीके से मिलता है। और इसके साथ-साथ बहुत दबे-छिपे रूप में वे आशंकाएँ भी, जिनके भीतर स्त्रियों का जीवन पसरा पड़ा है। वे रोमान के भीतर से ही कितने स्वाभाविक तरीके से यथार्थ की जमीन पर हौले से अपने पाँव रख देती हैं यह खास तौर पर देखने लायक है। ‘मायालोक से बाहर’ के बीच में यानी प्रतिकार और आशंकाओं से बिद्ध कविताओं के बाद आरती की छोटी-छोटी तेरह प्रेम कविताएँ भाव की गहराई और कलात्मकता दोनों ही लिहाज से बहुत ही प्रभावपूर्ण कविताएँ हैं। ये कविताएँ ऐसी हैं जिनमें उपस्थित समर्पण मीरा और महादेवी की याद दिलाता है। इन कविताओं में जिस प्रेम की उपस्थिति है वह बहुत साधारण होते हुए भी विशिष्ट है। कविताओं में प्रेम की शायद यही विशिष्टिता होती है कि वह अपने साधारण में ही असाधारण होता है।
आरती की प्रेम कविताओं में संतों की सी निर्मलता है. उदाहरण के लिए ‘एक बूँद इत्र’ कविता को देखें –
जैसे बूँद भर इत्र बिखर गई हो मेजपोश पर
जैसे छलक गया हो प्याला शराब का
ऐसी ही कोई मिलीजुली सी
गमक
फैल गई है मेरे भीतर
मैं अभी इतनी फुरसत में नहीं हूँ कि
नफा नुकसान को मापतौल सकूँ
प्रेम में नफा नुकसान का हिसाब न करने की बात जब वे कहती हैं तो प्रकारांतर से यह यह भी कहती हुई लगती हैं कि प्रेम में नफा नुकसान का कारोबार भी चलन में है। यदि ऐसे प्रेम का हश्र ऐसा हो तो क्या आश्चर्य –
मीरा गाती रही
साँसों के झाँझ मजीरे बजा बजाकर
समझाती रही प्रेम की पीर
‘मेरो दरद न जाने कोय’
न प्रेम जाना किसी ने न दीवानगी
बस, एक मूरत और जोड़ दी मंदिर में
बहुत तल्ख टिप्पणी है यह। प्रेम में निहित विद्रोह भी कैसे भक्तिजनित आस्था में डूबकर अपनी मूल चेतना को खो देता है मीरा इसकी सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। यदि आरती जी ने अपनी प्रेम कविताओं में मीरा को याद किया है तो जाहिर है कि समर्पण और विद्रोह के दोनों छोरों को वे प्रत्यक्ष या परोक्ष तरीके से महसूस करती हैं और अपनी कविताओं में व्यक्त भी करती हैं।
स्त्री जीवन के अनुभवों और उसके स्वप्नों को आरती जी ने कई-कई तरह से समझने की कोशिश की है। बचपन के किस्से कहानियों, समझाइशों, परिवार के भीतर के अनुभवों और अपेक्षाओं को पकड़ने में उन्होंने जिस दृष्टि का परिचय दिया है वह हिंदी की स्त्री कविता को समृद्ध करता है। कविता उनके लिए एक कलात्मक अनुभव से गुजरने के साथ-साथ एक ऐसी पीड़ा भी है जिस पर सदियों से लगातार कहा जा रहा है लेकिन उसकी तीव्रता कम नहीं हुई है। ऐसे में यदि कविता ‘उस चादर के नीचे’ में एक मादा श्वान से अपनापन पाए तो क्या आश्चर्य ! यह दरअसल एक वक्तव्य भी है हमारे समय की मानव-केन्द्रित क्रूरता पर।
संग्रह के अंत में आरती की अपने मूल स्वभाव के विपरीत, ‘उस चादर के नीचे’, ‘कबाड़खाना’, ‘क्षत विक्षत’, ‘मैं दरख्त बनूँगी’, ‘इस तट पर कोई नहीं अब’ जैसी कुछ लंबी कविताएँ हैं। इन कविताओं में स्त्री संसार की कश्मकश ही रेखांकित हुई है। साथ ही वे आशंकाएँ भी दुःस्वप्न की तरह यहाँ दिखाई पड़ती हैं जिनसे उनका जीवन घिरा घिरा सा है। हालाँकि वे अपनी छोटी कविताओं में जितनी स्वाभाविक और अचूक हैं उतनी लंबी कविताओं नहीं। संग्रह की अंतिम कविता, जो अपनी संरचना में सबसे लंबी है, में वे स्त्री जीवन की साँसत और उसकी उपेक्षा के भाव का नदी से मिलान करते हुए सहसा भारत की राजनीति, अर्थतंत्र और भूमंडलीय व्यवस्था के उपक्रमों को एक साथ रखती हैं। थोड़ी बिखरी बिखरी सी होने के बावजूद इसमें वह चिंता झलकती है जिसमें अपने अस्तित्व को नदी के बहाने उन्होंने एक व्यापक पृष्ठभूमि में देखा है।
संग्रह की शीर्षक कविता ‘मायालोक से बाहर’ का कथ्य यद्यपि धर्म के व्यावसायीकरण और उसके पाखंड का है। लेकिन यह शीर्षक मुझे संग्रह के लिहाज से बहुत ही आकर्षक और महत्वपूर्ण जान पड़ा। स्त्री को विरासत में जो संसार मिलता है उसे माया का लोक नहीं तो और क्या कहा जाएगा? सबकुछ है भी और नहीं भी। इस नजर से इस संग्रह को एक बार फिर देखें तो लगता है कि आरती जी आरंभ में जिस संसार के खिलाफ जोर से बोलना या चीखना चाहती हैं, पूरे संग्रह में उसी संसार का खाका खींचती हैं। यहाँ तक कि मातृत्व जैसे विषय में छुपी अंतर्कथा को भी वे देख लेती हैं। स्वेटर बुनने जैसे अनुभव के माध्यम से ‘उल्टे सीधे घर’ कविता में वे कहती हैं –
कितनी चतुरता से माँएँ
सौंप देती हैं बेटी को घर
उसे आकार देने
सजाने सँवारने का काम
उँगलियों में घट्टे पड़ जाने से अधिक
घर छूट जाने का डर लगा रहता है
घर और परिवार स्त्री के जीवन की सुरक्षा भी है और उसके अस्तित्व को शून्यता की ओर ढकेलने वाले प्रकल्प भी। ऐसे में यदि स्त्रियाँ इस पर विश्वास व्यक्त करते हुए सवाल भी उठाती हैं और आशंकाएँ भी व्यक्त करती हैं तो यह अस्वाभाविक नहीं है। जरूरत है इन सवालों के भीतर छुपी हुई स्त्री की सांसत को समझा जाए। रघुवीर सहाय ने अपनी कई कविताओं में इसके बेचैन करने वाले पक्षों को रखा है। आरती की कविताएँ भी यही करती हैं। उनके सवाल नई सदी के नए सवाल नहीं हैं। वे शाश्वत सवाल उठाती हैं। यद्यपि नई सदी में उनके सवाल अप्रासंगिक नहीं हुए हैं। इसलिए उनकी कविताएँ हमें इतनी निकट की कविताएँ लगती हैं।
पुस्तक – मायालोक से बाहर
कवयित्री – आरती
प्रकाशक – रचना समय, भोपाल

