पिछले कुछ समय की फ़िल्मों पर अगर ग़ौर करेंगे तो पाएँगे कि हिंदी सिनेमा में दो तरह की फ़िल्में सफल हुई हैं। एक वे जो किसी फ़्रेंचाइज़ का हिस्सा हैं, जैसे कि भूलभुलैया, स्त्री, बागी वगैरह। दूसरी वे जिनमें नायक, नायकत्व के मानकों पर खरा नहीं उतरता है। अगर साफ़ शब्दों में कहें, तो वह कुरूप है। उत्तेजित मत होइए, यहाँ शारीरिक सुंदरता की नहीं हीरोइज़्म के अन्य मानकों की बात हो रही है। मसलन, कबीर सिंह प्रेम के नाम पर वो सब करता है, जो एक समय पर खलनायक भी नहीं करते थे। पुष्पा शारीरिक रूप से हीरो न होते हुए भी माचो मैन है। तमाम पीरियड फ़िल्मों और वेब सीरीज़ के नायक अंत में विलन से हार जाते हैं। इस कड़ी में आप ऐनिमल से लेकर धुरंधर तक तमाम नाम गिन सकते हैं। सवाल है कि आखिर क्यों? पिछले पाँच-छह साल में ऐसे कौन-से कारण रहे कि हमारे यहाँ हीरो होने का मतलब बीहड़ बनता जा रहा है? इसका जवाब तलाशने के लिए हमें पहले भारतीय सिनेमा को थोड़ा पीछे से समझना पड़ेगा।
हर दौर में सिनेमा नायक का एक टाइप होता है। मतलब हर दौर की सफल फ़िल्मों के नायकों और कहानी का आकलन करें, तो पाएँगे कि युवा पीढ़ी के सपनों में ग्लैमर का तड़का डालकर पर्दे पर दिखाया जाना सफल रहता है। उदाहरण से समझते हैं, सत्तर के दशक में छात्र आंदोलन वाली पीढ़ी का सबसे बड़ा हीरो इंस्पेक्टर विजय था, जो अकेला ही सिस्टम से लड़ जाता था। अस्सी में ये विजय, डॉन और अपराधी बनकर उसूलों के साथ अपराध करता था। नब्बे की खुलती अर्थव्यवस्था में वो विदेश जाने और परिवार की मर्ज़ी से लवमैरिज करने वाला राहुल था। शताब्दी बदली, तो दूसरे शहर जाकर नौकरी करने वाले हीरो आया, जिसके स्ट्रगल में सिस्टम से लड़ना और शादी के लिए घर से भागना तो था ही नहीं। दिल चाहता है के आकाश से लेकर प्यार के पंचनामा के तीनों लड़कों की कहानियों में वो सब-कुछ था, जिसे पाकर उनसे पहली वाली फ़िल्मों के हीरो की फ़िल्म खत्म हो जाती थी। फिर कहानी में ट्विस्ट आ गया। देश को बदलाव चाहिए था। भ्रष्टाचार और सिस्टम की बातें तो थीं ही, लेकिन इस बार बदलाव की आँधी उस स्क्रीन से उठी जो हमारे हाथ में चौबीस घंटे रहती है, मतलब हमारा मोबाइल फ़ोन। नायक के ‘कुरूप’ होने की असली वजह सिनेमा हॉल के बाहर, सोशल मीडिया की उस दुनिया में छिपी है जिसने हमारे देखने और महसूस करने का नज़रिया पूरी तरह बदल दिया है।
रील बनाम रियल: परफ़ेक्ट लाइफ़ की थकान और भीतरी कुंठा
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण है ‘एक्सपोज़र’ की अति। एक दौर था जब दर्शक सुंदरता, कम कपड़े, बोल्ड सीन या ग्लैमर देखने के लिए सिनेमाहॉल का टिकट कटाते थे। आज स्थिति यह है कि इंस्टाग्राम की एक रील में उससे कहीं ज़्यादा ग्लैमर और बोल्डनेस परोस दी जाती है। जब दर्शक की आँखों को सुंदरता और नग्नता सोशल मीडिया पर मुफ़्त और बेहिसाब मिल रही है, तो सिनेमा उसे लुभाने के लिए क्या नया दे? जवाब है, वीभत्सता और नंगा सच।
इसके साथ ही, सोशल मीडिया और इन्फ़्लुएंसर्स ने एक “परफ़ेक्ट लाइफ़” का मायाजाल बुन दिया है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, हर कोई अपनी ‘बेस्ट लाइफ़’ जी रहा है—महँगी छुट्टियाँ, शानदार शरीर, और खुशहाल रिश्ते। लेकिन आम आदमी की हकीकत इससे कोसों दूर है। जब एक आम इंसान को यह ‘परफ़ेक्ट’ जीवन नहीं मिलता, तो वह भीतर ही भीतर कुंठित (frustrated) होता जाता है। यह कुंठा उसे उस नायक की ओर खींचती है जो स्क्रीन पर सुंदर और सभ्य नहीं, बल्कि टूटा हुआ, बदतमीज़ और हिंसक है। उसे लगता है कि कम से कम यह हीरो उस झूठे परफ़ेक्शन का ढोंग तो नहीं कर रहा। बल्कि इंपरफ़ेक्ट होते हुए भी वह हीरोइज़्म तो दिखा पा रहा है।
ट्रोल संस्कृति और नफ़रत का ‘रेज-बेट’
नायक की इस कुरूपता का दूसरा सिरा हमारे समाज में बढ़ते विद्वेष से जुड़ा है। सोशल मीडिया ने हर घर और हर परिवार में ‘ट्रोल’ पैदा कर दिए हैं। राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक नफ़रत के चलते हर व्यक्ति अंदर से ‘भरा बैठा’ है। उसे अपना गुस्सा निकालने के लिए कोई ज़रिया चाहिए। ऐसे में जब स्क्रीन पर नायक मार-काट मचाता है, या किसी को गालियाँ देता है, तो दर्शक को अपनी दबी हुई नफ़रत के लिए एक निकास मिल जाता है।
पहले की फ़िल्मों में भी ‘रेड फ़्लैग’ वाले हीरो होते थे, लेकिन उन पर रोमांस, रूहानी संगीत और क्यूटनेस का एक मोटा ‘मुलम्मा’ चढ़ा होता था। हीरो अगर पीछा भी करता था, तो उसे ‘दीवानगी’ कह दिया जाता था। आज का सिनेमा उस मुलम्मे को उतार फेंक रहा है। आज के मेकर्स को पता है कि ‘रेज-बेट’ (Rage Bait) यानी उकसावे वाली सामग्री ही साल का सबसे बड़ा शब्द है। वे जानबूझकर ऐसे दृश्य और पात्र गढ़ते हैं जो समाज को बाँट दें।
इस बदलाव की तस्दीक कई तरह से की जा सकती है। ‘मिर्ज़ापुर’ के कालीन भैया हो या मुन्ना, वे नियम तोड़ने में नहीं, बल्कि अपना नियम बनाने में विश्वास रखते हैं, और दर्शक इसी अराजकता (Chaos) में अपना ‘कैथार्सिस’ ढूँढते हैं। यही नहीं, कहानी के कथित नायक गुड्डू और बबलू विलन को हराने की ख्वाहिश नहीं रखते, उन्हें खुद विलेन बनना है। एक समय के बाद कहानी यही रह जाती है कि ज़्यादा बड़ा विलन कौन है। वैसे यह प्रवृत्ति सिर्फ़ भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया का सबसे सफल वेब शो। यानी चर्चित कोरियाई शो ‘स्क्विड गेम्स’ का नायक, अमीरों को हराने निकला कोई शूरवीर नहीं, बल्कि कर्ज़ में डूबा एक लाचार जुआरी है, जो अंत में जीतकर भी हार जाता है। जिसकी बेबसी में दुनिया भर के कुंठित मध्यम वर्ग ने अपना दर्द देखा। पिछले कुछ समय में लोकप्रिय हुए सभी चरित्र, फिर चाहे वे स्थानीय हों या विदेशी, उस ‘परफ़ेक्ट’ और ‘प्लास्टिक’ दुनिया को नकारते हैं जो सोशल मीडिया हमें हर पल बेचने की कोशिश कर रहा है। इसकी जगह वे सोशल मीडिया की नफ़रती प्रवृत्ति को बेहतर पैकेजिंग के साथ बड़े पर्दे पर देखना स्वीकार करते हैं।
वैसे इस विमर्श में एक ऐसा विरोधाभास भी है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इन कुरूप कथाओं का संगीत बेहद सुंदर है। यह गौर करने वाली बात है कि नायक जहाँ-जहाँ ‘कुरूप’ और ‘बीहड़’ होता जा रहा है, उसकी दुनिया का संगीत उतना ही सम्मोहक और रूहानी होता जा रहा है। आप ‘स्कैम 1992’ की उस धुन को याद कीजिए जो एक घोटालेबाज को रॉकस्टार जैसा महसूस कराती है, या फिर ‘कबीर सिंह’ का वह संगीत जो उसकी विषाक्तता को ‘जुनून’ में बदल देता है। ‘स्क्विड गेम’ का संगीत तनाव को धड़कनों में उतार कर आपको उसे गुनगुनाने पर मजबूर करता है, तो ‘पुष्पा’ और ‘ऐनिमल’ के गाने हिंसा को एक उत्सव बना देते हैं। ‘धुरंधर’ भी इसका अपवाद नहीं है। असल में, इन जगहों पर संगीत एक ‘मनोवैज्ञानिक नशा’ है। यह दर्शक की नैतिकता के फ़िल्टर को सुन्न कर देता है, ताकि वह स्क्रीन पर हो रही क्रूरता पर सवाल उठाने के बजाय उस ‘वाइब’ का आनंद ले सके। जब परदे पर खून बहता है और बैकग्राउंड में एक शानदार स्कोर बजता है, तो हिंसा, हिंसा नहीं रहती वह ‘कला’ बन जाती है।
मेरी कुरूपता बनाम तुम्हारी कुरूपता
आज दर्शक सिर्फ फ़िल्म नहीं देखता, वह फ़िल्म के ज़रिए अपनी लड़ाई लड़ता है। उसे समाज की कुरूपता को पर्दे पर देखना है ताकि वह सोशल मीडिया पर आकर चिल्ला सके कि “देखो, यही असली सच है!” वह लड़ता है कि उसकी पसंद वाली कुरूपता ही समाज का असली चेहरा है। अगर एनिमल या कबीर सिंह जैसे किरदार हिट हो रहे हैं, तो इसलिए नहीं कि लोग उन्हें आदर्श मानते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि ये किरदार उस ऑनलाइन बहस के लिए ‘कच्चा माल’ मुहैया कराते हैं, जिसमें हर कोई एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगा है।
कुल-मिलाकर, आज का नायक हमारे समय की इसी डिजिटल अराजकता की उपज है। वह उस समाज का प्रतिनिधि है जो इन्फ़्लुएंसर्स की नकली दुनिया से चिढ़ा हुआ है, जो ट्रोल्स की भाषा बोलता है, और जिसे शांति से ज़्यादा ‘कलेश’ में मज़ा आता है। जब तक समाज में यह डिजिटल और मानसिक उथल-पुथल रहेगी, हमारे नायक ‘बीहड़’ ही रहेंगे, क्योंकि अब सुकून बिकाऊ नहीं है, सिर्फ ‘बवाल’ बिकाऊ है।

