कहानियों में एक अद्भुत ताकत होती है। वो किसी एक देश या समाज में जन्म लेती हैं और फिर कहीं और कही व सुनाई जाती है। यानी एक कहानी को दूसरे देश या समाज में कहा, सुनाया या देखा-दिखाया जा सकता है , थोड़ा बदलकर। देखा व दिखाया इसलिए कि वही कहानी नाटक या फिल्म में भी परिवर्तित हो सकती है। ऐसा ही हुआ इस बार के भारंगम (भारत रंग महोत्सव) में हुए नाटक हिंद 1957’ में। ये नाटक अमेरिकी नाटकफेंसेस’ का हिंदी रूपांतर है। इसे निर्देशित किया फिरोज अब्बास खान ने औऱ रूपांतर किया है विकास बाहरी ने। फेंसेस’ ऑगस्ट विल्सन का लिखा है जिस पर डेंजेल वाशिंगटन में बहुत अच्छी फिल्म भी बनाई। मूल नाटक अमेरिका में अश्वेत और रंगभेद की समस्या पर केंद्रित है।हिंद 1957’ रूपांतरित होकर भारत में मुसलमानों से जुड़े मसलों पर।
ये नाटक बेहद संवेदनशील तरीके से कुछ मुददों को उठाता है। जैसे उर्दू भारतीय भाषा है या नहीं, मुसलमान भी भारत में सच्चा देशभक्त हो हो सकता है या नहीं, जब सत्ता तंत्र किसी को परेशान करता है तो उस पर क्या मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है, खासकर जब वो अल्पसंख्यक होता है। लेकिन नाटक सिर्फ इन राजनैतिक बातों तक सीमित नहीं रहता। वो उस तरफ भी जाता है जिधर परिवार में स्त्रियों को काफी कुछ झेलना पड़ता है और कैसे कोई अपने मनोवैज्ञानिक ग्रंथियों से मुक्त होकर क्षमाशील हो सकता है।
`हिंद 1957’ तबरेज अंसारी औऱ उसकी पत्नी रजिया के इर्दगिर्द घूमती है। तबरेज भारत ने आजादी की लड़ाई में भाग लिया था। लेकिन पारिवारिक कारणों से आजादी के बाद एक बार पाकिस्तान क्या गया सत्ता तंत्र उसकी देशभक्ति पर संदेह करने लगता है। वो शायर है पर वक्त की मार से शायरी छूटती जाती है। पहली पत्नी के निधन के बाद वो रजिया से शादी करता है। रजिया उसकी पहली पत्नी से हुए लड़के के साथ अपने बच्चे की देखभाल करती है। तबरेज बीड़ी बनाने की एक फैक्टरी में काम करता है। गुलरेज नाम का उसका एक भाई भी है जो मानसिक रूप से कमजोर है। तबरेज का बड़ा बेटा लतीफ शायर बनना चाहता है और छोटा बेटा फैजी सेना में जाना चाहता है और ह़ॉकी खेलना चाहता है। तबरेज को ये सब पसंद नहीं। इसी बीच तबरेज तीसरी शादी कर लेता है। रजिया को सदमा पहुंचता है। फिर तबरेज की तीसरी पत्नी का जचकी के दौरान निधन हो जाता है पर बच्ची बच जाती है। क्या बच्ची को रजिया पालेगी?

इस तरह `हिंद 1957’ में दो विषय मिले हुए हैं। एक तो ये क्या किसी को धार्मिक आधार पर संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए? या और खोलकर कहें तो क्या कोई मुसलिम है इसी आधार पर भारत में उसकी देशभक्ति को प्रश्नांकित किया जा सकता है? और उर्दू तो भारत में जन्मी और विकसित हुई भाषा औऱ उसमें कई शायर और लेखक तो हिंदू भी हुए है। आज भी कई युवा शायर हिंदू हैं। नाटक में जो शायरी इस्तेमाल की गई है वो लखनऊ के शायर अभिषेक शुक्ला की है। ये भी भाषाई विवाद के बारे में कुछ रेखांकित करता है।
जो दूसरा विषय इस नाटक में अहम रूप से उभरता है वो ये है कि समाज में भले ही कई तरह पूर्वग्रह फैले हों, चीजें बदलती है। तबरेज अंसारी को अदालत देशद्रोह के मुकदमें से बाइज्जत रिहा कर देती है, बड़ा बेटा लतीफ भी शायर के रूप में अपनी पहचान बनाना शुरू कर देता है और छोटा बेटा सेना में चला जाता है। पर साथ ही कुछ पेचीदियां भी हैं इस नाटक में। तबरेज का मामला इस तरह जटिल है वो रजिया के साथ वफा नहीं करता। वो उसे धोखा देता है। हालांकि इसी कारण रजिया का व्यक्तित्व भी पाक होकर उभरता है। रजिया की भूमिका सोनल झा ने जिस तरह निभाई है उस कारण भी दर्शक की सहानुभूति उसे ही मिलती है। सचिन खेडेकर ने तबरेज की जो भूमिका निभाई है। वो भी उम्दा है और उनके कारण नाटक जजबाती बुंलदी तक पहुंचता है। तबरेज के दोस्त बनवारी की चरित्र में दधि पांडे के अलावा एनके पंत (गुलरेज), (अंकित लतीफ) और रवि चाहर (कैफी) ने भी अपनी अपनी भूमिकाओं से साथ न्याय किया है।

निर्देशक फिरोज अब्बास खान ने बहुत नियंत्रित तरीके से इस नाटक में निहित मुद्दों को उभारा है। विवादास्पद विषयों को इस तरह निभाया है कि आग राख बन जाए, ज्यादा फैले नहीं। आखिरी दृश्य में फैजी अपने पिता की उन कड़वी बातों के मन से निकाल देता है जो बरसों उसके मन तो चुभते रहे और दर्द देते रहे। ये एक एक रूपक भी है जो ये कहता है कि बुरी यादें या बातें भुलनी भी पड़ती हैं, अगर हम जिंदगी में आगे बढ़ना चाहें।
एक तरफ इस बार के भारंगम में हिंद 1957’ जैसा राजनैतिक मिजाज वाला नाटक था तो दूसरी तरफ मिराज’ भी था जो कैंसर ग्रस्त महिला की दर्दगाथा है। इस एकल अभिनय वाले नाटक के निर्देशक हैं रणधीर कुमार। मिराज’ कैंसर ग्रस्त. जिसे कैंसर सरवाईवर भी कहा जा सकता है, महिला अनन्या मुखर्जी की किताबटेल्स फ्रॉम दे टेल एंड’पर आधारित है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पूर्व स्नातक और अभिनेत्री दीक्षा तिवारी ने अनन्या मुखर्जी की पीड़ा गाथा को जिस तरह प्रस्तुत किया उसमें न सिर्फ एक कैंसर की बीमारी से जूझती महिला का आत्म संघर्ष को सामने आता है बल्कि उसका जीवन दर्शन भी उभरता है जो गरिमा के साथ जीने के लिए जरूरी है। भले भी आपके पास जीने के लिए सिर्फ एक ही दिन का समय़ न बचा हो लेकिन उसे अश्रुविगलित होकर ने जिएं।
पर इस नाटक के बारे मे आगे बात करने के पहले ये ऱेखांकित करना जरूरी है कि रंगमंच पर अब ऐसे मसले भी आने शुरू हो गए हैं जिनका संबंध स्वास्थ्य से हैं। रंगमंच दूसरी कलाओं की तरह मनुष्य के दर्द का बयान भी है। इसीलिए भारत में भी और पूरी दुनिया में ऐसे नाटक भी लिखे औऱ खेले जा रहे हैं जो स्वास्थ्य औऱ बीमारियो से संबंधित हैं। खासकर डिमेंशिया औऱ कैसर को लेकर। हालांकि इन पर फिल्में बनने का सिलसिला भी बरसों पहले शुरू हो गया। हिंदी में कई फिल्में बनी है। राजेश खन्ना की फिल्म `आनंद’ तो इस बारे में एक क्लासिक फिल्म मानी जाती है। ऐसी और भी कई हिंदी में बनी हैं औऱ बन रही है।
बहरहाल कैंसर तक बात सीमित ऱखें तो ये याद रखना जरूरी है कि एक जमाने तक ये लाइलाज माना जाता था। हालांकि अब मेडिकल साइंस के बढ़ते कदम की वजह से कैंसर का कुछ हद तक इलाज संभव हो गया है लेकिन पूरी तरह नहीं। लेकिन बात इलाज की ही नहीं है, एक पहलू ये भी है कि जिसे ये होता है उसे भीतर ही भीतर ध्वस्त कर देता है। शारीरिक स्तर पर भी औऱ मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी। `मिराज’ नाटक इन दोनो पक्षों को सामने लाता है। दीक्षा तिवारी ने जो किरदार निभाया है उसमें बीमार के तनाव के गहनतम क्षणो को सामने लाया गया है। नाटक की कैंसर ग्रस्त कीमोथेरपी से जूझते हुए अंदर ही अंदर लगातार कितनी टूटती और विघटित होती जाती है ये सब तो दिखता ही है पर ना हार माननेवाली जिद भी उसके अंदर है। ये पक्ष भी दीक्षा ने दिखाया है।

दो और वजहों से मिराज एक विशिष्ट नाटक बन गया। पहली तो ये कि इसमें वीडियो तकनीक के माध्यम से कैंसर ग्रस्त की पीड़ा की बहुस्तरीयता को उद्घाटित किया है। वैसे तो कई निर्देशक अब वीडियो तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं औऱ कुछ तो बहुत अच्छा कर रहे हैं। लेकिन निर्देशक रणधीर कुमार और उनके सहयोगी वीडियो विशेषज्ञ विशाला महाले ने वीडियो के माध्यम से कैंसर ग्रस्त के दिमाग में चल रहे वबंडर को पकड़ने और दिखाने में भी सफलता पाई है। ये इस नाटक को गहराई देता है। काव्यशास्त्र में एक एक अवधारणात्मक पद है भावसबलता। यानी विशिष्ट प्रसंग में किसी चरित्र के भीतर कई तरह के भावों और विचारों का आलोड़न। शब्दों में इसे बयान करना तो अपेक्षाकृत उतना मुश्किल नहीं है लेकिन अभिनेता के लिए इसे दिखाना काफी कठिन है। लेकिन फिल्म में या वीडियो तकनीक के माध्यम से इसे अनुभूत कराया जा सकता है। हालांकि इसके लिए समझ और कल्पनाशीलता चाहिए और रणधीर और विशाला इस नाटक में बखूबी कर दिखाया है।
वैसे तो ये पुरानी मान्यता रही है और रंगमंच के कई सुधी प्रयोक्ता या निर्देशक अभिनय और अभिनेता को ही रंगमंच की बुनियाद मानते हैं। लेकिन ये एक धारणा भर है और संपूर्ण सत्य नहीं है। अगर पारंपरिक भाषा में या नाट्यशास्त्र की शब्दावली में कहें तो नाटक का रं उद्देश्य रसानुभूति है और इसके लिए संभी संसाधनो का प्रयोग करना चाहिए, चाहे संगीत हो, प्रकाश व्यवस्था हो, वस्त्र सज्जा हो या वीडियो हो। रंगमंच समुच्चय की वजह से ज्यादा प्रभावशाली होता है किसी एक पक्ष पर निर्भरता के कारण नहीं।

इस नाटक का दूसरा मजबूत पक्ष इसकी प्रकाश व्यवस्था है। रणधीर एक बहुत अच्छे प्रकाश परिकल्पक हैं और उन्होंने अपने इस नाटक में बूम स्टेंड पर साइड लाइट के माध्यम से ऐसा प्रभाव पैदा किया है जो किसी अस्पताल में कैंसरवार्ड जैसा असर पैदा करे। कैंसर वार्ड में पेशेंट एक ऐसी यातनादायक स्थिति में होता है (या होती है) जहां उसके दिमाग में कई तरह की यादें सताती हैं, कई निराशाएं घेरे रहती हैं और दुश्चिंताएं दबोचने को तैयार रहती हैं। कहने को ये प्रकाश व्यवस्था है लेकिन इसमें जीवन के उस लम्हे का अंधेरा अधिक दिखता है जहां कोई अस्वस्थ या बीमार अपने आसपास रोशनी को धूमिल होता महसूस करता (करती) है।

