‘पहल’ की साहित्यिक पत्रकारिता के महत्व और उसमें ज्ञानरंजन की भूमिका की चर्चा बहुत होती है, कहानीकार ज्ञानरंजन की कम। लेकिन मुझे लगता है कि 21वीं सदी में हिंदी कहानी में ज्ञानरंजन के हस्तक्षेप को कहीं अधिक शिद्दत से याद किया जाएगा।
नयी कहानी से साठोत्तरी बेचैनी तक
उनकी कहानियों ने ‘नयी कहानी’ की व्यक्तिवादी धारा में मौजूद अस्तित्ववादी रोमानी धुंधलके को एकबारगी छिन्न-भिन्न कर दिया। हिंदी कहानी को जमीनी विस्तार की नई दिशाओं में आगे बढ़ा दिया।
ज्ञानरंजन की कहानियाँ मध्यवर्ग के दायरे से बाहर अक्सर नहीं जातीं। ये सातवें-आठवें दशक के हिन्दुस्तानी शहरों की कहानियाँ हैं। ‘मैं’-शैली में कही गईं। आत्मसंवाद-नुमा।
थोड़ी-सी ही कहानियाँ हैं। लंबे समय से उन्होंने कहानियाँ नहीं लिखीं। लेकिन कहानीकार के रूप में उनका अप्रतिम महत्व बना हुआ है।
ज्ञानरंजन कहानी कहने की एक नयी तमीज़ लेकर आए थे।
नयी कहानी ने प्रेमचंद-जैनेन्द्र के जमाने के कथित रोमानी आदर्शवाद को पहले ही तज दिया था। मध्यवर्ग के नए कहानीकार अपने नागर व्यक्तिवादी नज़रिए के साथ आदर्शविहीन यथार्थ को मनुष्य के विकल्पहीन अस्तित्व या नियति के रूप में चित्रित करते हुए सामने आए। ‘परिंदे’ और ‘वापसी’ जैसी बहुचर्चित कहानियों में इस नियति-बोध और उससे उपजे नॉस्टेल्जिया को पहचाना जा सकता है।
साठोत्तरी कहानी पुराने ढंग के आदर्शवादी या अस्तित्ववादी खांचे से मुक्त होने की जद्दोजहद में सामने आई। साठ का दशक दुनिया भर में बदलाव की बेचैनियों का दशक था। दुनिया भर में युवा आंदोलन, स्त्री आंदोलन, नागरिक अधिकार आंदोलन और भेदभाव-विरोधी आंदोलन चल रहे थे। यह बर्लिन की दीवार के निर्माण, फ्रांस के छात्र आंदोलन और वियतनाम युद्ध का दशक था। यह बीट कविता की लोकप्रियता और एलेन गिंसबर्ग का दौर था।
भारत में यह अकविता, अकहानी और भूखी पीढ़ी का दौर था।
जिसे भारत में अक्सर मोहभंग का दौर कहा जाता है, वह दुनिया भर के नौजवानों में फैल रहे प्रचंड गुस्से की ही अभिव्यक्ति थी, जिन्हें लगता था कि उदारवादी यथास्थितिवाद ने उनके साथ जबरदस्त विश्वासघात किया है।
आगे चलकर यह गुस्सा मार्क्सवादी-लेनिनवादी राजनीति के साथ जुड़कर नक्सली बगावत के रूप में फूटा। यह तब हुआ जब गुस्से के साथ भविष्य का एक स्वप्न और बदलाव की एक विचारधारा जुड़ गई। यही कारण है कि 1967 के बाद के हिंदी साहित्य में एक रचनात्मक जनवादी मोड़ दिखाई देता है। लेकिन जिसे साठोत्तरी लेखन कहा जाता है, वह प्रयास इस मोड़ के पहले का लेखन है। इस लेखन में विक्षोभ है, जो यथास्थिति को मटियामेट कर देना चाहता है, लेकिन अभी इसके पास नए भविष्य का कोई स्वप्न नहीं है। स्वप्न कहीं है भी, तो उस पर विश्वास नहीं है—वैसा विश्वास जो आगे चलकर नक्सलवादी आंदोलन से मिला।
ज्ञानरंजन की कहानियाँ जिस दौर में लिखी जा सकीं, वह यही साठोत्तरी जमाना था।
ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया और काशीनाथ सिंह को साठोत्तरी हिंदी कहानी के ‘चार यारों’ के रूप में पहचाना जाता है। महीप सिंह, रमेश बक्षी और महेंद्र भल्ला जैसे कहानीकारों को भी इसी दौर से जोड़ा जाता है। लेकिन इस दौर में नई कहानी से जुड़े कहानीकार भी सक्रिय थे—जैसे निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, अमरकांत, शेखर जोशी, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, मृदुला गर्ग और नासिरा शर्मा। इनकी कहानियों में भी इस दौर में नियतिवादी नैराश्य कमजोर पड़ने लगा और बदलाव की बेचैनी अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोजती दिखाई देती है।
खिलंदड़ेपन की संजीदगी और पाखंड का ध्वंस
अधिकतर साठोत्तरी कहानीकार उदारवादी आदर्शवाद और अस्तित्ववादी नियतिवाद को ठुकरा चुके थे, लेकिन अपनी धुरी से खिसकते जा रहे नए हिन्दुस्तानी शहरों में पनप रही अराजक मध्यवर्गीयता के रूमानीकरण से नहीं बच पा रहे थे। देखने में ऐसी कहानियाँ तटस्थ लगती हैं। मूल्य-निर्णय से इनकार करती हैं। लेकिन पलटकर इस इनकार को ही एक मूल्य की तरह स्थापित करती जाती हैं। अक्सर वे एक ऐसा धुंध भरा वातावरण निर्मित करती हैं, जिसमें मूल्य, स्मृतियाँ और स्वप्न खोजे ही नहीं जा सकते।
ज्ञानरंजन की कहानियों की सबसे मूल्यवान विशेषता यह है कि वे अराजक विद्रोह के रूमान में नहीं फंसतीं। वे मध्यवर्गीय पाठक को अपने ही जीवन का भरपूर सामना करने के लिए बाध्य करती हैं—आत्म-साक्षात्कार के रूप में, आत्मनिंदा की तरह नहीं।
उनकी कहानियों का ‘मैं’ एक संजीदा खिलंदड़ेपन के साथ भावना और विचार के एक-एक पाखंड की धज्जियाँ उड़ाता है। यह समझते हुए कि इन कथा-चरित्रों के जीवन में पाखंड उनका अपना चुनाव उतना नहीं है, जितना कि दी हुई स्थितियों में जीने की मजबूरी है। इस मजबूरी को ढोते रहने की जरूरत नहीं है। इसी से वह खिलंदड़ापन जन्म लेता है, जो सायास और संजीदा है। वह केवल मनबहलाव या मज़ाक नहीं है।
शहर की यात्रा, मृत्यु और फुटपाथ की सच्चाई
ज्ञानरंजन की कहानियों में शहर, नदी, यात्रा और मृत्यु की उपस्थिति लगातार बनी रहती है। लेकिन बहुत-सी नई कहानियों की तरह नॉस्टैल्जिया, रहस्य, अवसाद और शोक का तिलस्म रचते हुए नहीं। शहर में जीवन का कोलाहल है। इसी कोलाहल से ज्ञानरंजन की कहानी जन्म लेती है। लेकिन शहर में पाखंड, हिंसा, अकेलापन और मृत्यु भी है। दोनों के बीच का तनाव ज्ञानरंजन की कहानी में एक गति पैदा करता है, जिससे वह यात्रा संभव होती है—जो कभी बाहर से बाहर की तरफ, कभी भीतर से बाहर की तरफ और कभी बाहर से भीतर की तरफ चलती रहती है। इस यात्रा में मुँह-अधर आदर्श और रोमान के सभी आवरण छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। लेकिन बेचैनी बरकरार रहती है।
‘सम्बन्ध’ कहानी में ‘मैं’ का यह खयाल कि उसका बेरोजगार भाई सचमुच आत्महत्या कर गुजरे तो यह सबके लिए अच्छा होगा, परिवार के भीतर की बहुत-सी घिसटती हुई हकीकतों की परतें खोलता है। अगर कहानी इस खयाल के लुत्फ का शिकार हो जाती तो आत्महत्या से कम पर न खत्म होती। लेकिन ज्ञानरंजन की कहानी की उड़ान उस आत्महत्या को निरस्त या स्थगित करने में है। कहानी यों खत्म होती है—
‘‘मैं सोच रहा हूँ कि कितनी गंभीरता पूरी रात छाई रही—कितनी हंसी की ये बात है—जितना मज़ाक मैं कर सका वह भी कितनी आसानी से उलट गया—कितनी दया मैं अपने ऊपर करूँ? जीवन..जीवन..जीवन, कोई कविता इस समय नहीं याद आ रही है, जो इस शब्द से शुरू होती हो और जिसे गाऊँ।’’
इसलिए ज्ञानरंजन की कहानियाँ जहाँ खत्म होती हैं, वहाँ से फिर से उलटी दिशा में पढ़े जाने की मांग करती हैं। इन्हें केवल शुरू से आखिर तक पढ़ना काफी नहीं है, आखिर से शुरू तक फिर से पढ़ना जरूरी है। तब जाकर बात साफ होती है कि उनकी कहानियाँ उनकी ही पीढ़ी के दूसरे कहानीकारों की कहानियों से कहाँ अलग और बड़ी होती हैं।
उनकी कहानियों में अंधेरों की पहचान है, लेकिन अंधकार का नमन या महिमामंडन नहीं है। वे अराजकता का उत्सव नहीं मनातीं। वे इस ‘दिव्यज्ञान’ का शोर नहीं मचातीं कि दुनिया सिर्फ झूठ, बेईमानी, कुत्सा, द्वेष और हिंसा से भरी हुई है। मनुष्य के मामूलीपन, भय और आत्मछल को गहरी संवेदनशीलता के साथ देखती हैं। जीवन की रचनात्मक संभावनाओं की ओर से आँखें मूँदकर नहीं चलतीं।
वे व्यक्ति, परिवार और मध्यवर्ग के जीवन की विच्छिन्नता को दिखाते हुए भी इसे अंतिम सत्य की तरह स्थापित नहीं करतीं।
शहरी मध्यवर्गीय जीवन के सारे कुत्सित अनुभवों के निर्मम साक्षात्कार के बाद उनकी कहानियाँ उन फुटपाथों पर लौटकर आती हैं, जहाँ दिन भर अदृश्य रहने वाला मेहनतकश तबका अपनी नींद पूरी करने आता है…
‘‘दूर तक फुटपाथ ऐसा लगता था, जैसे दुर्घटना के बाद अस्त-व्यस्त लाशें पड़ी हों।’’ (‘अनुभव’ से)
स्त्री-दृष्टि और साठोत्तरी लेखन की सीमा
ज्ञानरंजन की कहानियों की स्त्री-दृष्टि को लेकर खूब वाद-विवाद हुआ है। ‘घंटा’ कहानी में स्त्रियों को लेकर जिस तरह की अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल हुआ है, उसके बारे में यह सफाई दी जा सकती है कि वह भाषा इस कहानी के केंद्रीय चरित्र के व्यक्तित्व के उथलेपन को उजागर करने के लिए आई है। वह स्वयं को एक क्रांतिकारी नौजवान समझता है, लेकिन किसी साधन-संपन्न व्यक्ति का ‘घंटा’ बनने के लिए लालायित रहता है। उसकी क्रांतिकारिता नशे में दी गई गालियों के रूप में फूटती है और इसके नतीजे में हुई सार्वजनिक पिटाई के बाद खत्म हो जाती है।
उनकी दूसरी कहानियों में भी ऐसे युवा पुरुष चरित्र मिलते हैं जो अपनी अभावग्रस्त जिंदगी से पीड़ित होकर समाज में क्रांतिकारी बदलाव का सपना देखते हैं लेकिन जिनकी दौड़ एक सुविधाजनक जिंदगी का जुगाड़ करते-करते खत्म हो जाती है।
ऐसे कुंठित क्रांतिकारी लड़के सबसे पहले स्त्री-पुरुष प्रेम की रूमानी कल्पनाओं के खिलाफ बगावत करना चाहते हैं। यौनाकर्षण उन्हें जितना खींचता है उतना ही भयभीत भी करता है। इस आकर्षण को नकारने के फेर में स्त्री के प्रति अधिक से अधिक हिंसक भाषा का प्रयोग एक तरह की विवशता जान पड़ती है। यह थीम और यह भाषा ज्ञानरंजन की अनेक कहानियों में बार-बार लौटती है। स्त्री उनकी कहानियों में हर जगह मौजूद है लेकिन कोई मजबूत स्त्री चरित्र उनकी किसी कहानी के केंद्र में नहीं है।
जानबूझकर और जोर-शोर से स्त्री की अवहेलना करने की यह प्रवृत्ति दूसरे कहानीकारों और कवियों के यहाँ भी मिलती है। यह पुरुष-दंभ साठोत्तरी लेखन की एक ऐसी सीमा है, जो इसमें व्यक्त होने वाले विद्रोह की किसी बुनियादी कमजोरी की ओर इशारा करता है। अकारण नहीं है कि साठोत्तरी के साथ किसी महत्वपूर्ण स्त्री कथाकार का नाम नहीं जुड़ा है।

