Friday, March 20, 2026
Homeकला-संस्कृतिबहसतलब: जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा, उनका भी अपराध

बहसतलब: जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा, उनका भी अपराध

विलासपुर के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद ‘हिंदी कथा-साहित्य का वर्तमान और भविष्य ‘ में कुलपति प्रो. आलोक कुमार चक्रवाल ने ख्यात कहानीकार मनोज रुपड़ा को उनकी एक छोटी सी, पर उचित टिप्पणी के लिए सभागार से निकाल बाहर किया। क्या लेखकों की स्थिति इतनी गौण या तुच्छ रह गयी है, शिक्षा के गढो में? क्या किसी आगंतुक को मेहमान बनाकर बुलाने के बाद उसके साथ ऐसा व्यवहार करना उचित है, विवेक सम्मत है? क्या विधार्थियों-शोधार्थियों और लेखकों के द्वारा इस आयोजन का बहिष्कार नहीं होना चाहिए था?

विलासपुर के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद ‘हिंदी कथा-साहित्य का वर्तमान और भविष्य’ में कुलपति प्रो. आलोक कुमार चक्रवाल ने ख्यात कहानीकार मनोज रुपड़ा को उनकी एक छोटी-सी पर समुचित टिप्पणी के लिए सभागार से बाहर निकाल दिया। ऐसी टिप्पणियाँ साहित्यिक गोष्ठियों की एक ज़रूरी रवायत रही हैं, यह अपने अनुभव से भी जानती हूँ। यह साहित्य के लोकतांत्रिक होने और बने रहने का चिन्ह भी हैं।

कुलपति एक तरफ कहते हैं- ‘हिंदी जनमानस की भाषा है और कहानियाँ जीवन के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सभी आयामों को समेटे हुए भविष्य की दिशा तय करती हैं।’ वे कहते हैं- ‘कहानी केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, समाज, संवेदना और भविष्य को गढ़ने वाली सृजनात्मक शक्ति है। कहानी जीवन का संपूर्ण दस्तावेज़ है।’ और दूसरी तरफ एक कहानीकार द्वारा उनके सवाल के प्रत्युत्तर में ‘मुख्य विषय पर आने’ की बात कहे जाने के ऐवज में उन्हें सभा से निष्कासित भी कर देते हैं। ज्योंकि वह कोई सम्मानित-आमंत्रित कथाकार न होकर उनकी कक्षा का कोई शरारती-ढीठ बच्चा हो। और अन्य मंचित और आमंत्रित लेखक यह तमाशा चुपचाप देखते रहते हैं।

ताक़त का नशा, शब्दों की हिंसा और लेखकों की चुप्पी, यह कोई अकेली या पहली वारदात नहीं है। यह उस व्यवस्था का लक्षण है जहाँ सत्ता जब निरंकुश होती है तो सबसे पहले भाषा को अपमानित करती है। मंच से बोले गए शब्द, यदि अश्लील, अपमानजनक और असंवेदनशील हैं, तो वे केवल बोलने वाले की मानसिकता का ही नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र का बयान होते हैं जिसने उसे वहाँ तक पहुँचाया और वहाँ बैठे लोगों की तालियों ने जिसे वैधता दी।

किसी कुलपति को, जो ज्ञान, विवेक और नैतिक अनुशासन का प्रतीक माना जाता है, सार्वजनिक मंच से इस तरह की भाषा में बात करना केवल व्यक्तिगत अशिष्टता नहीं है। यह ज्ञान-संस्थानों के नैतिक पतन का सार्वजनिक उद्घोष है। यह बताता है कि सत्ता अब संवाद नहीं, दमन चाहती है; विचार नहीं, अधीनता चाहती है; और असहमति नहीं, मौन चाहती है।

जब ताक़त सिर चढ़कर बोलती है, तो वह सबसे पहले भाषा को गाली बनाती है। भाषा, जो विचार की वाहक होती है, संवेदना की अभिव्यक्ति होती है, उसे सत्ता अपनी बर्बरता का औज़ार बना लेती है। यह वही क्षण होता है जब शब्द अर्थ खो देते हैं और केवल डर पैदा करने का माध्यम बन जाते हैं।

हमें कुलपति की भाषा पर आश्चर्य करने की आवश्यकता सचमुच नहीं है, क्योंकि ऐसी भाषा एक दिन में पैदा नहीं होती। यह वर्षों की तालियों, चमचागिरी और बौद्धिक कायरता का परिणाम होती है। यह उस परिवेश में गढ़ी जाती है जहाँ बेहूदगी को ‘स्पष्टवादिता’, अशिष्टता को ‘साहस’ और ‘आतंक’ को ‘अनुशासन’ कहा जाने लगता है।

असली प्रश्न यह नहीं है कि उसने क्या कहा। असली प्रश्न यह है कि जब यह कहा जा रहा था, तब वहाँ बैठे लोग क्या कर रहे थे? खासकर लेखक समुदाय। यह सच है कि कई बार स्थिति की गंभीरता और जटिलता समझते-समझते थोड़ा वक्त लगता है। पर वह वक्त इतना भी लंबा नहीं होता कि… सवाल यह भी है कि जब वस्तुस्थिति समझ आई, तब लेखकों ने क्या कदम उठाया?

हिंदी साहित्य की परंपरा केवल शब्दों की नहीं, प्रतिरोध की भी परंपरा है। यह वही परंपरा है, जिसने प्रेमचंद को उपनिवेशवाद के विरुद्ध खड़ा किया, मुक्तिबोध को सत्ता के अंधकार में ‘अँधेरे में’ लिखने को विवश किया, रघुवीर सहाय को भाषा की नागरिकता पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित किया। ऐसी परंपरा के उत्तराधिकारी कहलाने वाले लेखक यदि किसी मंच पर एक सिद्धहस्त कथाकार, या किसी भी लेखक के अपमान पर चुप बैठे रहें, तो यह चुप्पी केवल चुप्पी या मौन भर नहीं रह जाती। यह मूक सहभागिता बन जाती है।

यहाँ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि ‘हम असहज थे’, ‘मंच पर बोलना संभव नहीं था’ या ‘यह प्रशासनिक मामला था।’ लेखक का धर्म असुविधा से बचना नहीं होता। लेखक का धर्म सत्ता को असहज करना होता है। उसे सवालों के घेरे में खड़ा करना होता है। यहाँ सवाल किसी एक लेखक का भी नहीं है, न ही किसी एक कुलपति का। सवाल उस बौद्धिक वातावरण का है, जहाँ लेखक सत्ता के साथ बैठना तो स्वीकार करते हैं, लेकिन सत्ता से सवाल करना भूल जाते हैं। और जो निडर होकर अपनी बात कहते हैं, उनका हश्र मनोज रुपड़ा की तरह होता है। यह वह क्षण भी है जब लेखक धीरे-धीरे एक मौकापरस्त, अवसरपरस्त सामान्य इंसान में तब्दील होने लगता है। वह सम्मानों, समितियों और आयोजनों का स्थायी अतिथि होने लगता है।

आज हिंदी का सबसे बड़ा संकट रचनात्मक नहीं, नैतिक है। लेखकों के पास शब्द हैं, विषय हैं, मंच हैं, लेकिन साहस नहीं है। मंचों का लोभ आज इतना बड़ा हो चुका है कि हम ग्राह्य-अग्राह्य, त्याज्य-अत्याज्य का बोध और भेद दोनों बिसरा बैठे हैं। यूँ भी साहस असुविधा लाता है और असुविधा, सुविधाओं को ख़तरे में डालती है।

कुलपति के मंच पर बैठा लेखक जानता है कि अगर वह खड़ा होकर विरोध करेगा, तो अगला आमंत्रण नहीं पाएगा। समिति से नाम कट सकता है। पुरस्कार की संभावना धुँधली हो सकती है। ‘संतन को कहाँ सीकरी सो काम’ की तर्ज़ पर वह भूल जाता है कि ‘लेखक को कहाँ यूनिवर्सिटी/अकादमी सो काम’। और यही वह क्षण है जहाँ लेखक अपने भीतर के समझौतावादी का विचारों और तर्क से बचाव करने लगता है… ‘अभी नहीं’, ‘यह सही समय नहीं’, ‘इससे क्या बदलेगा’ आदि-आदि। या फिर, ‘जिसने बुलाया था, उसकी स्थिति कठिन हो जाएगी’, ‘वह मुश्किलों में फँस जाएगा।’ आप इस क्षण भूल जाते हैं कि जो सरेआम बेइज़्ज़त करके बाहर किया गया है, वह भी आपका ही एक बंधु है, आपकी लेखक बिरादरी का ही एक सदस्य, एक ख्यात लेखक। इतिहास गवाह है कि हर फ़ासीवादी व्यवस्था इन्हीं ‘अभी नहीं’ कहने वालों की मदद से मज़बूत होती है।

यह सच है कि प्रतिरोध केवल मंच से चिल्लाने का नाम नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जहाँ अपमान सार्वजनिक रूप से किया जाए, वहाँ प्रतिरोध की बजाय मौन सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए विरोध भी सार्वजनिक ही होना चाहिए।

यदि लेखक उस मंच से रुपड़ा के साथ या उनके बाद भी उठकर चले जाते, तो वह एक सामूहिक बयान होता। यदि वे सामूहिक रूप से अपनी आपत्ति दर्ज करते, तो वह एक इतिहास बनता।

यदि तदुपरांत भी वे खुलकर अपनी बात कहते या लिखते, तो वह प्रतिरोध की निरंतरता होती। लेकिन जब इनमें से कुछ भी नहीं होता, तब सवाल उठता है कि लेखक आखिर किस बात के गवाह हैं- पक्ष के या सत्ता के? सत्ता के या समय के?
यह घटना केवल एक व्यक्ति को अपमानित करने की घटना नहीं है। यह कथा, साहित्य और स्वतंत्र विचार के अपमान की घटना है। जब एक कथाकार को मंच से इस तरह अपदस्थ किया जाता है, तो दरअसल यह संदेश दिया जाता है कि कहानी कहने वालों की अब कोई ज़रूरत नहीं। अब सिर्फ आदेश मानने वालों की ज़रूरत है। चुपचाप, सिर झुकाए, पीछे-पीछे चलने वाले भेड़ की ज़रूरत। बेज़ुबान भीड़ की ज़रूरत।

यह वही समय है जब विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र नहीं, सत्ता के प्रशिक्षण शिविर बनते जा रहे हैं। जहाँ कुलपति प्रशासक नहीं, सरदार की तरह व्यवहार करने लगते हैं। और लेखक भी यदि चुप हैं, तो वे इस रूपांतरण के मूक साक्षी ही नहीं, सहयोगी भी हैं। इसलिए इस घटना की केवल निंदा करना पर्याप्त नहीं है। निंदा अब एक औपचारिक क्रिया बन चुकी है। चर्चाएँ दो-चार दिन चलेंगी, बयान आएँगे, सोशल मीडिया पर पोस्ट होंगी और फिर सब सामान्य हो जाएगा। आज ज़रूरत है एक संगठित, बौद्धिक और नैतिक अभियान की… ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि ऐसी मानसिकता के विरुद्ध। एक ऐसा अभियान जो यह स्पष्ट करे कि ज्ञान के मंच पर अशिष्टता अस्वीकार्य है। लेखक की गरिमा पर हमला पूरे समाज पर हमला है और सत्ता को भाषा की मर्यादा सिखाना भी प्रतिरोध का एक बेहद ज़रूरी हिस्सा है। यह अभियान किसी राजनीतिक दल का नहीं, किसी संस्था का नहीं— लेखकों, अध्यापकों और छात्रों की साझी चेतना का होना चाहिए।

संयुक्त आयोजक होने के नाते साहित्य अकादेमी को अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। कुलपति द्वारा माफ़ी भी माँगी जानी चाहिए— सार्वजनिक रूप से, स्पष्ट और बिना शर्त। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या हम ऐसे लोगों को बार-बार माफ़ करते रहेंगे? क्या हर बार कहा जाएगा- ‘ज़ुबान फिसल गई?’ या कभी कहा जाएगा- ‘अब नहीं?’
लेखक का काम सिर्फ़ लिखना नहीं, माहौल बनाना भी है। वह माहौल जिसमें अगली बार कोई कुलपति मंच से बोलने से पहले सोचे कि सामने बैठे लोग चुप नहीं रहेंगे।

अंत में, लेखक होना क्या है?
लेखक होना सुविधा नहीं, जोखिम है।
लेखक होना सम्मान नहीं, ज़िम्मेदारी है।

और लेखक होना सत्ता के सामने खड़े होने की तैयारी है, मूक-बधिर बनकर बैठ रहने की नहीं।

यदि लेखक यह भूल जाते हैं, तो फिर उन्हें अपमानित किए जाने पर कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए। क्योंकि जो अपनी आवाज़ दबा या घोंट देता है, उसकी गरिमा हमेशा कोई अन्य तय करता है। यह समय है कि हिंदी के लेखक यह तय करें कि वे मंच की शोभा बनना चाहते हैं या समय की आवाज़? क्योंकि कोई भी इतिहास तालियाँ याद नहीं रखता, पक्ष और विपक्ष याद रखता है। न्याय याद रखता है और जीत याद रखता है।

कविता
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments