Sunday, March 29, 2026
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कालजयीः गुनाहों का देवता- प्रेम, त्याग और आत्मप्रवंचना का द्वंद्व

कालजयी में आज अजय पांडेय चर्चा कर रहे हैं, धर्मवीर भारती के प्रथम श सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘ गुनाहों का देवता’ की। गुनाहों का देवता एक अत्यंत लोकप्रिय और जनप्रिय उपन्यास है, जिसे हमने लंबे समय तक प्रेम की महान गाथा की तरह पढ़ा, पर अब उसके आलोचनात्मक पुनर्पाठ की महती आवश्यकता है।

प्रेम में आज तक जितना विद्रोह हुआ या किया गया उससे कहीं अधिक, उसने समर्पण और आत्मदमन को महिमामंडित किया है। प्रेम जितना जीया गया है, उससे ज्यादा कहीं उसे एक ‘उच्च नैतिक त्रासदी’ में बदलकर सुरक्षित भी कर दिया गया ताकि समाज की संरचनाएँ अक्षुण्ण रह सकें। प्रेम की कथाएँ केवल विद्रोह की नहीं, बल्कि पराजय के सौंदर्यीकरण की भी कथाएँ हैं। गुनाहों का देवता भी इसका जीवंत उदाहरण है।

एक सामान्य सहज और सरल पाठ

प्रेम को बंधनों से बैर है। आप उसे नियमों, परम्‍पराओं अथवा सरहदों की लकीरों में कैद नहीं कर सकते। स्‍वतंत्र होना उसका स्‍वभाव है। मर्यादाओं की भाषा उसे नहीं मालूम। संस्‍कारों की दीवारों से वह परे है। और शायद यही वजह है कि समाज और प्रेम के बीच हमेशा छत्‍तीस का आंकड़ा रहा है। यह दीगर बात है कि तमाम सामाजिक बंधनों के बावजूद इश्‍क होता आया है, बंधनों, मर्यादाओं से टकराता रहा है। विलियम शेक्सपीयर कहते हैं- “The course of true love never did run smooth.”

इतिहास गवाह है कि न केवल भारत में, बल्कि दुनिया के तमाम मुल्‍कों में ज्‍यादातर मोहब्‍बत की बेल सामाजिक बंधनों के ताप से मुरझाती ही आई है। आप हीर-रांझा की बात कर लें, शीरी और फरहाद की बात करें, लैला-मजनूं की चर्चा करें या रोमियो और जूलियट की। इन तमाम मशहूर प्रेम कथाओं में एक बात समान है कि ये दुखांत हैं। इन सभी कथाओं में, सामाजिक बंधनों की दीवारों से टकराकर प्रेम दम तोड़ता आया है। एक खास बात यह भी है कि इन कथाओं से गुजरते हुए जब आप अंत में पहुंचते हैं, तो आपके हृदय में एक हूक सी उठती है। आप यदि चेनाब नदी के किनारे झांग (पाकिस्‍तान) में मौजूद हीर और रांझा की मजार पर जाएंगे, तो उस हूक से आपका हृदय भी जरूरत व्‍यथित होगा। कहीं छल से, तो कही बल से प्रेम को बंधनों में बांधने का हश्र हृदयविदारक हुआ है। ऐसा ही मंजर कल भी था और बहुत हद तक आज भी है। यही वजह है कि प्रेम कथाएं कालजयी हैं।

हिन्‍दी साहित्‍य के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार धर्मवीर भारती के मशहूर उपन्‍यास गुनाहों का देवता में सुधा और चन्‍दर कथा को पढ़ते हुए और इस निश्‍छल प्रेम का हश्र देखकर दिल में वैसी ही हूक उठती है।

यह उपन्यास केवल एक प्रेमकथा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, नैतिक बंधनों, सामाजिक मर्यादाओं और आत्मबलिदान की जटिल मनोभूमि का सूक्ष्म चित्रण है। यही कारण है कि इसे “कालजयी” कहा जाता है,अर्थात् जो हर युग में प्रासंगिक रहे।

उपन्यास का केंद्र है चंदर और सुधा का निष्कलुष, किंतु अपूर्ण प्रेम। चंदर एक मेधावी, संवेदनशील युवक है जो अपने गुरु डॉ. शुक्ला के घर आता-जाता है। वहीं उसकी मुलाकात होती है सुधा से, सुधा यानी डॉ. शुक्ला की पुत्री। दोनों के बीच आत्मीयता, स्नेह और एक अनकहा प्रेम विकसित होता है।

परंतु यह प्रेम सामाजिक संरचनाओं, संस्कारों और आत्मसंयम की दीवारों से टकराता है। चंदर अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता और सम्मान के कारण अपने प्रेम को स्वीकार नहीं कर पाता। वह स्वयं को त्याग देता है और सुधा का विवाह कहीं और होने देता है।

यहाँ प्रेम का संघर्ष केवल बाहरी नहीं, बल्कि भीतरी है; कर्तव्य और भावना के बीच। यही आंतरिक द्वंद्व इस रचना को साधारण प्रेमकथा से ऊपर उठाकर दार्शनिक ऊँचाई देता है।

गुनाहों का देवता प्रेम को शारीरिक या रोमांटिक सीमाओं में नहीं बाँधता। यहाँ प्रेम एक साधना है। एक ऐसा भाव जो त्याग, संयम और आत्मपीड़ा से गुजरकर निर्मल होता है।

चंदर का चरित्र इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह प्रेम करता है, पर उसे भोगना नहीं चाहता; वह उसे एक उच्चतर नैतिक स्तर पर ले जाना चाहता है। परंतु यही आदर्शवाद अंततः उसे भीतर से तोड़ देता है।

यहाँ भारती यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या प्रेम का सर्वोच्च रूप त्याग है? या क्या अत्यधिक आदर्शवाद स्वयं एक प्रकार का ‘गुनाह’ बन जाता है? इसी प्रश्नवाची स्वर ने इस उपन्यास को कालातीत बना दिया है।

उपन्यास का परिवेश इलाहाबाद का बौद्धिक वातावरण है, जहाँ विश्वविद्यालय, मध्यवर्गीय परिवार, संस्कार और सामाजिक मर्यादाएँ एक साथ उपस्थित हैं। यह वह समय था जब भारतीय समाज आधुनिकता और परंपरा के बीच संक्रमण से गुजर रहा था। स्त्रियाँ शिक्षित हो रही थीं, परंतु विवाह और परिवार की सीमाएँ अभी भी कठोर थीं।
सुधा और पम्मी के माध्यम से भारती ने स्त्री की दो छवियाँ प्रस्तुत कीं। एक पारंपरिक, दूसरी आधुनिक। इन दोनों के बीच चंदर का झूलना उस युग के पुरुष मन की अस्थिरता को दर्शाता है। यही सामाजिक यथार्थ इसे ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी बना देता है।

धर्मवीर भारती मूलतः कवि थे, और उनकी काव्यात्मक संवेदना इस उपन्यास में स्पष्ट झलकती है। भाषा सरल होते हुए भी अत्यंत भावपूर्ण है। संवादों में स्वाभाविकता है, और वर्णन में एक लयात्मक प्रवाह। कई अंश ऐसे हैं जो पाठक के हृदय को सीधे स्पर्श करते हैं।

भारती की भाषा में भावनात्मक तीव्रता है, परंतु वह अतिनाटकीय नहीं होती। यह संतुलन ही रचना को साहित्यिक ऊँचाई देता है।

चंदर का चरित्र आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। वह अपने आदर्शों का बंदी है। वह स्वयं को ‘गुनाहगार’ समझता है क्योंकि उसने अपने प्रेम को सामाजिक स्वीकृति नहीं दी।

यह आत्मग्लानि उसे पम्मी की ओर ले जाती है, जहाँ वह अपने भीतर के दमन को तोड़ना चाहता है। परंतु वहाँ भी उसे संतोष नहीं मिलता।

इस आंतरिक टूटन और आत्मसंघर्ष उपन्यास को मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान करता है। यही कारण है कि यह कृति केवल भावुक प्रेमकथा नहीं, बल्कि मानव-मन की जटिलताओं का दस्तावेज़ है।

उपन्यास का अंतिम भाग अत्यंत मार्मिक है। सुधा की पीड़ा, चंदर का पश्चाताप और परिस्थितियों की त्रासदी, ये सब मिलकर एक ऐसी करुणा का निर्माण करते हैं जो पाठक को भीतर तक झकझोर देती है।

यह करुणा सस्ती भावुकता नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य विडंबना का परिणाम है। भारती यहाँ यह संकेत देते हैं कि जीवन में आदर्श और वास्तविकता के बीच संतुलन आवश्यक है; अन्यथा दोनों ही टूट जाते हैं।

किसी रचना का कालजयी होना इस बात पर निर्भर करता है कि वह समय के साथ अप्रासंगिक न हो। गुनाहों का देवता आज भी युवाओं के बीच उतनी ही लोकप्रिय है जितनी दशकों पहले थी। इसके पात्र आज भी जीवित लगते हैं, इसकी पीड़ा आज भी सच्ची प्रतीत होती है।

तस्वीरः अमेजन

नये कोण, नये अर्थ और नये सवाल

धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता एक ऐसी कृति है, जिसे हमने प्रेम की महान कथा के रूप में स्वीकार किया, पर शायद अब उसके एक आलोचनात्मक पुनर्पाठ की आवश्यकता है। जिसे आज के संदर्भों में और वर्तमान समय की तुला पर तोलकर देखा जा सके। क्योंकि वही कृति कालजयी होती है, जो कालातीत हो और और हर समय समकालीन। तो अब कुछ मुख्य विचारणीय ब़िदुओं के तहत इसकी समीक्षा की जाये।

गुनाहों का देवता को अब केवल एक “महान प्रेमकथा” की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं है। यह एक ऐसी कृति है, जो जितनी संवेदनशील है, उतनी ही वैचारिक रूप से संदिग्ध भी।यह हमें मजबूर करती है पूछने के लिए कि ‘क्या त्याग ही प्रेम है, या यह प्रेम से बचने का सबसे सुंदर तरीका है?’

और इससे भी आगे—क्या हमने इस उपन्यास को महान कहकर, दरअसल उस समाज को वैधता दी है जो प्रेम से डरता है और उसे नियंत्रित करना चाहता है?

गु.का.दे. में अनकहा प्रेम: भाषा के पार या साहस का अभाव?

चंदर और सुधा का प्रेम अपनी अभिव्यक्ति में मितभाषी है। -‘कुछ संबंध ऐसे होते हैं जिनका कोई नाम नहीं होता।’
यह कथन उपन्यास की संवेदना को व्यक्त करता है, पर साथ ही एक प्रश्न भी खड़ा करता है कि- क्या नामहीनता प्रेम की ऊँचाई है, या उसकी अस्वीकृति? यहीं यह प्रेम अपने ही मौन में कैद हो जाता है।

“One is loved because one is loved. No reason is needed for loving.”
— Paulo Coelho

यदि प्रेम को तर्क या मर्यादा की आवश्यकता नहीं, तो फिर उसे व्यक्त करने में यह संकोच क्यों?

चंदर: आदर्श या आत्मप्रवंचना का शिकार?

यहाँ एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक प्रश्न उभरता है, क्या चंदर का त्याग वास्तव में त्याग है, या वह निर्णय लेने से बचने का एक परिष्कृत रूप है? क्या वह प्रेम के प्रति ईमानदार है, या वह सामाजिक स्वीकृति के दबाव में अपने भावों का परित्याग करता है? इस संदर्भ में देखा जाए तो चंदर का आदर्शवाद कहीं-न-कहीं आत्मप्रवंचना का रूप ले लेता है। वह प्रेम को उच्चतर नैतिक धरातल पर स्थापित करने की कोशिश में उसे जीवन से ही विस्थापित कर देता है।

चंदर का चरित्र इस उपन्यास का सबसे जटिल बिंदु है और इस उपन्यास का सबसे विचारोत्तेजक पक्ष भी। वह प्रेम करता है, पर उसे स्वीकार नहीं करता।

‘मैं तुम्हें पाकर तुम्हें छोटा नहीं करना चाहता, सुधा।’

‘मैं तुम्हें अपने लिए नहीं चाहता, सुधा…’

यह कथन त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है, परंतु आलोचनात्मक दृष्टि से यह प्रश्न भी उठता है- ‘क्या यह त्याग वास्तव में त्याग है, या निर्णय से बचने का एक परिष्कृत रूप?

चंदर अपने गुरु के प्रति कर्तव्य और सामाजिक मर्यादाओं के दबाव में अपने प्रेम का निषेध करता है। परंतु यह निषेध कहीं-न-कहीं उसकी आंतरिक असमर्थता का भी द्योतक है। आत्मवंचना जैसा कुछ…वह अपने निर्णय को नैतिक ऊँचाई का नाम देता है, जबकि भीतर वह एक गहरे द्वंद्व और भय से संचालित है।

इस प्रकार, यह उपन्यास प्रेम के साथ-साथ उस नैतिकता की भी आलोचना करता है, जो मनुष्य को उसके ही अहसासों से काट देती है। यह त्याग तो है, पर क्या यह सचमुच त्याग है? जीन पॉल सार्त्र कहते हैं-“We are our choices.” चंदर का निर्णय केवल नैतिकता नहीं, उसकी व्यक्तिगत पसंद भी है। वह प्रेम को चुनता नहीं, वह उससे बचता है।“Man is condemned to be free.”- (Jean-Paul Sartre ही)अर्थात्, निर्णय से बचना संभव नहीं। और चंदर का “त्याग” भी एक निर्णय है। इस दृष्टि से देखें तो उसका आदर्शवाद एक प्रकार की आत्मप्रवंचना बन जाता है।

सुधा: समर्पण की करुणा या सामाजिक निर्मिति?

सुधा का चरित्र इस त्रासदी का दूसरा पक्ष है। वह प्रेम में पूर्ण समर्पण का प्रतीक है, परंतु उसका यह समर्पण भी आलोचनात्मक दृष्टि से परखा जाना चाहिए। क्या यह समर्पण उसकी स्वायत्त इच्छा का परिणाम है, या वह उन सामाजिक-सांस्कृतिक संस्कारों का विस्तार है, जो स्त्री को त्याग और बलिदान के लिए प्रशिक्षित करते हैं? इस प्रकार, सुधा केवल एक प्रेमिका नहीं, बल्कि उस स्त्री-मन की प्रतिनिधि बन जाती है, जो अपने ही भावों को सामाजिक मर्यादाओं के भीतर ढालने के लिए बाध्य है।

सुधा का चरित्र हिंदी पाठक के लिए हमेशा से करुणा का केंद्र रहा है। ‘मैं तुम्हारी हूँ-चाहे जो हो।’ यह समर्पण जितना मार्मिक है, उतना ही विचारोत्तेजक भी।

“One is not born, but rather becomes, a woman.”-Simone de Beauvoir

लेकिन सुधा का समर्पण उसकी स्वाभाविक प्रकृति नहीं, बल्कि एक सामाजिक निर्माण भी हो सकता है। जहाँ स्त्री को त्याग और बलिदान के लिए तैयार किया जाता है।

“The most common way people give up their power is by thinking they don’t have any.-Alice Walker

क्या सुधा का प्रेम उसकी शक्ति है, या उसी शक्ति का विसर्जन? यह प्रश्न इस चरित्र को नए अर्थ देता है।

पम्मी: दमन का प्रतिरोध और अस्वीकार की त्रासदी

पम्मी का चरित्र इस त्रिकोण में एक विघटनकारी उपस्थिति के रूप में आता है। वह आधुनिकता, देहबोध और आत्मस्वीकृति का प्रतिनिधित्व करती है। चंदर का उसके प्रति आकर्षण केवल शारीरिक नहीं, बल्कि दमन के प्रतिरोध का भी संकेत है। यहाँ भारती अनायास ही एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक सत्य को उद्घाटित करते हैं, दमन अंततः विकृति को जन्म देता है। चंदर का पम्मी की ओर झुकाव इसी दमन का परिणाम है, जो उसे न तो संतोष देता है और न ही मुक्ति। ‘मनुष्य अपने को जितना दबाता है, उतना ही भीतर से टूटता है।'(गु.का.दे) चंदर का उसके प्रति आकर्षण उसके भीतर के दमन का परिणाम है। परंतु यह संबंध भी उसे मुक्ति नहीं देता। क्योंकि समस्या बाहरी नहीं, उसकी चेतना में है और उसकी चेतना से ही सम्बद्ध है।

इस दृष्टि से देखें तो यह उपन्यास केवल प्रेम का आख्यान नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले दमन,अपराधबोध और आत्मसंघर्ष की कथा है और पम्मी इस कथा में आधुनिकता और स्वतंत्रता की प्रतिनिधि। ‘

पम्मी वह स्त्री है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता लेकिनवह इस कथा की सबसे ईमानदार, और इसलिए सबसे अस्वीकार्य, उपस्थिति है। वह प्रेम को देह, इच्छा और स्वतंत्रता के साथ जीती है और ठीक इसी कारण वह ‘समस्या’बन जाती है। यह उपन्यास उसे अंततः अस्वीकार देता है, क्योंकि अगर पम्मी स्वीकार कर ली जाए, तो पूरा नैतिक ढाँचा टूट जाएगा।

इसलिए पम्मी को कभी पूरी वैधता नहीं मिलती।वह एक “विकृति” की तरह उपस्थित रहती है।और यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी वैचारिक सीमा है। यहाँ एक असुविधाजनक प्रश्न यह है-क्या ‘उचित’ होना हमेशा सही होना भी होता है?

नैतिकता बनाम जीवन

यह उपन्यास बार-बार नैतिकता को जीवन पर वरीयता देता है। “प्यार बहुत पवित्र चीज़ है, उसे पाना ही सब कुछ नहीं होता।”( गु.का.दे.) यह कथन प्रेम को ऊँचा उठाता है पर साथ ही उसे जीवन से अलग भी कर देता है।

“Love is not love which alters when it alteration finds.”-William Shakespeare

यदि प्रेम बदलता नहीं, तो फिर चंदर का प्रेम क्यों बदल जाता है?

करुणा: संवेदना या स्वीकृति?

उपन्यास का अंत गहरी करुणा से भरा है। ‘जीवन में सब कुछ पाना संभव नहीं होता।'(गु.का.दे)यह वाक्य जीवन की विडंबना को स्वीकार करता है। पर क्या यह उस विडंबना को चुनौती भी देता है? यहीं पाठक के सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है- ‘क्या हम इस दुख को केवल महसूस करते हैं, या उसके कारणों पर भी प्रश्न उठाते हैं?’

यह उपन्यास अपने मूल में एक त्रासदी है। परंतु यह त्रासदी बाहरी परिस्थितियों की अपेक्षा , मनुष्य के भीतर घटित होती है। चंदर और सुधा का संबंध इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है कि उसमें प्रेम की स्वीकृति से अधिक उसका निषेध सक्रिय है। यहाँ प्रेम की अभिव्यक्ति से अधिक उसका दमन कथा को संचालित करता है।

चंदर का चरित्र इस उपन्यास का सबसे जटिल और विवादास्पद पक्ष है। वह एक ओर संवेदनशील, विचारशील और नैतिक व्यक्ति है, तो दूसरी ओर वह अपने ही आदर्शों का बंदी भी है। उसका त्याग, जिसे सामान्यतः उच्च नैतिकता का प्रतीक माना जाता है, दरअसल एक गहरे आंतरिक द्वंद्व का परिणाम है।

भाषा और शिल्प अर्थात् काव्यात्मकता और संवेदनात्मक अनुशासन

धर्मवीर भारती की काव्यात्मक संवेदना इस उपन्यास को एक विशिष्ट लय प्रदान करती है। भाषा सरल है, परंतु उसमें गहरी भावात्मक तीव्रता है। यह भावुकता कभी-कभी आलोचना का विषय भी बनती है, परंतु यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति भी है, क्योंकि यही पाठक को पात्रों के भीतर प्रवेश करने की अनुमति देती है

करुणा से चिंतन तक: उपन्यास का अंत

उपन्यास का अंतिम भाग करुणा की चरम परिणति है।

‘जीवन में कुछ खोकर ही कुछ पाया जाता है।’पर क्या हर खोना आवश्यक है? ‘प्रेम अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है।’ पर क्या हर उत्तरदायित्व प्रेम की हत्या पर ही आ खत्म होता है।’

उपन्यास का अंत एक गहरी करुणा का निर्माण करता है। पर यह करुणा निष्क्रिय नहीं है। यह पाठक को प्रश्नों के साथ छोड़ती है। क्या प्रेम का आदर्श रूप वही है जो अपूर्ण रह जाए? क्या त्याग ही प्रेम की अंतिम परिणति है, या यह मनुष्य की कमजोरी का एक सौंदर्यीकरण मात्र? क्या नैतिकता के नाम पर भावनाओं का दमन वास्तव में नैतिक है? यह प्रश्न पाठक को केवल भावुक नहीं करता, बल्कि उसे आत्ममंथन के लिए भी बाध्य करता है।

एक अनंत प्रश्न

गुनाहों का देवता आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि यह हमें सवालों के उत्तर नहीं देता, बल्कि प्रश्नों के साथ छोड़ता है। ये प्रश्न ही इस कृति की आत्मा है।

इन प्रश्नों के कारण ही गुनाहों का देवता एक जीवित कृति बन जाती है, जो हर पाठ और हर पाठक के लिए नए अर्थ खोलती है। आज के समय में, जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय के प्रश्न अधिक मुखर हैं, इस उपन्यास को एक नए परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जा सकता है।

इस प्रकार, यह कृति अपने समय और समाज का दस्तावेज़ तो बनती है, पर साथ ही हर समय के लिए एक आलोचनात्मक दर्पण भी।

गुनाहों का देवता हमें यह सिखाता है कि प्रेम केवल अनुभूति नहीं, बल्कि एक नैतिक और अस्तित्वगत प्रश्न भी है। यह हमें अपने भीतर झाँकने के लिए बाध्य करता है। यह पूछने के लिए कि हम प्रेम को जीते हैं, या उससे डरकर उसे त्याग देते हैं। और शायद यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति है और सार्थकता भी।यह हमें उत्तर नहीं देता, बल्कि हमें प्रश्नों के साथ जीना सिखाता है। यह किताब एक सतत संवाद है- समाज से, नैतिकता से, और सबसे अधिक, हमारे अपने भीतर से।और शायद इसी दुविधा में इसकी कालजयिता निहित है।

अजय पांडेय
अजय पांडेय
अजय पांडेय पेशे से पत्रकार हैं। पत्रकारिता और जनसंपर्क के क्षेत्र में करीब 25 वर्षों का अनुभव। देश के प्रमुख प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्रों में कार्य का अनुभव। हिंदी साहित्य से गहरा लगाव।
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