Friday, March 20, 2026
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20 साल लगाकर गणितज्ञ ने बनाया ‘न हल होने वाला’ सवाल, AI ने 11वें प्रयास में ही सुलझाया

पोलैंड के गणितज्ञ बार्तोश नास्क्रेन्त्स्की (Bartosz Naskręcki) ने 20 साल लगाकर गणित की जिस रिसर्च लेवल की प्रॉब्लम तैयार की, और यह दावा किया था कि इसे एआई नहीं सुलझा सकता, जीपीटी-5.4 ने उसे महज 11 वीं कोशिश में हल कर दिया।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम मेधा (एआई) को लेकर लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि क्या यह केवल एक उन्नत कैलकुलेटर है या इसमें इंसानी दिमाग की तरह तर्क करने की क्षमता है? हाल ही में सामने आए एक मामले ने इस बहस को नई दिशा दे दी है।

दरअसल पोलैंड के गणितज्ञ बार्तोश नास्क्रेन्त्स्की (Bartosz Naskręcki) ने 20 साल लगाकर गणित की जिस रिसर्च लेवल की प्रॉब्लम तैयार की, और यह दावा किया था कि इसे एआई नहीं सुलझा सकता, जीपीटी-5.4 ने उसे महज 11 वीं कोशिश में हल कर दिया।

Garryslist की रिपोर्ट के अनुसार, बार्तोश नास्क्रेन्त्स्की ने खुद एआई की सीमाएं साबित करने के लिए बेहद कठिन गणितीय सवाल तैयार किया था, अब मान रहे हैं कि मशीनें गहरे गणितीय तर्क तक पहुंचने लगी हैं।

बार्तोश नास्क्रेन्त्स्की एडम मित्स्केविच यूनिवर्सिटी (Adam Mickiewicz University) में गणित और कंप्यूटर विज्ञान संकाय के उप-डीन हैं। इससे पहले तक वे मानते थे कि एआई केवल एक अत्यधिक उन्नत कैलकुलेटर है। उन्होंने कहा था कि मशीनें गणना तो कर सकती हैं, लेकिन रचनात्मकता, अंतर्ज्ञान और अलग-अलग अवधारणाओं के बीच संबंध जोड़ने जैसी क्षमताएं अभी भी मानव दिमाग की ही विशेषता हैं।

हालांकि एक हालिया प्रयोग के बाद उनके विचार बदल गए हैं। उनके मुताबिक एआई मॉडल GPT-5.4 ने जिस तरह एक कठिन गणितीय समस्या का समाधान निकाला, वह उनके लिए ‘मूव-37’ जैसा क्षण था। ऐसा क्षण जो किसी क्षेत्र की समझ को ही बदल देता है।

एआई की क्षमता परखने के लिए बनाया गया था खास सवाल

नास्क्रेन्त्स्की उन चुनिंदा यूरोपीय गणितज्ञों में शामिल हैं जिन्हें एआई के लिए बनाए गए कठिन गणितीय परीक्षण “फ्रंटियरमैथ” के लिए समस्याएं तैयार करने का निमंत्रण मिला था। यह बेंचमार्क एआई की गणितीय क्षमता को परखने के लिए बनाया गया है।

नास्क्रेन्त्स्की ने अपने करियर के 20 वर्षों का अनुभव निचोड़कर एक ऐसा गणितीय प्रश्न तैयार किया था, जिसे सुलझाना किसी भी एआई मॉडल के लिए नामुमकिन माना जा रहा था। ‘फ्रंटियरमैथ’ बेंचमार्क के तहत तैयार यह प्रश्न गैलोइस थ्योरी और बीजीय ज्यामिति के बेहद कठिन सिद्धांतों पर आधारित था। नास्क्रेन्त्स्की ने जो समस्या बनाई, वह टियर-4 श्रेणी की थी, जिसे शोध स्तर की सबसे कठिन समस्याओं में गिना जाता है।

नास्क्रेन्त्स्की ने जानबूझकर इसमें कई ऐसे ‘अवरोध’ डाले थे जिनसे वर्तमान मॉडल्स भ्रमित हो जाएं। उनका मानना था कि गहरी गणितीय तर्कशक्ति के लिए जिस रचनात्मकता और अंतर्ज्ञान की आवश्यकता होती है, वह मशीनों के पास नहीं है। लेकिन इस सप्ताह जीपीटी-5.4 ने उनके इस दावे को पूरी तरह गलत साबित कर दिया।

कई कोशिशों के बाद मिला समाधान

Epoch AI ने जब जीपीटी-5.4 पर नास्क्रिन्की के इस जटिल प्रश्न का परीक्षण किया, तो शुरुआती 10 प्रयासों में मॉडल पूरी तरह विफल रहा। लेकिन 11वें प्रयास में एआई ने वह कर दिखाया जिसे नास्क्रिन्की ने “मूव 37” जैसा करिश्मा करार दिया। एआई ने किसी ‘शॉर्टकट’ या डेटा रटने की पद्धति के बजाय एक बेहद प्रभावशाली ‘समेशन ट्रिक’ का उपयोग किया। इसने अंकगणित और ज्यामिति के बीच एक ऐसा सुंदर पैटर्न खोज निकाला, जिसने समाधान का रास्ता साफ कर दिया।

नास्क्रेन्त्स्की के अनुसार, यह कोई ‘हैकिंग’ नहीं बल्कि शुद्ध और उच्च स्तरीय गणित था। मॉडल ने अंकगणित और ज्यामिति के बीच संबंध का विश्लेषण करते हुए एक खास गणितीय तरकीब का उपयोग किया, जिससे जटिल गणितीय उपकरणों की जरूरत कम हो गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कोई तकनीकी चाल नहीं थी, बल्कि पूरी तरह वैध गणितीय तर्क था। उनके शब्दों में, समाधान का तरीका इतना दिलचस्प था कि एक पेशेवर गणितज्ञ के रूप में भी उन्हें वह प्रभावशाली लगा। हालांकि सफलता की दर मात्र 9% (1/11) रही, लेकिन विशेषज्ञ इसे एक “क्वालिटेटिव शिफ्ट” मान रहे हैं, जो दर्शाता है कि एआई अब पीएचडी स्तर के शोधकर्ताओं के बराबर सोचने की क्षमता की ओर बढ़ रहा है।

फ्रंटियरमैथ बेंचमार्क के आंकड़े बताते हैं कि पिछले डेढ़ साल में एआई की गणितीय क्षमता तेजी से बढ़ी है। 2024 के अंत में जब यह परीक्षण शुरू हुआ था, तब सबसे उन्नत एआई मॉडल भी सबसे कठिन समस्याओं में दो प्रतिशत से कम हल कर पा रहे थे।

उस समय दुनिया के प्रमुख गणितज्ञ Terence Tao ने इन समस्याओं को बेहद कठिन बताते हुए कहा था कि एआई को इन्हें हल करने में कई वर्ष लग सकते हैं। लेकिन उसके बाद से प्रदर्शन में लगातार सुधार हुआ है। पहले एआई मॉडल अपेक्षाकृत आसान स्तर की समस्याओं का लगभग एक-चौथाई हिस्सा हल कर पा रहे थे। बाद में यह क्षमता बढ़कर लगभग आधी समस्याओं तक पहुंच गई। सबसे कठिन टियर-4 समस्याओं में भी एआई की सफलता दर तेजी से बढ़ी है। अब तक इस श्रेणी की लगभग आधी समस्याएं कम से कम एक बार एआई द्वारा हल की जा चुकी हैं।

फिर भी कुछ सीमाएं बरकरार

भले ही एआई ने शोध-स्तर की समस्याओं में अपनी धाक जमा ली है, लेकिन एक मोर्चा अभी भी अछूता है। जीपीटी-5.4 को जब ‘ओपन प्रॉब्लम्स’ दी गईं यानी वे सवाल जो आज तक किसी भी इंसान ने हल नहीं किए हैं तो वहां उसका स्कोर ‘शून्य’ रहा। इसका सीधा अर्थ यही है कि एआई अभी भी उस ज्ञान की सीमा को नहीं लांघ पाया है जहाँ मानव बुद्धि भी रुकी हुई है। इसके अलावा, एआई की इस सफलता के पीछे कंप्यूटिंग पावर का भारी इस्तेमाल भी एक पहलू है; एक प्रश्न को हल करने में मॉडल ने लाखों टोकन और घंटों की प्रोसेसिंग का उपयोग किया।

इस अनुभव के बाद नास्क्रेन्त्स्की का मानना है कि यह एआई द्वारा गणितज्ञों के विस्थापन का नहीं, बल्कि उनके सशक्तिकरण का दौर है। उन्होंने खुद स्वीकार किया कि अब वे एआई का उपयोग अपने शोध में गलतियां खोजने और नई दिशाएं तलाशने के लिए कर रहे हैं। जिस गणितज्ञ ने एआई को “अक्षम” साबित करने के लिए टेस्ट बनाया था, आज वही कह रहे हैं कि अब गणितज्ञों का असली काम केवल “अतरंगी और नए विचारों” को जन्म देना रह जाएगा, क्योंकि जटिल गणनाएं और तर्क अब मशीनों के जिम्मे हैं।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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