केंद्र की एनडीए सरकार ने एटॉमिक एनर्जी बिल, 2025 को मंजूरी दे दी है। यह बिल भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े मौजूदा कानूनों में बड़े बदलाव की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। कैबिनेट की हरी झंडी के बाद सरकार संसद के शीतकालीन सत्र के आखिरी हफ्ते में इससे जुड़े संशोधन पेश करने की तैयारी में है। इन संशोधनों का मकसद 1962 के एटॉमिक एनर्जी एक्ट में बदलाव कर निजी कंपनियों को भारत में परमाणु बिजली परियोजनाओं में शामिल होने की अनुमति देना है।
अब तक परमाणु ऊर्जा भारत के सबसे बंद और पूरी तरह सरकारी नियंत्रण वाले क्षेत्रों में रही है। नए बिल के तहत निजी कंपनियां आने वाली न्यूक्लियर पावर परियोजनाओं में 49 प्रतिशत तक हिस्सेदारी ले सकेंगी। इसके साथ ही विदेशी कंपनियों और वैश्विक सॉवरेन वेल्थ फंड्स के लिए भी, भारतीय साझेदारों के साथ मिलकर, इन परियोजनाओं में निवेश का रास्ता खुल सकता है।
एटॉमिक एनर्जी बिल, 2025 को नया नाम दिया गया है- सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया यानी SHANTI बिल। यह कदम 2047 तक भारत की परमाणु बिजली क्षमता को करीब 100 गीगावॉट तक पहुंचाने की योजना से जुड़ा है। फिलहाल देश की स्थापित परमाणु क्षमता 8 गीगावॉट से भी कम है। तुलना करें तो अमेरिका की न्यूक्लियर क्षमता करीब 100 गीगावॉट, फ्रांस की 65 और चीन की 58 गीगावॉट है।
एसएमआर पर बड़ा दांव
परमाणु क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार ने 20,000 करोड़ रुपये के बजट के साथ न्यूक्लियर एनर्जी मिशन की भी घोषणा की है। इसका फोकस स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर यानी एसएमआर के रिसर्च और डेवलपमेंट पर है। सरकार का लक्ष्य है कि 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी एसएमआर चालू किए जाएं।
गौरतलब है कि ये पारंपरिक परमाणु रिएक्टरों से छोटे होते हैं, लेकिन लगातार बिजली देने में सक्षम होते हैं। एनपीसीआईएल ने मार्च 2024 में स्वदेशी एसएमआर के लिए टेंडर जारी किया था। रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा पावर, अडानी पावर समेत कई बड़ी निजी कंपनियों ने इसमें रुचि दिखाई है। देश के छह राज्यों- गुजरात, मध्य प्रदेश, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ में 16 संभावित साइट चिन्हित की गई हैं।
भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर द्वारा तीन तरह के एसएमआर डिजाइन किए जा रहे हैं, जिनमें भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (200 मेगावॉट), भारत स्मॉल रिएक्टर (220 मेगावॉट) और 55 मेगावॉट का छोटा रिएक्टर शामिल है। इनमें से कुछ लाइट वॉटर रिएक्टर तकनीक पर आधारित होंगे। सरकार का कहना है कि फिलहाल इन परियोजनाओं में विदेशी सहयोग की जरूरत नहीं है और पहले डेमो यूनिट्स देश में ही स्थापित की जाएंगी।
इन संशोधनों के जरिए निजी क्षेत्र को न केवल बिजली उत्पादन, बल्कि परमाणु खनिजों की खोज, ईंधन निर्माण, उपकरण निर्माण, प्लांट संचालन और नागरिक उपयोग की परमाणु तकनीकों के शोध में भी शामिल करने की योजना है।
विदेशी निवेश क्यों जरूरी
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से लिखा है कि भारत परमाणु क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग दो वजहों से चाहता है। पहली, कोयले के विकल्प के तौर पर भरोसेमंद बेस लोड बिजली की जरूरत। दूसरी और ज्यादा अहम वजह है पूंजी की कमी। अधिकारी के अनुसार, भारत के पास तकनीक तो है, लेकिन बड़े पैमाने पर विस्तार के लिए पूंजी चाहिए। पश्चिम एशिया के सॉवरेन फंड समेत कई विदेशी निवेशकों ने शुरुआती रुचि दिखाई है।
सरकार सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010 में भी बदलाव की तैयारी कर रही है। यह कानून परमाणु हादसे की स्थिति में मुआवजे और जिम्मेदारी तय करता है, लेकिन विदेशी कंपनियां इसे लंबे समय से निवेश में बाधा बता रही हैं। खासकर ‘राइट ऑफ रिकॉर्स’ प्रावधान को लेकर चिंता जताई जाती रही है, जिसमें ऑपरेटर की जिम्मेदारी सप्लायर तक पहुंच सकती है। अब सरकार देनदारी की सीमा तय करने और राज्य समर्थित फंड जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है।
पिछले एक दशक में भारत ने सौर और पवन ऊर्जा पर जोर दिया है, लेकिन इसके साथ ग्रिड अस्थिरता की समस्या भी सामने आई है। सूरज न होने या हवा न चलने पर बिजली उत्पादन गिर जाता है। दूसरी ओर, कोयला आधारित बिजली का विस्तार भी सीमित किया जा रहा है। ऐसे में सरकार मानती है कि परमाणु ऊर्जा एक भरोसेमंद और अपेक्षाकृत कार्बन-न्यूट्रल बेस लोड विकल्प है।

