कुछ किताबों को पढ़ कर मन देर तक उदास रहता है। अपनी मनुष्यता और अपनी सभ्यता पर विचलित करने वाला संदेह हमें व्यथित करता रहता है।
गरिमा श्रीवास्तव का उपन्यास ‘आउशवित्ज़ एक प्रेम कथा’ ऐसी ही किताब है। यह किताब आपको इतिहास के यंत्रणागृहों में ले जाती है। यह किताब बताती है कि मनुष्य किस हद तक क्रूर हो सकता है। यह किताब याद दिलाती है कि नस्ल, धर्म या किसी भी आधार पर पैदा श्रेष्ठता-ग्रंथि कितनी खूंखार हो सकती है और सभ्यता से अपनी कितनी बड़ी और कड़ी क़ीमत वसूल सकती है। यह किताब याद दिलाती है कि युद्ध हो या क्रांति- सबके नायक पुरुष होते हैं और सबकी पीड़ित स्त्रियां होती हैं। हर जगह वे लुटती-पिटती, बलात्कृत होती और फिर छोड़ दी जाती हैं। और किताब यह भी बताती है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी स्त्री बची रहती है- वह अपनी संततियों को इतिहास लिखने के लिए तैयार कर जाती है।
‘आउशवित्ज़ एक प्रेम कथा’ कई स्तरों पर चलने वाला उपन्यास है। मूल कथा आउशवित्ज़ की भयावह स्मृति और उसके आसपास बुनी गई है। पोलैंड की यात्रा पर गई कथावाचिका प्रतीति सेन आउशवित्ज़ (जिसे हम अब तक ऑश्वित्ज़ के रूप में पढ़ने के आदी रहे है) के यातनाघरों तक जाती है- उन गैस चैंबरों तक जिसमें असहनीय यातनाएं देने के बाद यहूदियों को मरने के लिए ठूंस दिया जाता था। इस कथा से गुज़रते हुए अगर हमारे रोंगटे खड़े नहीं होते तो हमारी मनुष्यता में कुछ खोट है। लेखिका ने बहुत विस्तार से आउशवित्ज़ के प्रामाणिक ब्योरे लिए हैं। यह किताब पढ़ते हुए ही खयाल आता है कि हिटलर के नाज़ी जर्मनी वाले दौर में साठ लाख यहूदियों की हत्या तो उस महात्रासदी का बस एक पहलू है- बेशक सबसे बड़ा पहलू- लेकिन उस त्रासदी के चेहरे और भी हैं। यह किताब याद दिलाती है कि आउशवित्ज़ में लोगों को मारने से पहले उनकी मनुष्यता छीनी गई, उन्हें पशु बनाया गया। जो लोग कैंपों में खटने-मरने के लिए लाए जाते थे, उन सबके कपड़े उतार कर उन्हें नंगा कर दिया जाता था। लेखिका ने इस बात की बहुत मार्मिक पड़ताल की है कि कपड़े भी हमें मनुष्य बनाते हैं, कपड़ों से वंचित किसी मनुष्य के भीतर कुछ पहले ही मर जाता है। बहरहाल, आउशवित्ज़ के इन कैंपों में यह यातना की शुरुआत थी- उनकी उपयोगिता के आधार पर छंटाई होती थी- उनसे बेतरह काम लिया जाता था, उनका मेडिकल प्रयोगों में इस्तेमाल होता था, उनमें से जुड़वें बच्चे छांट कर उनके साथ तरह-तरह के प्रयोग होते थे। हिटलर की वैचारिक सेना जैसे एक पूरे अभियान में लगी हुई थी कि उसे अपनी कल्पनाओं की श्रेष्ठ आर्यन नस्ल तैयार करनी है जिसकी नीली आंखें हों। लेखिका ऐसे ही एक प्रयोग की चर्चा करते हुए बताती है कि दो जुड़वां बच्चों को एक साथ सिल दिया गया ताकि यह देखा जा सके कि उनके बरताव एक-दूसरे से किस तरह भिन्न हैं। उन्होंने असहनीय यातनाएं झेलीं और अंततः अपने ही ज़ख़्मों के शिकार होकर मर गए। नाज़ी क्रूरता की इस पराकाष्ठा के और भी पहलू हैं। जो लोग अपने घरों से निकाल कर कैंपों में लाए जा रहे हैं, उन्होंने अपने बेशक़ीमती सामान अपने वस्त्रों में छुपा या सिल लिए हैं। इन कपड़ों को उधेड़ कर ये सामान निकालने का काम भी इन्हीं क़ैदियों के हवाले किया जाता है। वे बिल्कुल जानवरों की तरह रखे जाते हैं और जानवरों से भी ज़्यादा बेरुख़ी से मार दिए जाते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध में जब जर्मनी हार के कगार पर था तो वहशत के इन विराट सबूतों को डायनामाइट से उड़ा कर नष्ट कर देने की कोशिश की गई- फिर भी कुछ लोग बचे रहे जिन्होंने यातना की इन स्मृतियों को हमारे लिए दर्ज किया। जर्मनी के युद्ध अपराधियों पर न्यूरेमबर्ग ट्रायल चला, लेकिन उसमें भी बहुत कम लोगों को सज़ा हो पाई। हैरान करने वाली बात यह भी थी कि जिन लोगों को इन अपराधों का दोषी पाया, उनमें से ज़्यादातर को अपने किए का कोई मलाल नहीं था- सब मानते थे कि उन्होंने सही किया।
इतिहास के इस सर्वाधिक स्याह अध्याय की स्मृति पोलैंड और आउशत्विज़ ने बचाए रखी है। उपन्यास की नायिका या कथावाचिका इन इलाक़ों में घूमते हुए उनके निशान देखती है- वे ख़त और सामान देखती है जो बचे रह गए- और उनकी मार्फ़त यह कहानी कहने की कोशिश करती है। ऐसा नहीं कि यह कथा पहली बार कही जा रही है। उल्टे दूसरे विश्वयुद्ध की अमानवीयताओं पर यूरोपीय साहित्य और सिनेमा पटा पड़ा है। यह बहस भी चली है कि क्या हॉलोकॉस्ट के बाद कविता लिखी जा सकती है? थियोडोर अडोर्नों का यह वक्तव्य बार-बार उद्धृत किया जाता है कि आउशवित्ज़ (या ऑशवित्ज़?) के बाद कविता लिखना बर्बरता है। मगर इसके बाद भी कविताएं लिखी गई हैं और आउशवित्ज़ पर भी लिखी गई हैं। बल्कि चार्ल्स रेंज़िकॉफ़ ने ‘होलोकॉस्ट’ के नाम से एक बहुत लंबी कविता लिखी है जिसमें यातनाओं से बिल्कुल आंख मिलाते हुए उनका वर्णन किया गया है। रेंज़िकॉफ ने क़ानून की पढ़ाई की थी और मानता था कि कविता को किसी आपराधिक मुक़दमे के साक्ष्य की तरह होना चाहिए- यह नहीं कि कवि ने क्या महसूस किया, बल्कि यह कि उसने क्या देखा और क्या सुना। हिंदी में भी कविताओं और विचार की दुनिया में हॉलोकास्ट और ऑशवित्ज़ आते रहे हैं।
मगर निस्संदेह आउशवित्ज़ की इस भयावह कहानी को उपन्यास की शक्ल में लाने का यह हिंदी मे पहला उद्यम है। हालांकि इसी वजह से यह महत्वपूर्ण नहीं हो जाता। गरिमा श्रीवास्तव ने बहुत संवेदनशीलता से अपने उपन्यास में इस बात को पकड़ा है कि भूगोल और कालखंड बदल जाएं, मगर अमानुषिकताएं हमारा पीछा करती रहती हैं- छोटे-छोटे आउशवित्ज़ समाज में घटते रहते हैं। यह उपन्यास इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह पोलैंड के यातना शिविरों तक नहीं रह जाता, इसमें दूसरी कहानियां भी गुंथी हुई हैं जो इसके मानवीय आयामों को अन्य रोशनियों मे देख पाने का अवसर भी उपलब्ध कराती हैं।
उपन्यास में एक कथा तो ख़ुद नायिका या कथावाचिका की है जिसके एक हिस्से एक छूटे हुए प्रेम की टीस है और संभवतः जिसकी वजह से उसके भीतर जीवन में नए संबंधों को लेकर अविश्वास और अरुचि है। अपने प्रेमी की स्मृति से बचने के लिए व्यस्तता के जो शरण्य वह तलाशती है, उसमें एक यात्रा पोलैंड की भी है। अपने सिहराने, छीलने वाले अनुभवों के बीच वह बार-बार अपने प्रेम की स्मृति तक लौटती है, अपने मन का मरना याद करती है और फिर भी पाती है कि कुछ बचा हुआ है जो उसे अभिरूप से जोड़े रखता है।
एक कहानी पोलैंड की सबीना की है जिसके पास अपने दादा-दादी की स्मृतियां हैं जिन्हें होलोकॉस्ट का दौर देखा, उसकी यातना झेली और अपने यहूदी पति का साहचर्य है जो उस अनुभव की आंच में कुछ ऐसा हो गया है कि वर्तमान में जीना नहीं सीख पाया है।
मगर उपन्यास में एक और कहानी है जो मूल कथा जितनी ही जगह घेरती है और अहमियत रखती है। यह कथानायिका की नानी की कहानी है। वह द्रौपदी देवी थी- बिराजित की बहुत प्यार पाने वाली पत्नी- धनबाद में मायके था, कलकत्ता के राजाबाज़ार में बेहद समृद्ध घर। मगर वह 1971 में बांग्लादेश में हुए दमन की चपेट में आ जाती है। जीवन उसका बदल जाता है- वह रुख़साना ख़ातून बन जाती है। उसकी कहानी बताती है कि 1971 का मुक्ति संग्राम औरतों पर किस क़दर भारी गुज़रा था। हज़ारों-लाखों औरतों के साथ बलात्कार हुआ, वे गर्भवती हुईं, उनके पतियों ने उन्हें छोड़ कर नई शादी कर ली, उनके मायके ने उन्हें दुत्कार दिया- वे एक क्रांति की ऐसी संतानें थीं जिन्हें क्रांति ही खा चुकी थी।
उपन्यास के ये सारे हिस्से आपस में इस तरह जुड़े हुए हैं कि वे एक-दूसरे का आईना बन जाते हैं। किरदार एक-दूसरे की कहानियां कहते लगते हैं। सबीना की दादी ने यूरोप में जो झेला है, वही प्रतीति सेन की नानी ने एशिया में झेला है। यह सच है कि गरिमा श्रीवास्तव ने बहुत सधे हुए ढंग से इन अलग-थलग पड़ी कथाओं और अंतर्कथाओं को इस तरह गूंथ दिया है कि वे एक ही कहानी का हिस्सा जान पड़ती हैं। सबसे बड़ी बात है कि कथा तत्व में दिलचस्पी हमेशा बनी रहती है। कथानायिका यानी प्रतीति सेन की मां कौन है और उसका क्या हुआ- यह जानने का डरावना सा खयाल उपन्यास पढ़वाए जाता है।
कई छोटे-छोटे अध्यायों में बंटे इस उपन्यास के हर अध्याय का शीर्षक किसी बांग्ला काव्य-पंक्ति या वाक्यांश से बनता है। कथा के बीच में भी बांग्ला संवाद और माहौल चले आते हैं। यह बस एक स्थानिकता का प्रभाव पैदा करने की कोशिश नहीं है, इसकी हूक कहीं ज़्यादा व्यापक है। इन पंक्तियों से गुज़रते हुए हिंदी पाठक के सामने अचानक यह टीसता हुआ एहसास उभरता है कि अनजान शब्दावली से बने ये वाक्यांश अपने अर्थ में कितने शाश्वत और सार्वभौमिक हैं और इनमें पीड़ा हो या प्रेम- दोनों किस हद तक शब्द और काल से परे हैं।
इतिहास की टेढ़ी-मेढ़ी, रक्ताक्त, चीख-पुकार से भरी गलियों से गुज़रते इस उपन्यास में अगर कुछ हल्की शिकायतें खोजनी हों तो ये कहा जा सकता है कि इसमें बीच-बीच में ऐतिहासिक वर्णन कथा और चरित्रों का हाथ छुड़ा कर उनसे अलग छिटके दिखते हैं। कहीं-कहीं बिल्कुल तारीख़ों को देते हुए अपनी बात की प्रामाणिकता साबित करने का मोह न होता और उसे सिर्फ़ किरदारों की स्मृति का हिस्सा बनाया जाता तो शायद वह ज़्यादा सहज होता- बेशक, सूचनाएं कुछ कम होतीं।
बहरहाल, इतने बड़े कलेवर में पसरे उपन्यास की पठनीयता बनाए रखने की चुनौती लेखिका ने ठीक से निबाही है। उपन्यास के अंत में प्रतीति सेन अपने बिस्तर पर पड़े उस नाना से मिलने जा रही है जिसका उसने ज़िक्र भर सुना है जिसे देखा नहीं है। उपन्यास में मानवीय संबंधों, प्रेम और जीवन को लेकर लगातार विचार चलते रहते हैं। यह सवाल उठता है कि मनुष्य अपने अतीत से कितना मुक्त हो सकता है और कितना उसे बंधा रह जाता है। क्या ऐसा कोई वर्तमान या भविष्य संभव है जो पूरी तरह अतीत से मुक्त हो? और क्या ऐसा कोई अतीत है जो वर्तमान और भविष्य से पूरी तरह कटा हुआ हो? या फिर ख़ुद को इतना सभ्य कहने वाला मनुष्य या समाज क्यों इस हद तक बर्बर हो उठता है कि उसके दुष्कृत्यों से धरती कांपे, उनको याद करने की इच्छा न हो और फिर भी याद करते रहना ज़रूरी लगे कि उनको फिर से दुहराया न जाए? जीवन को जिए जाने की विवशता, सभ्यता के चलते रहने की अपरिहार्यता और मनुष्य का लगातार अपनी मनुष्यता बचाए रखने का संघर्ष- ये वे बड़े सवाल हैं जो उपन्यास से निकलते हैं। हालांकि लेखिका इनके जवाब नहीं देतीं। लेकिन जवाब हमेशा महत्वपूर्ण नहीं होते, महत्वपूर्ण सवाल होते हैं। बेशक, उपन्यास में प्रेम पर जितना निजी संदर्भों में विचार किया गया है- दो लोगों के आपसी व्यवहार की तरह- उतना ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भों में नहीं, जो होता तो शायद उस विडंबना के कुछ और सूत्र खुलते जिसका नाम मानव सभ्यता है। यह बात भी कुछ और स्पष्ट होती कि इस पूरी सभ्यता में पुरुष की भूमिका आखेटक की रही है, स्त्री आखेट बनी है- भले उसे बहुत सारे गौरवशाली नाम दिए गए हैं। हालांकि यह लिखते-लिखते यह खयाल भी आ रहा है कि पूरा उपन्यास दरअसल इस बात की तस्दीक करता है।
तो इन जबरन खींची जाने वाली सीमारेखाओं के बावजूद ‘आउशवित्ज़ एक प्रेम कथा’ एक बड़ा उपन्यास है। वह बीसवीं सदी की कुछ लोमहर्षक दास्तानों के बीच रचा गया है- जिस पर कहीं-कहीं समकालीन विमर्श के भी छींटे हैं और जिसे पढ़ते हुए हम अपने समय की कुछ श्रेष्ठता-ग्रंथियों के ख़तरे भी पहचान सकते हैं। धर्म, नस्ल या राष्ट्र के नाम पर सत्ता के महत्वाकांक्षी खेल मनुष्यता को किस तरह लहूलुहान करते हैं- यह उपन्यास इस बात का साक्ष्य है- बताता हुआ कि समय बदल जाए, सरहदें बदल जाएं, ख़तरे वही रहते हैं, विडंबनाएं वही रहती हैं।
आउशवित्ज़ एक प्रेम कथा: गरिमा श्रीवास्तव, वाणी प्रकाशन, 224 पृष्ठ; 399 रुपये

