रचनाकार का स्वप्न क्या होता है और उसे कैसा होना चाहिए? हमारे एक पुरोधा लेखक मम्मट ने काव्य यानी साहित्य के प्रयोजन इस तरह बताए थे- काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये। सद्यः परनिर्वृतये कांतासम्मिततयोपदेशयुजे।। अर्थात काव्य रचना यश की प्राप्ति, धन-संपत्ति लाभ, व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा, अमंगल के नाश, शीघ्र ही आनन्द की अनुभूति और प्रिया स्त्री के समान मनभावन उपदेश देने के लिए की जाती है। समय निकलता गया और दुनिया बदलती गई लेकिन ध्यान से देखें तो क्या काव्य के प्रयोजन आज भी लगभग वे ही नहीं हैं जो संस्कृत के आचार्य मम्मट ने बताए थे? अमंगल के नाश को भी थोड़ा व्यापक ढंग से देखें तो भारत में जाति का दंश बहुत पुराना है और हिंदी के प्रारम्भिक कवियों में अग्रगण्य सरहपा के यहाँ कविता में जाति का सवाल आता है, गैर बराबरी और छुआछूत का सवाल आता है। बौद्ध मत के सिद्धों की यह परम्परा हिंदी में कबीर और रैदास के यहाँ गाढ़े रंग में आगे बढ़ती है जब वे साहित्य को मनुष्य मुक्ति के सवाल से जोड़ते हैं। ध्यान दीजिये कि मुक्ति का यह सवाल आत्मा-परमात्मा का नहीं है बल्कि इसी जीवन में मनुष्य की मुक्ति से जुड़ा है जिसका अभिप्राय मनुष्य को उसके सामर्थ्य और उसकी योग्यता के अनुसार काम और सम्मान मिले, उसके साथ किसी तरह का भेदभाव न हो। अंग्रेजी शासन के दौरान पढ़े लिखे लोग गांधी जी से प्रभावित हुए और बाद में कार्ल मार्क्स से भी। ये लोग साहित्य में प्रगतिशीलता का आंदोलन खड़ा करने में सफल हुए। इस प्रगतिशीलता का आशय किसी राजनैतिक मतवाद का अंधानुयायी होना या उसका प्रचारक होना नहीं था बल्कि उसका निहितार्थ था – मनुष्य अपने और अपने समाज की सभी तरह की बेहतरी का स्वप्न देखे, उसके लिए प्रयास करे और साहित्य के मार्फ़त उस स्वप्न को समाहिक मनुष्यता का स्वप्न बनाए। प्रेमचंद और निराला इस स्वप्न के सबसे बड़े दृष्टा हैं जिन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त गैर बराबरी और अन्याय के विभिन्न कारणों को देखा-समझा और असंख्य पाठकों को इस गैर बराबरी तथा अन्याय की चिंता से जोड़ा। भारत में साहित्य (खासतौर पर आधुनिक हिंदी साहित्य) की परम्परा का मूल स्रोत यही है। प्रेमचंद की लोक व्याप्ति का कारण भी यही है कि वे लाखों-करोड़ों दुःखी और हताश भारतीयों की आवाज़ बन जाते हैं।
आज़ादी के पचहत्तर बरस बाद एक रचनाकार का स्वप्न क्या होना चाहिए? क्या अभी भी गैर बराबरी और अन्याय से छुटकारा ही हमारे साहित्य सृजन का मूल मंत्र हो? क्या वाकई हम अभी भी अंग्रेजी हुकूमत वाले हताश मुल्क वाले नागरिकबोध में ही हैं? तो उत्तर होगा कि यदि सचमुच हमारे देश के लोगों की सबसे बड़ी मुसीबत यह गैर बराबरी है, शोषण है, अन्याय है तो किसी भी संवेदनशील रचनाकार के लिए यह उद्वेलन का विषय होना चाहिए। एक और बात यह भी है कि भारत दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश है और इस देश की आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी, भूख, शोषण, गैर बराबरी, हिंसा से पीड़ित है तब इन विषयों की तरफ आँख मूंदकर बैठ जाना असंवेदनशीलता और कृतघ्नता ही होगी। जिस समाज और भाषा के लोगों ने आपको लेखक स्वीकार किया है उस समाज और भाषा के लोगों के वास्तविक चित्र उस लेखक की रचनाओं में होने चाहिए। फिर यह भूलना भी अनुचित होगा कि एक सच्चा रचनाकार अपनी भाषा और देश के साथ साथ समूची मनुष्यता का प्रतिनिधि भी होता है। गोर्की, चेखव, लू शुन, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रेमचंद इसी नाते पूरी दुनिया के साहित्यकार हैं। हमारे सपनों में सुन्दर परियाँ और महल हों, लेकिन पहले मैं यह तो देख लूँ कि मेरा भाई दुःखी तो नहीं, मेरी बहन की आँखों में आँसू तो नहीं।
मैं अपने बारे में जब सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि रचनाकार होना बहुत बड़ी बात है। हमारे वांग्मय में रचनाकार (कवि) को सृष्टि निर्माता माना गया है और उसे ब्रह्मा के समकक्ष आदर दिया गया है क्योंकि वह भी एक प्रतिसंसार का निर्माण करता है। मेरा लेखन कविताओं से प्रारम्भ हुआ था जिन्हें किशोरावस्था से आगे बढ़ रहे भावुक मन की उपज माना जाना चाहिए। फिर जब धीरे धीरे मैं कविता के वृहद संसार का पाठक होता गया और नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, निराला जैसे लोगों के समूचे काव्य सृजन से गुजरता गया तो समझ पाया कि कविता लिखना कौतुक या खेल नहीं है। यह समूची जीवन साधना है। कवि होना दुर्लभ बात है। बहुत दिनों बाद जब मैं अध्यापक हो गया और अज्ञेय के साक्षात्कारों की एक किताब पढ़ रहा था तब एक जगह ठिठक गया। अज्ञेय ने एक साक्षात्कार में कहा था कि एक पीढ़ी में एकाध कवि भी हो जाए तो बहुत बड़ी बात है। मैं सोचने लगा कि समूचे रीतिकाल में हम घनानंद, बिहारी, पद्माकर, सेनापति जैसे कितने कवियों को जानते हैं और उन्हें पढ़ते हैं ? मुश्किल से चार पांच। बहुत हुआ तो दस बीस। इस औसत से आज से पांच-सात सौ साल बाद हमारे दौर के लोगों में से कितने कवि (या रचनाकार) याद रखे जाएंगे? तब मैं अच्छी तरह समझ गया कि कविता लिख लेना एक बात है और कवि होना एक बिल्कुल दूसरी बात। और फिर यह भी समझ आया कि एक बड़ा कवि बड़ी दृष्टि, विरल दृष्टि वाला मनुष्य ही हो सकता है जिसके पास अकूत साधना का धैर्य हो और जो किसी भी तरह के तात्कालिक मोह-लाभ से परे हो।
कविता लिखने के दिनों के आसपास ही मैं हमारी भाषा के बहुत बड़े कथाकार स्वयं प्रकाश जी के संपर्क में आ गया था। उनके संपर्क में आ जाने का पहला लाभ यह हुआ कि मैं साहित्य के वृहत्तर और व्यापक संसार को देखने लगा। उनके पास ढेर सारी पत्रिकाएं आती थीं और उनका निजी पुस्तकालय भी बहुत समृद्ध था। कई बार ऐसा हुआ कि मैं किसी उपन्यास को पढ़ते पढ़ते अटक जाता या ऊब जाता तो उनसे पूछता कि इसके लेखक तो बहुत बड़े रचनाकार हैं तब मैं इन्हें पढ़ क्यों नहीं पा रहा? तब वे बताते थे कि रुचि, परिवेश और संस्कार का पाठकीयता से क्या सम्बन्ध होता है। धीरे धीरे मैंने अपना कैरियर ही साहित्य से जोड़ लेने का निश्चय किया और हिंदी में एम ए के बाद पीएच डी में प्रवेश ले लिया तब मैं समीक्षा -आलोचना से विधिवत जुड़ गया। मुझे लगता था कि शोध के लिए जो लिखना है वह तो लिखना ही है लेकिन अभ्यास और समझ के लिए मुझे समकालीन साहित्य पर भी निरन्तर लिखना चाहिए। और फिर मैं समकालीन कहानी की अनेक कृतियों को पढता गया और उन पर लिखता गया। सौभाग्य से मुझे अच्छे सम्पादक मिले जिन्होंने मेरा उत्साह भी बढ़ाया और मुझे निरन्तर लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। ऐसे सम्पादकों में समयांतर के पंकज बिष्ट, हंस के राजेंद्र यादव, समीक्षा के गोपाल राय और सत्यकाम, सम्बोधन के क़मर मेवाड़ी, समकालीन भारतीय साहित्य के अरुण प्रकाश और रणजीत साहा, कथाक्रम के शैलेन्द्र सागर, शेष के हसन जमाल, इंडिया टुडे के अशोक कुमार, कादम्बिनी और शुक्रवार के विष्णु नागर तत्काल याद आते हैं।
फिर एक और घटना हुई। सन 2001 में जयपुर में लघु पत्रिका सम्मेलन का बहुत बड़ा आयोजन हुआ जिसमें पूरे भारत से हिंदी के दिग्गज सम्पादक और लेखक आए थे। मैं अनेक लेखकों से पहली बार इसी सम्मलेन के दौरान मिला। तब मैं चित्तौड़ में रहता था और मुझे स्वयं प्रकाश जी अपने साथ जयपुर ले गए थे। इससे पहले भी मैं एक समीक्षक के रूप के लघु पत्रिकाओं के इस आंदोलन से जुड़ चुका था। यही नहीं अपने शहर चित्तौड़गढ़ में मैंने कथन के ही दर्जन भर से अधिक वार्षिक सदस्य बना दिए थे। आगे भी यह सिलसिला चलता रहा और मैंने समयांतर के अनेक सदस्य बनाए। लघु पत्रिकाओं के प्रति मेरे मन में आकर्षण थोड़ा और पुराना था। तब राजस्थान पत्रिका में साहित्य के दो पेज आते थे और मनोहर प्रभाकर इसके सम्पादक थे। वे अक्सर गोविन्द माथुर जैसे किसी सजग लेखक से लघु पत्रिकाओं के नए अंकों पर आधा आधा पेज की समीक्षा लिखवाते जिन्हें देख पढ़कर मेरे मन में इन पत्रिकाओं के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। कालेज में मेरे शिक्षक रहे सदाशिव श्रोत्रिय जी के घर पर भी अनेक पत्रिकाएं आती थीं और बाद में स्वयं प्रकाश जी से मित्रता हुई तो जैसे लघु पत्रिकाओं का खजाना ही मिल गया। मैं ढेर की ढेर लघु पत्रिकाएं स्वयं प्रकाश जी के घर से लाता और पढ़ता। जब मैंने समझ लिया कि लघु पत्रिकाओं के प्रकाशन का उद्देश्य क्या है तब मैं इन पत्रिकाओं का सहयोगी बन गया। मैं इन पत्रिकाओं के लिए समीक्षा, रिपोर्ट और लेखकों से साक्षात्कार भेजने लगा। बनास जन का प्रकाशन इसी स्वप्न का परिणाम था जो पाठकों को अच्छे साहित्य को सुलभ करवाने के संकल्प से शुरू हुआ।
समीक्षक के रूप में मैंने तय किया कि मैं उन रचनाकारों की कृतियों को अपने लेखन का विषय बनाऊंगा जिनके मूल में व्यापक मानवीय मूल्यों के लिए संघर्ष है। शायद मैं इसी ढंग से साहित्य के मार्फ़त मनुष्यता की सेवा कर सकता हूँ। दुनिया बदलने का काम साहित्य से नहीं होता वह राजनीति का अधिकार है लेकिन साहित्य अपने पाठकों को संवेदनशील बना सकता है जो मनुष्य होने की बुनियादी अर्हता है। मेरा सपना यही हो सकता था कि अनपढ़ और कुपढ़ मानी जानी वाली हिंदी पट्टी के लोगों के ध्यान में बार बार ऐसी कृतियों को लाऊँ जो समता का सन्देश देती हैं, जिनमें गैर बराबरी से लड़ने का हौंसला है। अच्छी बात यह है कि आधुनिक हिंदी लेखन के आधारभूत मूल्य प्रेमचंद की कहानियों ने गढ़े हैं और तभी प्रेमचंद से जाहिर विरोध करने वाला रचनाकार भी अपनी कहानी में गैर बराबरी का समर्थन नहीं कर सकता, हिंसा को उचित नहीं ठहरा सकता, जातिवाद को जरूरी नहीं बता सकता। हाँ, इन मूल्यों के साथ कहने की कला जिन रचनाकारों के पास बेहतर है, बढ़िया है और जो कुछ मौलिक ढंग से रचने की कोशिश करते हैं वे निश्चय ही हमारे समय के प्रतिनिधि रचनाकार होंगे। मैंने जब कहानी समीक्षा के क्षेत्र में अपना पहला कदम रखा तब स्वयं प्रकाश, अरुण प्रकाश, असग़र वजाहत और पंकज बिष्ट की पीढ़ी अपने शीर्ष पर थी। उन दिनों अखिलेश, एस आर हरनोट, हरि भटनागर, हरीचरन प्रकाश जैसे कहानीकार बढ़िया लिख रहे थे। हाँ, पिछली पीढ़ी के अमरकान्त, शेखर जोशी, विद्यासागर नौटियाल, काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, राजी सेठ जैसे कथाकार भी सक्रिय थे। तभी रवींद्र कालिया के अद्भुत संपादन कौशल ने एक नयी पीढ़ी को देखते देखते खड़ा कर दिया और हिंदी कहानी को अनेक समर्थ कहानीकार मिले। एक कथा समीक्षक के रूप में मेरी कोशिश रही कि कहानीकारों के सबल पक्ष को उजागर करूँ और पाठकों को इस विधा की शक्ति से परिचित करवाऊं। कालिया जी के सम्पादन में वागर्थ में ही नामवर सिंह का एक व्याख्यान छपा था ‘कहानी कमज़ोर का हथियार है’ जिसने उस वातावरण में एक बार फिर साहित्य के सामाजिक पक्ष का महत्त्व नयी पीढ़ी के सामने रखा।
याद आता है जब नयी शताब्दी के लगभग दस बारह साल निकल चुके थे और हिंदी साहित्य में कथेतर की चर्चा शुरू हो रही थी। इन दिनों यात्रा आख्यान विधा की एक किताब ‘वह भी कोई देस है महराज’ की धूम मची हुई थी। यात्रा साहित्य यात्रा इंदराज के कलंक को छोड़कर यात्रा आख्यान जैसी उपाधि ले रहा था। यात्रा ही नहीं आत्मकथा, जीवनी, डायरी, संस्मरण, रिपोर्ताज़ और शहरनामा जैसी विधाओं में नयी नयी और शानदार किताबें आ रही थीं। इन किताबों ने बताया कि यथार्थ के उद्घाटन के लिए कथेतर विधाओं को लेखक अधिक मुफीद पा रहे हैं। हालाँकि इसकी शुरुआत नयी शताब्दी के आरम्भिक दिनों और उससे भी थोड़ा सा पहले से हो गई थी जब अखिलेश, विश्वनाथ त्रिपाठी, राजेश जोशी जैसे समर्थ रचनाकार अपनी पुरानी विधाओं को छोड़कर कथेतर में सक्रिय हो रहे थे। इन्हीं दिनों मैंने कोशिश की कि अब मुझे हिंदी साहित्य के इन नये नये बदलावों को देखना और समझना चाहिए। हंस के सम्पादन में सहयोग कर रहीं सुधी आलोचक बलवंत कौर ने मुझसे कहा कि मैं हंस में कथेतर विधाओं की मीमांसा और मूल्यांकन का काम करूँ और हर अंक में एक शृंखला की तरह लिखता जाऊं। इस काम में भी मैंने पाया कि हमारे नये रचनाकार बेहतर दुनिया के स्वप्न को भूले नहीं हैं। पिछली पीढ़ी के जो रचनाकार कथेतर विधाओं में लिख रहे थे वे यहाँ भी अपने संकल्पों के साथ थे। याद आता है कि कृष्णा सोबती हों या ममता कालिया, भीष्म साहनी हों या नन्द चतुर्वेदी, अपने संस्मरणों में सभी ने गांधी हत्या को याद किया और इतिहास के उस क्रूर प्रसंग को अपने अपने ढंग से लिखा है। सुधीर विद्यार्थी जैसे रचनाकार तो आज़ादी के दीवानों के इतिहास की तलाश में गाँव गाँव भटके और उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं जो कथेतर विधाओं का उज्ज्वल पक्ष है। एक समीक्षक के रूप में मेरा दायित्व था कि कथेतर के इन रूपों को देखूं-समझूँ और यथा शक्ति पाठकों को इसके महत्त्व से परिचित करवाऊँ। एक समीक्षक के रूप में मेरा यही स्वप्न रहा है और मुझे लगता है कि मेरे कहने-लिखने से दो पाठक भी किसी सार्थक कृति को पढ़ने के लिए उत्साहित हो जाएं यह मेरे काम की सार्थकता होगी।
विश्वास कीजिये हमारी दुनिया, हमारा देश, हमारा समाज, हमारे लोग सब कुछ बहुत अच्छा है, सुन्दर है और आवश्यक है। हाँ, यहाँ बहुत कुछ असुंदर भी है, अशिव भी है तो हम उसका मुकाबला अपने ढंग से लिखकर, अधिक संवेदनशील होकर करें जैसा हमारे पुरखे कह गए हैं –
जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।
चीज़ ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए
बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए।


धन्यवाद।
बहुत महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावी लेख।
“समीक्षक के रूप में मैंने तय किया कि मैं उन रचनाकारों की कृतियों को अपने लेखन का विषय बनाऊंगा जिनके मूल में व्यापक मानवीय मूल्यों के लिए संघर्ष है। शायद मैं इसी ढंग से साहित्य के मार्फ़त मनुष्यता की सेवा कर सकता हूँ। दुनिया बदलने का काम साहित्य से नहीं होता वह राजनीति का अधिकार है लेकिन साहित्य अपने पाठकों को संवेदनशील बना सकता है जो मनुष्य होने की बुनियादी अर्हता है।”
निस्संदेह पल्लव जी का यह विचार साहित्यकारों के लिए अत्यंत विचारणीय और प्रेरणास्पद है।
बहुत सुंदर लेखन एक रचनाकार का सटीक वर्णन
चित्तौड़गढ़ का उल्लेख अन्तिम पँक्ति बीज ऐसा बो कि बेल बन जाये अति उत्तम