Friday, March 20, 2026
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खेती बाड़ी-कलम स्याही: किसान दिवस पर किसान के कलम से!

आज के दिन भारत में राष्ट्रीय किसान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। हमारे देश में 23 दिसंबर का दिन किसानों को समर्पित किया गया है। भारत में किसान को अन्नदाता और धरती पुत्र कहा जाता है।

आज किसान दिवस है! किसानों का भी दिन होता है, पता नहीं किसानी समाज इससे वाकिफ है कि नहीं ? अपना मानना है कि किसानों का दिन हो महज तारीख नहीं।

आज का दिन देश के अन्नदाता किसान वर्ग के प्रति आभार प्रकट करने का दिन है। इस दिन को किसान दिवस के तौर पर मनाने का मकसद किसानों के उत्थान, आर्थिक विकास में उनके अहम योगदान, उनकी समस्याओं जैसे मुद्दों पर सबका ध्यान खींचना है। यह दिन लोगों को किसानों से जुड़े विभिन्न मुद्दों के बारे में शिक्षित करने का काम करता है। 

आज के दिन भारत में राष्ट्रीय किसान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। हमारे देश में 23 दिसंबर का दिन किसानों को समर्पित किया गया है। भारत में किसान को अन्नदाता और धरती पुत्र कहा जाता है। दरअसल आज किसानों के मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न चौधरी चरण सिंह की जयंती भी होती है इसलिए यह दिन भारत में किसान दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज धरती के सच्चे नायक को नमन को दिन है। किसान हमारी अर्थव्यवस्था, संस्कृति और खाद्य सुरक्षा की रीढ़ हैं। राष्ट्रीय किसान दिवस पर अन्नदाता के परिश्रम, समर्पण और योगदान को सलाम करना चाहिए।

बिहार में हूँ तो बात बिहार के किसानी समाज की ही करूँगा। आप उस परिवार से बात करें जो पहले 10-15 एकड़ जमीन पर खेती करता था। पहले घर के बच्चे पढ़ने के लिए बाहर जाते हैं, फिर नौकरी करते हैं और इसके बाद अपने माता – पिता को साथ ले आते हैं। वह खेती वाली जमीन को गांव में छोड़ बस जाते हैं शहर में। यह एक अजीब तरह का पलायन है।

जमीन पर जो खेती करते हैं, वे किराया देते हैं। बात का एक सिरा यहां उस किराया देने वाले किसान से भी जुड़ा है। वह भी दरअसल माइग्रेंट लेबर ही है। फसल लगाकर वह भी निकल जाता है दूसरे राज्य में दिहाड़ी करने। वह हर साल कमाने के लिए बाहर जाता है, क्योंकि उसे खेती के लिए पैसा चाहिए।

मेरा मत है कि बिहार के सभी जिले से किसान गायब हैं, मतलब एब्सेंट फार्मर। यह शब्द कुछ वैसा ही है जैसा Absentee landlord होता है। ऐसे में जो बिहार में किसानी कर रहा है, उनकी संख्या अब कम ही बची है।

आप उन लोगों से बात करिए, जिनके घर में पहले खेती बाड़ी हुआ करती थी, वह आपको बताएंगे कि पलायन केवल श्रमिक वर्ग का ही नहीं हुआ है बल्कि जमीन मालिक किसान परिवारों का भी हुआ है। बिहार में पिछले दो दशकों में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों का खेती से मोह भंग हुआ है जिनका घर परिवार खेती बाड़ी से ही चलता था।

पलायन की जब भी बात होती है तो हम श्रमिक की बात करते हैं जो तमिलनाडु, केरल, पंजाब, दिल्ली या अन्य राज्यों में दिहाड़ी करने जाते हैं, जो स्किल्ड लेबर कहलाते हैं। लेकिन हम किसान परिवार के पलायन पर एक शब्द नहीं लिखते हैं या कोई आंकड़ा जारी नहीं करते हैं। हमें इस पलायन को समझना होगा।

बिहार में किसान का कोई भी मोर्चा नहीं होने की एक वजह यह भी है। दरसअल गाम का गाम खाली पड़ा है। बड़े जोतदार नौकरी पेशा हो गए हैं और उनकी जमीन पर जो फसल उगाता है, वह शायद खुद को किसान मानता ही नहीं है। बिहार में किसानी की असल पीड़ा यही है, कटु है लेकिन सत्य यही है।

आप मंडी, भाव आदि की बात करते रहिए लेकिन किसान के नाम पर बिहार में आंदोलन राजनीतिक दल के लोग ही करेंगे, किसान चुप ही रहेगा। दिल्ली, पटना में बैठे लोग जो आंकड़ा जारी कर दें लेकिन बिहार में किसानी करने वाले चुप ही रहेंगे।

इन सबके बावजूद आज के दिन को किसानों को समर्पित किया गया है, यह किसानी समाज के लिए बड़ी बात है। देश के 5वें पीएम चौधरी चरण सिंह जुलाई 1979 से जनवरी 1980 तक प्रधानमंत्री रहे। वह अपने जीवन में हमेशा किसानों के कल्याण के लिए काम करते रहे। पीएम रहते किसानों के हित में उन्होंने कई अहम कदम उठाए

चौधरी चरण सिंह ने अपने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने किसानों के हित के लिए कई कार्यक्रम चलाए। उन्होंने किसानों को सशक्त बनाने के लिए कई कानून और नीतियां बनाई थी। चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को हुआ था।

साल 2001 में चौधरी चरण सिंह के सम्मान में हर साल 23 दिसंबर को किसान दिवस मनाने का फैसला किया था। भारत को किसानों का देश कहा जाता है और आजादी के बाद देश के विकास में उनकी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

खैर, किसान दिवस की शुभकामनाएं! आज लंच और डिनर के टेबल पर किसान को याद कर लीजियेगा।

गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा ने पत्रकारिता की पढ़ाई वाईएमसीए, दिल्ली से की. उसके पहले वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक कर चुके थे. आप CSDS के फेलोशिप प्रोग्राम के हिस्सा रह चुके हैं. पत्रकारिता के बाद करीब एक दशक तक विभिन्न टेलीविजन चैनलों और अखबारों में काम किया. पूर्णकालिक लेखन और जड़ों की ओर लौटने की जिद उनको वापस उनके गांव चनका ले आयी. वहां रह कर खेतीबाड़ी के साथ लेखन भी करते हैं. राजकमल प्रकाशन से उनकी लघु प्रेम कथाओं की किताब भी आ चुकी है.
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