Saturday, November 29, 2025
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शबनम शेख़ की कहानी

महानगर की चमक-दमक के पीछे छिपी सच्चाइयों को उधेड़ती, “शबनम शेख़ की कहानी” एक ऐसी स्त्री का सफ़र है जो अपना जीवन दोबारा संभालने की कोशिश में हर मोड़ पर टूटती भी है और लड़ती भी। राधिका से शबनम बनी यह स्त्री अकेली माँ होने, बेरहमी से रिश्तों के टूटने, और किराए के एक छोटे से कमरे की तलाश जैसे मामूली लगने वाले संघर्षों में छुपी हुई एक बड़ी त्रासदी को सामने लाती है। सामाजिक और लैंंगिक असमानताओं, भाषागत प्रहारों, निर्णय और ‘दया’ के नाम पर किए जाने वाले अदृश्य शोषण को यह कहानी बेहद तल्ख़ी से उजागर करती है। यह सिर्फ़ एक लड़की की दास्तान नहीं, बल्कि उन हज़ारों औरतों का दस्तावेज़ है जिनके जीवन पर अक्सर उनके अलावा हर किसी का नियंत्रण होता है। फ़रीद ख़ाँ  ने मुम्बई के जीवन-सत्यों को अपने कई  कहानियों में बयान किया है, वह भी बिना साज-सजावट, बगैर लाग-लपेट, सीधी-सहज भाषा में, जो  सीधा दिल में उतरती है। प्रस्तुत कहानी भी इसका अन्यतम उदाहरण है।

राधिका अपनी दो साल की बच्ची के साथ सड़क पर खड़ी थी। ट्रैफ़िक की चिल्ल-पों उसके अकेलेपन के अहसास को लगातार बढ़ा रही थी। कई बार उसका मन हुआ कि किसी चलती गाड़ी के सामने आ जाए और किस्सा ही ख़त्म कर दे। लेकिन वह रुक गई। उसने सोचा कि वह पुरानी फ़िल्मों की हीरोइन थोड़ी है। उस बेहूदे इंसान के लिए वह क्यों अपनी जान दे। फिर उसकी बच्ची भी तो है – “इन सब में इसका क्या दोष ?”

 इसलिए उसने रात भर के लिए कहीं पनाह लेने के ग़रज़ से कई मित्रों को फ़ोन लगाया पर कहीं से भी कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली। सभी की मजबूरियाँ हैं। सभी छोटे-छोटे दायरों में रहते हैं। सभी का अपने सर पे छत बचाये रखने का संघर्ष है।

 अपने मोबाइल में तमाम नंबरों को देखते देखते राधिका को एक ऐसे व्यक्ति का नंबर दिखा जिससे उसने कभी बात नहीं की थी। उससे कोई परिचय भी नहीं था।  

 “हाँ, सुरेन्द्र, मैं राधिका बोल रही हूँ। मुझे तुम्हारा नंबर सतीश सर ने दिया था।”

 सुरेन्द्र के चाचा का नाम सतीश था। वह पटना में कोचिंग सेंटर चलाते थे। किसी ज़माने में राधिका वहाँ पढ़ती थी लेकिन उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता था। दिन भर फ़िल्मी हिरोईनों के बारे में पढ़ती रहती थी। उसके तमाम दोस्त उसे फ़िल्मों का इनसाइक्लोपीडिया कहते थे। तो जब एक दिन राधिका ने अपने टीचर सतीश सर को बताया कि वह मुम्बई जा रही है, अब वहीं किस्मत आज़माएगी तो उन्होंने अपने भतीजे का नंबर दिया था कि “मिल लेना। परदेस में एक दूसरे का सहारा रहता है।” लेकिन मुम्बई आने के बाद राधिका अपने दोस्तों के साथ सिनेमा और टीवी के संघर्ष में इतना मसरूफ़ हो गई कि उसे सुरेन्द्र को फ़ोन करने का कभी मौका ही नहीं मिला। उसने सोचा था कि प्राईवेट बैंक का इंश्योरेंस अधिकारी उसके फ़िल्मी करियर में क्या मदद कर सकेगा।

 सुरेन्द्र ने याद करते हुए कहा – “जी, जी, राधिका जी, चाचा जी बताए थे एक बार, बताईये”।

 “असल में”, अपनी झेंप को अतिरंजित करते हुए राधिका ने बताया, “मेरी रूममेट को अचानक गाँव जाना पड़ा और ग़लती से चाभी उसी के पास रह गई है। अब इस समय रात के ग्यारह बजे मैं चाभी बनाने वाले को कहाँ खोजूँ”, उसने फिर अतिरिक्त हिचक के साथ बोलते हुए कहा, “मेरे साथ मेरी बेटी भी है, दो साल की, इसीलिए किसी अपरिचित के यहाँ नहीं जा सकती उसको लेकर। आप समझ रहे हैं न। सतीश सर ने बताया था कि आप पर मैं आँख मूँद कर भरोसा कर सकती हूँ”।

 “देखिये, हम तो एक कमरे के डेरे में रहते हैं और मेरी माँ भी आजकल आई हुई हैं”।

 “अरे, फिर तो मुझे कोई चिंता ही नहीं है, मैं आंटी के साथ रह लूंगी। कोई तकलीफ़ नहीं होगी उनको। मेरी रूममेट ने कहा है कि बस दो तीन दिनों की बात है, फिर जब वह आ जाएगी तो मैं वापस अपने घर चली जाउंगी”।

 राधिका को इस बात पर बड़ा अचंभा हो रहा था कि वह फ़र्राटे से इतना झूठ कैसे बोलती जा रही है? क्या जीना इतना ज़रूरी है कि झूठ बोलना पड़े? क्या इसीलिए दोस्तों ने अपने घर में उसे जगह नहीं दी कि उन्हें सच पता था? विचार आ रहे थे-जा रहे थे।

 उसका तो पति से झगड़ा हुआ था। झगड़े में पति ने उसे ‘धंधे वाली’ कह दिया था। असल में पिछली रात की जिस पार्टी को लेकर उनमें झगड़ा हो रहा था उसमें उसका पति भी मौजूद था पर राधिका अपना ज़्यादातर समय प्रोड्यूसर–डायरेक्टर के साथ बिता रही थी और उसके पति को लग रहा था कि वह उन्हें रिझा रही थी। जबकि उसका पति भी अभिनेता था और वह भी पार्टी में उन प्रोड्यूसर–डायरेक्टर को चापलूसी में ‘हेलो–हेलो’ कर रहा था पर उसकी तरफ़ कोई पलट कर देखता भी नहीं था। इसी चिढ़ में उसने झगड़ा शुरू किया था। सिर्फ़ झगड़ा भर हुआ होता तो दुनिया में किसी की मजाल नहीं थी कि कोई राधिका को घर से निकलने पर मजबूर कर दे। लेकिन अपने लिए ‘धंधे वाली’ शब्द उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। ग़ुस्से से भर कर उसने अपनी बच्ची को बग़ल में दबाया और सामान लेकर बाहर निकल गई। उसके पीछे पीछे उसके पति ने उसका बाकी सामान भी बाहर फेंक दिया और यह भी कह दिया कि कभी वापस न आए।

 सुरेन्द्र की तरफ़ से जब कुछ सेकेंड तक जवाब नहीं आया तो राधिका ने कहा “मैं अकेले होती तो कहीं भी रह लेती पर……  यू नो……”

 “ठीक है”। सुरेन्द्र को लगा कि वह रो रही है। उसने बड़े अनमने ढंग से जवाब दिया। “आ जाईये”।

 जब राधिका अपनी बच्ची को लेकर सुरेन्द्र के घर में आई तो उसकी माँ ने उसके नमस्ते का जवाब भी नहीं दिया और अकेले ही बैठ कर खाना खाने बैठ गईं। झूठे मुंह राधिका को पूछा भी नहीं, जो उनके लिए भी असहज था पर उन्हें अपना मंतव्य प्रेषित करना था। बात जिस तक पहुंचनी थी, पहुँच भी गई। सुरेन्द्र को बुरा लगा पर वह कुछ कर नहीं सकता था। जब सुरेन्द्र किसी काम से घर से बाहर निकला तो मौका देख कर उसकी माँ ने राधिका से कहा – “ब्याह के समय माँ बाप तो बताए होंगे कि पति के घर से स्त्री की अर्थी निकलती है?” पहले तो राधिका ने सोचा कि उसकी आँखें डबडबा जानी चाहिए फिर उसने अपने रोका कि इन बातों की आदत डालनी पड़ेगी। इसलिए उसने प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। एक गहरी सांस ली और मुस्कुरा कर उनकी तरफ़ देखा। मानो कह रही हो, ‘आपकी बात सही है’।

 सुरेन्द्र की माँ को अपने बेटे लिए चिंता थी। उन्होंने राधिका की बच्ची को देखते ही माजरा समझ लिया था कि रूममेट वाली कहानी सच नहीं है। पर सुरेन्द्र से कुछ कहा नहीं। वह कहाँ मानता है उनकी बात।

 राधिका को सुरेन्द्र के यहाँ रहते हुए एक सप्ताह बीत चुका था और राधिका की वह ‘रूममेट’ अब तक गाँव से नहीं लौटी थी। इधर राधिका रोज़ अपनी बच्ची को लेकर फ़िल्म और टीवी के ऑडिशन देने निकल पड़ती पर कहीं भी उसका चयन नहीं हो रहा था। तो उसने निर्णय लिया कि अब वह सहायक निर्देशक बनेगी। उसने सुना था कि उसमें जल्दी काम मिल जाता है। निर्देशक फ़ोन पर उसे मिलने के लिए फ़ौरन वक़्त दे देते थे। उसकी आवाज़ उन्हें अच्छी लगती थी। लेकिन जब मिलने पर बच्ची को उसके साथ देखते तो टाल जाते। जब राधिका को इस बात का अहसास हुआ तो उसने अपनी बेटी को सुरेन्द्र की माँ के पास छोड़ कर जाने के लिए उनसे निवेदन किया। यह भी आश्वासन दिया कि काम मिलते ही वह दूसरी जगह घर लेकर रहने लगेगी। सुरेन्द्र की माँ ने उससे पलट कर कभी नहीं कहा कि अगर ‘रूममेट’ नहीं आ रही है तो वह दूसरी चाभी बनवा ले। पर उसकी अनुपस्थिति में अपने बेटे से यह बात ज़रूर कही। इस पर सुरेन्द्र ने कहा – “अगर हम उसकी रूममेट की बात करेंगे तो उसको लग सकता है कि हम उसे घर से निकालना चाहते हैं। हो सकता है उसकी कोई मजबूरी हो जिसे वह छिपा रही हो, कुछ पूछने पर उसे दुःख भी हो सकता है।“ सुरेन्द्र की माँ को लगता था कि उनके भोले भाले बेटे को कहीं कोई औरत फंसा न ले।  

सुरेन्द्र की माँ का पास-पड़ोस की औरतों के साथ मिलना जुलना हुआ करता था। जब औरतों ने उन्हें बच्ची के साथ देखा तो पूछ लिया – “पोती है आपकी?” हर औरत उनसे बारी बारी से यह सवाल पूछती, तो उन्हें हर किसी को बार बार एक ही जवाब देना पड़ता था – “नहीं नहीं। यह तो हमारे बेटे के दोस्त की बेटी है। आजकल वह यहीं रह रही है।” तो औरतें आश्चर्य से कहतीं – “हमें तो लगा था कि वह आपकी बहू है।” फिर से सुरेन्द्र की माँ को सफ़ाई देनी पड़ती – “नहीं नहीं मेरे बेटे से उसका कोई संबंध नहीं है।” तो झट से दूसरा सवाल खड़ा हो जाता – “तो उसका पति कहाँ है?” यह सवाल तो सुरेंद्र की माँ के मन में भी था ही। इन सवालों से उनके संदेह को वैधता मिल रही थी लेकिन दूसरी तरफ़ वे सकपका भी जातीं थीं और कह पड़ती थीं कि “नहीं नहीं, ऐसी वैसी कोई बात नहीं है”। एक पड़ोसिन ने बड़े रहस्योद्घाटन के अंदाज़ में उन्हें बताया कि “फ़िल्म इंडस्ट्री की लड़कियाँ सुरेन्द्र जैसे भोले भाले लड़कों को फंसा लेती हैं। अच्छी ख़ासी नौकरी है उसकी, महीने की पहली तारीख़ को तनख़्वाह आ जाती है, और क्या चाहिए किसी को। इसलिए सावधान रहिएगा आंटी जी।”

 सुरेन्द्र की माँ ने यह भी देखा कि जब से राधिका आई है, सुरेन्द्र की दोस्त ख़ुशी ने आना जाना बंद कर दिया है। हालांकि ख़ुशी को सुरेन्द्र की माँ कुछ ख़ास पसंद नहीं करती थीं – “लेकिन वह राधिका से तो बेहतर ही है, कम से कम सुरेन्द्र के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ी तो हुई है। कुंवारी है।” उनकी पड़ोसिनों ने राधिका के बारे में यह बात भी उनके दिमाग़ में डाल दी कि “न जाने बच्ची का बाप कौन है?” तो किसी दूसरी पड़ोसिन ने मज़ाक में कहा – “अगर बहुत सारे होंगे तो उसे भी कहाँ पता होगा।“ सभी खिलखिला खिलखिला कर दोहरी हो गईं। पर सुरेन्द्र की माँ का चेहरा तन गया।  

 सुरेन्द्र की माँ को अब ख़ुशी, चाहे वह जैसी भी हो, अच्छी लगने लगी। वह जानबूझ कर राधिका के सामने अपने बेटे से ख़ुशी का हाल चाल पूछतीं। उसकी तारीफ़ किया करतीं। उसके माँ बाप के अच्छे संस्कारों की बात किया करतीं। माँ के निहितार्थ को सुरेन्द्र भी समझ रहा था और राधिका भी।  

 इधर ख़ुशी को सुरेन्द्र समझा ही नहीं पा रहा था कि किन परिस्थितियों में राधिका को उसके घर में आना पड़ा – “अरे रात के वक़्त, एक लड़की, अपनी बच्ची के साथ मुंबई की सड़क पर खड़ी थी, और वह चाचा जी का भी नाम ले रही थी, मैं क्या करता?” लेकिन ख़ुशी को किसी भी ‘स्टोरी’ पर यकीन नहीं था – “उसे बाहर निकालो वरना मुझे भूल जाओ।”

 एक तरफ़ माँ, दूसरी तरफ़ से प्रेमिका का इतना दबाव था कि सुरेन्द्र ने एक दिन हकलाते हुए राधिका से कह दिया कि हाउसिंग सोसायटी में लोग उसके रहने पर ऐतराज़ कर रहे हैं। वह अपना ठिकाना कहीं और ढूंढ ले। राधिका शर्म से गड़ गई। उसने सोचा था कि सुरेन्द्र के कहने से पहले ही वह अपना कोई ठिकाना ढूंढ लेगी पर यह संभव न हो सका। उसने जो ‘स्टोरी’ सुनाई थी वह फ़र्ज़ी साबित हो चुकी थी। अब कुछ और कहने की स्थिति में वह थी नहीं। इसलिए उसने कई ब्रोकरों को कमरा ढूँढने के लिए कहा।

 ब्रोकरों ने कहा कि अकेली लड़की को कोई किराए पर कमरा नहीं देता। ऊपर से आपके साथ बच्ची भी है लेकिन पति नहीं है, इस बात पर तो बिल्कुल भी कोई नहीं देने वाल। फिर उसने पहलू बदलते हुए कहा – “अगर आप किराया डबल कर दो तो मैं मैनेज कर सकता हूँ।” लेकिन राधिका पैसा बचाना चाहती थी। भविष्य के लिए। न जाने आगे क्या हो। आपात स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। इसलिए उसने कह दिया कि उसका बजट बहुत कम है। वास्तव में वह आर्थिक तंगी में आ चुकी थी। उसके पति ने जॉइंट अकाउंट से सारे पैसे निकाल लिए थे।  

 ऐसा लग रहा था मानो दिमाग़ में फफोले पड़ गए हों। वह भावहीन सी अपनी बेटी को लेकर सड़क पर चली जा रही थी। तभी एक बाईक वाले ने ज़ोर का ब्रेक लगाया। संयोग से वह सुरेन्द्र था और पीछे ख़ुशी बैठी हुई थी।

 तीनों एक कैफ़े में बैठे समस्या का समाधान निकालने की कोशिश कर रहे थे। सुरेन्द्र ने उसकी बेटी को आईसक्रीम देकर दूसरे टेबल पर मसरूफ़ कर दिया था। राधिका से मिल कर ख़ुशी की असुरक्षा की भावना कुछ कम हुई। बल्कि उसके हालात देख कर उसे सहानुभूति ही हुई। उसने राधिका के कंधे पर हाथ रख कर ढारस बंधाया।  

                                     2

राधिका और उसकी बेटी को ख़ुशी अपने घर, चॉल, में ले आई। उसकी चॉल बड़ी थी। एक कमरा किराए पर भी देते थे वे लोग जो फ़िलहाल ख़ाली था। राधिका को उसमें रहने की जगह मिल गई। ख़ुशी ने ऐसा करके अपने संबंधों की असुरक्षा तो ख़त्म कर ली लेकिन राधिका का मानसिक दबाव बढ़ गया। ऐसा लगा मानो उसका जीवन दूसरे लोग चला रहे हैं जिस पर उसका अपना कोई नियंत्रण ही नहीं रहा। हालांकि ख़ुशी के घर में उसके माँ बाप थे। एक भाई भी था – नितिन। सभी उसकी बेटी को प्यार–दुलार करते थे। उसकी बेटी भी  नितिन के साथ बहुत घुल-मिल गई थी। ख़ुशी ने राधिका से कह दिया कि वह किराये की तरफ़ से निश्चिंत रहे और काम ढूंढें।“ जब काम मिल जाए तो किराया दे देना।”

 नितिन राधिका की बेटी को कंधे पर लिए लिए घूमता रहता था। जल्दी ही राधिका यहाँ सहज हो गई थी। अपनी बेटी की तरफ़ से भी उसको इत्मिनान हो गया था। वह रोज़ काम की तलाश में निकलती थी और जब शाम को ख़ाली हाथ लौटती तो कोई उससे काम के बारे में नहीं पूछता बल्कि हर कोई मुस्कुरा कर उसका हौसला ही बढ़ाता था।

 नितिन फ़ूड-डिलेवरी का काम करता था। अमूमन शाम से लेकर देर रात तक। सैकड़ों ‘रेस्टोरेंट अणि बार’ के ऑर्डर की उसे होम डिलेवरी करनी होती थी। कई बार उन जगहों पर काम करने वाली महिला कर्मचारियों को भी वह रात को उनके घर, या जहाँ उन्हें बुलाया जाता, पहुँचा दिया करता था। जिससे उसे दुगुने-तिगुने पैसे मिल जाते थे। कई बार तो इस काम में पूरी रात निकल जाती थी और वह सुबह को घर आता था।

 एक दिन जब उसने देखा कि राधिका बस से काम की तलाश में जाती है तो उसने उसकी मदद करने के लिए कहा कि वह अपनी बाईक से पहुँचा दिया करेगा – “आपको जहाँ भी जाना हो बता देना।” राधिका ने मना कर दिया। उसने सोचा कि वह रात भर थक कर आता है फिर दिन में उसके लिए अगर बाईक चलाएगा तो आराम कब करेगा। फिर भी जब एक दिन राधिका पैदल चली आ रही थी तो उसने पीछे से आकर बाईक पर बैठने को कहा। राधिका के पास इनकार करने का कारण नहीं था। पर नितिन उसे घर लेकर नहीं गया। एक पार्क में ले गया। चारों तरफ़ पेड़ पौधे और हरियाली। राधिका को न जाने कितने दिनों के बाद ऑक्सीजन मिल रही थी। न जाने कितने दिनों के बाद वह मुस्कुराई थी। नितिन ने उसे तरह तरह के किस्से कहानी सुना कर ख़ूब हंसाया। राधिका एक नई ऊर्जा से भर गई।   

 अब अक्सर राधिका और नितिन दिन में किसी समय किसी पार्क में बिताते और यह सिलसिला सिनेमा देखने तक पहुँच गया। पर इस क्रम में राधिका को अपने भीतर एक बेचैनी का अहसास हुआ इसलिए उसने नितिन से दूरी बनानी शुरू कर दी। पहले तो उसने नितिन के चुटकुलों पर हँसना बंद कर दिया फिर इस बात की भरसक कोशिश की कि उससे सामना न हो। तो एक दिन नितिन ने उससे पूछ लिया – “क्या बात है ?” तो राधिका ने भी साफ़ साफ़ कह दिया – “तुम्हें मालूम है न, मैं शादी-शुदा हूँ।” नितिन हंसने लगा – “अरे अपन तो दोस्त हैं बस। अपन को वह सब मचमच चाहिए ही नहीं”। पहली बार में तो उसने सुकून की एक लम्बी सांस ली। फिर दूसरे ही पल उसे एक नामालूम सा धक्का सा लगा। यह भी… 

 लेकिन संबंधों की स्पष्टता से दोनों के बीच और खुलापन आ गया था।  

 जब दो तीन महीनों तक राधिका को कोई काम नहीं मिला तो ख़ुशी के घर वालों ने उस कमरे को किराए पर उठाने के लिए मोहल्ले के ब्रोकर को कह दिया और वह धड़ा धड़ किरायेदार लेकर कमरा दिखाने आने लगा। कई बार राधिका सोई रहती थी और ब्रोकर किरायेदार को लेकर कमरा दिखाने आ जाता था। इससे राधिका का मानसिक दबाव बहुत बढ़ गया। उसको दबाव में देख कर नितिन  भी दबाव में आ गया था। पर ख़ुशी ने सफ़ाई देते हुए कहा कि बहुत दिन तक कमरा बिना किराये के नहीं रख सकते है न। वह अप्रत्यक्ष रूप से कह रही थी कि राधिका अगर किराया देना शुरू नहीं करेगी तो कोई कब तक उसे मदद के नाम पर घर में रखेगा। दरअसल नितिन और राधिका की बढती हुई दोस्ती ने भी उसके परिवार को यह कदम उठाने को मजबूर किया था।

 ऐसा नहीं था कि राधिका हाथ पैर नहीं मार रही थी। पर फ़िल्म इंडस्ट्री में  बाहर से आई अभिनेत्रियों के लिए बहुत काम है नहीं। टीवी सीरियल में जिस तरह की शक्ल सूरत चलती है उसमें वह ‘नॉट फ़िट’ थी।

 इसी बीच नितिन को पता चला कि एक ‘रेस्टोरेंट अणि बार’ में एक महिला कर्मचारी, जिसे वेट्रेस कहा जाता है, कम पड़ गई है। उसने राधिका को बाईक पर बैठाया और सीधे रेस्टोरेंट के मालिक के पास ले आया। रेस्टोरेंट के मालिक को कोई दिक्कत नहीं थी पर राधिका को थी। उसने उसके सामने तो कुछ नहीं कहा पर बाहर निकल कर नितिन से कहा कि उसे बताना चाहिए था कि वह कहाँ लेकर आ रहा है।

 वे दोनों घर लौटे जब तक एक नये किरायदार से ख़ुशी के पापा ने पगड़ी ले ली थी और अगले दिन ही वह किरायेदार रहने के लिए आने वाला था। राधिका ने ख़ुशी की माँ से कहा कि वह जल्द ही किराया देना शुरू कर देगी तो उन्होंने ख़ुशी के पापा के हवाले से कहा कि उन्हें फ़ैमिली को रखना है। ऊपर से मोहल्ले के ब्रोकर का भी दबाव है। किराये पर उठाने से उसे ब्रोकरेज मिलेगा, इसलिए। राधिका ने एक हफ़्ते की मोहलत माँगी तो ख़ुशी और नितिन के कहने पर उसके घर वालों ने मोहलत दे दी। पर अब वह वहाँ नहीं रह सकती थी यह बात निश्चित हो चुकी थी।

 दूसरी जगह रहने के लिए भी तो पैसे चाहिए होंगे। तो राधिका ने अपने डायरेक्टर प्रोड्यूसर से बात की। पर किसी को उसकी बातों में ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि वे सब इशारों में उसे अपने किसी दूसरे फ़्लैट में रहने को कह रहे थे जिसका मतलब वह अच्छे से समझती थी। तब हार कर उसने वेट्रेस का ही काम पकड़ लिया।

 काम पर पहले दिन ही राधिका ने रेस्टोरेंट के मालिक से एडवांस माँग लिया। अपनी मजबूरी भी बताई पर वह टस से मस नहीं हुआ। उसने साफ़ साफ़ कह दिया – “पहले काम फिर दाम। नहीं तो घर पे आराम।”

 एक हफ़्ते की मोहलत ख़त्म होने वाली थी और राधिका की अधीरता बढ़ती जा रही थी। उसे नितिन, ख़ुशी और सुरेन्द्र ने भी समझाया कि अपने पति के पास वापस चली जाये। “मर्द लोग बोल देते हैं ऐसा। इसको ‘इगो-इशू’ नहीं बनाना चाहिए।” अगर पति के बारे में इतना समझाया न गया होता तो शायद वह नर्म पड़ जाती और लौट जाती उसके पास। पर समझाने पर वह कठोर से कठोरतम होती जा रही थी। वह यही सोच रही थी ‘वह’ क्यों नहीं आकर माफ़ी मांग सकता। अपशब्द तो उसने कहे थे।

 सुरेन्द्र को लगा कि राधिका ने उसकी बात नहीं सुनी इसलिए उसने उसे ज़ोर देकर समझाया कि अपना ग़ुस्सा थूके और पति के पास वापस चली जाये। लेकिन राधिका तमतमा गई और उसकी बात काटते हुए उसने कहा – “मैं अपनी बेटी के साथ ख़ुदकुशी कर लूंगी लेकिन उसके पास वापस नहीं जाऊँगी।” तो ख़ुशी ने कहा – “फिर आप पटना क्यों नहीं चली जातीं ? कम से कम वहाँ आपकी बेटी की परवरिश तो ठीक ढंग से हो जाएगी।”

 राधिका यह नहीं बता सकती थी कि उसका उसके माँ बाप से रिश्ता टूट चुका था। वे लोग ‘लव मैरेज’ के ख़िलाफ़ थे। वह भी दूसरे ‘कास्ट’ में। इसलिए वह पटना नहीं जा सकती थी। इसलिए राधिका को ख़ुशी का बोलना बहुत बुरा लगा। जब तक सुरेन्द्र बोल रहा था वह सहन कर रही थी। लेकिन ख़ुशी के बोलते ही उसने नितिन से कहा – “ठीक है, तुम्हारे घर से निकलना ही है तो मैं अभी अपना सामान निकाल लाती हूँ”। वह तपाक से उठ गई। उसी तपाक से ख़ुशी ने उसका हाथ पकड़ कर उसे बैठा लिया।

 सुरेन्द्र ने चिंतित होकर अपने चाचा को फ़ोन किया और कहा कि उसके माँ बाप से कहें कि अपनी बेटी को यहाँ से ले जाएँ। मुसीबत में है बेचारी। पर दो दिन के बाद चाचा जी से पता चला कि उसके माँ बाप ने इस बारे में बात करने से भी इनकार कर दिया और उनके मुंह पर दरवाज़ा बंद कर दिया।

 सुरेन्द्र और ख़ुशी को चिंतित देख कर नितिन ने कहा कि “अभी दो दिन और है हफ़्ता पूरा होने में, मैं कुछ देखता हूँ।“   

                               3

लगभग दो सालों के बाद एक अंग्रेज़ी दैनिक की उप संपादक ‘महानगर में अकेली स्त्री’ के रहने में आने वाली मुश्किलों पर एक स्टोरी तैयार कर रही थी जिसके लिए वह शबनम [बदला हुआ नाम] से बात कर रही थी। वह लिख रही थी – शबनम ने बताया कि चूंकि विन्सेंट [बदला हुआ नाम] से उसकी इतनी नज़दीकी हो गई थी कि उससे खुल कर कुछ भी कह सके तो उसने उससे मदद माँगी। चाहे तो वह रहने का कोई इंतज़ाम कर दे या क़र्ज़ के तौर पर इतने पैसों का इंतज़ाम कर दे कि रहने के लिए डिपोज़िट और ब्रोकरेज दिया जा सके। तो उसने कई जगहों पर फ़ोन किया। फिर दो दिनों के बाद अपनी बाईक पर वह उसे एक फ़्लैट दिखाने ले गया। बहुत अच्छा फ़्लैट था। सब कुछ था वहाँ। टीवी, फ़्रिज, एसी, मोडुलर किचेन, हॉल, बेडरूम, आलमारी, खाने का सामान, सब कुछ। शबनम हैरान थी। 

 ब्रोकर ने कॉन्ट्रैक्ट पेपर आगे बढ़ाया। उसमें उसका नाम ‘शबनम शेख़’ लिखा हुआ था। तस्वीर भी लगी हुई थी। ब्रोकर ने दस्तख़त करने को कहा। फिर उसने विटनेस के लिए विन्सेंट से कहा। उसने अपना नाम  लिख कर दस्तख़त किया।

 शबनम की असहजता देख कर ब्रोकर ने समझाकर उससे कहा कि वह घबड़ाये नहीं। इधर ……. बहुत सारी लड़कियों को हम लोग ऐसे ही रखते हैं। असल में सूरत, बड़ौदा, अहमदाबाद, जयपुर, दिल्ली, पंजाब आदि से बहुत सारे बिज़नेसमैन आते हैं और यहाँ रहते हैं। जितने ख़र्चे में वे लोग किसी होटल में एक महीना रहेंगे, उतने ख़र्चे में यहाँ पर किसी लड़की को आश्रय देकर एक साल के लिए एक घर किराए पर ले लेते हैं। इधर ईस्ट की तरफ़ से …………..  क्रॉस बॉर्डर से …..भी ….. लड़कियाँ आती हैं और उनको सहारा मिलता है।

 “क्रॉस बॉर्डर मतलब ?”

 “ऊँहू ………….. सवाल नहीं …….  बात को समझिये। फिर उसने धीरे धीरे समझाते हुए कहा – “सप्ताह में सिर्फ़ एक या दो दिन के लिए बिज़नेसमैन लोग आते हैं। कभी कभी महीने – दो महीने पर भी आते हैं। बचे समय में आप आपनी नौकरी, नौकरी की तलाश, अपने अन्य शौक … कुछ भी आराम से कर सकती हैं।  चाहे तो कुछ भी न करें और आराम से पड़ी रहें। जिसकी जैसी ज़रूरत … 

वो  लोग लड़की लोग को एकदम पत्नी की तरह …… खाना वाना बना कर खिलाती हैं। घर बार संभालना…“

 “और…. ?”

 “और ? और क्या चाहिए आपको ?”

 फिर उस ब्रोकर ने  कहा कि अगर बच्चा-वच्चा हैं तो वह उनका भी अच्छा सा इंतज़ाम करवा देगा। किसी को तकलीफ नहीं होता है इधर…

उप संपादक ने पूछा – तो आपके बच्चे वच्चे भी हैं ?

 शबनम से जवाब नहीं मिलने पर उप संपादक ने फिर से उससे यही सवाल पूछा। इस बार शबनम ने ऐसे चौंक कर उसे देखा मानो वह कहीं खो गई थी। 

फिर थकी सी आवाज़ में उसने कहा – आपका जीवन जब दूसरे लोग चलाते हैं, तब उस पर आपका  कोई भी नियंत्रण कहां रह जाता है…

                             — —समाप्त——

फ़रीद ख़ाँ
फ़रीद ख़ाँ
जन्म - 29 जनवरी 1975 पटना में जन्मे और पले बढ़े। पटना विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में एम ए। पटना इप्टा के साथ जुड़ाव। लखनऊ के भारतेंदु नाट्य अकादमी से नाट्य कला में दो वर्षीय प्रशिक्षण। पिछले कई वर्षों से मुम्बई में फ़िल्म और टीवी के लिए व्यवसायिक लेखन। डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी के साथ "उपनिषद गंगा" नामक धारावाहिक का नामक धारवाहिक का लेखन। फ़िल्म 'पटना शुक्ला' में सह-लेखक। प्रकाशन- ई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं जिनमें कृत्या, दो आबा, कथादेश, तद्भव, समावर्तन, आलोचना, अक्षर, के अलावे समालोचन, (ई पत्रिका) में कहानियां प्रकाशित। अंग्रेजी, मलयाली, मराठी. पंजाबी और नेपाली में कविता और कहानी का अनुवाद और प्रकाशन। किताबें- 'अपनों के बीच अजनबी' [कथेतर गद्य], (जिसका अनुवाद 'Stranger In My Own Land' T Jerry Dint,o Loft Word प्रकाशन ने किया।) गीली मिटटी पर पंजों के निशान [कविता संग्रह], मास्टर शॉट [कहानी संग्रह], लोकभारती से प्रकाशित। संपर्क - kfaridbaba@gmail.com
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