भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अपने 15 महीने के कार्यकाल की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हुए कहा है कि उनकी सबसे बड़ी चिंता न्यायिक पेंडेंसी (लंबित मामलों) को कम करना और यह सुनिश्चित करना है कि देश के हर नागरिक तक न्याय और उचित कानूनी प्रतिनिधित्व पहुंचे। कॉलेजियम प्रक्रिया में पारदर्शिता, मध्यस्थता को बढ़ावा और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा उनके एजेंडे के अहम हिस्से होंगे।
इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में सीजेआई ने सूर्यकांत ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में अपने कार्यकाल को याद किया। उन्होंने कहा कि पंजाब में नशे की समस्या पर अदालत की निगरानी उनके लिए धैर्य और निरंतरता की परीक्षा थी। यह ऐसा मामला नहीं था जिसे एक आदेश से सुलझाया जा सके। उन्होंने बताया कि नियमित सुनवाई के जरिए हालात को समझा गया, पीड़ित परिवारों की बातें सुनी गईं और प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय की गई।
इस दौरान बड़े ड्रग तस्करों के खिलाफ कार्रवाई, सीमाओं को मजबूत करने, नशामुक्ति और पुनर्वास केंद्रों की स्थापना तथा युवाओं में जागरूकता फैलाने जैसे कदम उठाए गए। उनके मुताबिक यह दंडात्मक, निवारक और पुनर्वास तीनों पहलुओं को जोड़ने वाला समग्र प्रयास था।
‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ की भूमिका को गलत समझा जाता हैः सीजेआई
मुख्य न्यायाधीश को “मास्टर ऑफ रोस्टर” कहे जाने पर होने वाली आलोचना पर उन्होंने कहा कि इस भूमिका को अक्सर गलत समझा जाता है। रोस्टर तय करना एक प्रशासनिक जिम्मेदारी है, लेकिन यह फैसला अकेले नहीं बल्कि अन्य जजों से परामर्श और उनकी विशेषज्ञता को ध्यान में रखकर लिया जाता है।
न्यायिक स्वतंत्रता पर उन्होंने साफ कहा कि यह केवल कार्यपालिका से आजादी तक सीमित नहीं है, बल्कि किसी भी तरह के दबाव समूहों से दूरी बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
लंबित मामलों, ‘बेल का सिद्धांत’ पर क्या कहा?
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि पेंडेंसी से निपटने के लिए मौजूदा व्यवस्थाओं को मजबूत करना और मध्यस्थता को प्रभावी बनाना जरूरी है। सोशल मीडिया पर अदालत की कार्यवाही के अंश वायरल होने को लेकर उन्होंने कहा कि संदर्भ से काटकर साझा किए गए वीडियो गलतफहमियां पैदा करते हैं और ऐसी ट्रोलिंग को नजरअंदाज करना ही बेहतर है। उन्होंने ‘बेल नियम है, जेल अपवाद’ के सिद्धांत पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि यह आपराधिक न्याय व्यवस्था का आधार है, लेकिन इसका इस्तेमाल हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
कॉलेजियम प्रणाली में सुधार की जरूरत
कॉलेजियम प्रणाली पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह पहले से अधिक पारदर्शी हुई है, लेकिन सुधार की गुंजाइश बनी रहती है। उम्मीदवारों की योग्यता, अनुभव, ईमानदारी और न्यायिक स्वभाव को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
तकनीकी और विशेषज्ञता वाले मामलों, खासकर पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने कहा कि अदालतें विशेषज्ञों और समितियों की मदद से वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाती रही हैं और आगे भी यही तरीका अपनाया जाएगा, ताकि फैसले संतुलित और प्रभावी हों।

