Friday, March 20, 2026
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दृश्यम: एक मुलाकात- कविता, स्मृति और अधूरे प्रेम का मंचीय पुनर्पाठ

पिछले वर्ष 28 दिसम्बर को कमानी सभागार, दिल्ली म़े मंचित  ‘एक मुलाकात, एक ऐसा नाटक है, जिसके शो दिल्ली और अन्य महानगरों में दो दशक से भी अधिक से बार-बार होते रहे हैं। दर्शकों ने इसे खुले दिल से और भरपूर प्यार दिया है। हिंदी-उर्दू साहित्य और रंगमंच के संगम पर खड़ा यह नाटक ‘एक मुलाक़ात’ किसी जीवनीपरक पुनर्निर्माण या ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह सामने नहीं आता, बल्कि वह साहित्यिक स्मृति, कल्पना और संवेदना से उपजा हुआ एक ऐसा नाट्य-अनुभव है, जो दर्शक को तथ्य से अधिक भाव और अनुभूति के स्तर पर संबोधित करता है। यह नाटक उस प्रेमकथा को मंच पर लाने का साहस करता है जो अपने वास्तविक जीवन में कभी पूर्ण नहीं हुई, पर साहित्य में जिसकी प्रतिध्वनि आज भी जीवित है। यह ‘मुलाक़ात’ वस्तुतः दो व्यक्तियों की नहीं, दो काव्य-चेतनाओं की है; दो विचारधाराओं, दो अस्मिताओं और दो अलग-अलग ढंग से प्रेम को जीने वाले मनों की टकराहट और सहअस्तित्व की है।

एक मुलाकात किसी ऐतिहासिक घटना का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि दो कवि-हृदयों के बीच घटित उस कल्पित क्षण की नाट्यात्मक अभिव्यक्ति है, जो समय और यथार्थ की सीमाओं से परे जाकर आज भी हमारी संवेदनाओं में धड़कता है। यह नाटक एक ऐसी शाम रचता है जो कभी वास्तव में नहीं हुई, पर जिसकी संभावना साहित्य में हमेशा जीवित रही। जहाँ स्वीकारोक्तियाँ हैं, अनकहे पल हैं, टूटन है और अधूरे प्रेम का मौन उत्सव भी। मंच पर साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम केवल पात्र नहीं रह जाते, बल्कि दो दृष्टियाँ, दो संवेदनाएँ और दो वैचारिक संसार बनकर उभरते हैं। शेखर सुमन साहिर की द्वंद्वात्मकता, विद्रोह और आंतरिक संघर्ष को तीव्रता के साथ साधते हैं। उनका साहिर न तो केवल प्रेमी है, न ही सिर्फ़ शायर। वह अपने समय से टकराता हुआ एक बेचैन मनुष्य है, जिसकी खामोशियाँ उसकी पंक्तियों जितनी ही मुखर हैं। गीतिका त्यागी की अमृता साहसी और कोमल दोनों रूपों में सामने आती है। एक ऐसी स्त्री जो प्रेम को स्वीकार करती है, उसे जीती है और उसके अपूर्ण रह जाने को भी गरिमा के साथ संभालती है। फिर भी एक कसक थी जो मुझे बार-बार सालती रही। गीतिका के बदले अगर दीप्ति(नवल) यहां होतीं तो फिर यह मंजर कैसा होता? या फिर रह कि 2015-16 के उस दौर में जब दीप्ति अमृता को जीती थीं तब अगर इस नाटक को देखना टाला नहीं होता तो आज एक तुलनात्मक अध्ययन संभव था।

एक मुलाक़ात की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह प्रेम को घटना की तरह नहीं, स्मृति और अनुभूति की तरह मंच पर उपस्थित करता है। संवादों के बीच के ठहराव, मौन और अधूरे वाक्य उतने ही अर्थपूर्ण हैं जितनी कही गई पंक्तियाँ। यह नाटक अभिनय से अधिक एक संवेदनात्मक अनुभव बनता है, जहाँ कविता देह धारण कर लेती है और प्रेम अपने न होने में भी सम्पूर्ण प्रतीत होता है।

अंततः एक मुलाक़ात एक श्रद्धांजलि है। सिर्फ़ साहिर और अमृता के प्रति नहीं, बल्कि उस साहित्यिक प्रेम के प्रति जो कभी पूर्ण नहीं हुआ, फिर भी कभी समाप्त नहीं हुआ।

कल्पना के सहारे रचा गया यथार्थ

एक मुलाक़ात की संरचना एक ऐसे क्षण पर आधारित है जो इतिहास में घटित नहीं हुआ, पर जिसकी आकांक्षा साहित्य में बार- बार व्यक्त होती रही है। जिसको लेकर लोगों के मन में हजारहां सवाल हैं और कोई निश्चित जबाब नहीं। साहिर की मृत्यु के बाद अमृता ने कभी कहा था कि जब उनकी मौत की खबर का ट्रंक कॉल आया उससे ठीक पहले उन्हें लगा था- साहिर यही कहीं हैं उनके पास।  वे उनसे ही तो बातें कर रही थीं… शायद अमृता के अनुभव का वही पल ‘ एक मुलाकात’ नाटक की रचना का उत्स बना। और इसे संभव करने के.लिए साक्ष्य बने- रसीदी टिकट (अमृता की आत्मकथा), साहिर का कविता संग्रह- ‘तल्खियां’ के उनके नज्म और गीत। अमृता के अन्य कविता संग्रह की  कविताएं और साहिर के कुछ फिल्मी गीत। लेकिन इस सारे तिकड़म में एक मासूम सा घपला यह भी हुआ कि यहां वो भी चीजें साग्रह इस्तेमाल हो गयीं कहीं-कहीं, जिससे अमृता का रिश्ता नहीं, या जिसकी वायस अमृता नहीं थीं। कई तो ऐसी भी जो अमृता के उनके जिंदगी में आने से बहुत पहले या फिर उनके जाने के बहुत बाद लिखी गयीं।

इस मामूली और मासूम से गलतफहमी के अलावे  बस सब स्निग्ध, सुंदर और कोमल है इस नाटक में।

 एक शांत शाम है। समय से मुक्त, यथार्थ से परे। जहाँ साहिर और अमृता आमने-सामने बैठते हैं। नाटक इस शाम को बहाना बनाकर प्रेम, स्मृति, अपराधबोध, दूरी, प्रशंसा और अधूरेपन को संवादों में ढालता है।

यहाँ लेखक/निर्देशक का स्पष्ट चुनाव दिखाई देता है कि वे ‘क्या हुआ था’ की बजाय ‘क्या हो सकता था’ पर विश्वास करते हैं। इस दृष्टि से एक मुलाक़ात इतिहास का नाट्य रूपांतरण नहीं, बल्कि साहित्यिक संभावना का मंचन है। यह नाटक साहिर और अमृता को उनके क़िस्सों और उद्धरणों में जकड़कर प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उनके भीतर चल रही बेचैनियों और विरोधाभासों को केंद्र में रखता है।

साहिर: विद्रोह, प्रेम और अस्वीकृति का मानक चेहरा

शेखर सुमन द्वारा अभिनीत साहिर लुधियानवी इस नाटक के केंद्रीय पात्र हैं। यहां साहिर सिर्फ़ रोमांटिक शायर नहीं, बल्कि एक असंतुष्ट, प्रश्नाकुल और भीतर से टूटा हुआ व्यक्ति है। शेखर सुमन का अभिनय साहिर की इस जटिलता को बख़ूबी साधता है। उनकी आवाज़ में तीखापन है, ठहराव में क्रोध और निगाहों में अस्वीकार का भाव। यह नाटक साहिर को आदर्श प्रेमी के रूप में नहीं गढ़ता। वह उनके अहं, उनकी असुरक्षा और उनके आत्मसंघर्ष को भी सामने लाता है। अमृता के प्रति उनका प्रेम यहाँ किसी कोमल गीत की तरह नहीं, बल्कि एक अनकही कसक की तरह उपस्थित होता है,जो स्वीकार से अधिक अस्वीकार में व्यक्त होता है।

शेखर सुमन का साहिर मंच पर बोलते समय जितना मुखर है, मौन में उतना ही प्रभावशाली। उनके ठहराव, अधूरे वाक्य और अनकही निगाहें दर्शक को यह एहसास कराती हैं कि साहिर के लिए प्रेम एक सुंदर अनुभूति से अधिक एक असहज बोझ भी रहा है, जिसे वे चाहकर भी पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाए।

अभिनय नहीं, आत्मसाक्षात्कार

शेखर सुमन का साहिर लुधियानवी किसी नाटकीय प्रदर्शन का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरे आत्मसंयम और समझ से उपजा हुआ चरित्र है। वे साहिर को केवल उनकी लोकप्रिय छवि, रोमांटिक शायर या विद्रोही गीतकार के रूप में नहीं निभाते, बल्कि उनके भीतर मौजूद अकेलेपन, अस्वीकार और मानसिक संघर्ष को मंच पर लाते हैं।

उनकी आवाज़ में एक स्थायी कसक है। जैसे हर संवाद किसी अधूरे वाक्य की निरंतरता हो। वे मंच पर जितना बोलते हैं, उतना ही प्रभाव उनके मौन का है। ठहराव, आँखों की हलचल और देह-भाषा के माध्यम से वे साहिर के भीतर चल रहे द्वंद्व को अभिव्यक्त करते हैं।

यह साहिर आत्मसंघर्ष से भरा, असंतुष्ट और भीतर से अकेला व्यक्ति है। जो प्रेम चाहता तो है, पर उसे पूरी तरह स्वीकार करने से डरता भी है।

यहां.शेखर सुमन का अभिनय किसी नाटकीय उछाह पर आधारित नहीं, बल्कि संयम और आंतरिक ऊर्जा पर टिका है। वे साहिर की तीक्ष्णता को ऊँची आवाज़ या आक्रामक हाव-भाव से नहीं, बल्कि शब्दों की काट और मौन की गहराई से रचते हैं। मंच पर उनके ठहराव यह संकेत देते हैं कि साहिर के लिए प्रेम भी एक वैचारिक द्वंद्व है। जिसे वे कविता में तो साध लेते हैं, जीवन में नहीं।

यह साहिर आत्ममुग्ध नहीं, आत्मालोचक है। वह अपने ही निर्णयों, अस्वीकारों और चुप्पियों से घिरे हुए दिखाई देते हैं। यह प्रस्तुति साहिर को आदर्श या नायक की तरह पेश करने से बचती है, और यही इसकी आलोचनात्मक ईमानदारी है।.शेखर सुमन का साहिर प्रेम में भी असहज है। वह अमृता से प्रेम करता है, पर उसे पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाता। यह असमर्थता उनके अभिनय में कमजोरी नहीं, बल्कि साहिर के चरित्र की सबसे सशक्त विशेषता बन जाती है।

यह भूमिका किसी भी अभिनेता के लिए आसान नहीं।क्योंकि यहाँ अभिनय से अधिक आत्मसंयम चाहिए। शेखर सुमन इस चुनौती को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं। उनका साहिर मंच पर कविता नहीं पढ़ता, बल्कि स्वयं कविता में बदल जाता है। टूटी हुई, तीखी और एक असुविधाजनक कविता। और शेखर हर फ्रेम में बस साहिर हैं, जीते-जागते, हंसते-बोलते, चलते-फिरते साहिर । शक्ल-सूरत से नहीं, बल्कि अक्ल और सीरत में भी हूबहू साहिर।

साहिर की भूमिका में शेखर सुमन: अभिनय नहीं, एक आंतरिक संवाद

रंगमंच पर किसी ऐतिहासिक या साहित्यिक व्यक्तित्व को निभाना हमेशा एक जोखिम भरा उपक्रम होता है। जब वह व्यक्तित्व साहिर लुधियानवी जैसा हो—जिसकी छवि जनस्मृति में शायर, गीतकार, विद्रोही और प्रेमी, सब कुछ एक साथ बन चुकी हो—तो यह जोखिम और भी बढ़ जाता है। ऐसे में अभिनेता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वह साहिर की नकल न करे, न ही उन्हें किसी जड़ प्रतीक में बदल दे। एक मुलाक़ात में शेखर सुमन का अभिनय इसी चुनौती का उत्तर है—संयमित, विचारशील और भीतर की ओर मुड़ा हुआ।

शेखर सुमन का साहिर किसी स्मारक की तरह मंच पर खड़ा नहीं होता। वह चलता है, ठहरता है, हिचकता है, चुप हो जाता है—और इन्हीं क्षणों में वह सबसे अधिक विश्वसनीय बनता है। यह साहिर न तो लोकप्रिय स्मृति में बसे रोमांटिक कवि का आसान संस्करण है, न ही क्रांतिकारी तेवरों का सतही प्रदर्शन। यह एक ऐसा साहिर है जो स्वयं से असहमत रहता है, अपने ही प्रेम से डरता है और अपनी ही तीक्ष्णता से घायल भी होता है।

वह आवाज़ : जहाँ कविता टूटकर बोलती है

शेखर सुमन के अभिनय की सबसे सशक्त विशेषता उनकी आवाज़ है, पर वह आवाज़ ऊँची या प्रभावशाली होने के कारण नहीं, बल्कि अपने भीतर के तनाव के कारण असर करती है। उनके संवाद किसी मंचीय घोषणा की तरह नहीं आते; वे अक्सर ऐसे लगते हैं मानो भीतर से निकलते-निकलते रुक गए हों। कई बार ऐसा महसूस होता है कि साहिर बोल नहीं रहे, बल्कि स्वयं से बहस कर रहे हैं।

उनकी आवाज़ में स्थायी कठोरता नहीं, बल्कि एक थकी हुई तल्ख़ी है। यह तल्ख़ी साहिर की कविताओं से अधिक उनके जीवन-संघर्षों की ओर संकेत करती है। प्रेम की बात करते हुए भी उनकी आवाज़ में सहज कोमलता नहीं आती और यही बात इस साहिर को पारंपरिक प्रेमी-रूप से अलग करती है।

यह साहिर प्रेम में भी आश्वस्त नहीं है। उसकी आवाज़ में जो कंपन है, वह रोमांच से नहीं, असुरक्षा से पैदा होता है। शेखर सुमन इस सूक्ष्म अंतर को पकड़ते हैं और पूरे नाटक में बनाए रखते हैं।

मौन : अभिनय का सबसे बड़ा औज़ार

एक मुलाक़ात में शेखर सुमन का अभिनय जितना संवादों में है, उतना ही बल्कि कहे तो उससेभी  अधिक उनके मौन में है। वे उन बिरले अभिनेताओं में हैं जो चुप रहकर भी भूमिका निभाते हैं। उनके ठहराव, उनकी आँखों की गति, और शरीर की हल्की-सी अकड़ साहिर के भीतर चल रहे द्वंद्व को स्पष्ट कर देती है।

कई बार मंच पर ऐसा क्षण आता है जब साहिर कुछ कह सकते हैं, पर नहीं कहते। यह नहीं कह पाना शेखर सुमन के अभिनय का सबसे गहरा पक्ष है। यह मौन प्रेम की असमर्थता, स्वीकार की असफलता और साहिर के आत्मरक्षा; तीनों का प्रतीक बन जाता है।

यह अभिनय दर्शक से धैर्य माँगता है। जो दर्शक संवाद और भावुक विस्फोट की उम्मीद लेकर आए हैं, उन्हें यह साहिर ठंडा या दूरी बनाए रखने वाला लग सकता है। पर यही दूरी इस चरित्र की सच्चाई है। और शेखर सुमन इसे ईमानदारी से स्वीकार करते हैं।

देह-भाषा : भीतर की असहजता का संकेत

शेखर सुमन का साहिर मंच पर सहज नहीं दिखता और यह असहजता अभिनय की कमी नहीं, बल्कि चरित्र की माँग है। उनका शरीर अक्सर थोड़ा झुका हुआ, कंधों पर अनकहा बोझ उठाए हुए लगता है। बैठने, खड़े होने और चलने के ढंग में एक तरह की बेचैनी है। जैसे साहिर हर क्षण किसी अदृश्य बहस में उलझे हों।

यह देह-भाषा उनके संवादों के साथ मिलकर एक ऐसा चरित्र रचती है जो प्रेम चाहता है, पर उसके लिए जगह नहीं बना पाता। अमृता के सामने उनका शरीर कभी पूरी तरह खुलता नहीं। वह आधा पीछे रहता है, आधा आगे बढ़ता हुआ। यह शारीरिक द्वंद्व साहिर के मानसिक द्वंद्व का सटीक विस्तार है।

अमृता के सामने साहिर : असंतुलन का अभिनय

गीतिका त्यागी की स्थिर और संतुलित अमृता के सामने शेखर सुमन का साहिर और अधिक अस्थिर दिखाई देता है। यह असंतुलन जानबूझकर रचा गया है। जहाँ अमृता ठहरकर बोलती हैं, साहिर जल्दी प्रतिक्रिया देता है। जहाँ अमृता स्वीकार में सहज हैं, साहिर प्रश्न में उलझा हुआ।

इस द्वंद्व में शेखर सुमन अपने किरदार को कमजोर दिखाने से नहीं डरते। उनका साहिर कई बार अमृता के सामने बौना, असहाय और भ्रमित लगता है, और यही बात अभिनय को सशक्त बनाती है। यह साहिर नायक नहीं बनना चाहता, न ही बन पाता है।

साहिर का पुनर्पाठ : एक असुविधाजनक छवि

शेखर सुमन का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वे साहिर को ‘पसंदीदा’ बनाने की कोशिश नहीं करते। उनका साहिर असुविधाजनक है।.दर्शक के लिए भी और स्वयं के लिए भी। वह अपने प्रेम को कविता में बदल सकता है, जीवन में नहीं। वह अमृता को चाहता है, पर उसके साथ सहज नहीं हो पाता।

यह पुनर्पाठ साहिर की लोकप्रिय छवि से टकराता है। और यही टकराव इस अभिनय को आलोचनात्मक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। शेखर सुमन साहिर को एक ऐसे मनुष्य की तरह पेश करते हैं जो अपनी ही तीक्ष्णता का शिकार है।

अभिनय नहीं, अनुभव

शेखर सुमन स्वयं कहते हैं कि- ‘यह भूमिका अभिनय नहीं, एहसास है। और यह कथन मंच पर सिद्ध भी होता है। यह भूमिका तकनीकी दक्षता से अधिक आत्मसंयम माँगती है। यहाँ अभिनेता को चमकने के बजाय सिमटना पड़ता है, बोलने के बजाय सुनना पड़ता है, और नायक बनने के बजाय मनुष्य बनना पड़ता है।’शेखर सुमन इस कठिन रास्ते को चुनते हैं और यही चुनाव एक मुलाक़ात को एक सामान्य मंचीय प्रस्तुति से ऊपर उठाता है। एक मुलाक़ात में शेखर सुमन का साहिर लुधियानवी अभिनय की विजय नहीं, बल्कि आत्मसंघर्ष की प्रस्तुति है। यह साहिर कविता का नहीं, कविता के पीछे छिपे अकेलेपन का चेहरा है। शेखर सुमन इस चरित्र को निभाते नहीं बल्कि वे इसे धीरे-धीरे जीते हैं।

यह भूमिका हमें याद दिलाती है कि महान कवि होना हमेशा महान प्रेमी होना नहीं होता, और कभी-कभी सबसे सच्चा अभिनय वही होता है जिसमें अभिनेता अपने किरदार की असफलताओं को भी उतनी ही ईमानदारी से स्वीकार करता है जितनी उसकी प्रतिभा को।

अमृता : प्रेम की स्वायत्त चेतना

गीतिका त्यागी की अमृता प्रीतम इस नाटक में केवल प्रेमिका नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र रचनात्मक चेतना के रूप में उभरती हैं। उनकी अमृता न तो साहिर के प्रेम में स्वयं को मिटाती है, न ही उसकी अनुपस्थिति को शिकायत में बदलती है। वह प्रेम को स्वीकार करती है, पर उसे अपनी शर्तों पर जीती है।

अमृता का चरित्र इस नाटक में स्त्री-स्वातंत्र्य की एक सशक्त छवि रचता है। वह साहिर से प्रेम करती है, पर उसके जीवन के केंद्र में खुद को नहीं रखती। यही बात साहिर और अमृता के बीच मूल वैचारिक अंतर को रेखांकित करती है। जहाँ साहिर प्रेम को अपने भीतर के द्वंद्व से जोड़ते हैं, वहीं अमृता प्रेम को जीवन-स्वीकृति की तरह देखती हैं।

गीतिका त्यागी की अभिनय–भाषा संयत और सधी हुई है। वे अमृता को न तो अत्यधिक भावुक बनाती हैं, न ही अनावश्यक रूप से विद्रोही। उनकी अमृता में एक गहरी शांति है, जो साहिर की बेचैनी के बरक्स और भी स्पष्ट हो जाती है।

गीतिका त्यागी अभिनीत अमृता इस नाटक में साहिर के प्रतिपक्ष की तरह नहीं, बल्कि एक समानांतर चेतना की तरह उपस्थित हैं। अमृता यहाँ न विरह–विलाप की मूर्ति हैं, न त्याग की देवी। वे एक ऐसी स्त्री हैं जिसने प्रेम किया, उसे स्वीकार किया, और उसके अधूरे रह जाने को भी अपनी रचनात्मकता का हिस्सा बना लिया। गीतिका त्यागी इस संतुलन को सादगी और गरिमा के साथ निभाती हैं। उनके अभिनय में आवेग कम, स्थिरता अधिक है और यही साहिर की बेचैनी के बरक्स उन्हें और अधिक प्रभावशाली बनाता है।

यह अमृता स्त्री–दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। वे प्रेम में भी अपनी अस्मिता को बनाए रखती हैं, और नाटक इसी के माध्यम से एक सूक्ष्म स्त्री–स्वातंत्र्य का पाठ प्रस्तुत करता है—बिना किसी घोषणात्मक नारीवाद के।

संवाद और मौन : नाटक की असली भाषा

एक मुलाक़ात की सबसे बड़ी उपलब्धि इसके संवाद नहीं, बल्कि उनके बीच मौजूद मौन हैं। यह नाटक उन अनकहे वाक्यों को महत्व देता है जो कभी लिखे नहीं गए, उन पत्रों को मंच पर जीवित करता है जो कभी भेजे नहीं गए।

संवाद कविता की तरह बहते हैं, पर उनमें नाटकीयता का आग्रह नहीं है। यहाँ कोई बड़ा क्लाइमैक्स नहीं, कोई ज़ोरदार टकराव नहीं। बस दो चेतनाएँ हैं, जो एक-दूसरे के सामने खुलती और सिमटती रहती हैं। यह शैली दर्शक से धैर्य माँगती है, और यही कारण है कि एक मुलाक़ात हर दर्शक के लिए नहीं, बल्कि संवेदनशील दर्शक के लिए है।

इस नाटक में मौन सबसे मुखर तत्व है। कुछ सबसे महत्वपूर्ण क्षण वे हैं जब कोई पात्र कुछ नहीं कहता। यह मौन दर्शक को आमंत्रित करता है कि वह अपने अनुभव और स्मृति के सहारे उन खाली जगहों को भरे।

प्रेम का पुनर्पाठ

यह नाटक प्रेम को आदर्श, त्याग या मिलन के रूप में नहीं देखता। यहाँ प्रेम एक अपूर्ण अनुभव है-जो स्मृति में अधिक सघन हो जाता है। एक मुलाक़ात इस बात को स्वीकार करता है कि कुछ प्रेम पूरे इसलिए नहीं होते, क्योंकि उनका अधूरापन ही उनकी सबसे बड़ी सच्चाई होता है।

नाटक यह भी प्रश्न उठाता है कि क्या हर महान कविता के पीछे कोई टूटा हुआ प्रेम होता है? और क्या हर प्रेम को पूरा होना चाहिए? साहिर और अमृता के संदर्भ में ये प्रश्न इसलिए और भी जटिल हो जाते हैं, क्योंकि दोनों ही रचनात्मक रूप से समृद्ध व्यक्तित्व थे।

जब प्रेम इतिहास नहीं, स्मृति बनकर मंच पर आता है

समकालीन रंगमंच में जब जीवनी, दस्तावेज़ और यथार्थ की माँग तेज़ होती जा रही है, ऐसे समय में एक मुलाक़ात जैसा नाटक एक विरल अपवाद की तरह सामने आता है। यह नाटक तथ्यों से अधिक भाव पर, घटनाओं से अधिक स्मृति पर और इतिहास से अधिक साहित्यिक संभावना पर भरोसा करता है। साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम जैसे दो स्थापित, लगभग मिथकीय हो चुके साहित्यिक व्यक्तित्वों को मंच पर लाना अपने आप में एक जोखिम भरा काम है। क्योंकि यहाँ ज़रा-सी चूक उन्हें प्रतीक या आदर्श मूर्ति  के रूप में बदल सकती है। एक मुलाक़ात इस खतरे को पहचानते हुए एक अलग रास्ता चुनता है।

एक मुलाक़ात को यदि केवल एक प्रेम-कथा के रूप में देखा जाए, तो उसके भीतर मौजूद गहरे वैचारिक स्तर अनदेखे रह जाते हैं। यह नाटक दरअसल प्रेम के दर्शन, स्मृति की राजनीति और स्त्री-पुरुष संबंधों के असंतुलन पर एक सूक्ष्म टिप्पणी है। यहाँ प्रेम किसी रोमांटिक उपलब्धि की तरह नहीं, बल्कि एक मानसिक अवस्था और सांस्कृतिक अनुभव की तरह प्रस्तुत होता है।

साहिर और अमृता का रिश्ता आधुनिक प्रेम की उस विडंबना को सामने लाता है, जहाँ चाहना गहरी होती है, पर साझा जीवन की संभावना नहीं बन पाती। साहिर का प्रेम आत्मसंघर्ष और अहं से ग्रस्त है। वह प्रेम को भी अपनी वैचारिक बेचैनी के दायरे में खींच लाते हैं। इसके विपरीत, अमृता का प्रेम स्वायत्त और स्वीकारात्मक है। 

यह अंतर जेंडर दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। एक मुलाक़ात में अमृता स्त्री-पीड़ा की पारंपरिक छवि नहीं बनतीं। यह प्रस्तुति साहित्यिक परंपरा में स्त्री-चरित्रों के नए पुनर्पाठ का संकेत देती है।

स्मृति इस नाटक का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है। यह मुलाक़ात स्मृति में घटती है। और स्मृति कभी निष्पक्ष नहीं होती। यहाँ प्रेम को वैसा नहीं दिखाया जाता जैसा वह था, बल्कि वैसा जैसा वह याद किया जाता है याकि उसे होना था। यही कारण है कि यह नाटक यथार्थ से अधिक भावात्मक सत्य पर विश्वास करता है।

इस दृष्टि से एक मुलाक़ात प्रेम का उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम पर विचार है, एक ऐसा विचार, जो अधूरेपन को भी पूर्णता की तरह स्वीकार करता है। 

जहां प्रेम दृश्य नहीं, अनुभूति बन जाता है

आज के समय में जब रंगमंच अक्सर या तो तेज़ दृश्यात्मकता का शोर बन जाता है, या फिर जीवनी और तथ्यपरक प्रस्तुति की सीमाओं में सिमट जाता है, एक मुलाक़ात जैसा नाटक एक दुर्लभ सांस्कृतिक हस्तक्षेप की तरह सामने आता है। यह नाटक न तो साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम के जीवन का पुनर्कथन है, न ही उनके प्रेम–प्रसंग का भावुक उत्सव। यह एक ऐसी कल्पित मुलाक़ात है, जो कभी इतिहास में घटित नहीं हुई—लेकिन साहित्य और स्मृति में जिसकी संभावना हमेशा मौजूद रही।

एक मुलाक़ात वस्तुतः दृश्य से अधिक दृष्टि का नाटक है। यहाँ मंच पर जो घटता है, वह आँख से कम और मन से अधिक देखा जाता है। यह नाटक दर्शक से धैर्य, संवेदना और सहभागिता की अपेक्षा करता है। और यही चीज इसे आज के जल्दबाज़ समय में विशेष बनाती है।

संवाद से अधिक मौन का रंगमंच

एक मुलाक़ात की भाषा काव्यात्मक है, पर आडंबरहीन। संवाद साहित्यिक हैं, पर आत्मप्रदर्शन से मुक्त। कई बार यह नाटक मंच से अधिक पाठ के निकट लगता है—और यही इसकी प्रकृति भी है। यह रंगमंच और साहित्य की सीमा–रेखा पर खड़ा नाटक है।

यहाँ मौन सबसे मुखर तत्व है। अनकही बातें, अधूरे वाक्य और रुके हुए संवाद दर्शक को सक्रिय सहभागिता के लिए आमंत्रित करते हैं। यह नाटक बताता है कि हर दृश्य दिखाने के लिए नहीं होता—कुछ दृश्य महसूस किए जाते हैं।

प्रेम का सांस्कृतिक पुनर्पाठ

एक मुलाक़ात प्रेम का दृश्य नहीं रचता। वह प्रेम की स्मृति को मंच पर उपस्थित करता है। यह नाटक साहिर और अमृता को महिमामंडित नहीं करता, बल्कि उन्हें मनुष्य की तरह देखता है। अपूर्ण, जटिल और असमाप्त।शायद यही वजह है कि मंच से उतरने के बाद भी यह नाटक दर्शक के भीतर चलता रहता है,  एक अधूरे मिलन या फिर एक अधूरी बातचीत की तरह।

आलोचनात्मक स्तर पर देखा जाए तो एक मुलाक़ात की सबसे बड़ी सीमा और शक्ति दोनों यही हैं कि यह अत्यंत सौम्य और धीमा नाटक है। जिन दर्शकों को कथानक-प्रधान या घटनात्मक नाटक की अपेक्षा होगी, उन्हें यह नाटक अधूरा या स्थिर लग सकता है। लेकिन साहित्यिक दृष्टि से यही इसकी ज़रूरत भी है, क्योंकि यह नाटक भाव के  सूक्ष्म संवेगों पर चलता है। कहीं-कहीं संवादों में काव्यात्मकता का अतिरिक्त बोझ महसूस होता है, जहाँ भाषा मंच से अधिक पाठकीय हो जाती है। पर यह भी इस नाटक की प्रकृति का हिस्सा है, क्योंकि यह रंगमंच से अधिक साहित्य के निकट खड़ा नाटक है। यह साहिर और अमृता को मूर्ति नहीं बनाता, बल्कि उन्हें मनुष्य की तरह देखता है- अपूर्ण, जटिल और विरोधाभासी।

 एक मुलाक़ात अभिनय नहीं, अनुभव है; कथा नहीं, संवेदना है; और प्रेम नहीं, प्रेम की प्रतिध्वनि है, जो मंच से उतरकर देर तक मन में बनी रहती है।यह प्रस्तुति उन दर्शकों के लिए है जो रंगमंच में घटना नहीं, अनुभूति तलाशते हैं। 

कविता
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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