Friday, March 20, 2026
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दिल्ली यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम से चीन, पाकिस्तान और इस्लाम पर विषय को हटाने की चर्चाओं के बाद विवाद

नई दिल्लीः दिल्ली विश्वविद्यालय के पैनल ने एम ए राजनीति विज्ञान से चीन, पाकिस्तान और इस्लाम का पाठ्यक्रम हटाने का विचार कर रहा है। इस प्रस्ताव पर विभाग के प्रोफेसरों के मत बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कुछ शिक्षकों ने आरोप लगाया है कि यह राजनैतिक रूप से पक्षधरता को दिखाता है और अकादमिक स्वतंत्रता को भी खतरा पहुंचाता है।

वहीं, कुछ शिक्षकों का मानना है कि यह राष्ट्रीय प्रासंगिकता को सुरक्षित करता है और पाठ्यक्रम को भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं के साथ जोड़ता है। 

मंगलवार को हुई थी समिति की बैठक

समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, शैक्षणिक मामलों पर विश्वविद्यालय की स्थायी समिति ने मंगलवार को विभागों में पाठ्यक्रम की समीक्षा के लिए बैठक हुई थी। 

न्यूज 18 ने अकादमिक काउंसिल की सदस्य मोनामी सिन्हा के हवाले से लिखा कि राजनीतिक विज्ञान स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम “महत्वपूर्ण जांच” के दायरे में आ गया। उन्होंने कहा कि जिन पाठ्यक्रम हटाया या प्रतिस्थापित किया जा सकता है। उनमें ‘इस्लाम और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति’, ‘पाकिस्तानः राज्य और समाज’ और ‘धार्मिक राष्ट्रवाद और राजनैतिक हिंसा’ है। उन्होंने कहा कि इन पाठ्यक्रमों को या तो पूरी तरह से हटाया जाएगा या फिर नया रूप दिया जाएगा। 

विभागीय समिति अब एक नया पाठ्यक्रम तैयार करेगी जिसे फिर विश्वविद्यालय की औपचारिक स्वीकृति से गुजरना पड़ेगा। हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय की तरफ से अभी कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। 

इससे पहले विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर योगेश सिंह ने कहा था कि विभाग के प्रमुखों से पाठ्यक्रम की समीक्षा के बारे में पूछा गया है और इसमें मौजूद “पाकिस्तान को अनावश्यक गौरवपूर्ण” बताने वाली सामग्री को हटाने के लिए कहा गया है। 

शिक्षकों ने दर्ज कराया विरोध

हालांकि, डीयू की फैकल्टी के कई सदस्यों ने इन बदलावों का तीखा विरोध दर्ज कराते हुए इन्हें विचारधारा से प्रेरित करने वाला बताया है। डॉ. मोनामी सिन्हा ने तर्क दिया कि ऐसे पाठ्यक्रमों को छोड़ने में अकादमिक अखंडता और आलोचनात्मक सोच से समझौता होता है, जिसे उच्च शिक्षा को प्रोत्साहित करना चाहिए।

उन्होंने कहा भारत की विदेश नीति में इसकी केंद्रीय भूमिका को देखते हुए पाकिस्तान का विस्तार से अध्ययन करना जरूरी होता है। इसी तरह चीन पर सामग्री को हटाने से उसके बढ़ते वैश्विक प्रभाव की वास्तविकता को नजरअंदाज किया जा सकता है। वहीं, चीन का पाठ्यक्रम हटाने को लेकर उन्होंने कहा कि यह उभरती वैश्विक प्रभाव की वास्तविकता को नजरअंदाज करता है। 

राजनीति शास्त्र के अलावा कई अन्य विभागों में भी पाठ्यक्रम में बदलाव की बात की जा रही है। समिति ने कथित तौर एम ए भूगोल के पहले सेमेस्टर से तीसरी यूनिट हटाने का प्रस्ताव दिया है। इस यूनिट में आंतरिक संघर्ष और धार्मिक हिंसा समेत राजनैतिक वैज्ञानिक पॉल ब्रास के काम से जुड़े टॉपिक को हटाने की बात करता है। 

अन्य विषयों में भी कई टॉपिक हटाने का प्रस्ताव

इसी तरह सामादिक भूगोल के पाठ्यक्रम में समिति ने “अनुसूचित जाति जनसंख्या को वितरण” को शामिल करने पर आपत्ति जताई तथा जाति पर कम जोर देने का तर्क दिया। 

इसी तरह समाजशास्त्र में पूरी तरह से पश्चिमी विचारकों पर केंद्रित करने की भी आलोचना की गई। इसमें मैक्स वेबर, कार्ल मार्क्स और इमाइल दुर्खीम का नाम शामिल है। समिति ने इनके स्थान पर भारतीय विचारकों और परंपरागत पारिवारिक संरचना को शामिल करने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही सेम-सेक्स परिवारों पर काथ वेस्टन के विचारों को भी चुनौती दी गई है। इस रीडिंग के बारे में कहा गया है कि यह अनुचित है क्योंकि भारत में यह गैरकानूनी है। इसके साथ ही संवेदनशीलता और आपदा प्रबंधन पर भी एक पाठ्यक्रम को हटा दिया गया है। 

इन बदलावों को लेकर शिक्षकों के बीच बातचीत शुरू हो गई है जिसमें कहा जा रहा है कि ये प्रयास उच्च शिक्षा में अकादमिक स्वतंत्रता, संस्थानिक स्वायत्तता और वैचारिक हस्तक्षेप को दर्शाते हैं।

अमरेन्द्र यादव
अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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