28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल गठबंधन द्वारा ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद से पश्चिम एशिया में युद्ध एक महीने से अधिक समय से जारी है। आने वाले दिनों में युद्ध और भी तीव्र हो सकता है या प्रतिद्वंद्वी पीछे हटकर कूटनीति को मौका दे सकते हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि हवा किस दिशा में बहेगी, और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
डीजल, एलपीजी और पेट्रोल की कथित कमी के चलते खरीद में अफरा-तफरी और सरकार द्वारा इन अफवाहों को खारिज करने की खबरें देखी जा रही हैं।
टीवी चैनल हों, पोर्टल हों या अखबार कोई भी इन झूठी खबरों को नजरअंदाज नहीं कर सका। दिलचस्प बात यह है कि कभी-कभी अफवाहों को दूर करने की कोशिश उन्हें और भी ज्यादा विश्वसनीय बना देती है। फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोगों ने पेट्रोल पंपों की तस्वीरें पोस्ट कीं जिनमें मुट्ठी भर ग्राहक ही नजर आ रहे थे।
इन सबके बीच कश्मीर में एक अनोखी घटना केंद्र बिंदु रही- वह ईरानी लोगों के लिए चंदा इकट्ठा करना! जी हां कश्मीर के कई हिस्सों में मस्जिदें और सार्वजनिक सभा के अन्य स्थान चंदा इकट्ठा करने के कई आयोजन हुए। महिलाएं, बूढ़े और जवान, अपने बच्चों को गुल्लक में लिए हुए, इन स्थानों पर उमड़ पड़ीं।
यह ईद के कुछ दिनों बाद हुआ और इसमें तांबे-स्टील के बर्तन, बेड शीट्स, घर का सामान और कैश सहित अन्य मूल्यवान चीजें थीं। इसी तरह की एक अन्य घटना में एक बुजुर्ग महिला चंदा इकट्ठा करने के लिए मस्जिद में पहुंची और अपने कुछ सोने के आभूषण दान कर दिए। अधिकांश समाचार पत्रों ने बताया कि वह अपने पति की मृ्त्यु के बाद पिछले दो दशक से अपने पास रखे आभूषण दान कर रही थी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, बच्चे कैश निकालने के लिए अपने गुल्लक तोड़ रहे हैं और चंदा इकट्ठा करने वालों को दे रहे हैं, नवविवाहित महिलाओं को एक या दो अंगूठी, चांदी का सामान देते दिखाया गया। जम्मू क्षेत्र में ऐसी रिपोर्टें सिर्फ एक ही जगह से प्राप्त हुईं, चंदरकोट (रामबन) की एक मस्जिद से जहां शिया बड़ी संख्या में रहते हैं। नीलामी स्थल पर दान की गई कुछ वस्तुओं की नीलामी की गई और बोली लगाने वालों द्वारा दी गई नकदी को अंतिम राशि में शामिल किया गया।
अब सवाल पर आते हैं जो हममें से कोई भी पूछ सकता है। व्यक्तिगत तौर पर मैंने कश्मीर घाटी से निकाले गए पंडितों के लिए ऐसे किसी भी दान के बारे में देखा या सुना नहीं है। घाटी में रहने वाले हिंदू सदियों से कश्मीर में रह रहे थे लेकिन 1989-90 में इस्लामी कट्टरपंथियों ने वहां से भगा दिया था। निश्चित तौर पर पिछले चार दशकों में ऐसा तो नहीं हुआ है।
जिन्होंने चंदा इकट्ठा किया और जिन्होंने चंदा दिया उसे ईरानी लोगों के साथ एकजुटता का प्रतीक बताया। चंदा इकट्ठा करने के दौरान छोटे बच्चे भी ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ और ‘इजराइल मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे। ऐसे कामों में शामिल लोगों के बारे में इससे क्या पता चलता है?
यह तो साफ तौर पर कहा जा सकता है कि यह ईरानियों खासकर अपने जैसे शियाओं के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है। साथ ही यह भी कि ईरान के दूरदराज के शियाओं के प्रति उनका प्रेम कश्मीर में अपने घर छोड़कर आए हिंदुओं के प्रति किसी भी सहानुभूति या प्रेम से कहीं अधिक है। पाकिस्तानी बंदूकधारी आतंकवादियों के सामने बेबसी जताने के अलावा, 36 साल से अधिक के अपने पत्रकारिता करियर में मैंने कभी भी कश्मीरी हिंदुओं, यानी कश्मीरी धरती के बेटों और बेटियों के लिए कोई चंदा अभियान नहीं देखा।
कुछ चुनिंदा अवसरों पर हमें कुछ कहानियां पढ़ने को मिलती हैं कि कश्मीरी मुसलमानों ने कश्मीर के दूरदराज इलाके के गांव में पड़ोसी हिंदू के अंतिम संस्कार में शामिल हुए। वहीं दूसरे अवसर पर कुछ रिपोर्ट कहती हैं कि स्थानीय मुसलमान कश्मीर पंडितों को वापस लाना चाहते हैं। लेकिन क्या इन खोखले बयानों में कोई सच्चाई नहीं है?
पीएम मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और उनसे पहले की सरकारों ने अक्सर कहा है कि वे जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में आतंकवाद को खत्म करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली केंद्र शासित प्रदेश सरकार और उनसे पहले की सरकारों ने भी इसी तरह की बातें कही हैं। लेकिन ये सिर्फ राजनीतिक रूप से सही बयानबाजी तक ही सीमित नहीं हैं, कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में अनुच्छेद-370 निरस्त करना निश्चित रूप से एक सही कदम था। कश्मीर के आम लोगों के एक बड़े वर्ग में पनप रही अलगाववादी भावना को दूर करने में मदद मिली। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व में विभिन्न आतंकवादी संगठनों की कमर तोड़कर आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले तंत्र को नष्ट करने का काम भी चल रहा है। बेशक, इसमें समय लग रहा है।
एक हफ्ते पहले कुछ कश्मीरी पंडितों ने शोपियां जिले के नदीमार्ग का दौरा किया जहां उनके दो बच्चों सहित 24 लोगों की 23 मार्च 2003 को हत्या कर दी गई थी। ये लोग कश्मीर छोड़कर भाग गए थे और आज भी उस कस्बे में चार मंजिला वीरान मकान खड़े हैं। वे लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के आतंकवादियों द्वारा मारे गए शहीदों को श्रद्धांजलि देने गए थे।
आने वाले महीनों में कुछ और कश्मीरी पंडित खीर भवानी, शारिका मंदिर, ज्येष्ठ स्थान और कश्मीर के अन्य मंदिरों में जाएंगे। पिछले कुछ वर्षों में हिंदुओं, विशेषकर कश्मीर में अपने घर-बार छोड़कर आए लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है। आने वाले वर्षों में यह संख्या और भी बढ़ सकती है लेकिन उनकी स्थायी वापसी एक सपने जैसी है हकीकत नहीं।
क्यों? क्योंकि किसी भी कश्मीरी मुस्लिम ने न तो व्यक्तिगत स्तर पर और न ही पार्टी के स्तर पर चंदा इकट्ठा करने का अभियान चलाया है जैसे उन्होंने दूर रहने वाले शिया ईरानियों के लिए किया है। जिस दिन कश्मीर के उन दूर-दराज गांवों में भी कुछ ऐसा ही होने लगेगा जहां कभी हिंदू रहते थे उस दिन पलायन कर चुके लोग अपने परिवेश में वापस स्वागत महसूस कर सकते हैं। और फिर वापस आएंगे।

