Friday, March 20, 2026
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क्या अमेरिका को किसी देश के राष्ट्रपति को गिरफ्तार करने का अधिकार है? जानें क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून

निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वेनेजुएला को कुछ समय के लिए अमेरिका चलाएगा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक अस्थिरता रोकने और देश के जर्जर हो चुके तेल ढांचे को दोबारा खड़ा करने के लिए इस संक्रमण काल की निगरानी जरूरी है।

वॉशिंगटनः राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने शनिवार को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को एक सैन्य अभियान के तहत हिरासत में ले लिया। यह कार्रवाई राजधानी कराकस में की गई, जहां हमलों और विस्फोटों से पूरा शहर दहल गया।

गौरतलब है कि अमेरिका और उसके कुछ सहयोगी मादुरो को लंबे समय से अवैध राष्ट्रपति मानते रहे हैं। गिरफ्तारी के बाद मादुरो और उनकी पत्नी को न्यूयॉर्क लाया गया है जहां उनपर ड्रग तस्करी से जुड़े आरोपों में मुकदमा चलाया जाना है।

जहां ट्रंप के इस कदम को उनके कई सहयोगियों और रिपब्लिकन नेताओं ने सराहा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। आलोचकों का कहना है कि यह कार्रवाई वेनेजुएला की संप्रभुता का सीधा उल्लंघन है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे अहम सवाल यही है कि क्या किसी देश को यह अधिकार है कि वह दूसरे देश में घुसकर उसके मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष को गिरफ्तार कर ले? आइए जानते हैं कानून क्या कहता ह?

अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?

अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी भी देश को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी संप्रभु राष्ट्र के कार्यरत राष्ट्राध्यक्ष को सैन्य बल के जरिए पकड़ ले। संयुक्त राष्ट्र ने भी शनिवार को कहा कि अमेरिका की यह कार्रवाई एक खतरनाक मिसाल कायम करती है, खासकर ऐसे समय में जब दुनिया पहले ही कई संघर्षों से जूझ रही है।

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, मादुरो की गिरफ्तारी संयुक्त राष्ट्र चार्टर का स्पष्ट उल्लंघन है। अक्टूबर 1945 में लागू हुए इस चार्टर के अनुच्छेद 2(4) में साफ कहा गया है कि कोई भी देश दूसरे देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ सैन्य बल का इस्तेमाल नहीं करेगा।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के आर्टिकल में लिखा गया है, “सभी सदस्य अपने इंटरनेशनल संबंधों में किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ़ धमकी या बल के इस्तेमाल से बचेंगे, या किसी भी ऐसे तरीके से जो यूनाइटेड नेशंस के उद्देश्यों के साथ असंगत हो।”

ब्रिटिश वकील और अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञ जेफ्री रॉबर्टसन केसी ने अमेरिकी कार्रवाई को चार्टर का साफ उल्लंघन बताया है। उन्होंने गार्जियन से कहा कि अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन किया है और यह आक्रामकता का अपराध है, जिसे नूर्नबर्ग ट्रायल में सबसे गंभीर अपराध बताया गया था।

नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में संवैधानिक कानून के प्रोफेसर जेरेमी पॉल ने डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में वेनेजुएला में की गई कार्रवाई पर सवाल खड़े किए। उन्होंने ट्रंप के उस बयान का भी जिक्र किया जिसमें उन्होंने कहा कि कुछ समय के लिए वेनेजुएला को हम चलाएंगे।

रॉयटर्स से बात करते हुए जेरेमी ने कहा, “आप एक तरफ इसे कानून-व्यवस्था की कार्रवाई बताते हैं और दूसरी तरफ कहते हैं कि अब हम उस देश को चलाएंगे। यह तर्क ही समझ से परे है।”


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हालांकि अमेरिका मादुरो को विवादित और चुनावों में धांधली का आरोपी मानता रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बिना किसी देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की इजाजत नहीं है। इस मामले में संयुक्त राष्ट्र को पहले से कोई जानकारी नहीं दी गई थी। हैरानी की बात यह भी है कि ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी कांग्रेस से भी कोई अनुमति नहीं ली।

अमेरिका ने कार्रवाई को कैसे सही ठहराया

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि मादुरो की गिरफ्तारी न्याय विभाग के अनुरोध पर की गई एक सैन्य कार्रवाई थी। अमेरिकी अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी ने कहा कि मादुरो और उनकी पत्नी अमेरिकी अदालतों में मुकदमे का सामना करेंगे। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद इस दलील को कमजोर कर दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने वेनेजुएला पर अमेरिकी तेल हितों की चोरी का आरोप लगाया और यह भी कहा कि अमेरिका कुछ समय तक देश को चलाएगा।”

विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने माना कि इस ऑपरेशन की पूर्व सूचना किसी को नहीं दी गई थी। आम तौर पर ऐसी कार्रवाइयों के लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होती है, हालांकि अमेरिकी प्रशासन पहले भी सीमित दायरे और राष्ट्रीय हित का हवाला देकर विदेशों में सैन्य कार्रवाई को सही ठहराते रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञ सुसान ब्रू के मुताबिक, यह कार्रवाई तभी वैध मानी जा सकती थी जब अमेरिका को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी मिली होती या वह आत्मरक्षा में कदम उठा रहा होता। उनका कहना है कि इन दोनों ही स्थितियों का कोई ठोस आधार सामने नहीं आया है। ब्रू ने यह भी कहा कि ड्रग तस्करी को आधार बनाकर कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन अब तक ऐसा कोई स्पष्ट सबूत नहीं है कि यह गतिविधियां सीधे तौर पर मादुरो सरकार के नियंत्रण में थीं।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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