Friday, March 20, 2026
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कथा प्रांतर-8: एक नई संभावित दुनिया का दरवाजा

साहित्य की तमाम विधाओं के बीच कहानी की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि प्रति वर्ष अनुमानतः पाँच सौ से ज्यादा नई हिंदी कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं। नई कहानी के दौर में पहली बार कहानियों के विधिवत मूल्यांकन का जो सिलसिला शुरू हुआ था, आज वह एक सुदीर्घ परंपरा के रूप में विकसित हो चुका है। ‘कथा प्रांतर’ चुनिंदा कहानियों के मूल्यांकन की एक शृंखला है, जिसकी हर कड़ी में कहानीकार आलोचक राकेश बिहारी किसी समकालीन कहानी की विवेचना करते हैं। इस शृंखला की आठवीं कड़ी में प्रस्तुत है, दिव्या विजय की कहानी ‘अलगोजे की धुन पर’ का विश्लेषण।

कथा प्रांतर की पाँचवीं कड़ी में, मिथिलेश प्रियदर्शी की कहानी ‘रकीब’ पर केंद्रित आलेख ‘क्वीयर संवेदना के सघनतम तनाव की अभिव्यक्ति’ के अंतिम हिस्से में मैंने यह संकेत किया था कि आत्म-प्रतिबिंबित प्रतिस्पर्धी के प्रिय और आत्मीय हो जाने की उस कथा के अंतिम पड़ाव तक आते-आते दो पुरुष रक़ीबों के सम्बन्धों की जो जटिल संरचना वहाँ खुलती है, उसका एक स्त्री-संवेदी रूप दिव्या विजय की कहानी ‘अलगोजे की धुन पर’ में मौजूद है। उक्त आलेख में मैंने उस कहानी पर फिर कभी चर्चा करने की बात भी की थी। जीवन की कुछ अन्य अनिवार्यताओं के बीच वह ‘फिर कभी’ पिछले दो किश्तों में स्थगित होता रहा। इससे पहले कि वह स्थगन टालमटोल या विघटन में बदल जाए, फरवरी ने एक बार पुनः उस ‘फिर कभी’ की याद दिलाई है।

फरवरी यानी वसंत, यानी वे दिन जब सार्वजनिक और निजी दोनों स्तरों पर प्रेम की भाषाएँ अधिक स्पष्ट, अधिक मुखर और कभी-कभी अधिक व्यावसायिक भी हो उठती हैं। ‘वेलेंटाइन वीक’ के सजावटी उत्सवों के बीच प्रेम की लोकप्रिय और बाज़ारपोषित छवियाँ कई बार प्रेम की संरचनात्मक, जैविक और आध्यात्मिक जटिलताओं को ढँक देती हैं। ऐसे समय में प्रेम के उन रूपों की ओर लौटना ज़रूरी हो जाता है जो प्रतिस्पर्धा, स्वामित्व और पितृसत्तात्मक संरचनाओं से बाहर अपनी जगह बनाने की कोशिश करते हैं।

‘रकीब’ पर लिखा गया वह आलेख प्रेम के त्रिकोण में छिपी क्वीयर संवेदना की पड़ताल था, जहाँ एक रकीब प्रतिद्वंद्वी नहीं, आत्म-प्रतिबिंब में रूपांतरित हो जाता है। वहाँ ईर्ष्या आत्म-स्वीकार की सीढ़ी बनती है। उस लेख के अंत में ‘अलगोजे की धुन पर’ का ज़िक्र एक तरह से उस खुली संभावना की तरफ संकेत भी था कि यदि रकीब की अवधारणा पुरुष-पुरुष संबंधों के संदर्भ में विघटित हो सकती है, तो क्या स्त्री-स्त्री संबंधों में भी वह किसी नए अर्थ में उद्घाटित हो सकती है? क्या प्रेम का त्रिकोण अनिवार्यतः हिंस्र प्रतिस्पर्धा की ओर ही जाता है, या वह पारस्परिकता की किसी नई दुनिया के दरवाजे भी खोल सकता है? दिव्या विजय की कहानी ‘अलगोजे की धुन पर’ इन्हीं प्रश्नों के स्वाभाविक विस्तार के रूप में सामने आती है। यदि ‘रकीब’ में ईर्ष्या और आकर्षण के बीच फँसे पुरुष मन की क्वीयर बेचैनी को स्वर मिलता है, तो ‘अलगोजे की धुन पर’ उसी संरचना को स्त्री अनुभव के भीतर पुनर्स्थापित करती है। यहाँ भी त्रिकोण है- पूर्व प्रेमिका, वर्तमान प्रेमिका और एक पुरुष। पर कथा का केंद्र धीरे-धीरे पुरुष से खिसककर दो स्त्रियों के बीच बन रहे सूक्ष्म, आत्मीय और अप्रत्याशित सेतु पर आ टिकता है।

इस प्रकार, यह लेख केवल एक नई कहानी पर विचार नहीं, बल्कि पूर्ववर्ती विचार-प्रक्रिया की निरंतरता है। ‘रकीब’ से ‘अलगोजे की धुन पर’ तक की यह यात्रा क्वीयर संवेदना के दो छोरों को जोड़ने का प्रयास है, जहाँ रकीब शत्रु नहीं, दर्पण बनता है, जहाँ प्रेम स्वामित्व नहीं, अनुभव की पारस्परिकता है और जहाँ प्रतिस्पर्धा की जगह साझा संवेदना की धुन सुनाई देती है। ‘रकीब’ जहाँ पुरुष–पुरुष–पुरुष त्रिकोण में इच्छा, ईर्ष्या और आत्म-स्वीकार के मनोविश्लेषणात्मक वृत्त रचती है, वहीं ‘अलगोजे की धुन पर’ स्त्री–स्त्री–पुरुष त्रिकोण के भीतर पितृसत्तात्मक प्रतिस्पर्धा की संरचना को विघटित करते हुए स्त्री-पारस्परिकता की नई भावभूमि निर्मित करने का प्रयास करती है। इन दोनों कहानियों को साथ पढ़ना इसलिए भी ज़रूरी है कि दो भिन्न धरातल पर लिखी होने के बावजूद दोनों ही कहानियों में ‘रकीबपन’ का भाव अंततः आत्मीय स्पर्श में विघटित होता है।

कबीर की पूर्व प्रेमिका अन्वेषा और वर्तमान प्रेमिका स्वप्ना के एक उद्यान में मिलने के बहाने रची गई यह कथा ‘मैं’ शैली में लिखी गई है और पूरी तरह वाचक की आंतरिक दृष्टि से संचालित होती है। यहाँ कबीर एक स्वतंत्र चरित्र नहीं, बल्कि स्मृति और गंध की तरह उपस्थित है। वह कहानी में देह की तरह नहीं, ध्वनि की तरह है, अनुपस्थित होते हुए भी गूँजता हुआ। कहानी में कबीर की अनुपस्थिति अन्वेषा के भीतर एक आंतरिक कंपन पैदा करती है। लेकिन दोनों कहानियों के बीच एक उल्लेखनीय और स्पष्ट अंतर है। ‘रकीब’ में वाचक अपने रकीब के प्रति आकर्षण और ईर्ष्या के द्वंद्व में उलझा रहता है और अंततः आत्म-स्वीकार की दिशा में बढ़ता है। वहाँ इच्छा का तनाव अंत तक बना रहता है और जेल का दृश्य उसे एक संभावित क्वीयर प्रेम की ओर मोड़ देता है। ‘अलगोजे की धुन पर’ में यह तनाव अधिक सूक्ष्म है। यहाँ दो स्त्रियाँ- अन्वेषा और स्वप्ना, एक ही पुरुष- कबीर के माध्यम से जुड़ी हैं। इन दोनों स्त्रियों का मिलना, उनका संकेतित जुड़ाव पहली दृष्टि में पितृसत्तात्मक प्रतिस्पर्धा का विस्तार-सा लगता है। परंतु जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, रकीब की अवधारणा शिथिल होती जाती है।

‘अलगोजे की धुन पर’ में स्वप्ना अन्वेषा का दर्पण है, सहानुभूतिशील दर्पण। वह अन्वेषा की पराजय का प्रमाण नहीं, उसकी संवेदनात्मक निरंतरता का साक्ष्य बनती है। कहानी का वह दृश्य, जहाँ स्वप्ना अन्वेषा की गोद में सिर रखती है और अन्वेषा उसे सहलाती है, भावुकता से कहीं आगे, पितृसत्तात्मक प्रेम-त्रिकोण की संरचना के विघटन का संकेत है। यहाँ पुरुष अनुपस्थित है और दो स्त्रियाँ एक-दूसरे के दुख, स्मृति और रिक्तियों का पूरक बनती हैं। एक-दूसरे को पूरने का यह भाव स्वामित्व के पारंपरिक दावे का विघटन और अनुभूति के प्रमाणन का साझा विस्तार है।

‘रकीब’ में क्वीयर इच्छा दमन, आत्महीनता और राजनीतिक हिंसा की पृष्ठभूमि में आकार लेती है। वहाँ शाहीन बाग़ और जेल के दृश्य क्वीयर अस्तित्व के दमन और प्रतिरोध के रूपक बन जाते हैं। ‘अलगोजे की धुन पर’ में राजनीति के संदर्भ प्रत्यक्षतः उपस्थित नहीं हैं, पर उसके सांस्कृतिक आयाम लगातार संकेतित हैं। स्त्री-शरीर की स्वतंत्रता, सिगरेट का साझा कश, चूड़ियों का आदान-प्रदान और चुम्बन…ये सब छोटे-छोटे सांस्कृतिक हस्तक्षेप हैं, जो स्त्री की कामना को प्रतिस्पर्धा से पारस्परिकता की ओर मोड़ने का प्रस्ताव रखते हैं।

दोनों कहानियों में एक और महत्त्वपूर्ण समानता है- प्रेम का नैरंतर्य। ‘रकीब’ में अंसल यह समझता है कि प्रेम एक बार का अनुभव नहीं, बल्कि पुनर्जन्म लेने वाली प्रक्रिया है। ‘अलगोजे की धुन पर’ में भी प्रेम समाप्त नहीं होता; वह एक देह से दूसरी देह और एक स्मृति से दूसरी स्मृति में प्रवाहित होता है। कबीर दोनों के जीवन में है, पर अंततः वह दोनों के बीच का पुल भर रह जाता है।

यदि ‘रकीब’ क्वीयर इच्छा के सघनतम तनाव का दस्तावेज़ है, तो ‘अलगोजे की धुन पर’ उस तनाव के पिघलने और रूपांतरित होने की कहानी है। एक में रकीब के प्रति आकर्षण आत्म-स्वीकार में बदलता है, दूसरे में रकीब के प्रति सहानुभूति आत्मीयता में। दोनों ही कहानियाँ इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि ये पारंपरिक नैतिक ढाँचे में उल्लेखनीय और दृश्य हस्तक्षेप करती हैं- एक समलैंगिक पुरुष प्रेम की संभावना के माध्यम से, दूसरी स्त्री-पारस्परिकता और संभावित स्त्री-स्त्री आकर्षण के माध्यम से। इन दोनों को साथ पढ़ना हिन्दी कथा-साहित्य में क्वीयर संवेदना की एक नई मनोभूमि का संधान करना है, जहाँ रकीब शत्रु नहीं, आत्म-प्रतिबिंब है; जहाँ प्रेम स्वामित्व नहीं, साझा अनुभव है; और जहाँ इच्छा अपराध नहीं, आत्म-स्वीकृति की ओर ले जाने वाली ऊर्जा है। इन अर्थों में ‘रकीब’ और ‘अलगोजे की धुन पर’ अलग-अलग कहानियाँ नहीं, बल्कि एक ही भाव-संगीत की दो धुनें हैं, जिन्हें साथ सुनने पर उनकी पूर्ण लय उद्घाटित होती है। लेकिन ‘अलगोजे की धुन पर’ को सिर्फ रकीब के भाव-साम्य की तरह देखना उसकी रचनात्मक स्वायत्तता को सीमित करना होगा। इसलिए ज़रूरी है कि इसके संरचनात्मक, सैद्धान्तिक, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक पक्षों पर स्वतंत्र रूप से विचार किया जाए।

‘अलगोजे की धुन पर’ की वास्तविक शक्ति घटनाओं में नहीं, बल्कि कथन-प्रक्रिया में निहित है। कहानी का मूल घटनाक्रम अत्यंत साधारण है- पूर्व प्रेमिका अन्वेषा और वर्तमान प्रेमिका स्वप्ना का एक उद्यान में मिलना और कुछ घंटों का साथ। किन्तु इस साधारण कथ्य को कहानीकार ने जिस तरह संरचित और प्रस्तुत किया है, वही इसे विशिष्ट बनाता है। ‘मैं’ शैली में कही गई इस कहानी में अन्वेषा वाचक भी है और पात्र भी। जेरार्ड जेनेट की शब्दावली में कहें तो एक ‘होमोडायजेटिक नैरेटर’। पूरी कहानी अन्वेषा की चेतना से ही छनकर आती है। स्वप्ना का व्यक्तित्व, उसकी मुस्कान, उसकी आँखें, यहाँ तक कि उसकी मंशा भी पाठक को अन्वेषा की दृष्टि से ही ज्ञात होती है-

“क्या इसी के लिए मेरे प्रेमी ने मुझे छोड़ा है। क्या अच्छा लगा होगा इसमें? हाँ, इसकी आँखें खूबसूरत हैं। बहुत बड़ी नहीं पर आकर्षक जिन्हें काजल की रेखा ने और भी सुरूप बना दिया है। इसके लम्बे बालों को वह अवश्य पसन्द करता होगा। और इसके होंठ…कितना सुन्दर आकार है। इन होंठों से जब यह उसे छूती होगी तो क्या इसे मालूम हुआ होगा कि वह पहले मेरे होंठ छू चुका है। मेरे होंठों का स्वाद उसके अधरों में अब भी शेष होगा!”

यहाँ अन्वेषा का स्वप्ना को देखना केवल ईर्ष्या से भरा दृष्टिपात नहीं है। वह उसके शरीर को, एक संवेदनात्मक गहराई से देखती है। इस दृष्टि में आकर्षण, जिज्ञासा और तुलनात्मकता का मिलाजुला भाव निहित है। सामान्य पुरुष दृष्टि से इतर यहाँ स्त्री-शरीर किसी पुरुष की इच्छा का केंद्र नहीं, बल्कि स्वयं स्त्री की संवेदना का क्षेत्र बन जाता है। अन्वेषा स्वयं को संयत और परिपक्व दिखाना चाहती है, किंतु उसके भीतर गहरी ईर्ष्या और असुरक्षा का भाव भी है। वह बार-बार स्वप्ना की उम्र, त्वचा, आकर्षण और सहजता की तुलना स्वयं से करती है। वह सीधे-सीधे अपनी पीड़ा स्वीकार नहीं करती, बल्कि उसे भीतर दबाकर आत्म-मूल्यांकन की प्रक्रिया में उलझी रहती है। फिर भी, सबकुछ अन्वेषा की मानसिक व्याख्या होने के कारण सामान्यतया पाठक तक स्वप्ना की वास्तविक छवि नहीं पहुँचती और इस प्रकार कथा का आंतरिक दृष्टिकेन्द्रण इसे अत्यधिक व्यक्तिपरक बनाता है।

वाचकीय दृष्टिकोण के समानांतर इस कहानी की समय-संरचना को भी देखा जाना ज़रूरी है। कथानक का बाह्य समय मात्र एक दोपहर का है- उद्यान में मिलना, बैठना, बातें करना, सिगरेट पीना, विदा होना। परंतु वाचक कथा कहते हुए बार-बार अतीत में लौटती है। कबीर के साथ कॉलेज के दिनों की स्मृतियाँ, टिफ़िन बनाना, ख़त सँभालकर रखना जैसे छोटे-छोटे संदर्भ इस बात की तरफ संकेत करते हैं कि यहाँ घंटों की घटना में वर्षों का इतिहास समाहित है। कहानी की यह समय-व्यवस्था कथा को मनोवैज्ञानिक गहराई देती है। यही कारण है कि ‘अलगोजे की धुन पर’ बाहरी घटनाओं से अधिक आंतरिक मनोदशा की कहानी की तरह उपस्थित होती है। कथा में घटनाएँ सीमित हैं, पर चरित्रों के भीतर कई-कई भावों का जटिल ताना-बाना निरंतर सक्रिय रहता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कहानी की गति प्रारंभ में धीमी है- प्रतीक्षा, देर से आना, मौन, संवाद…आदि-आदि। पर इनके तुरंत ही बाद आत्मालाप के अपेक्षाकृत लंबे टुकड़े कथा को भीतर की ओर मोड़ देते हैं और अपने अंत तक पहुँचते-पहुँचते कहानी की गति क्रमशः तीव्र हो उठती है। स्वप्ना का गोद में सिर रखना, अन्वेषा का उसे सहलाना और अंततः चुम्बन। इसके बाद तुरंत अवरोह- स्वप्ना का प्रस्थान और अन्वेषा का प्रश्न- “मैं किससे मिली थी, कबीर से, स्वप्ना से, या खुद से?” यह प्रश्न कथा को किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचाने के बजाय एक खुले अंत पर छोड़ देता है, जहाँ अर्थ-निर्माण पाठक विशेष के पाठ और उसकी गहराई पर निर्भर है।

आकार में अपेक्षाकृत छोटी इस कहानी में संवाद और आत्मालाप की संरचना भी उल्लेखनीय है। कहानी में स्वप्ना के संवाद कम हैं, पर वे निर्णायक हैं- “ज़रूरत तो हमारे मिलने की भी नहीं थी।” या “तुम रक़ीब हो मगर मुझे बेहद प्यारी हो।” जैसे लघु संवाद कहानी की आंतरिक दिशा तय करते हैं। यद्यपि कहानी एकल दृष्टिकोण से लिखी गई है, पर संवादों, उनके बीच के अंतरालों और चुप्पियों के बीच दोनों पात्रों के भीतर जिस तरह का अंतर्मंथन चलता रहता है, वह अपनी संपूर्णता में इसे कई-कई अंतर्ध्वनियों से भर देता है। आंतरिक दृष्टिकेन्द्रण के बावजूद आत्ममंथन के कई स्वर कहानी में सक्रिय हैं- अन्वेषा का वर्तमान स्वर, उसकी स्मृतियाँ, स्वप्ना का आत्मविश्वासी स्वर और कबीर की अनुपस्थित ध्वनियों की गूँज…और इन सब के बीच कहानी के दौरान घटित हो रहे संवेदनात्मक पल यथा- सिगरेट का साझा कश, चूड़ियों का उतारकर पहनाना, किताब का उपहार…ये सभी मिलकर कहानी को अर्थ-संघनन की संभावना से भर देते हैं। उदाहरणतः जब अन्वेषा अपनी चूड़ियाँ उतारकर स्वप्ना को पहनाती है, तो यह केवल वस्तु का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि भावात्मक रिक्तियों की पूर्ति का परस्पर उद्यम है। यही कारण है कि इस कहानी की ताकत कथ्य की जटिलता में नहीं, बल्कि उसके कथन-विधान में है। एक सीमित और संक्षिप्त घटना को आंतरिक दृष्टिकेन्द्रण के बावजूद आंतरिक स्वरों की बहुलता और समय की आवाजाही के माध्यम से बहुस्तरीय बना देने की क्षमता इस कहानी की नैरेटोलॉजिकल उपलब्धि है। लेकिन मेरे लिए सिर्फ इतना भर कह देने से कहानी की आलोचना मुकम्मल नहीं होती है। मेरे लिए इस प्रश्न पर विचार करना बहुत ज़रूरी है कि पूर्व प्रेमिका अन्वेषा और वर्तमान प्रेमिका स्वप्ना तथा कबीर के त्रिकोण के बीच संरचित यह कहानी पितृसत्ता के पारंपरिक वृत्त में ही घिरी रह जाती है या उस वृत्त को तोड़कर सत्ता और नैतिकता की किसी नई दुनिया में दाखिल होती है?

प्रारंभिक स्तर पर कथा एक विशुद्ध प्रेम-त्रिकोण के तौर पर उपस्थित और विकसित होती है। दोनों स्त्रियाँ एक ही पुरुष के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ी हैं। अन्वेषा का पहला भाव संशय और तुलना का है- “क्या इसी के लिए मेरे प्रेमी ने मुझे छोड़ा है।“ यह प्रश्न प्रतिस्पर्धा के उन्हीं पितृसत्तात्मक तर्कों की पुनर्स्थापना करता है, जिसमें स्त्रियाँ पुरुष के चयन की वस्तु बनती हैं और एक-दूसरे की ‘रक़ीब’ होने की नियति को प्राप्त होती हैं। यहाँ कबीर की अनुपस्थित उपस्थिति पूरे कथानक को नियंत्रित कर रही है। हर स्पर्श, हर स्मृति, हर तुलना में वह मौजूद है। सिगरेट की खुशबू, पेंडेंट की बूँद, किताब की पसंद, आँखों की तितलियाँ, स्मृतियों के फ़्लैशबैक, कॉलेज के दिन, सब उसी के इर्द-गिर्द एक साझा स्मृति की तरह आवाजाही करते हैं। यहाँ तक कि दोनों स्त्रियों का मिलना भी उसी के कारण संभव हुआ है। इस अर्थ में स्त्री पात्रों के माध्यम से कही जाने के बावजूद कथा की संरचना लगभग पुरुष-केंद्रित है। पुरुष ही यहाँ स्त्री संबंधों की उत्पत्ति का मूल है। प्रत्यक्षतः स्वतंत्र, पर परोक्षतः पुरुष-संबंध द्वारा परिभाषित इन रक़ीब स्त्रियों को देखते-सुनते मेरे भीतर सहज ही यह प्रश्न उठता है कि क्या यह पितृसत्तात्मक समाज के ढाँचे का ही पुनर्प्रस्तुतीकरण या पितृसत्तात्मक वृत्त की पुनरावृत्ति नहीं है?

गौरतलब है कि ऊपर वर्णित दृश्यों तक ही कहानी ठहरती नहीं। जैसे-जैसे संवाद आगे बढ़ता है, प्रतिद्वंद्विता का तर्क शिथिल पड़ने लगता है। कथा का सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब सामने आता है, जब स्वप्ना अन्वेषा की गोद में सिर रखती है और अन्वेषा उसे सहलाती है। जैसे संबंधों की धुरी बदल-सी गई हो। अब दोनों का संपर्क कबीर के माध्यम से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की अनुभूतियों के माध्यम से है। इस दृश्य में अन्वेषा का स्वप्ना को देखने का भाव बहुत गहरा है। यहाँ प्रत्यक्षतः स्वप्ना को देखती अन्वेषा दरअसल स्वयं को भी देख रही है, जैसे अपने भीतर स्थित स्वयं की छाया से साक्षात्कार कर रही हो। यही वह क्षण है, जहाँ यह स्थापित होता है कि दोनों रकीब स्त्रियाँ एक पुरुष के लिए संघर्ष नहीं कर रही हैं, बल्कि एक-दूसरे में उस साझा अनुभव को पहचानने की कोशिश कर रही हैं, जो उन्हें आपस में जोड़ता है। यहाँ तक आते-आते कहानी में वर्णित संबंध त्रिकोण के बाने को छोड़कर वृत्ताकार हो जाता है, जहाँ हर व्यक्ति दूसरे में आंशिक रूप से समाहित है। यहाँ अन्वेषा निमिष भर को स्वयं में कबीर की कल्पना करती है- “उस एक पल मैं कबीर हो उठी।” यह दृश्य कुछ हद तक लैंगिक भूमिकाओं की परंपरा निर्धारित नैतिकता को चुनौती भी देता है। यहाँ अन्वेषय केवल स्त्री नहीं रह जाती, कल्पना में पुरुष की भूमिका ग्रहण कर लेती है। लेकिन पुरुष यहाँ अनुपस्थित है, स्त्रियाँ परस्पर भाव साझा कर रही हैं। अन्वेषा का अंतिम प्रश्न- “मैं किससे मिली थी, कबीर से, स्वप्ना से, या खुद से?” पितृसत्तापोषित लैंगिक वृत्त के विघटन का चरम है। पुरुष केंद्र से लगभग पूर्णतः विस्थापित है और स्त्री का ‘स्व’ और उनकी पारस्परिकता लगभग केंद्र में आ गए हैं। प्रेम-त्रिकोण के प्रसंग से बाहर निकल कर आत्म अन्वेषण की इस लघु कोशिश के कारण भी यह आत्म-साक्षात्कार का क्षण है।

तो क्या इस कहानी को पितृसत्ता के वृत्त से मुक्ति की कहानी मान लिया जाए? ऐसा कहना शायद जल्दबाज़ी होगी। कारण कि कबीर की स्मृति, उसकी गंध, उसकी अनुपस्थित छाया कहानी में आद्योपांत बनी रहती है। कहानी में कबीर प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं है, फिर भी वही केंद्र में है। यह स्थिति पितृसत्तात्मक समाज की उस संरचना को उजागर करती है, जहाँ स्त्रियाँ प्रायः किसी पुरुष के इर्द-गिर्द परिभाषित होती हैं। अन्वेषा और स्वप्ना दोनों की पहचान प्रारंभ में कबीर की प्रेमिका के रूप में निर्मित होती है। वे एक-दूसरे को अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व के आधार पर नहीं, बल्कि कबीर के संदर्भ में देखती हैं। यही वह बिंदु है जहाँ पितृसत्ता स्त्रियों को प्रतिद्वंद्वी बनाकर खड़ा कर देती है। वे अनजाने में उसी सत्ता-संरचना को पुष्ट करती प्रतीत होती हैं, जिसने उनके अस्तित्व को सीमित किया है।

स्वप्ना का चरित्र एकतरफा नहीं है। वह युवा है, पर भोली नहीं। उसमें सहज आत्मविश्वास है। वह अन्वेषा के खत पढ़ चुकी है और यह स्वीकार करती है। उसका यह व्यवहार अधिकार-भाव से अधिक जिज्ञासा का प्रतीक है। वह अन्वेषा की शत्रु नहीं है, बल्कि कबीर के भीतर जीवित उस अंश को समझना चाहती है जो अन्वेषा से जुड़ा है। यहाँ कहानी के अंतिम दृश्य को जरूर देखा जाना चाहिए-

“‘क्या हम दुश्मन हैं?’ मैं हैरत से बोली।

‘हाँ, तुम रक़ीब हो मगर मुझे बेहद प्यारी हो,’ उसने पर्स उठाया और आगे बढ़ चली। मैं कब आप से तुम हो गयी थी! हमारे बीच की अदृश्य दीवार का लोप हो गया था।सब कुछ अकस्मात घट रहा था। उस पूरे दृश्य को संचालित करने वाली वही थी। वह जिस तरह अचानक आयी, वैसे ही जा रही थी। मैं उसे पुकारकर रोक लेना चाहती थी पर मैं जड़ रह गयी थी। फिर वह पीछे पलटी…कदम मेरी ओर बढ़ाये…हिचकिचाई और अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। मेरे होंठ काँपे थे पर उसके होंठों ने उन्हें समेट लिया था। ओह! ये कैसा एहसास था। हाँ, कबीर की मिठास थी इनमें। कुछ पल बाद वह अलग हुई। ‘तुम्हारा स्वाद अब मुझमें घुल गया है, तुम्हें अपने अन्दर समेटे ले जा रही हूँ। कबीर के मन का एकांत अब शायद उतना अकेला न रहे ‘वह मुस्कुराई और बाहर की तरफ़ बढ़ चली। मैं उसे जाते हुए देखती रही। मैं किससे मिली थी, कबीर से, स्वप्ना से, या खुद से? आज का दिन मुझे कुछ देकर गया या वो मायाविनी मुझे ठगकर चली गयी थी?”

स्वप्ना का यह कहना कि “तुम रक़ीब हो, मगर मुझे बेहद प्यारी हो” कथा के भाव-परिदृश्य को बहुत हद तक बदल देता है। स्वप्ना की यह स्वीकारोक्ति पितृसत्तात्मक प्रतिस्पर्धा को तोड़ती है क्योंकि यही वह क्षण है, जहाँ से उसके प्रतिद्वंद्वी स्वरूप का एक संवेदनशील मनुष्य के रूप में रूपांतरण शुरू होता है। यह दरअसल उस सांस्कृतिक स्टीरियोटाइप को तोड़ने की शुरुआत है, जो ‘नारि न मोहे नारि के रूपा’ की संरचना में स्त्रियों को एक-दूसरे की शत्रु के रूप में देखने का आदी रहा है। यहाँ प्रतिस्पर्धा की जगह आत्मीयता और समझ का भाव विकसित होने में परिवर्तन के सूक्ष्म लेकिन महत्त्वपूर्ण संकेत निहित हैं। पर अन्वेषा का अंत में यह सोचना कि ‘आज का दिन मुझे कुछ देकर गया या वो मायाविनी मुझे ठगकर चली गयी थी?’ संशय की एक धुंधली लकीर भी खींच देता है, जो बहुत हद तक स्वाभाविक और यथार्थपरक भी है।

इस तरह यह कहानी पितृसत्तात्मक वृत्त को पूरी तरह भले नहीं तोड़ती हो, उसकी परिधि को कुछ ढीला अवश्य करती है, उसके भीतर दरार अवश्य डालती है। इसलिए इसे संक्रमण का पाठ कहना अधिक तर्कसंगत होगा। कारण कि पुरुष-केंद्रित त्रिकोण के भीतर भी यहाँ स्त्रियाँ एक-दूसरे से संवाद स्थापित कर सकती हैं, प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहानुभूति चुन सकती हैं और सह-अस्तित्व की भावना के साथ अपने ‘स्व’ की खोज कर सकती हैं।

जिस तरह अलगोजे में दो नलिकाएँ साथ-साथ बजती हैं, यह कथा दो रक़ीब स्त्रियों की पारस्परिकता और उनके साथ को संभव बनाती है। अंत तक आते-आते पुरुष उस संगीत की पृष्ठभूमि भर रह जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ से एक नई संभावित दुनिया का दरवाजा खुल सकता है। निश्चित ही यह कार्य इतना आसान नहीं है कि इसे आत्मकेंद्रित आंतरिक दृष्टिकेन्द्रण से प्राप्त किया जा सके। इसके लिए कथा में चरित्रों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि और व्यापक स्त्री-जीवन के सांस्कृतिक-राजनैतिक संदर्भों का शामिल किया जाना जरूरी है। लेकिन समूह का संघर्ष व्यक्ति से ही तो शुरू होता है। ‘अलगोजे की धुन पर’ को उसी दिशा में बढ़े कदम की तरह देखा जाना चाहिए।

राकेश बिहारी
राकेश बिहारी
जन्म : 11 अक्टूबर 1973, शिवहर (बिहार)। कहानी तथा कथालोचना दोनों विधाओं में समान रूप से सक्रिय। प्रकाशन- वह सपने बेचता था, गौरतलब कहानियाँ (कहानी-संग्रह) केंद्र में कहानी, भूमंडलोत्तर कहानी (कथालोचना)। सम्पादन- स्वप्न में वसंत (स्त्री यौनिकता की कहानियों का संचयन),‘खिला है ज्यों बिजली का फूल’ (एनटीपीसी के जीवन-मूल्यों से अनुप्राणित कहानियों का संचयन), ‘पहली कहानी : पीढ़ियां साथ-साथ’ (‘निकट’ पत्रिका का विशेषांक) ‘समय, समाज और भूमंडलोत्तर कहानी’ (‘संवेद’ पत्रिका का विशेषांक)’, बिहार और झारखंड मूल की स्त्री कथाकारों पर केन्द्रित 'अर्य संदेश' का विशेषांक, ‘अकार- 41’ (2014 की महत्वपूर्ण पुस्तकों पर केन्द्रित), दो खंडों में प्रकाशित ‘रचना समय’ के कहानी विशेषांक, ' चेतना का देश-राग' और 'आहटें आसपास' ('पुस्तकनामा' की साहित्य वार्षिकी)। सम्मान- ‘स्पंदन’ आलोचना सम्मान, वनमाली कथा आलोचना सम्मान तथा सूरज प्रकाश मारवाह साहित्य सम्मान से सम्मानित। ईमेल – brakesh1110@gmail.com
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2 COMMENTS

  1. यह लेख अपनी वैचारिक सघनता, सैद्धान्तिक सजगता और संवेदनात्मक सूक्ष्मता के कारण समकालीन कथालोचना का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। राकेश बिहारी ने ‘रकीब’ और ‘अलगोजे की धुन पर’ के आपसी संवाद को केवल तुलनात्मक धरातल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे क्वीयर संवेदना, पितृसत्तात्मक संरचनाओं के विघटन और स्त्री-पारस्परिकता की नई संभावनाओं तक विस्तार दिया है। कथा-विन्यास, वाचकीय दृष्टिकोण, समय-संरचना और मनोवैज्ञानिक परतों का जिस गहराई और धैर्य से विश्लेषण किया गया है, वह आलोचना को महज़ व्याख्या नहीं, बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप बनाता है। विशेष रूप से यह लेख इस बात के लिए उल्लेखनीय है कि यह कहानी की रचनात्मक स्वायत्तता को स्वीकार करते हुए भी उसके भीतर निहित सामाजिक-सांस्कृतिक तनावों और संक्रमणशील संभावनाओं को रेखांकित करता है। भाषा की प्रवाहमयता, उदाहरणों की सटीकता और निष्कर्ष में छोड़ा गया खुलापन—इन सबके कारण यह लेख पाठक को सोचने के लिए उकसाता है और हिंदी कथा-साहित्य में क्वीयर विमर्श की एक नई, अधिक मानवीय और संवेदनशील मनोभूमि निर्मित करता है।

  2. कथा आलोचना पर आपकी यह सीरीज ध्यान खींच रही है। दिव्या विजय की इस कहानी पर आपके लेख का इंतज़ार कर रहा था। पढ़कर संतुष्टि हुई।

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