Monday, March 23, 2026
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Cyber Scam: कर्नाटक में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर 81 वर्षीय कारोबारी से 15.45 करोड़ की ठगी

डिजिटल अरेस्ट बेहद सुनियोजित और मनोवैज्ञानिक दबाव पर आधारित होता है। पीड़ित को फोन या वीडियो कॉल पर बताया जाता है कि उसके खिलाफ गंभीर अपराध जैसे मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग तस्करी या साइबर अपराध का मामला दर्ज है। इसके बाद उसे तुरंत गिरफ्तारी का डर दिखाया जाता है….

Cyber Scam: कर्नाटक के बेलगावी में साइबर ठगी का एक बड़ा मामला सामने आया है। यहां ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर ठगों ने 81 साल के एक बुजुर्ग कारोबारी से 15.45 करोड़ रुपये ऐंठ लिए। यह राज्य के अब तक के सबसे बड़े साइबर फ्रॉड मामलों में से एक बताया जा रहा है।

पुलिस के मुताबिक, तिलकवाड़ी इलाके के अगारकर रोड निवासी पीड़ित को 5 फरवरी को व्हाट्सएप कॉल आया। कॉल करने वालों ने खुद को सीबीआई अधिकारी बताया और दावा किया कि उनके नाम पर जारी सिम कार्ड अवैध गतिविधियों में इस्तेमाल हो रहे हैं। ठगों ने यह भी कहा कि इनमें से एक सिम का इस्तेमाल जेट एयरवेज के एक वरिष्ठ अधिकारी से संपर्क के लिए हुआ था, जिसे गिरफ्तार किया जा चुका है।

डिजिटल अरेस्ट में होने का ठगों ने कैसे दिखाया डर?

इसके बाद ठगों ने कारोबारी को बताया कि वह 25 लाख रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जांच के दायरे में हैं और उन्हें 5 लाख कमीशन मिलने की बात भी कही। इसी बहाने उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ में होने का डर दिखाया गया।

पुलिस के अनुसार, 7 फरवरी से 9 मार्च के बीच ठग लगातार संपर्क में रहे और दबाव बनाकर कारोबारी से कई बार में पैसे ट्रांसफर कराते रहे। इस तरह कुल 15.45 करोड़ रुपये की ठगी को अंजाम दिया गया। मामले की शिकायत 18 मार्च को साइबर क्राइम थाने में दर्ज कराई गई।

जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों से जुड़े कई बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है और करीब ₹90 लाख की रकम ट्रेस कर उसे निकालने से रोक दिया गया है। बाकी रकम की बरामदगी और आरोपियों की पहचान के लिए विशेष टीम गठित की गई है।

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पुलिस ने क्या बताया?

पुलिस आयुक्त भूषण गुलाबराव बोरसे ने स्पष्ट किया कि भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इस तरह के डराने-धमकाने वाले कॉल या संदेशों के झांसे में न आएं। उन्होंने कहा कि देश की कोई भी जांच एजेंसी व्हाट्सएप कॉल के जरिए जांच नहीं करती।

साइबर अपराध विशेषज्ञों ने भी चेतावनी दी है कि ठग अब सीबीआई और आरबीआई जैसी संस्थाओं के अधिकारियों का रूप धारण कर लोगों को डराते हैं और उनसे पैसे ट्रांसफर करवा लेते हैं। खासतौर पर बुजुर्गों और कारोबारियों को निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि वे दबाव में जल्दी आ जाते हैं।

पिछले साल मार्च में मशहूर शास्त्रीय संगीतकार रमेश जुले के साथ भी ऐसा ही कुछ बड़ा साइबर फ्रॉड हुआ था। उन्हें डिजिटल अरेस्ट कर करीब एक करोड़ 60 लाख की चपत लगाई गई थी। दिलचस्प बात है कि ठगी करने वाले ने भी खुद को सीबीआई अधिकारी बताया था।

रमेश जुले को एक वीडियो कॉल आया था, जिसमें कॉलर ने खुद को सीबीआई अधिकारी बताया था। कॉल के दौरान उसने डीपी में सीबीआई का लोगो लगाया था, जिससे संगीतकार को मामला विश्वसनीय लगा और वह जाल में फंस गए।

फर्जी सीबीआई अधिकारी ने रमेश जुले को बताया कि उन्हें डिजिटल अरेस्ट किया जा रहा है, क्योंकि उनके नाम से आए एक पार्सल में बड़ी मात्रा में ड्रग्स मिला है। इस आरोप से घबराए रमेश जुले को करीब तीन घंटे तक कॉल पर रोके रखा गया। इस दौरान ठग ने धोखे से उनके बैंक अकाउंट से पूरी पूंजी ट्रांसफर करवा ली। जब खाते से सभी पैसे निकल गए, तब गायक को साइबर ठगी का एहसास हुआ।

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क्या है ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खेल?

इस ठगी का तरीका बेहद सुनियोजित और मनोवैज्ञानिक दबाव पर आधारित होता है। पीड़ित को फोन या वीडियो कॉल पर बताया जाता है कि उसके खिलाफ गंभीर अपराध जैसे मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग तस्करी या साइबर अपराध का मामला दर्ज है। इसके बाद उसे “तुरंत गिरफ्तारी” का डर दिखाया जाता है और कहा जाता है कि वह लगातार कॉल पर बना रहे। कई मामलों में पीड़ित को परिवार और दोस्तों से भी अलग रहने को कहा जाता है।

इसके बाद ठग पैसे ट्रांसफर करने को मामला सुलझाने का तरीका बताते हैं। असलियत यह है कि भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई कानूनी प्रावधान है ही नहीं। कोई भी जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तारी या पूछताछ नहीं कर सकती।

कैसे फंसते हैं लोग?

ठग अपने जाल को असली दिखाने के लिए फर्जी दस्तावेज-जैसे कोर्ट ऑर्डर, अरेस्ट वारंट, यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की मुहर जैसे दिखने वाले कागजात व्हाट्सएप पर भेजते हैं। कई बार पीड़ितों को लगातार वीडियो कॉल पर रखकर उनकी निगरानी की जाती है, जिससे वे मानसिक रूप से पूरी तरह टूट जाते हैं।

गुजरात के कच्छ में एक बुजुर्ग दंपति से करीब 1.07 करोड़ की ठगी इसी तरीके से की गई, जहां उन्हें लगभग एक महीने तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा गया। इसी साल के शुरुआत में दिल्ली में 81 और 77 साल के एक दंपति, जो पेशे से डॉक्टर और इंजीनियर थे, से करीब 15 करोड़ की ठगी की गई थी। उन्हें फर्जी वीडियो कोर्ट सुनवाई तक दिखाई गई, जिसमें नकली जज और वकील मौजूद थे।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2022 में ऐसे करीब 39,925 मामले सामने आए थे, जिनमें 91.14 करोड़ की ठगी हुई। लेकिन 2024 तक यह संख्या बढ़कर 1.23 लाख से ज्यादा हो गई और ठगी की रकम 1,935 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बढ़ते खतरे पर चिंता जता चुका है।

नवंबर 2025 में अदालत ने कहा था कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ के जरिए 3,000 करोड़ से ज्यादा की ठगी हो चुकी है, जिसमें ज्यादातर पीड़ित बुजुर्ग हैं। तब कोर्ट ने सीबीआई को इन मामलों की जांच में प्रमुख एजेंसी बनाने और सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे।

बता दें कि साइबर ठगी से बचने के लिए सरकार लोगों को सजग करती रहती है। लोगों को सलाह दी जाती है कि वीडियो कॉल पर किसी अज्ञात व्यक्ति की बातों में न आएं। कोई भी सरकारी अधिकारी डिजिटल अरेस्ट जैसी प्रक्रिया नहीं करता। अपने बैंकिंग और पर्सनल डिटेल्स किसी के साथ साझा न करें। अगर संदेह हो तो तुरंत पुलिस या साइबर सेल से संपर्क करें।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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