हिन्दी सिनेमा में धर्मेन्द्र की पारी 1960 से शुरू होकर लम्बे समय तक चलती रही है। उनकी अंतिम फ़िल्म अब रिलीज होगी जब वे हमारे बीच नहीं हैं। अपने अंतिम पर्व में भी वे कम हुए, ओझल नहीं हुए। इतना सुदीर्घ और सम्मानित करियर बहुत कम अभिनेताओं को मिलता है। इस बीच राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की आँधियाँ आईं, बहुत से तत्कालीन सितारे इन नये जलजलों में डूब गए, लेकिन धर्मेन्द्र अपनी समूची आबोताब में क़ायम रहे। एक भारतीय पौरुषपूर्ण व्यक्तित्व का सम्मोहन, संकोची भद्रता से लगाकर टपोरी मस्ती की एक बड़ी रेंज, एक महत्वपूर्ण दौर में सफलताओं का लगातार उनके बाद की सफलताओं से होने वाला सत्यापन : बेशक धर्मेन्द्र ने अपना लम्बा टिकाऊपन इन्हीं अलामतों के ज़रिए हासिल किया।
धर्मेन्द्र ऐसे स्टार रहे हैं जिन्हें उनके साथ काम करने वाली हर अभिनेत्री के साथ पसंद किया गया है। एक समय जितनी सहजता से वे मीना कुमारी, नूतन, सुचित्रा सेन, साधना, वहीदा रहमान, माला सिन्हा और आशा पारेख के नायक रहे; वैसे ही उन्हें हेमामालिनी, रेखा, राखी, जीनत अमान और परवीन बाबी के साथ भी लगातार सफलताएँ मिलती रहीं; बल्कि बाद के दौर में तो वे अपने से बहुत छोटी अनीता राज और अमृता सिंह के साथ भी दिखाई पड़े। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि बाद में अपनी ही मैन, माचो और गरम-धरम छवि के लिए ही जाने गये धर्मेन्द्र की पहले दौर की बहुत सी फ़िल्में स्त्री केन्द्रित रही हैं। ‘अनुपमा’, ‘देवर’, ‘अनपढ़’ , ‘बंदिनी’, ‘काजल’, ‘मँझली दीदी’, ‘फूल और पत्थर’, ‘दुल्हन एक रात की’, ‘चन्दन का पलना’, ‘ममता’ जैसी फ़िल्मों के केन्द्र में नायिकाएँ ही थीं। और उनकी परावर्तित आभा में नायक कुछ सकुचाया हुआ और हतप्रभ प्रतीत होता था। ये भूमिकाएँ भी धर्मेन्द्र ने बहुत अच्छी तरह निभाई हैं।’ख़ामोशी’ में धर्मेन्द्र की सिर्फ़ पीठ दिखाई देती है। एक हिलती हुई कुर्सी और हेमन्त कुमार के स्वर में : तुम पुकार लो, तुम्हारा इंतज़ार है… सीढ़ियाँ उतरती हुई वहीदा रहमान। धर्मेन्द्र के पात्र की मौजूदगी नहीं होते हुए भी फ़िल्म में हर जगह है।

धर्मेंद्र और नूतन (बंदिनी फिल्म का दृश्य)
यह भी कम दिलचस्प नहीं कि बाद का यमला पगला दीवाना यह पंजाबी जट्ट अनेक बांग्ला निर्देशकों का चहेता अभिनेता रहा है। फ़िल्म इंडस्ट्री में पंजाबी बनाम बंगाली लॉबी को देखते हुए धर्मेन्द्र की यह स्वीकार्यता उनके बारे में बहुत कुछ कहती है। विमल राय की ‘बन्दिनी’ का डॉक्टर, उनके सहायक ऋषिकेश मुखर्जी का भी प्रिय कलाकार रहा। ‘अनुपमा’ का कवि जो पिता के व्यवहार से ख़ुद में डूब गई लड़की के मन के गिरहें खोलता है, ‘मझली दीदी’ का अपनी पत्नी के करुणा और वात्सल्य भाव के आगे समर्पित पति, ‘सत्यकाम ’ का ईमानदार इंजीनियर जिसका जीवन उसकी सत्यनिष्ठा की बलि चढ़ जाता है,’ गुड्डी’ का स्टार धर्मेन्द्र जो एक किशोर लड़की को फ़िल्मी दुनिया के छद्म सम्मोहन से उबारता है, ‘चुपके चुपके’ का बॉटनी का प्रोफ़ेसर परिमल बनाम ड्राइवर प्यारेमोहन, धर्मेन्द्र ऋषि दा के भरोसे पर हमेशा खरे उतरे।उन्होंने ही कपिल शर्मा शो में यह मज़ेदार किस्सा भी सुनाया था कि ऋषि दा ने ‘आनंद’ की कहानी उन्हें सुनाई थी, लेकिन यह फ़िल्म राजेश खन्ना को दे दी। यह पता लगने पर धर्मेन्द्र रात भर पीते हुए ऋषि दा को शिकायती फ़ोन लगाते रहे। असित सेन ने उन्हें ‘खामोशी’ की एक झलक के अलावा ‘ममता’ और ‘शराफ़त’ में लिया था।प्रमोद चक्रवर्ती के तो वे शुभंकर ही थे। उनके साथ उन्होंने ‘नया ज़माना’, ‘जुगनू’, ‘ड्रीमगर्ल’ और ‘आज़ाद’ जैसी कामयाब फ़िल्में कीं। दुलाल गुहा ने उन्हें ‘दोस्त’ और ‘प्रतिज्ञा’ जैसी सुपरहिट फ़िल्मों में कास्ट किया। बासु चटर्जी ने भी ‘स्वामी’ में एक गीत के अलावा ‘दिल्लगी’ उनके साथ की जिसमें उन्होंने संस्कृत के ऐसे प्रोफेसर का किरदार निभाया जो कार्बन डायऑक्साइड कही जाने वाली शुष्क केमेस्ट्री की प्रोफेसर का दिल जीतने में सफल होता है। सत्तर के शुरुआत में ही राखी के प्रथम परिचय वाली ‘जीवन मृत्यु ‘के निर्देशक सत्येन बोस थे जो अलेक्जेंडर ड्यूमा के ‘काउंट ऑफ़ मोंटे क्रिस्टो’ का रूपान्तर थी। धर्मेन्द्र की बंगाली फिल्मकारों में यह लोकप्रियता उनके विषय में बहुत कुछ कहती है। उन्होंने एक बांग्ला फ़िल्म में अभिनय भी किया है। गौर करने योग्य यह भी है कि अन्य बांग्ला फ़िल्मकारों से अलग प्रमोद चक्रवर्ती और दुलाल गुहा ने उन्हें प्रचलित मुंबइया रंगत वाली कमर्शियल फ़िल्मों में ही लिया।
‘आई मिलन की बेला’ के बाद रामानंद सागर की ‘आँखें’ से धर्मेन्द्र के कदम व्यावसायिक हिन्दी सिनेमा में जम गए। रोल जासूस का हो या चोर अथवा पॉकेटमार का, सड़कछाप मवाली का हो या छोटेमोटे उठाईगीर का, डाकू का हो या उसे पकड़ने वाले फ़ौजी का, कवि,उपन्यासकार, प्रोफ़ेसर का हो या बैंक मैनेजर का: धर्मेन्द्र ने उसे बख़ूबी निभाया।
धर्मेन्द्र की गुस्सैल पुरुष की छवि ओ.पी.रल्हन की ‘फूल और पत्थर’ से बनी जो उनके करियर का बड़ा मोड़ साबित हुई। जब वे अपनी तरेरी हुई आँखों, भींचे हुए जबड़ों और पॉवर पैक्ड घूंसों से खलनायकों पर टूट पड़ते तो वास्तविक जीवन में लुटे पिटे त्रस्त और पराभूत दर्शकों को सन्तोष मिलता था। ये प्रहार विश्वसनीय भी लगते थे। लगता था धर्मेन्द्र वाकई ‘इन कुत्तों का खून’ पी ही जाएँगे।उनका शरीर सौष्ठव और पुरुषोचित सौन्दर्य जो हर परिधान में अलग से उभर कर आता था, दर्शकों के मन में बरसों राज करता रहा। उनके उत्तरकाल में तो सिर्फ़ इसी छवि का दोहन हुआ। एक नज़र बस उनकी फ़िल्मों के नामों पर नज़र दौड़ा लीजिए, यह बात ज़ाहिर हो जाती है। जीने नहीं दूँगा, इन्सानियत के दुश्मन, दादागिरी, हुकूमत, आग ही आग, इंसाफ़ कौन करेगा, इंसाफ़ की पुकार, ख़तरों के खिलाड़ी, ऐलाने जंग, वीरू दादा, हमसे ना टकराना, कोहराम, तहलका, क्षत्रिय, मैदाने जंग, पुलिस वाला गुंडा, माफ़िया वगैरह : ये टाइटल ही सारी कहानी बयान कर देते हैं कि इनमें धर्मेन्द्र कैसे,क्या रहे होंगे ! ऐसी फ़िल्मों का एक सदाबहार दर्शकवर्ग रहा है जिसे धर्मेन्द्र संतुष्ट करते रहे ।उनका होना फ़िल्म में मारधाड़ की गारंटी थी। चूँकि कमर्शियल सिनेमा में एक्शन ही मुख्यधारा है, आम दर्शकों में उनकी लोकप्रियता के इतना दीर्घकालिक होने का यह प्रमुख कारण है। लेकिन इस सब में वह धर्मेन्द्र कहीं खो गए, जिनकी संकोची संवेदनशील और काव्यात्मक छवि दिल में कहीं गहरे उतरती थी; जिन्हें मोहम्मद रफ़ी और मुकेश के कुछ स्पर्शी गीत पर्दे पर गाने का मौक़ा मिलता था, जो हेमंत कुमार के स्वर में गा सकते थे :
या दिल की सुनो दुनिया वालों
या मुझको अभी चुप रहने दो
मैं ग़म को ख़ुशी कैसे कह दूँ
जो कहते हैं
उनको कहने दो !
इसके बजाय वे बालासुब्रमण्यम की आवाज़ में गरजने लगे : मैं इंतक़ाम लूंगा ! ‘ग़ज़ब’ में तो इतना ग़ज़ब हुआ कि धर्मेन्द्र के बदन में उनके हमशक्ल (शायद जुड़वाँ भाई) अपनी हत्या के बाद घुस जाते हैं और धरमपाजी का बॉडी साइज़ डबल कर देते हैं, ताकि वे खलनायकों की कुटाई और अच्छी तरह कर सकें। यह धर्मेन्द्र ही थे, जो ऐसी उलजलूल फ़िल्मों को भी हिट करवा सकते थे।

जीवन के उत्तरार्द्ध में धर्मेन्द्र ने यह महसूस किया कि इस एक्शन हीरो इमेज ने उन्हें सिनेमा में लंबा जीवन तो दिया, लेकिन एक श्रेष्ठ अभिनेता के तौर पर याद रखी जाने वाली भूमिकाएँ नहीं दीं। ‘सत्यकाम’ और ‘अनुपमा’ के अलावा उनके पास याद रखी जा सकने वाली भूमिकाएँ बहुत हैं भी नहीं। हाँ, मनोरंजक भूमिकाएँ ज़रूर हैं। कॉमेडी का जो रंग उनके अभिनय में कुछ कुछ ‘मेरा गाँव मेरा देश’ से घुलना शुरू हुआ था, वह बाद में ‘प्रतिज्ञा’, ‘शोले’, ‘चुपके चुपके’, ’दिल्लगी’ जैसी फ़िल्मों में अलग अलग शेड्स में उभरता रहा।इस रंगत में भी वे दर्शकों के बहुत प्रिय रहे। उनसे उत्तर भारतीय दर्शक एक ख़ास अपनापन महसूस करते थे, जैसे कोई उनके अपने बीच का खिलंदड़, मस्तमौला, दुस्साहसी जवान पर्दे पर आ गया है। उनकी अटपटी और हास्यास्पद नृत्यशैली भी उनका सिग्नेचर मार्क थी । अपनी सीमाओं को उन्होंने इस तरह स्टाइल में बदल कर ख़ुद को और मनोरंजक बना लिया था। वे मिमिक्री कलाकारों को अपनी संवाद और नृत्यशैली से पर्याप्त सामग्री देते रहे। ‘कपिल शर्मा शो’ में कृष्णा का धर्मेन्द्र के ट्यूनिक वाले ‘धरमवीर’ अवतार में उनकी मिमिक्री करना शो का एक अहम हिस्सा रहा है। इसमें सनी देओल बन कर कीकू शारदा उनका साथ निभाते रहे हैं। वैसे यह देओल परिवार की दरियादिली है कि उन्होंने इसे स्पोर्टिंगली लिया और अपना मज़ाक़ उड़ाए जाने पर भी एतराज़ नहीं किया जबकि कपिल उनके कृपापात्र रहे हैं।
धर्मेन्द्र अपने हीमैन और दुश्मन पर टूट पड़ने वाले परसोना में इतने मुब्तिला रहे कि उन्होंने बढ़ती उम्र के अनुरूप एक अभिनेता के रूप में ख़ुद का पुनराविष्कार नहीं किया। काम वे करते रहे, फ़िल्में भी बनाते रहे, लेकिन यदि ‘जॉनी गद्दार’ को छोड़ दें तो उत्तर- धर्मेन्द्र के काम में कुछ भी अलग या अहम नज़र नहीं आता। उनकी यात्रा स्टारडम से आगे संभव नहीं हुई, जबकि एक समय के बाद उसकी बजाय यह फ़िक्र होनी चाहिए कि अभिनेता के तौर पर याद किया जा सकने वाला कितना काम आपके पास है! धर्मेन्द्र में वेध्यता और प्रतिकार का एक मिलाजुला आयाम सम्भव था जिसे उनकी बॉक्स ऑफ़िस सफलता ने पनपने नहीं दिया। उनके बेटे भी एक्शन के इसी कामयाबी भरे ट्रैप में फँसे रहे। उन्हें न धर्मेन्द्र जैसी लोकप्रियता और सुदीर्घ करियर मिलना था, न मिला; तिस पर एक स्टार और एक्टर दोनों ही दृष्टियों से वे अपने पिता से भी ज़्यादा सीमित रहे हैं। बॉबी देओल ने ज़रूर अब जा कर इस मर्म को पहचाना है और अपने अभिनेता को एक नयी धार देने की ओर प्रवृत्त हुए हैं। उनकी और हेमा की बेटी ईशा भी कुछ कोशिशों के बाद फ़िल्मी करियर से दूर हो चुकी हैं। पौत्रों को उन्होंने अपने जीवनकाल में लांच होते हुए देखा, लेकिन उनकी कामयाबी देखना उनके लिए शेष रह गया।

बहरहाल, धर्मेन्द्र अपने अलग अलग दौर में, अलग-अलग तौर पे हिन्दी सिने दर्शकों के प्रिय अभिनेता बने रहे। उनका शिखर समय वह था जब सिंगल स्क्रीन का ज़माना था। वे दर्शक उन्हें कभी भूल नहीं पाएंगे जो उनकी फ़िल्मों को देखते हुए बड़े हुए। जब मल्टीप्लेक्स आए, धर्मेन्द्र का पुराना दर्शक थिएटर से विदा हो गया। माहौल बदला: थिएटर का ही नहीं, फ़िल्मों का भी। कहानियाँ बदलीं, प्रस्तुति बदली, फ़िल्म निर्माण का व्याकरण बदला ; लेकिन धर्मेन्द्र की सफलता का ग्राफ़ इतना दमदार रहा है कि वे, ख़ास तौर पर, सत्तर और अस्सी के अपने दर्शकों में हमेशा जीवित रहेंगे: अपने सुदर्शन और सबल व्यक्तित्व के साथ।

