दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को उस याचिका पर नोटिस जारी किया है जिसमें कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से इनकार करने वाले मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश को चुनौती दी गई है।
आरोप है कि 1980 के मतदाता सूची में उनका नाम शामिल करवाया गया था, जबकि उन्हें भारतीय नागरिकता तीन साल बाद 1983 में मिली। याचिका में दावा है कि यह काम कथित रूप से जाली दस्तावेजों के सहारे किया गया।
राउज एवेन्यू स्थित विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने सोनिया गांधी और दिल्ली पुलिस से इस मामले पर जवाब मांगा है। यह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका विकास त्रिपाठी ने दायर की है, जो गांधी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उन्होंने 11 सितंबर को पारित एसीएमएम के आदेश को चुनौती दी है। त्रिपाठी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पवन नारंग पेश हुए। मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी 2026 को होगी।
याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं?
याचिकाकर्ता का कहना है कि नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की 1980 की मतदाता सूची में सोनिया गांधी का नाम शामिल था, जबकि भारतीय नागरिकता उन्हें 1983 में मिली। उनका यह भी कहना है कि 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटा और 1983 में दोबारा जोड़ा गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कांग्रेस नेता ने मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया और इस मामले में एफआईआर दर्ज होनी चाहिए।
निचली अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि वह निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं दे सकती और इस तरह की शिकायत पर एफआईआर का निर्देश नहीं दे सकती। अदालत ने यह भी कहा था कि केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है, खासकर तब जब धोखाधड़ी या जालसाजी जैसे अपराधों के लिए जरूरी जानकारी और ठोस विवरण उपलब्ध न हों। अदालत के अनुसार, त्रिपाठी जिन दस्तावेजों पर निर्भर थे, वे मतदाता सूची के कथित अंश की एक फोटोकॉपी भर थे, जिसे प्रमाणित दस्तावेज नहीं माना जा सकता।

