दिल्ली के दिल कहे जाने वाले लुटियंस ज़ोन में बसी सरकारी कोठियाँ, उसके बुलेवार्ड, उसकी सड़कें, ये सब सिर्फ प्रशासनिक ढांचे नहीं, बल्कि इतिहास की जीवित परतें हैं। हाल में ब्रितानवी मूल के शहरी नियोजक एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटाने और उसकी जगह पहले गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा ने एक गहरी बहस को जन्म दिया है। सवाल यह नहीं कि राजाजी का सम्मान क्यों! सवाल यह है कि क्या सम्मान का अर्थ किसी और का नाम मिटा देना होना चाहिए?
विरासत केवल सत्ता का आख्यान नहीं होती, वह सृजन की कहानी भी होती है। और सृजनकर्ता जैसे वास्तुकार, शहरी नियोजक, इंजीनियर, अक्सर पर्दे के पीछे रहकर काम करते हैं। वे नायक नहीं कहलाते, लेकिन शहरों की आत्मा उन्हीं की रेखाओं और कल्पना से आकार लेती है।
दिल्ली का नियोजन एडविन लुटियंस के नाम से जुड़ा है। चाहे हम औपनिवेशिक इतिहास पर कितनी भी आलोचनात्मक दृष्टि रखें, यह तथ्य नहीं बदलेगा कि नई दिल्ली के स्थापत्य और शहरी ढांचे में उनका केंद्रीय योगदान था। इतिहास को स्वीकार करना और उसका महिमामंडन करना दो अलग बातें हैं। स्वीकार्यता बौद्धिक ईमानदारी है।
कुछ वर्ष पहले जब मैं भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS), शिमला गई तो वहाँ के भव्य भवन के माथे पर हेनरी इरविन का नाम उकेरा हुआ देखा, जिन्होंने उन भवनों को कभी डिज़ाइन किया था। वह दृश्य औपनिवेशिक स्मृति का नहीं, एक वास्तुकार के जायज़ सम्मान का प्रतीक लगा।
इसी तरह विभाजन के समय के इंजिनियर रहे सर गंगा राम का उदाहरण हमारे सामने है। लाहौर में सर गंगा राम हॉस्पिटल आज भी उनके नाम से जाना जाता है। पाकिस्तान ने उनके योगदान को राजनीतिक चश्मे से नहीं, शहरी निर्माता के रूप में देखा। यह परिपक्वता है जहाँ इतिहास को शत्रु या मित्र की श्रेणी में नहीं, योगदान की कसौटी पर आँका जाता है।
दुनिया के अन्य शहरों में भी यह दृष्टि दिखाई देती है। जॉर्ज हॉस्समैन ने पेरिस को चौड़ी सड़कों और सुव्यवस्थित बुलेवार्ड्स से नई पहचान दी। आलोचनाएँ भी हुईं, राजनीतिक विरोध भी, पर “हॉसमैनियन पेरिस” आज भी स्वीकृत शब्द है। इसी तरह पियर चार्ल्स लाइनफेंट को वॉशिंगटन डी.सी. की योजना के लिए जीवनकाल में वह मान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। बाद में इतिहास ने उन्हें उनका श्रेय लौटाया, जो कि एक तरह का ऐतिहासिक संतुलन था।
भारत में ली कार्बुज़िये का चंडीगढ़ से रिश्ता भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। विदेशी होने के बावजूद उनके मास्टर प्लान को शहर की पहचान के रूप में स्वीकार किया गया। क्या हम चंडीगढ़ की विरासत से उनका नाम अलग कर सकते हैं? शायद नहीं। उसी तरह एंटोनी गाउडी का बार्सिलोना से संबंध अटूट है मगर राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद उनके स्थापत्य को मिटाने की कोशिश नहीं हुई।
इतिहास में ऐसे उदाहरण भी हैं जहाँ राजनीति ने सृजनकर्ताओं को हाशिए पर डाल दिया। सोवियत रूस में वैचारिक असहमति रखने वाले डिज़ाइनरों के नाम दबा दिए गए। चीन की सांस्कृतिक क्रांति में कई पारंपरिक कलाकारों की पहचान मिटा दी गई। इमारतें बचीं, नाम खो गए। क्या हम उसी राह पर चलना चाहते हैं?
विरासत को समझने का अर्थ है उसकी परतों को स्वीकार करना जिसमें औपनिवेशिक अतीत भी है, संघर्ष भी और रचनात्मक प्रतिभा भी। अगर हम हर असहज नाम को हटा देंगे, तो इतिहास सरल अवश्य लगेगा, पर अधूरा भी हो जाएगा।
और यदि सचमुच ऐतिहासिक सुधार का संकल्प है, तो उसे व्यापक होना चाहिए। उदाहरण के लिए, दिल्ली की पंडारा रोड, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसका मूल नाम “पांडव रोड” होना था, पर एक क्लेरिकल त्रुटि ने उसकी पहचान बदल दी। दशकों से वह गलती जस की तस है। सुधार की दृष्टि वहाँ क्यों नहीं जाती?
विरासत को राजनीति की तात्कालिकता से नहीं, इतिहास की गहराई से देखिए। किसी वास्तुकार का नाम स्वीकार करना औपनिवेशिक मानसिकता का समर्थन नहीं बल्कि बौद्धिक ईमानदारी का परिचय है। सृजनकर्ताओं को उनका श्रेय देना हमारे आत्मविश्वास को कम नहीं करता; बल्कि यह दिखाता है कि हम अपने अतीत से डरते नहीं, उसे समझते हैं। हमारा अतीत एकाश्मीय नहीं, कई ऐतिहासिक परतों से मिलकर बना है। नाम मिटाने से विरासत नहीं बदलती। पर नाम बचाकर रखने से हमारी समझ अवश्य गहरी होती है।

