Friday, March 20, 2026
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दृश्यमः दिखावे का लोकतंत्र और पहचान का संकट- क्रेजी किया रे!

प्रयागराज में स्थित स्वराज विद्यापीठ के यूनिवर्सिटी थिएटर ने अपने नाटकों के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि प्रभावशाली रंगमंच भव्य सज्जा नहीं, बल्कि सटीक रंग-भाषा से बनता है। उनकी ताजातरीन प्रस्तुति मौलियर के प्रहसन पर आधारित ‘क्रेजी किया रे!’ केवल वर्गीय आडंबर पर व्यंग्य नहीं करती, बल्कि पारिवारिक सत्ता-संरचनाओं के भीतर स्त्री की स्थिति को भी सूक्ष्म रूप से उजागर करती है। इसके इस भारतीय रूपांतरण में जहाँ मिस्टर कुमार हीनता-बोध से ग्रस्त होकर नकली उच्चता की दौड़ में लगे हैं, वहीं उनकी पत्नी की मौन समझदारी और बेटी डॉली की प्रेम-चयन की इच्छा पितृसत्तात्मक नियंत्रण से टकराती दिखाई देती है। हँसी के हल्के आवरण में लिपटा यह नाटक उस गहरी सच्चाई को सामने लाता है कि स्त्रियों के जीवन-निर्णय अब भी पुरुष-आकांक्षाओं के बोझ तले दबे रहते हैं।

‘क्रेजी किया रे!’, नाटक यूनिवर्सिटी थिएटर के द्वारा 21 नवंबर 2025 को स्वराज विद्यापीठ, प्रयागराज में प्रस्तुत किया गया। यूनिवर्सिटी थिएटर छात्रों द्वारा बनाया गया समूह है जो समय समय पर अपनी गतिविधियां संचालित करता रहता है। पिछले कुछ वर्षों से अपनी प्रस्तुतियों और कार्यक्रमों से इन्होंने प्रयागराज के सांस्कृतिक परिदृश्य में ठीक ठाक अपनी उपस्थिति बना ली है। शुरूआत में इस समूह ने शिवमूर्ति की प्रसिद्ध कहानी ‘सिरी उपमा जोग’ और हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ का नाट्य मंचन किया था। इसी क्रम में छात्रों द्वारा लिखित ‘जब वी मेट गांधी’, श्रीकांत वर्मा की कविता ‘मगध’, रेणु की कहानियों ‘ठेस’, ‘एक अकहानी का सुपात्र’, और ‘पहलवान की ढोलक’ की प्रस्तुति की। ‘कौन आजाद हुआ?’ शीर्षक से क्रांतिकारी आंदोलने के इतिहास पर दस्तावेजी नाटक करने के बाद हबीब तनवीर द्वारा लिखित नाटक ‘सड़क’ का मंचन किया। ‘कैंपस कथा’ शीर्षक प्रस्तुति में स्वयं प्रकाश की कहानी ‘लड़कियां क्या बातें करती हैं’ और  अखिलेश की कहानी ‘चिट्ठी’ का नाट्य मंचन हुआ. समूह में समय-समय पर फिल्मशाला, कार्यशाला, किताबशाला आदि  का भी संचालन होता है। 

‘क्रेजी किया रे!’ नाटक ‘मौलियर’ द्वारा लिखे गए नाटक ‘द बुर्जआ जेंटलमैन’ का हिंदी रूपांतर है। रूपांतर भारतीय परिस्थितियों में रंजीत कपूर ने किया है ‘कौवा चला हंस की चाल’ शीर्षक से। इस नाटक को हबीब तनवीर ने भी दो बार प्रस्तुत किया एक बार ‘मिर्जा शोहरत बेग’ के नाम से और दूसरी बार ‘लाला शोहरत राय’ नाम से. मौलियर फ्रेंच भाषा के नाटककार हैं जिन्होंने सत्रहवीं सदी में अपने लिखित प्रहसनों से रंगमंच को प्रभावित किया उनके नाटकों ‘ आचार्य तारतुफ’, ‘कंजूस’, ‘द बुर्जुआ जेंटलमैन’ आदि का आज भी मंचन होता रहता है। निर्देशक अमितेश कुमार ने ‘द बुर्जुआ जेंटलमैन’ को ‘क्रेजी किया रे!’ शीर्षक से प्रस्तुत किया, शीर्षक आज के युवा को रोचक लगे इसलिए बदल दिया गया था। 

नाटक का केंद्रीय पात्र मिस्टर कुमार है। वर्तमान समय में देखने को मिलता है उच्च वर्ग में शामिल होने की जद्दोजहद में सामान्य वर्ग का व्यक्ति किस तरह से अपने अस्तित्व को भूलकर दिखावेपन की जिंदगी जीना चाहता है उसमें मिस्टर कुमार (सामान्य व्यक्ति)  की संतुष्टि हो या ना हो लेकिन उसे उच्च वर्ग के समान बनने का भरपूर प्रयास करता है जैसे – तलवारबाजी सीखना, संगीत सीखना, नृत्य सीखना और महंगे कपड़े पहनना आदि। मिस्टर कुमार इन सब कार्यों को करते हुए सबकी नजरों में हंसी का पात्र बन जाता है लेकिन इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। अपना काम निकालने वाले मिस्टर भल्ला जो कि विधायक के रूप में इस नाटक में आते हैं वो भी सिर्फ मिस्टर कुमार के भोलेपन का फायदा उठाते हैं और समय – समय पर उनसे पैसे उधार लेते हैं उसे चुकाते नहीं है। यह बात मिस्टर कुमार की पत्नी भलीभांति समझती है लेकिन मिस्टर कुमार के आगे वह इस मामले में शांत ही रहती है। मिस्टर कुमार अपनी बेटी डॉली का विवाह किसी राजकुमार से करने की चाहत में रहता है लेकिन कुकू (डॉली का प्रेमी) का दोस्त बिट्टू एक नाटक से इस प्रेम प्रसंग को विवाह में सम्पन्न कराता है। इस नाटक में वर्तमान समय में एआई के बढ़ते दौर को भी दिखाया गया है जिससे सिद्ध होता है कि एआई के जमाने में रोजगार संकट में है। जो कार्य सामान्य मनुष्य घंटे में करता है एआई कुछ मिनट में पूर्ण कर देता है इसलिए आज मनुष्य की जगह एआई को ज्यादा महत्व मिल रहा है। 

यूनिवर्सिटी थियेटर के नाटकों में छात्र ही अभिनय करते है ‘क्रेजी किया रे! में भी शामिल सभी छात्रों के अभिनय में उनका अथक प्रयास दिखा लेकिन मिस्टर कुमार का अभिनय कर रहे अनंत का उल्लेख अलग से करना चाहिए।  जगह-जगह पर उसके भाव चाहे वह झल्लाने वाला हो, चाहे खुद को बचाने वाला हो, चाहे अंग्रेजी शब्दों को बोलने वाला हो कहीं भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वह किरदार हमें अपने से नहीं जोड़ रहा उसकी अतरंगी हरकतों का दर्शक आनंद भी ले रहे थे और उसके भोलेपन को समझ भी रहे थे। प्रस्तुति का वस्त्र विन्यास भी अनुकूल था। सबके पहनावे और ढंग से हम पात्रों की प्रकृति को समझ सकते थे। जैसे एआई के लिए चुना गया पात्र एकदम रोबोट की तरह बोल रहा था। मिस्टर कुमार के वस्त्र उन्हें हास्यास्पद बना रहे थे।  कुक्कु और बिट्टू को आज के युवा की पोशाकें दी गईं थीं।

नाटक की शुरूआत मंगलाचरण से करने की परम्परा है, उसके निर्वाह करते हुए प्रस्तुति की शुरूआत में ऐसा मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया जिसमें व्यंग्यात्मक पंक्तियों को भी जोड़ा गया था। प्रस्तुति के बीच बीच में लोकप्रिय फिल्मी गीतों का इस्तेमाल भी प्रस्तुति को रोचक बना रहा था। नृत्य को भी शामिल किया गया था, लेकिन इसे और बेहतर तरीके से नियोजित किया जा सकता था।  स्वराज विद्यापीठ में कम संसाधनों के बीच मंच तैयार किया गया। जिसमें काले पर्दे का प्रयोग करके पीछे नेपथ्य का कार्य व आगे मंच को स्थान दिया गया। मंच के निकट ही संगीत टीम को स्थान दिया गया था। नाटक में प्रकाश व्यवस्था भी की गई जो अभिनेताओं के अभिनय को ठीक से उभार रही थी और प्रस्तुति के मिजाज को भी। प्रेक्षागृह में नाटक करना जिस तरह से कठिन होता जा रहा है ऐसी स्थिति में ऐसे मंच तैयार करना नाटक करना ठीक विकल्प है।

नाटक आज भी प्रासंगिक है जितना कि मौलियर के समय में रहा होगा। परिवर्तन सिर्फ समय में आया है समस्याओं में नहीं। मनोविश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से देखें तो जब डॉली कुकू से बात नहीं करती तो वह उसके प्रेम को ठुकराने लगता है यह नहीं समझता कि उसकी स्थिति उसे समय बात करने की स्थिति में ना रही होगी। यह तो आज बहुत ज्यादा मात्रा में लोगों में देखने को मिलता है वह सामने वाले की स्थिति ना समझ कर अपने आप निष्कर्ष निकालने लगते हैं। इसमें स्त्री पक्ष को देखें तो मिस्टर कुमार अपनी पत्नी के प्रति बेरुखी अपनाते हैं वही बेटी की शादी जबरन किसी राजकुमार से करवाना चाहते हैं जबकि बेटी कुक्कु प्रेम करती है। आज की बुद्धिजीवी लड़कियां परिवार और समाज के दबाव से अपने प्रेमी से शादी नहीं कर पाती जिससे उनके जीवन में एक रिक्तता सी रहती है। 

रुपांतरण की भाषा में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों को रखा गया है जिसमें बहुत सुन्दर सामंजस्य स्थापित किया गया है, देशी शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। नाटक में कहीं – कहीं संवाद की ध्वनि स्पष्ट नहीं होती। संवादों में कहीं कहीं क्रिंज शब्दों का भी प्रयोग हुआ है जैस- ‘साले’, ‘अबे जा बे टिड्डे’,’अबे ओ बे कुत्ते’, ‘भग स्याले’ आदि। इससे कुछ संभ्रांत दर्शक जो गंभीर नाटक देखने के आदि हैं परेशान हो सकते हैं। परन्तु नाटक को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में  यह भाषा बहुत सटीक बैठती है और नाटक में रोचकता बनी रहती है । भाषा प्रवाह के कारण ही दर्शक इस नाटक में तल्लीन हो जाता है।

आजकल के भाग दौड़ भरी जिंदगी में ऐसी प्रस्तुति को देखने का मतलब है अपने आप को आंकना। कहीं हम भी तो मिस्टर कुमार नहीं बनते जा रहे हैं यह हमारे आसपास मिस्टर भल्ला जैसे लोग तो नहीं। दिखावेपन की इस दुनिया में बेहतर की तलाश में हम अपना नुकसान तो नहीं कर रहे हैं? प्रस्तुति इन प्रश्नों को सामने रखती हैं। निर्देशक ने भी लिखा है  “मौलियर का यह नाटक इतने सालों बाद भी आज का क्यों लगता है? हम मनुष्य अपनी मौलिकता को हीनता बोध के जरिए गंवा कर नकली मूल्य क्यों स्वीकार कर लेते हैं. और अब तो कृत्रिम बुद्धि भी आ गई है तो क्या हम उसके आगे अपनी मौलकिता गंवा देंगे?” प्रस्तुति की समाप्ति के बाद हो रही करतल ध्वनि से यह स्पष्ट था कि नाटक अपने साथ दर्शकों को जोड़ने में सफल रहा। दर्शकों की संख्या में ज्यादातर विद्यार्थी रहे इनके साथ – साथ अन्य संस्थाओं के निर्देशक, शिक्षक और वरिष्ठ जन भी उपस्थित रहे। यूनिवर्सिटी थियेटर और स्वराज विद्यापीठ ने इस प्रस्तुति से नए दर्शकों को भी जोड़ा और नये अभिनेताओं को भी। दर्शक अब इस नाटक की दूसरी प्रस्तुति का इंतजार कर रहे हैं। 

प्रस्तुति में अभिनय सन्नु, प्रियांशी, सृष्टि, ऋतु, अंकिता, शुभम, शक्ति, अनंत, प्राची, इशु, हर्षित, स्वीटी, श्वेता, सृष्टि, रिया, सृष्टि, दीपशिखा, अर्पिता, आशीष, दुर्गेश, कीर्ति, ताशु, रक्षा, सत्यवान, नंदिनी, ममता, अमन आदि ने किया. प्रस्तुति प्रबंधन हिमांशु  का था। संगीत संचालन शिवम ने किया। अभिनय मार्गदर्शन अमर का था। संगीत तैयार किया अजीत, सानु, हर्ष और विप्लव ने। मंच प्रबंधन  शुभम, आदित्य, प्रखर, निशांत और विवेक का था। मंच संचालन माधवी ने किया।

प्रस्तुति में प्रवीण शेखर, सुमन शर्मा, अजीत बहादुर, अमित सिंह, अनिर्बान, सुषमा शर्मा समेत कई गणमान्य लोग मौजूद थे. विद्यार्थियों की बड़ी संख्या दर्शकों के रूप में उपस्थित रही.

स्वराज विद्यापीठ गांधीवादी मूल्यों को आत्मसात् करते हुए स्वराज और स्वदेशी के विचार को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध संस्था है. जिसका कार्यक्षेत्र मुख्यतः प्रयागराज है. इसमें कई पाठ्यक्रमों का संचालन होता है. रविवारीय गोष्ठी, फिल्म प्रदर्शनी, पर्यावरण जागरूकता के कार्यक्रमों के साथ नई पीढ़ी को स्वराज के विचारों से जोड़ा जाता है.

अमिता गुप्ता
अमिता गुप्ता
अमिता गुप्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक करने के बाद प्रयाग रंगमंच पर शोध कर रही हैं।
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