देश की अर्थव्यवस्था को लेकर जारी राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने शुक्रवार को भारत के नवीनतम सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा भारत के राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी को हाल ही में ‘सी’ ग्रेड (दूसरा सबसे निचला ग्रेड) दिए जाने के संदर्भ में, इन जीडीपी आंकड़ों को ‘विडंबनापूर्ण’ बताया है।
दरअसल शुक्रवार को जारी एनएसओ आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई–सितंबर) में वास्तविक जीडीपी 8.2 फीसदी बढ़ी है। यह वृद्धि पिछले साल इसी तिमाही में दर्ज 5.6 फीसदी की तुलना में काफी अधिक है। सरकार इसे मजबूत आर्थिक प्रदर्शन का संकेत बता रही है।
कांग्रेस ने क्यों उठाए सवाल?
जयराम रमेश ने कहा कि जीडीपी आंकड़ों की टाइमिंग ‘विडंबनापूर्ण’ है, क्योंकि ठीक इसी समय आईएमएफ ने भारत के आंकड़ों को विश्वसनीयता के लिहाज से दूसरी सबसे कम ‘सी’ ग्रेड दी है। रमेश ने एक्स पर लिखा कि इतने उच्च जीडीपी आंकड़े तब जारी किए जा रहे हैं जब आईएमएफ ने डेटा की गुणवत्ता पर चिंता जताई है।
उन्होंने दावा किया कि सरकारी जीडीपी सीरीज़ में जिस जीडीपी डिफ्लेटर का इस्तेमाल किया गया है, वह मात्र 0.5% की महंगाई मान कर चलता है, जो जमीनी हकीकत से बिल्कुल अलग है। कांग्रेस का कहना है कि करोड़ों परिवार रोजमर्रा की महंगाई से जूझ रहे हैं, ऐसे में इतनी कम महंगाई मानकर जीडीपी आंकड़े बनाना संदिग्ध है।
जयराम रमेश ने तीन पाइंट्स को हाईलाइट किया
जयराम रमेश ने तीन पाइंट्स को हाईलाइट किया है। कांग्रेस नेता ने एक्स पोस्ट में कहा है कि निजी निवेश में कोई उल्लेखनीय तेजी नहीं दिख रही है। उनके मुताबिक ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन यानी स्थायी पूंजी निवेश में कोई स्पष्ट उछाल नहीं है, इसलिए ऊंची जीडीपी वृद्धि को टिकाऊ नहीं माना जा सकता।
उन्होंने जीडीपी डिफ्लेटर को भी ‘अवास्तविक’ बताया और आरोप लगाया कि सरकार महंगाई को बेहद कम दिखाकर आर्थिक प्रदर्शन बेहतर दिखाने की कोशिश कर रही है। रमेश का कहना है कि वास्तविक महंगाई आम लोगों की जेब पर साफ असर डाल रही है, लेकिन आंकड़ों में उसे छुपाने की कोशिश की जा रही है।
आईएमएफ द्वारा भारत के राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी को ‘सी’ ग्रेड दिए जाने को डेटा की विश्वसनीयता पर गंभीर संकेत माना जा रहा है। यह ग्रेड उस बहस को जन्म दे दिया है जिसमें कहा जा रहा है कि जीडीपी की बेस ईयर और गणना पद्धति कई बार बदली गई है, टैक्स कलेक्शन व अन्य आर्थिक संकेतकों से आंकड़ों का मेल कम दिखाई देता है और हेडलाइन ग्रोथ तेज दिखाई देने के बावजूद निजी निवेश और कैपेक्स में ठहराव बना हुआ है।
जयराम रमेश ने इन सभी पहलुओं को जोड़ते हुए सवाल उठाया है कि जब आईएमएफ जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को ही भारत के आंकड़ों पर पूरा भरोसा नहीं है, तो तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दावा किस आधार पर किया जा रहा है।
कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने भी आंकड़ों पर गंभीर सवाल खड़े किए हें। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह वृद्धि आम जनता के जीवन में दिखाई नहीं दे रही है, जिससे आंकड़ों की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा होता है।
सुरेंद्र राजपूत ने कहा, दुनिया भर के लोग, वैश्विक संस्थाएँ और भारत में कई विपक्षी नेता कह रहे हैं कि पिछले 10 वर्षों का भारत का सांख्यिकीय डेटा विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता है। लेकिन जीडीपी की यह वृद्धि आम लोगों को भी दिखाई देनी चाहिए।” उन्होंने केंद्र सरकार से मांग करते हुए कहा कि यदि बेरोजगारी कम हुई है, तो सरकार को सबूत देना चाहिए; यदि महंगाई कम हुई है, तो सरकार को यह दिखाना चाहिए; यदि उत्पादन बढ़ा है, तो सरकार को डेटा पेश करना चाहिए; और यदि किसानों को उनकी फसलों का उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य मिला है, तो सरकार को वह भी प्रदर्शित करना चाहिए।

