Friday, March 20, 2026
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न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब हमेशा सरकार के खिलाफ फैसले लेना नहींः डीवाई चंद्रचूड़

नई दिल्लीः भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ हमेशा सरकार के खिलाफ निर्णय देना नहीं है। दिल्ली में एक समारोह में बोलते हुए, उन्होंने न्यायाधीशों की निष्पक्षता और उनके विवेक पर भरोसा बनाए रखने की बात पर जोर दिया।

मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ 10 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। उन्होंने कहा कि “जब मैंने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार दिया और केंद्र सरकार के खिलाफ फैसला सुनाया, तो मुझे ‘बहुत स्वतंत्र’ कहा गया। लेकिन यदि कोई निर्णय सरकार के पक्ष में जाता है, तो कहा जाता है कि न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं है। यह स्वतंत्रता की मेरी परिभाषा नहीं है।”

गौरतलब है कि 15 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। इस फैसले का नेतृत्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने किया था। यह योजना 2018 से विवादों में रही है, क्योंकि इसे राजनीतिक फंडिंग के एक अपारदर्शी तरीके के रूप में देखा गया था।

‘न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब कार्यपालिका से स्वतंत्रता माना जाता रहा है’

मुख्य न्यायाधीश ने आगे बताया कि परंपरागत रूप से न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब कार्यपालिका से स्वतंत्रता माना जाता रहा है, लेकिन यह आज के परिदृश्य में काफी बदल गया है। उन्होंने कहा, “हमारा समाज बदल चुका है, खासकर सोशल मीडिया के आगमन के साथ। आज कई दबाव समूह और हित समूह हैं जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सहारा लेकर न्यायालय पर अपने अनुकूल निर्णय पाने का दबाव बनाते हैं।”

‘विवेक और अंतरात्मा की आवाज के अनुसार फैसला लेने की आजादी हो’

उनके अनुसार, ऐसे कई समूह न्यायपालिका को केवल तभी स्वतंत्र मानते हैं जब निर्णय उनके पक्ष में आता है। चंद्रचूड़ ने कहा, “मुझे इस बात से आपत्ति है कि ‘अगर आप मेरे पक्ष में फैसला नहीं देते, तो आप स्वतंत्र नहीं हैं।’ एक न्यायाधीश को स्वतंत्र होने के लिए अपने विवेक और अंतरात्मा की आवाज के अनुसार निर्णय लेने की आजादी होनी चाहिए। बेशक, वह विवेक जो संविधान और कानून के दिशानिर्देशों के अनुसार हो।”

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि जनता को न्यायाधीशों को इस स्वतंत्रता के साथ निर्णय लेने का अवसर देना चाहिए, जिससे वे सही और न्यायसंगत निर्णय दे सकें, चाहे वह किसी के भी पक्ष में हो। उन्होंने कहा, “ऐसे मामले जिनमें सरकार के खिलाफ फैसला देना आवश्यक होता है, हम वहां सरकार के खिलाफ निर्णय देते हैं। लेकिन यदि कानून की मांग है कि मामला सरकार के पक्ष में जाए, तो निर्णय कानून के अनुसार ही किया जाना चाहिए।”

उनके इस विचार ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर समाज में एक नई सोच को जन्म दिया है। न्यायपालिका के सशक्त और स्थिर बने रहने के लिए निष्पक्षता और विवेक को महत्वपूर्ण बताते हुए, मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने एक गहरा संदेश दिया कि स्वतंत्रता का सही अर्थ केवल सरकार का विरोध नहीं, बल्कि संविधान और न्याय की मूल भावना का पालन है।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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