पिछले सप्ताह एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यह दृश्य देखने को मिला कि योगी सरकार के एक मंत्री ने मंच पर मौजूद मंडलायुक्त के पैर छुए। बिहार में एक भारतीय जनता पार्टी के नेता, जो उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं, अपने विभाग के प्रधान सचिव को हमेशा “भइया” या “सर” कहकर संबोधित करते रहे हैं। यह राजनीतिक और प्रशासनिक संबंधों की जटिल प्रकृति को दर्शाता है।
सन 1991 में जब बीजू पटनायक उड़ीसा (अब ओडिशा) के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने तत्कालीन आबकारी आयुक्त को निलंबित कर दिया। इसके विरोध में राज्य के आईएएस अधिकारियों के संगठन ने राजधानी के एक प्रतिष्ठित क्लब में आपात बैठक बुलाकर निलंबन वापस लेने की मांग की और कार्य बहिष्कार की चेतावनी दी। बीजू पटनायक ने कड़ा रुख अपनाते हुए संवाददाता सम्मेलन में कहा कि वे राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को जिलाधिकारी और सचिव नियुक्त कर देंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान में कहीं यह अनिवार्य नहीं है कि केवल आईएएस अधिकारी ही इन पदों पर रहें।
बीजू बाबू प्रशासनिक तंत्र से प्रभावित होने वाले नेता नहीं थे। एक बार वे औद्योगिक नीति जारी कर रहे थे और अपनी उद्योग सचिव, जो आईएएस अधिकारी थीं, की सराहना कर रहे थे। तभी एक युवा पत्रकार ने पूर्व मुख्यमंत्री जानकी बल्लभ पटनायक के कार्यकाल की पुरानी औद्योगिक नीति की प्रति दिखाते हुए आरोप लगाया कि नई नीति शब्दशः उसी की नकल है, केवल मुख्यमंत्रियों के चित्र बदले गए हैं। बीजू पटनायक ने दस्तावेज मंगवाकर देखा तो पाया कि आरोप सही है। वे संवाददाता सम्मेलन बीच में छोड़कर चले गए और संबंधित अधिकारी को उसी दिन महत्वहीन पद पर भेज दिया गया।
जम्मू और कश्मीर में अपनी वेतनमान और पदमान योजना के तहत राज्य सेवा के अधिकारियों को भी जिला उपायुक्त बनाया जाता रहा है। वहां एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने मुख्यमंत्री से कहा कि उनकी ईमानदारी संदेह से परे है। मुख्यमंत्री ने उत्तर दिया कि अब तक तो संदेह नहीं था, पर जब आप स्वयं यह दावा कर रहे हैं तो इसकी जांच भी कराई जाएगी। अधिकारी ने तुरंत अपनी बात वापस ले ली।
गुजरात में जब अमरसिंह चौधरी मुख्यमंत्री थे, तब राजकोट के नगर आयुक्त एस जगदीशन को दल विशेष के कार्यकर्ताओं के अतिक्रमण हटाने से रोकने को कहा गया। अधिकारी ने विनम्रता से उत्तर दिया कि वे किसी भी दल में भेद नहीं करते। मुख्यमंत्री के दोबारा दबाव डालने पर उन्होंने कहा कि वे बिना भेदभाव कार्रवाई जारी रखेंगे। उसी शाम उनका स्थानांतरण कर दिया गया। शहर में विरोध भड़का, तेरह दिन तक कर्फ्यू लगा रहा और पुलिस की गोलीबारी में नौ लोगों की जान गई।
बिहार में आईएएस अधिकारियों के संगठन ने एक बार सरकार के खिलाफ सार्वजनिक असंतोष जताते हुए काली पट्टी बांधकर काम करने और मौखिक आदेश न मानने की घोषणा की। उन्होंने राजभवन क्षेत्र तक मार्च किया, जो धारा 144 के तहत प्रतिबंधित क्षेत्र माना जाता है, विशेषकर विधानसभा सत्र के दौरान। यह आचरण अखिल भारतीय सेवा आचरण नियम 1968 के प्रावधानों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है, जिसमें सरकार को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने या उसकी आलोचना से बचने का निर्देश है।
पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि 1987 बैच के आईएएस अधिकारी सुधीर कुमार की गिरफ्तारी प्रतिशोधात्मक कार्रवाई थी और उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी का नाम भी लिया था। सुधीर कुमार ने भी गिरफ्तारी से पहले नियुक्तियों में हस्तक्षेप के आरोप लगाए थे। यह घटनाएं उस समय के प्रशासनिक और राजनीतिक टकराव को उजागर करती हैं।
यह भी कहा जाता है कि नीतीश कुमार दबाव की राजनीति के आगे झुकने के अभ्यस्त नहीं हैं। उग्रवादी संगठनों ने भी कई बार सरकार पर अविश्वास जताया है। कुल मिलाकर यह पूरा परिदृश्य सत्ता और नौकरशाही के बीच शक्ति संतुलन की जटिलता को रेखांकित करता है।

