नई दिल्लीः अरावली पर्वत माला (Aravali Mountain Range) को लेकर हो रहे प्रदर्शनों के बीच केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्यों को नए खनन पट्टे देने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है। एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिए यह जानकारी दी गई है। अरावली पर्वत श्रृंखला दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैली हुई हैं।
केंद्र सरकार द्वारा बुधवार, 24 दिसंबर को जारी किए गए आदेश में मंत्रालय ने राज्यों को दिल्ली से गुजरात तक फैली संपूर्ण अरावली पर्वत श्रृंखला में नए खनन पट्टे देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है।
पर्यावरण मंत्रालय ने क्या कहा?
मंत्रालय ने भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) से अरावली पर्वतमाला में उन अतिरिक्त क्षेत्रों की पहचान करने को भी कहा है जहां केंद्र द्वारा पहले से प्रतिबंधित क्षेत्रों के अलावा खनन निषिद्ध होना चाहिए। यह पहचान पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक और भू-दृश्य संबंधी कारकों पर आधारित होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को दिए आदेश में खनन को प्रतिबंधित करने के लिए अरावली पर्वतमाला की परिभाषा पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के एक पैनल की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि स्थानीय भू-भाग से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई पर स्थित कोई भी भू-आकृति, अपनी ढलानों और आसपास की भूमि सहित, अरावली पर्वतमाला का हिस्सा मानी जाएगी।
अरावली पर्वत माला की परिभाषा क्या है?
केंद्र की समिति की सिफारिशों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिया था, उसके मुताबिक, अरावली की नई परिभाषा कोई भी भू-आकृति जो स्थानीय भू-भाग (या स्थानीय प्रोफाइल) से 100 मीटर या उससे अधिक की ऊंचाई पर स्थित है, उसे उसकी ढलानों और आस-पास की भूमि सहित अरावली पहाड़ियों का हिस्सा माना जाएगा।
अरावली की नई परिभाषा ने पर्यावरणविदों के बीच चिंता पैदा कर दी और इसके विरोध में तमाम पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने जगह-जगह प्रदर्शन किया। इन प्रदर्शनों के बीच केंद्र सरकार ने राज्यों को नए खदान पट्टे देने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए हैं।
यह प्रतिबंध संपूर्ण अरावली भूभाग पर समान रूप से लागू होता है और इसका उद्देश्य पर्वतमाला की अखंडता को बनाए रखना है। इन निर्देशों का उद्देश्य गुजरात से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक फैली एक सतत भूवैज्ञानिक श्रृंखला के रूप में अरावली की रक्षा करना और सभी अनियमित खनन गतिविधियों को रोकना है।
केंद्र सरकार ने और क्या निर्देश जारी किए?
इसके अलावा पर्यावरण एवं पर्यावरण संरक्षण मंत्रालय (MoEF&CC) ने भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) को निर्देश दिया है कि वह पूरे अरावली क्षेत्र में उन अतिरिक्त क्षेत्रों/क्षेत्रों की पहचान करे, जहां केंद्र द्वारा पहले से ही खनन प्रतिबंधित क्षेत्रों के अतिरिक्त खनन निषिद्ध किया जाना चाहिए। यह पहचान पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक और भूदृश्य स्तर के विचारों पर आधारित होनी चाहिए।
ICFRE को यह निर्देश दिया गया है कि वह पूरे अरावली क्षेत्र के लिए सतत खनन हेतु एक व्यापक, विज्ञान-आधारित प्रबंधन योजना (MPSM) तैयार करते समय इस कार्य को करे। यह योजना जिसे व्यापक हितधारकों के परामर्श हेतु सार्वजनिक किया जाएगा, संचयी पर्यावरणीय प्रभाव और पारिस्थितिक वहन क्षमता का आकलन करेगी, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील और संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान करेगी और बहाली एवं पुनर्वास के उपाय निर्धारित करेगी।
केंद्र द्वारा किया जाने वाला यह प्रयास स्थानीय स्थलाकृति, पारिस्थितिकी और जैव विविधता को ध्यान में रखते हुए, संपूर्ण अरावली क्षेत्र में खनन से संरक्षित और प्रतिबंधित क्षेत्रों के दायरे को और अधिक बढ़ाएगा।
इसके साथ ही केंद्र सरकार ने यह भी निर्देश दिया है कि पहले से ही चालू खदानों के संबंध में संबंधित राज्य सरकारें सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुरूप सभी पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करें। पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ खनन पद्धतियों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए चल रही खनन गतिविधियों को अतिरिक्त प्रतिबंधों के साथ सख्ती से विनियमित किया जाना चाहिए।

