Friday, March 20, 2026
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पुस्तक समीक्षा: द डे आई बिकेम अ रनर- दौड़ के बहाने जीवन और लिंग की राजनीति

यह पुस्तक केवल दौड़ और खिलाड़ियों की कथा से सम्बंधित नहीं; बल्कि स्त्री शरीर, समाज और संघर्ष की गहन पड़ताल है। सोहिनी चट्टोपाध्याय की द डे आई बिकेम अ रनर निजी अनुभव से शुरू होकर भारतीय महिला धावकों की अदृश्य, कठिन और साहसी यात्राओं को सामने लाती है। यह किताब दौड़ने को जीवन के रूपक की तरह पढ़ती है। यहाँ ट्रैक से ज़्यादा चुनौतीपूर्ण वह रास्ता है, जिसे स्त्रियाँ रोज़मर्रा के भय, भेदभाव और पूर्वाग्रहों के बीच तय करती हैं।

दर्द से मुक्ति नहीं है। लेकिन पीड़ा महसूस करना स्वैच्छिक है। मान लीजिए आप दौड़ रहे हैं और सोचते जा रहे हैं, ‘यार, बहुत दर्द हो रहा है, मैं अब और सहन नहीं कर सकता।’ तो दर्द और अधिक महसूस होगा। दर्द महसूस न हो ये सम्भव नहीं लेकिन दर्द के बाद भी कोई दौड़ में टिका रह पायेगा कि नहीं ये दौड़ने वाले पर निर्भर करता है।..दौड़ना मेरे लिए सिर्फ व्यायाम नहीं है, वो एक रूपक की तरह है।

व्हाट आई टॉक अबाउट व्हेन आई टॉक अबाउट रनिंग-मुराकामी

मुराकामी दौड़ने को एक रूपक की तरह देखते हैं। जैसे जीवन में उतार-चढ़ाव, संतुलन और उस पर नियंत्रण की जद्दोजहद होती है, ठीक उसी तरह दौड़ना भी है। लेकिन औरतों के लिए न तो जीवन के उतार-चढ़ाव एक रेखीय हैं और न ही खेल। उन दोनों की डोर एक दूसरे में गुथी और कई बार उलझी होती है। खेल के मैदान तक पहुँचना ही एक बहुत बड़ी बाधा-दौड़ है। 19 अक्टूबर 2025 के हिन्दुस्तान अखबार में एक सर्वे किया, जिसमें साफ आया है कि महिलायें सार्वजनिक स्थानों पर डर के मारे व्यायाम नहीं कर पाती हैं। बाधा कभी परिवार, समाज तो कभी उन्ही संस्थाओं के द्वारा खड़ी कर दी जाती है जिन्होंने ट्रेंनिंग करवाने का जिम्मा लिया है।

महिला खिलाड़ियों के जीवन पर केन्द्रित बहुत ही कम किताबें हैं। ऐसे में महिला धावकों पर केन्द्रित सोहनी चट्टोपाध्याय की इस किताब ने ध्यान खींच लिया। सोहनी चट्टोपाध्याय अपनी किताब की शुरूआत अपने जीवन-अनुभव से करती हैं। अपने नीजि दुख से निकलने के लिए वो दौड़ने को थेरेपी की तरह लेती हैं। वो लिखती हैं कि – ‘सुबह दौड़ना मेरे लिए शोक के अनुष्ठान की तरह हो गया। मुझे याद है कि यह दुःख मेरे लिए कितना भारी था: जैसे मैं कोई बोझिल, मरा हुआ वजन ढो रही थी। यह बहुत थका देने वाला था। मैंने उसे उतार फेंकने के लिए दौड़ लगाई। मैं लगातार, गंभीरता से दौड़ने लगी – मैं रोज़ मैदान पर जाती थी। लेकिन उस समय मैं मुश्किल से 700 या 800 मीटर दौड़ पाती थी, और एक बार में तो 500 मीटर भी नहीं।

‘मैं सौभाग्यशाली थी कि दक्षिण दिल्ली की एक कॉलोनी में रहती थी जहाँ पर कुछ पार्क और जॉगिंग ट्रैक थे। मैं जिस पार्क में मैं दौड़ती थी वह काफी लोकप्रिय था । वहाँ एक व्यस्त क्रिकेट कोचिंग कैंप चलता था, कई टहलने वाले और कुछ जॉगर्स आते थे। क्रिकेटर मैदान के समतल आधे हिस्से पर कब्जा कर लेते थे; टहलने वाले और हल्के-फुल्के जॉगर्स बाहर के ट्रैक पर चलते थे।

उन दिनों मैं खुद में एक बोझ थी । एक ऐसा छोटा सा, जल्दी हांफने वाला बोझ। मैं बगीचे के निचले, असमतल हिस्से में दौड़ती थी। मुझे जॉगिंग ट्रैक पर दौड़ने का हक नहीं था । मैं अदृश्य होना चाहती थी। कुछ दुःख था। मैं बस होना नहीं चाहती थी।’

सोहनी वास्तव में मुराकामी की बात को और विस्तार से यहाँ लिख रही हैं कि दौड़ना सिर्फ दौड़ना नहीं है। अपने जीवन अनुभव से शुरू करके लेखिका भारत की नौ महिला धावकों की जिन्दगी और खेल पर लिखती हैं। वो इन खिलाडियों से मिलकर उन्हें और बेहतर तरीके से समझती हैं।

2015 की बात है। ब्रिटेन की नंबर एक टेनिस खिलाड़ी हीथर वाटसन ने ऑस्ट्रेलियाई ओपन में पहले दौर की हार के बाद कहा था कि वे खेल के दौरान ‘अच्छा महसूस नहीं’ कर रहीं थीं। 22 साल की वाटसन ने कहा कि उन्हें खेल के दौरान चक्कर और उल्टियां आ रही थी और वो कमज़ोरी महसूस कर रहीं थीं।

वो बुल्गारिया की खिलाड़ी 52 रैंकिंग की स्वेताना पिरोनकोवा से हार गईं थीं। उन्होंने इन्टरव्यु में कहा कि दरअसल उन्हें लड़कियों के साथ होने वाली दिक्कत हो रही थी। यानी वो पीरियड्स के दौरान क्रैम्पस की बात कर रही थी। भारत की लम्बी कूद की शानदार खिलाड़ी अंजु बॉबी जार्ज ने भी एक इन्टरव्यू में कहा था कि उन्होंने तकरीबन दो मैच पीरियड्स के दौरान होने वाली दिक्कत के चलते हारा है। और वो ऐसी हालत होती है कि जिसे दूसरों को समझाया भी नहीं जा सकता है।

औरत का शरीर और उसकी सामाजिक तकलीफों को समझकर उसके स्टेमना को समझा जा सकता है। लेकिन यह समझ संवेदना पैदा करती होती तो कितना सुन्दर होता। औरत के शरीर को ठीक इसके विपरीत कमजोर और खेलों से बहिष्कृत मान लिया गया।

पहले लम्बी दूरी की दौड़ प्रतियोगिताओं में महिलाओं को शामिल नहीं होने दिया जाता था। मैराथन वुमन नाम से अपनी स्मृतियों को दर्ज करने करने वाली एतिहासिक खिलाड़ी कैथरीन स्वितज़र ने लिखा कि उन्होंने के वी स्वीतजर नाम से बास्टन मैराथन में खुद को रजिस्टर किया था। उस समय कैथरीन 19 वर्ष की थीं, वह लिखती हैं कि कैसे रेस के दौरान उन्हें धकियाया गया था लेकिन वो सबकुछ भूलकर दौड़ती रहीं। इस तरह चार घंटे बीस मिनट तक लगातार दौड़कर बोस्टन मैराथन पूरा करने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनीं। कितने आश्चर्य की बात है जब खिलाड़ियों को चीयर किया जा रहा होगा वहाँ एक औरत पर हमला हो रहा था। दरसल बोस्टन मैराथन तो 1966 में राबर्टा गिब ने ही पूरा कर लिया था वो ट्रैक से अलग लगी झाड़ियों वाले रास्ते पर दौड़ती रही। लेकिन औपचारिक तौर पर उनका नाम रजिस्टर में दर्ज नहीं था।

औरतों का धावक होना और धकियाना जाना साथ-साथ चलता रहा है।

मुम्बई के जिमखाना क्लब से लेकर हेलेंस्की तक दौड़ प्रतियोगिताओं की हिस्सा बनी भारत की शुरूआती धावक मेरी डिसूजा के बारे में जब लेखिका बात करती हैं तो उन्हें अपनी दादी का ख्याल आता है और इसी चैप्टर में किताब बहुत ही साहित्यिक मोड़ लेती है कि कैसे साहित्य में घर के बाहर स्त्रियों की एक दुनिया बनने लगी है। जब वह एशियन गेम्स में कमलजीत सिन्धु की भूमिका पर बात करती हैं तो ठीक उसी समय वह कलकत्ता के राजनीतिक हालात पर भी चर्चा करती है। वह यह भी बताती है कि कैसे एक साधारण स्त्री तमाम तरह के भय का शिकार थी। बाहर उसके साथ किसी भी तरह की दुर्घटना हो सकती है ऐसे में उसका खेल के मैदान में आना वास्तव में एक चमत्कार की तरह है। 1984 में पी टी ऊषा की बेमिसाल यात्रा रही है। लेकिन बाद के वर्षों में केरल से सटे तमिलनाडु की सांथि सौन्दर्याजन को अब शायद ही कोई याद करता हो। 2006 के दोहा ओलम्पिक में उन्हें 800 मीटर रेस में सिल्वर मेडल मिला था लेकिन दो दिन बाद
मेडिकल सेक्स टेस्ट में उन्हें फेल कर दिया गया। खेल के इतिहास में औरतों को अपना सेक्स टेस्ट देना होता है, जिसकी कहानी बहुत ही दारूण और तकलीफ देह है। टाइम्स आव इन्डिया के मुताबिक 2009 में सांथि भट्टा मजदूर के तौर पर काम करके गुजारा कर रही हैं। बहुत बाद में अखबार आदि में खबर आने के बाद उन्हें 2016 में कोई सरकारी नौकरी दी गयी। सांथि के जीवन पर अलग से एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है।

एक गरीब-दलित परिवार की बेटी ने लगातार प्रैक्टिस के बाद दोहा में मकाम हासिल किया। फिर उन्हीं के शब्दों में उन्हें एक ऐसे इक्जाम में फेल कर दिया गया, जिसका वो सैलेबस तक नहीं जानती थी। बहरहाल तमाम तरह के मेडिकल और सेक्स टेस्ट की राजनीति और उसकी तैयारी पर ज्यादा कुछ कहते नहीं बनता है।

अगला तकलीफदेह नाम पिंकी प्रमाणिक का है। 15 जून 2012 को उन्हें बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इतना ही नहीं ठीक कैमरे के सामने उनकी छाती दबोचे दो पुलिसवाले साथ चल रहे थे। उन्हें उनकी लिव इन पार्टनर की शिकायत पर गिरफ्तार किया था। उसके बाद उन्हें पुरूषों की जेल में रखा गया। एक लड़की जिसके पास स्पाइक्स खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, बालू पर दौड़ लगाकर अपना स्टेमना बढ़ाया था उसे लगातार अपने सेक्स की सही पहचान के लिए लड़ना पड़ा। जब तक फैसला आया तबतक बहुत देर हो चुकी थी।

हिन्दुस्तानी समाज में स्त्री की एक विशिष्ट देहयष्टि मानी जाती है खिलाड़ी लड़कियों का शरीर, उनके हार्मोंन्स में बदलाव हो सकते हैं। किसी की भी अलग सेक्सुआलिटी हो सकती है, लेकिन इस पर खुलकर चर्चा शायद ही हो। पिंकी प्रमाणिक की दौड़ का इतिहास एक ऐसी सर्पीली दौड़ का हिस्सा है, जिसका सिरा अब भी नहीं मिला है।

लेकिन पिछली हार आगे लड़ने का साहस भी देती है। उसका उदाहरण दुती चांद हैं। वो इकलौती भारतीय धावक है जिन्होंने अपनी सेक्सुआलिटी साफ जाहिर की। उन्होंने अपने समलैंगिक होने की बात सबके सामने स्वीकार की। 2014 में उनके टेस्टोस्टेरोन ज्यादा होने के चलते डिस्क्वालिफाई कर दिया गया था। उसके ठीक दो महीने पहले उन्होंने दो गोल्ड मेडल जीता था। दुती ने कानूनी लड़ाई लड़ी वर्ल्ड एथलीट सेन्टर आखिर तक नहीं बता सका कि पुरूषों का टेस्टोस्टेरोन का कटआफ क्यों नहीं तय है। दुती को उनके खेल के लिए बहुत कम लेकिन मीडिया पूरे समय उनके जीवन को लेकर गॉसिप बनाता रहा।

ललिता बाबर से लेकर सोहिनी तक सूरज के उगने से पहले उठने वाली साधारण घरों में रहने वाली धावकों पर एक पूरा चैप्टर है। लड़की जिस दिन से लड़की के तौर गर्भ में पहचान ली जाती है उस दिन से वह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती है। उसकी पढ़ाई लिखाई शादी दहेज बच्चे से लेकर हर समय वो एक बाधा दौड़ में शरीक होती है। लेखिका जितना ट्रैक का जायजा लेती है उससे कहीं ज्यादा उस न दिखने वाले ट्रैक के बारे में बताती है जिसने कितनी खिलाड़ियों को निगल लिया।

सच्चाई यही है कि खेल के मैदान में बहा पसीना बहुत सारी जड़ मान्यताओं और बहुत सारे तनाव को पिघला देता है और वो शरीर और मन दोनों को तरोताजा करता जाता है।

पुस्तक का नाम: द डे आई बिकेम अ रनर
लेखिका:सोहनी चट्टोपाध्याय
विधा:कथेतर (खेल)
प्रकाशक: हार्पर कोलिन्स व न्यु इंडिया फाउंडेशन के सहयोग से प्रकाशित
मूल्य-599

सविता पाठक
सविता पाठक
परिचय- सविता पाठक का जन्म जौनपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ है। शिक्षा विभिन्न शहरों से हुई है। हिन्दी की कई प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में लेख और कहानियाँ प्रकाशित। इसके अलावा सविता अनुवाद करती है। डा आंबेडकर की आत्मकथा वेटिंग फार वीजा का अनुवाद। क्रिस्टीना रोसोटी की कविताओं के अलावा कई लातीन अमरीकी कविताओं का अंग्रेजी से अनुवाद। पाखी के सलाना अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित। वीएस नायपाल के साहित्य पर शोध। हाल में ही इनका उपन्यास ‘कौन से देस उतरने का’ लोकभारती प्रकाशन से आया है जिसकी काफी चर्चा हुई। हिस्टीरिया और अन्य कहानियाँ नाम से कहानी संग्रह। फिलहाल सविता पाठक दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध एक कालेज में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन करती हैं।
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